वो दौर
न जाने वो कैसा दौर रहा होगा
जब बेटियों के पैदा होने पर
घर गाँव मे सन्नाटा छा जाता था
कहीं मातम भारी शाम होती थी
कहीँ पर बेटियों को दफना दिया जाता था
न जाने वो कैसा दौर रहा होगा।।
बेटोँ की चाह में इंसान अंधा हो जाता था
बेटियों वाले परिवार को कोसा जाता था
घर की लक्ष्मी को बोझ समझा जाता था
एक बेटी की माँ को तड़पाया जाता था
मनहूस और अपशगुन कहा जाता था
न जाने वो कैसा दौर रहा होगा।।
एक दौर की बेटी, रानी झांसी की कहलाई थी
जिसने आज़ादी के लिए लड़ना सिखाया था
एक दौर की एक बेटी ने अंतरिक्ष में
नाम हिंदुस्तान का लहराया था
ये भी उन्हीं दौर की बेटियाँ थीं
जिस दौर में बेटियों को मार दिया जाता था।।
बदलते दौर ने हर किसी को गर्व कराया है
माँ बाप का सिर ऊँचा हो गया है
देश का परचम विश्व मे लहराया है
जहाँ बेटियों ने वो कर दिखाया
जो बेटों से न हो पाया था
वो दौर न जाने कैसा रहा होगा।।
आज चाँद की बुलंदियों से लेकर
खेल के हर छेत्र में नाम कमाया है
गर बचा ली जाती वो बेटियाँ भी तो
वो दौर भी आज मुस्कुरा रहा होता
सम्मान उस दौर का भी होता
वो दौर भी महिलाओं के नाम से जाना जाता ।।