मानसिक सन्तुलन जब चरमराता है तो सर्व प्रथम स्थूल देह को अपने आगोश में लेता है और फिर काम पिपासा क्रियान्वित हो उठती है जो विकृति, असमायोजित होकर अनैतिकता को जन्म देती है...इसी बिषय को मुखरित करती मेरी दूसरी कहानी 'जूठन' लेकर हम मातृभारती पर कल यानि 3 मार्च को आ रहे हैं पढ़े साथियों और 'एक थी अनु' की भांति इसे भी अपना लाड-दुलार दें....आपकी प्रतिक्रिया की आकाक्षीँ
छाया अग्रवाल