अब हर वो शख्स
अब हर वह लम्हा
भुला देना चाहते थे जिन्हें
पर भुला नहीं पाते
जीना चाहते थे बिना गम के
पर शायद गम को मेरी आदत सी है
छोड़कर चले जाना है सबकुछ
फिर भी क्यों ऐसे लगाव है
ना जाने क्या है बंधनों की डोरीयों में
जो खींचे जा रही है
लाख छुड़ाए इनसे दामन अपना
पर यह है कि बंधे जा रही है
-बिंदु अनुराग