शिवोहम
शिव की साधना , शक्ति की आराधना
शिवलिंग के आकार में , फिर भी निराकार में
रुद्राक्ष का वेश और ना कोई पहेरवेश
बदन में भस्म , निभाउ में हर रस्म
समाधि को पिऊ और योग में जीऊ में
ना दिन को जागु और रात को सोऊ में
मेरी अघोर सी साधना , तु छोड़ काम क्रोध वासना
अविचल ज्ञान की धारा और दु समाधी का नारा
ब्रह्माण्ड मेरी भुजा में , निराकार में साकार में
भज तू किसी भी आकार में , हर पल साक्षात्कार में
सत्य को जान कर , ज्ञान को पहचान कर
अंधकार को दूर कर , खुद को प्रज्वलित कर
मुझसे आया और मुजमे समाया ,
कुछ नहीं पाया यदि मुझे नहीं भज पाया
देवो का भी देव , बोल महादेव
सब का काल , भज महाकाल
अलख का पुजारी , जय गिरनारी
चित्त रंजन , अलख निरंजन
कविता के रचनाकार:
वेद चन्द्रकांतभाई पटेल
२४,गोकुल सोसाइटी ,
कड़ी, गुजरात Mob.-9723989893