हर रंग के फूल खिले है इसके अंदर ,
रंगमंच बना है जिंदगी का दर्पण ।
खिलते भी है ,मुरझाते भी है , अनगिनत स्वपन इसके अंदर ,
य॓ उम्मीदों की नींव पे टिका है रंगमंच का हर क्षण ।
आँखो में नमी , चेहरे पे हँसी ,मुखौटा डाल खड़े हैं यहाँ सभी ,
ये रंगमंच है , हर अंश में अभिनय करते हैं यहाँ सभी ।
हर सोच पर रोज, एक कहानी लिखते हैं हर रोज ,
इस रंगमंच पर किरदार बदलते हैं हर रोज ।
मेरी ये सोच , रंगमंच का है दोष ,
जो ये किरदार बदलता है मेरा हर रोज ।