है मिली ज़िंदगी तो मज़ा लीजिये
रहने को न मिले गर तुम्हें कोई घर
आकर मेरे दिल में पनाह लीजिये
अपनों है अगर कोई शिकवा तुम्हें
गैरों में न इसे यूँ बयां कीजिये
जब दवा से न हो इलाजे मरज़
हाथ दोनों उठा कर दुआ कीजिये
नापसंद हैं तुम्हें झूठे रिश्ते अगर
देर न कीजिये , फासला कीजिये
आग लग जायगी घर में सुन कर इसे
मज़हबी बातों को न हवा दीजिये
vijay jhamb