"बिटिया का संसार"
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क्या इसी दुनिया में आएगी
वह नन्ही सी कली
बलात्कार, और छेड़छाड़
है जहां गली गली।।
फिक्रेबाज़ी, तानेबाज़ी
जिनको हर मोड़ पर मिलती है
डरी-सहमी हर क्षण सबसे
अजीब सी घुटन में वह पलती है।
मार्किट में, मुहल्ले में
कॉलेज में, स्कूल में
यहां तक कि सुरक्षित नहीं है
घर के ही माहौल में।।
बाप जो उसका संरक्षक है
स्वयं ही उसका भक्षक है
शिक्षक जो समाज निर्माता है
ऐसे उसके कर्म
शैतान भी शर्माता है।।
नारी ही नारी की विक्रेता है,
देखो...भाई ही बहन का क्रेता है
रिश्तेदारों ने भी खूब रिश्ता निभाया है
चंद पैसों के लिए भांजी-भतीजी बेच आया है।।
मां का अब किरदार भी देखो
कैसा अभिनय दिखाया है
बालक की किलकारी खातिर
बेटी को भेंट चढ़ाया है।।
इसीलिए तो डरता हूँ मैं
इस कलयुगी संसार से
कैसे कह दूं आजा बेटी
आजा शैतानों के बाजार में।।
"सिराज" तेरी लेखनी में भी
क्या स्याही की कमी है
या फिर तू भी है उनमें से
जिनसे ये दुनिया भरी है।।
- सिराज अंसारी