My New Poem...!!!
🌹फुर्सत ही महँगी है साहब..
वनाँ...
सुकूँ तो इतना सस्ता है।
कि चाय की एक चुस्की
मे भी मिल जाता है।
सच्चाई ही महँगी है साहब...
वनाँ...
ज़ूठ तो सरे-बाज़ार नीलाम है
एक ढूँढो हज़ार ज़ूठे मिलते है।
ईमान ही महँगा है साहब...
वनाँ...
यहाँ बूझदिल मक्कारोंसे
सारा जहाँ भरा पड़ा है...!!
एक ढूँढो हज़ार ढँल्लें मिलते है।
प्रभुकी शरण ही मँहगी है साहब
वनाँ...
इब्लीस के ब़दकार चेलोसे तो
सारा जहाँ भरा पड़ा है...!!
एक ढूँढो हज़ार चेले मिलते है।
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