Hindi Quote in Poem by Rooh The Spiritual Power

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My New Poem ...!!!!

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यारों अपने बचपन की वह मासूम जिद्द जब
ख़ुद ही समझौते में बदलने लगी

तब माना हमने, कि उम्र बेपरवाह आशिक़ी
कि अब तो सच में अपनी ढलने लगी

कूच-ए-यार के चक्कर हमने काटे थे कभी
अनगिनत, सोच पर अब बदलने लगी

हस्ती-ए-मस्ती तक कभी सजती सँवरती
पर आज आशिक़ी रब को ही चाहने लगी

शब-ओ-साँझ कभी घुमते थे बिलावजह
अब जीदगीं जीने की वजह हाथ लगी

रुसवा-ओ-बर्बाद तो बहुत हूएँ है हम, इश्क़
की मंज़िल पर प्रभु में ही अब दिखने लगी

करवटें जीदगीं की कितने अनजाने मोड़ से
गुजरते गुजरते , कश्ती किनारे आ लगी

यादों का जज़ीरा, ख़्यालों के तूफ़ान समेटे
हालाती-थपेड़ोंसे नैया साहिल पे आ लगी

जाने कितने उतार-चढ़ाव के पड़ाव पार कर
जीदगीं आज रुँहानियत से गले लगी

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Hindi Poem by Rooh   The Spiritual Power : 111338491
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