वह अंजान !
निभा स्टाफ बस में चढ़ कर बैठी ही थी कि एक युवक उसके बगल में आ कर बैठा और उसने नमस्ते की । निभा ने आदत के अनुसार - "खुश रहिए।" कहा ।
"आंटी आपका घुटना अब कैसा है ?"
"ठीक है बेटा लेकिन आप ....?"
"पिछली बार जब मैं आया था तो बस में चढ़ते समय अचानक आप को दर्द हुआ था ।"
"अरे , आप वही हैं जिन्होंने मुझे गोद में उठा कर नीचे गाड़ी में लिटाया था ।"
"जी आंटी , तब मैं लखनऊ से आया था और उसके बाद आज आना हुआ ।"
"मुझे ये लग रहा था कि उस हालत में मैंने आपको देखा भी नहीं था , धन्यवाद भी नहीं दे सकी ।"
"धन्यवाद क्यों ? मेरी माँ होती तो भी मैं यही करता और आप मेरी माँ के जैसी ही है ।"
निभा का मन अभिभूत हो गया । वह उस दिन को याद करने लगी , जब बस में चढ़ते समय पैर में कुछ हुआ कि वह चीखने लगी , न चढ़ पा रही थी और न उतर पा रही थी । पीछे आने वालों ने किसी तरह ऊपर चढ़ाया और सीट पर बिठा दिया । वह अर्द्ध बेहोशी हालत में टिक गई । उसकी आँखें नहीं खुल रही थीं । पास बैठी लड़की ने मोबाइल लेकर पति को फोन किया कि ऐसी हालत है , कहाँ उतारा जाय ? अस्पताल के पास वाले स्टॉप पर गाड़ी रोकी गयी । खुद तो खड़ी भी नहीं हो सकती थी । तभी किसी युवक ने कहा - "आप लोग हटिए , मैं उतार देता हूँ ।"
और उसने गोद में उठा कर गाड़ी में लिटा दिया । उस समय तो उसका चेहरा भी ठीक से नहीं देख पाई थी ।पर आज उसे देखकर ममतामयी माँ बनकर आशीर्वाद की झड़ी लगा दी।
रेखा श्रीवास्तव