फरवरी 20 का जिन्न
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दिल्ली की वादियों में
जैसे कोई जहर घोला हो
समरसता की कंघी का दांता
जैसे जबरजस्ती कोई तोड़ा हो
जैसे कोई धर्म के चश्मे को
अपने पैरों से रौंदा हो।
भाईचारे की आंखों में
जैसे कोई कांटा चुभाया हो
उन्मुक्त सोच की पतंग की
जैसे कोई मांझा को काटा हो
सपनो वाली नींद में कोई जैसे
कोयला का अंगारा फेंका हो।
दिल के फ़िक़रे का कोई
जैसे शब्द का दीया बुझाया हो
बिश्वास की चूनर में
जैसे आग कोई लगाया हो
अल्ला ईश्वर रटने पर
जैसे जीभ कोई कटवाया हो।
84 का जिन्न निकल कर जैसे
फरवरी 20 में तांडव मचाया हो
प्यार जी जुवान पर जैसे
नफरत के फफोले निकले हों
गर्भवती महिला के जैसे
कोई पेट में चाकू खोपा हो।
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'
किताब-'सच के छिलके' कविता संग्रह से