पंखहीन
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वह अक्सर ही मिल जाता है
चौराहे के आस पास, गलियों में भी
हमारे आपके बीच रहकर भी पृथक ही रहता है ,
वह कोई भी हो सकता है:
कभी सिर झुकाए बैठा जूता गांठ रहा होता है,
या भोर होते ही झाड़ू लगाता है इन गलियों में,
कहीं बैठा मिट्टी के घड़े सुराही बेंचता मिलता है
तो कभी बढ़ई की दूकान पर लकड़ी तराशता रहता है,
वह कभी सिर पर ईंटों का पर्वत उठाए
आपके भवन- प्रासाद बनवा रहा होता है
तो कभी तपते सूरज के नीचे खलिहान में जुट
आपकी फसल काट रहा होता है ,
सचमुच, किसी भी रूप में दिख जाएगा वह आपको !
अपनी उस सीलन भरी कोठरी में
या शहर के किसी फुटपाथ पर लेटा अर्धनिद्रा में
रात्रि पर्यन्त खांसता हुआ अनवरत
नीरवता को भंग करता रहता है,
आधा पेट खाकर भी मगर
वह कुछ पैसे जोड़ता है
और हर त्योहार में अपने गाँव लौट जाता है ।
वह आदमी आदिकाल से
जूझता आ रहा है ज़िन्दगी से,
पीता आ रहा है गरल
मजबूर हो, निज घर परिवार की रोटी के लिए,
हजार बरस बीत जाएंगे
युग भी बदल जाएगा,
किन्तु वह आदमी वहीं रहेगा
क्योंकि हमने उसे पंख ही नहीं दिए-
उड़ान उसकी कल्पना में ही नहीं है।
उसके श्रम से ही खड़ी हुई है यह हवेली
जहां हम और आप अर्थशास्त्र की विवेचना करते हैं
और बनाते हैं उसके उत्थान की योजनाएं
जो उसे जिंदा रखतीं हैं मगर उड़ने नहीं देती !
.... अशोक मिश्रा