My New Poem..!!!
मौसम कहाँ मानता है...
तहज़ीब की बन्दिशों को...
जिस्मों से बाहर निकल के...
अंगड़ाइयाँ बोलती हैं...!!
अग्न बदन में जब हद से
बढ़ जाए तो परेशानीऑ
अँग चढ़ कर बोलती है ..!!
बढ़ती रात के पिछले पहर
करवटें सलवटें बन चुभती
तो किसी की बाँहों में जकड़न
को खामौशीऑ ढुँढती है
पर जोगी जो प्रभु-परस्त होते है
नींद की चादर त्याग प्रभु गुणगान
में चौथे पहर मुक्ति की राह ढूँढते है