शीर्षक :- हम लाशें है।
हम रोज़ किसीका जलता हुआ घर देखते है
लौटकर अपने घर आते है और भूल जाते है।
हर रोज़ हमारे कानमें किसीकी चींखें पड़ती है
हम इयरफोन लगाए म्यूज़िकमें खो जाते है।
रॉड पर पड़े उस घायलने हमें भी पुकारा था
पर हमें फुरसत कहा, सो आगे बढ़ जाते है।
उस मासूम बच्चेने हमसे भी कुछ माँगा था
फिर बादमे उसने छीनना शुरू किया है।
दिखता हमे सबकुछ है, पर शायद
हम देखना ही नही चाहते,
सुनते हुए भी बहेरे बनते है,
दरसल हम आदि हो चुके है
इन हालात के,
हमे फर्क ही नही पड़ता।
हम लाशो के ढेर पर बैठे हुए,
किसी फ़िल्म के आलोचक या
किसी खेल के दर्शक बने हुए है।
हम भीड़ के उस हिस्से की तरह है
जिसे कोई मतलब नही इंसानियत से
वो सिर्फ अपने आकाओका हुक्मरान है।
हमें सुबह चाय के साथ अखबार में
थोडा कत्लेआम भी दिया जाता है
ओर दिनभर टीवी हमें सिखाए रखता है
जिससे हमारी आदत बनी रहे।
असलमें हम सब मर चुके है
ये जो घूम रहे हे, ये लाशें है
जो घर से काम को जाती है
ओर घर लौटकर सो जाती है ।
- अरविंद 'ख़ानाबदोश'
#Kavyotsav2