वो एक शख़्स जो मेरी नज़र में है.................
क्यों नहीं शामिल इस सफर में है................
उसका ही नशा रहता है अब हर पल
वो जो एक खुमार-सा आठों पहर में है..............
खिंच रहा है दिल को अपनी जानिब
अजब सी कशिश उसके खंजर में है..............
"रात के दामन में कुछ उजाला बाकी है
थोड़ा बहुत अँधेरा अभी तो सहर में है".............
तसल्ली न हुई मंज़िल पे आकर भी
कुछ मज़ा खुले रास्तों के सफर में है..............
"सब 'अजनबी' गाँव के अपने ही थे
अजनबी सब 'अपने' इस शहर में है"..............
"मैंने तो हाथ बढ़ा कर थामना चाहा
क्या इतना हौसला हमसफ़र में है?".............
लफ्ज़ो का हेर-फेर और दिल की बात
ग़ज़ल ना जाने कौन सी बहर में है.................
"क्यूँ बुलाते मदद के लिए किसी को
हम,डूबे तो खुद अपने ही भंवर में है" ...............
"ढूंढता है गली गली दीवाना उसको
खोया एक शख़्स दिल के नगर में है"..........
दिखाता रहा आइना सभी को उम्रभर
आज वही आइना खुद उसके घर में है...............
उसने देखा था एक बार मुस्कुराकर,
आज तक "माहीं" जादू के असर में है.................