वह
बहुत बर्षों बाद उसे देखा
कभी वह
नदी सी बही होगी,
यौवन सी फली होगी।
क्षितिज सी बन
आसमान को छूती होगी,
किसी की आँखों में
किसी के घर में
बैठ गयी होगी,
किसी बीते युग सी।
कभी पहाड़ सी अटल
मन से उठती होगी,
भोर के मंत्र सी
होठों में आ,
सन्ध्या तक
जपी जाती होगी।
बर्षों बाद उसे
मन के छोरों पर आते देखा,
बादलों सी उमड़ती-घुमड़ती,
बहती हवा सी
सांसों में मिलते देखा,
कितनी बार बूँद-बूँद बन
जीवन से कुछ कहते सुना।
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*महेश रौतेला