My New Poem...!!!!
इश्क़ में सब्र इतना रखो कि किसी भी,
हाल में यारों इश्क़ कभी बेहूदा न बने...
गर इश्क़ में खुदा मेहबूब बन जाए तो क्या,
बात है, पर मेहबूब कभी खुदा न बने...
पगली आवारगी इश्क़ में जायज़ तो है,
मगर दीवानगी में जान भी तो जाती हैं..
माशूक़ का हुस्न बे-मायने आशिक़ की,
नज़र में पर रब ही आशिक़ तो हक़ हुस्न है..
चिराग़ दिलके जले तो रौशन नज़र हो,
दिल ही चिराग़ बने तो रोशनी तालिब हो..
आसान तो नहीं डगर इश्क़ की तय करना
परवाने पर शमादान में दम तोड़ मुक्ति पाते
गहराईं इश्क़ की तेह तक समजा हैं कौन
लैला हैं कौन मजनू हैं कौन बात जाना हैं कौन
जब ना था कोई तो ख़ुदा था ना होगा कोई
तो ख़ुदा होगा ख़ुदा ख़ुद बन के आया कौन
जाने वो खेल खेलें कैसे निरालें बंदे के ढाँचे
में बंदा बन के आया कौन जाएगा कौन..??
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