!! ग़ज़ल!!
"नींद की ओस से...
नींद की ओस से पलकों को भिगोये कैसे;
जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे;
रेत दामन में हो या दश्त में बस रेत ही है;
रेत में फस्ल-ए-तमन्ना कोई बोये कैसे;
ये तो अच्छा है कोई पूछने वाला न रहा;
कैसे कुछ लोग मिले थे हमें खोये कैसे;
रूह का बोझ तो उठता नहीं दीवाने से;
जिस्म का बोझ मगर देखिये ढोये कैसे;
वरना सैलाब बहा ले गया होगा सब कुछ;
आँख की ज़ब्त की ताकीद है रोये कैसे।"
।। गुड नाईट दोस्तो।।