My Diwali Special Poem..!!!
जुस्तुजू ए ख़ालिक़..!!
तेरे अहसासकी है क्या
सोचता रहता हूँ आख़िर ये मोहब्बत है क्या
जलाकर दिए दिवाली के पवित्र पर्व मनाते है
अमीरों के घरों में जलते हैं फ़टाके धूम धाम से
गरीब बच्चों के दिलों की हसरतों की क़ीमत है क्या
बनाया प्रभु ने ढाँचा यक-सा और लहूँ भी यक-सा
फिर प्रबंधन इन्सानी-हस्तीऔ का जुदा है क्या
हम ने लोगों से बहुत ज़िक्र सुना था लेकिन
रोते बच्चों को देखा तो जाना कि क़यामत है क्या
ए रंक ..!! ये वहशी दुनिया है ये तेरा प्यार नहीं समझेगी
अपने जज़्बात दिखाने की ज़रूरत है क्या
ये भी क़ुदरत का करिश्मा है कि दुनिया में कोई
आज तक ये न समझ पाया कि क़ुदरत है क्या
तू ने दुनिया की हवस दिल में बसा रक्खी है
तेरे ईमान से बढ़ कर तेरी दौलत है क्या
इक तेरी ज़ात से क़ाएम है वजूद इंसाँ का
वर्ना इंसान की दुनिया में हक़ीक़त है क्या
जिस्म का हुस्न तेरी”रूह”तलक है नादान
ये नहीं हो तो ये मिट्टी की इमारत है क्या
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