My New Poem ...!!!!
.......💛💙💛💙💛💙💛💙.......
यारों अपने बचपन की वह मासूम जिद्द जब
ख़ुद ही समझौते में बदलने लगी
तब माना हमने, कि उम्र बेपरवाह आशिक़ी
कि अब तो सच में अपनी ढलने लगी
कूच-ए-यार के चक्कर हमने काटे थे कभी
अनगिनत, सोच पर अब बदलने लगी
हस्ती-ए-मस्ती तक कभी सजती सँवरती
पर आज आशिक़ी रब को ही चाहने लगी
शब-ओ-साँझ कभी घुमते थे बिलावजह
अब जीदगीं जीने की वजह हाथ लगी
रुसवा-ओ-बर्बाद तो बहुत हूएँ है हम, इश्क़
की मंज़िल पर प्रभु में ही अब दिखने लगी
करवटें जीदगीं की कितने अनजाने मोड़ से
गुजरते गुजरते , कश्ती किनारे आ लगी
यादों का जज़ीरा, ख़्यालों के तूफ़ान समेटे
हालाती-थपेड़ोंसे नैया साहिल पे आ लगी
जाने कितने उतार-चढ़ाव के पड़ाव पार कर
जीदगीं आज रुँहानियत से गले लगी
✍️💛💙💛💙💙💛💙💛💙✍️