जश्न मना चुका हूं।
अब अकेले से नहीं होता।
कोई तो खुशियों में भीगने की वजह दे दो ।
थक चुका हूं।
अब अकेले से नहीं होता।
कोई तो गोद में शर रखकर सुला दो।
डगमगा चुका हूं।
अब अकेले से नहीं होता।
कोई तो हाथ पकड़ कर संभाल लो।
खुद ही खुद को खो चुका हूं।
अब अकेले से नहीं होता।
कोई तो सीने से लगा के रुला दो।
बहोत अकेला रह चुका हूं।
अब अकेले से नहीं होता ।
कोई तो लौटने का पता बता दो।
कई बार दम घोट कर रोया हूं।
अब अकेले से नहीं होता।
कोई तो मेरे सेहमे हुए अश्कों को संजो कर रख दो ।
जी तो रहा हूं।
अब अकेले से नहीं होता ।
कोई तो जिंदगी का पता पूछ दो ।
बहोत घबरा चुका हूं ।
अब अकेले नहीं होता ।
कोई तो आके घड़कने थाम लो ।
- आचार्य. जिज्ञासु चौहान (L.K.U.)