वेदना
सडक के किनारे चुपचाप उपेक्षित बैठी हुई वह अबला नारी हर आने जाने वाले को कातर निगाहों से देख रही थी। उसके पास रूककर उसके दर्द को जानने का प्रयास कोई भी नही कर रहा था। उसके तन पर फटे-पुराने कपडे लिपटे हुये थे, जिससे वह बमुश्किल अपने तन के ढके हुए थी। उसके चेहरे पर असीम वेदना एवं आतंक का भाव दिख रहा था। वह अपने साथ कुछ माह पूर्व घटी निर्मम,वहशी बलात्कार की घटना के बारे में सोच रही थी, और इसे याद करके थर थर कांप रही थी।
इतने में पुलिस की गाडी की गाडी आयी, जिसे देखकर उसका खौफ, मन का डर और भी अधिक बढ गया। यह देखकर उसके मन में उस दिन की याद ताजा हो गयी, जब वह थाने में अपने साथ हुये अत्याचार एवं अनाचार का मामला दर्ज कराने पहुँची थी, परंतु उसके प्रति सहानुभूति ना रखते हुए पुलिसवालों ने उसे डांट डपटकर भगा दिया था। जिन अपराधी तत्वों ने ऐसा घृणित कृत्य किया था, वे अभी भी बेखौफ घूम रहे थे। पुलिसवाले उसे सडक से थोडा दूर हटकर बैठने की हिदायत देकर चले गये, मानो वे अपना फर्ज पूरा कर गये थे। उसे भिखारी समझकर कुछ दयावान व्यक्ति चंद सिक्के उसकी ओर उछालकर आगे बढ जाते थे। वह असहाय, इंसान में इंसानियत को खोज रही थी, जो समाज से तिरस्कृत एक गरीब महिला थी, जिसकी ऐसी स्थिति उसके परिवार के निजी कारणों से हो गई थी।
उसने सडक पर ही असीम प्रसव वेदना के साथ एक बच्चे को जन्म दे दिया, वह पीडा से निरंतर तडप रही थी। किसी संवेदनशील ने उसकी दयनीय हालत देखकर आपातकालीन सेवा को सूचना दी। उन्होने त्वरित कार्यवाही करते हुये उस ले जाकर शासकीय अस्पताल में भर्ती करा दिया, परंतु समय पर इलाज ना होने के कारण उसकी मृत्यु हो गई और उसकी संतान को अनाथालय में भेज दिया गया। मैं सोच रहा था, जिस बच्चे का जन्म ऐसी परिस्थितियों में हुआ हो, उसका बचपन, जवानी और बुढापा कैसे बीतेगा ?
कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि एक विदेशी दंपती बच्चे को गोद लेकर अपने देश चले गये है। जिसका कोई नही होता उसका भगवान होता है।