लड़के की आस में बैठा था परिवार अब मातम छाया है
खबर मिली जब पक्की की लड़की होने वाली है ,
लड़कों को सहना कोई नही सिखाता , लड़कियों को छोड़ ना पहले सिखा देते है ,
पराई है बताते है , कल किसी ओर घर की अमानत होने वाली है ,
कपड़ो का कद बढ़ाओ बदन ढका करो , नजरे नीची आवाज मधुर रखो ,
तुम लड़का नही लड़की हो , किसी दिन इस आँगन तेरी बारात आने वाली है ,
मत निकलो घर से बाहर , वो सूरज भी साथ छोड़ गया ,
आसमाँ को देखो नजरे उठाकर अब अँधेरी शाम होने वाली है ,
मोहब्बत का गुनाह तू कर नही सकती , ग़र कर गयी तो दोषी है ,
दुनिया कहेगी की ये लड़कियां ही माँ बाप की इज्जत उछालने वाली है ,
संस्कृत कोई नही जानता मगर सब संस्कृति के ज्ञानी है ,
कपड़ो को नापते लोग मुझे नही दिखते धोती , जब्बा , पगड़ी में शायद मेरी नजर पुरानी है ,
तू लड़की है ये दोष सिर्फ तेरा है जो तू जन्मी है इस मिट्टी में ,
तेरी लड़ाईया और मेरे अल्फाजो से ये दुनिया कभी कहाँ बदलने वाली है ...
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