कविता ..
नीदं भी खुली न थी ,कि धूप भी ढ़ल गयी ।
पांव जब तलक जमे न थे ,हाय जिदंगी फिसल गयी ।।
ख्वाब के पात पात झर गये ,आशा के शाख जल गये ।
चाहतें तो पुरी न हुई ,हाय उम्र तो फिसल गयी ।।
गीत अश्क बन गये ,छंद भी दफन हो गये ।
सुख के सभी दीऐ ,धुंआ धुंआ से बुझ गये ।।
और हम बुझे बुझे ,मोड पर रुके रुके ।
उम्र की असफलता के पडाव को ,मौन देखते रहे ।।
कांरवा गुजर गया ,बहार देखते ही रह गये ।
जिदंगी चली गयी ,हम हाथ मलते ही रह गये ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,धंबोला ,हाल .अमदाबाद ।