राजस्थान की लोक संस्कृति :एक विहंगम द्रष्टि
यशवंत कोठारी
रंगीले राजस्थान के कई रंग हैं. कहीं रेगिस्तानी बालू पसरी हुई है तो कही अरावली की पर्वत श्रंखलायें अपना सर ऊँचा कर के ख ड़ी हुई है .इस प्रदेश में शोर्य और बलिदान ही नहीं साहित्य और कला की भी अजस्र धारा बहती है.चित्र कलाओं ने भी मानव की चिंतन शैली को विकसित व् प्रभावित किया है .संस्कृति व् लोक संस्कृति के लिहाज़ से राजस्थान वैभवशाली प्रदेश हैं.राजस्थान में साहित्य ,संस्कृति कला की त्रिवेणी बहती हैं, जीवन कठिन होने के कारण इन कलाओं ने मानव को जिन्दगी से लड़ने का होसला दिया है. यहीं पर महाराणा प्रताप हुए.संत कवयित्री मीरा,कलाप्रेमी कुम्भा, चतरसिंह जी बावजी,भरथरी, बिहारी और अन्य सैकड़ों नाम हैं. पद्मश्री कोमल कोठारी , विजय दान देथा , देवीलाल सामर आदि ने राजस्थानी संस्कृति को सहेजने व् एकत्रित करने में बड़ा योग दान दिया.बोरुन्दा के रूपायन संसथान , व् उदय पुर के भारतीय लोक कला मंडल में काफी का म किया गया. देवेन्द्र सत्यार्थी ने जो काम उत्तर प्रदेश,बिहार व् अन्य जगहों पर किया वहीँ काम विजय दान देथा ने किया , वाता री फुलवारी में