शीर्षक - ठग
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
घात लगाए बैठा है, बस आज कोई मिल जाए
नोचें तुम्हारी जेब को ऐसे, गिद्ध को भी शर्म आ जाए
रग - रग में बसी ठगी है, क्यों परिश्रम कर कमाये
और, जब कद्दू फिर रहा कटने को, तो क्यों
चाकू - छुरी काटन को शरमाए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
मानवता का मुखौटा पहने बैठा है, मन में छल - कपट समाये
पेट ना भरता दुष्ट का, जितना चाहे इसे मिल जाए
बैठा है अवसर की प्रतीक्षा में, मुख में जिव्हा दबाए
ऐसे झपटे धन की गठरी को, जैसे, लपक के मेंडक कीट को खाए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
धूर्त बैठा है मूर्ख बनाने, यौवन को साज - सजाए
प्रवचनों की आड़ में पापी, अपनी हवस की खिचड़ी रहा पकाए
दुरांख से देखे पाखंडी चहुं ओर, बातों का मायाजाल बिछाए जाए
जब - तब मौका मिले तो पड़े पीछे, शूर सी जिव्हा लबलाबाए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
नियत में खोट है, नज़रों में सिर्फ नोट है
अंधाधुन कमाने के लिए, हो रहा लोटपोट है
सच छुपाए, झूठ बताए, करता झोल झपाट है
कुतर रहा इंसानियत का चौला ऐसे, मूषक देख देख पछताए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
बेच रहा भगवान है, अपना दीन ईमान है
इंसान की मूरत है, सीरत में हैवान है
इंसानियत, नैतिकता का गला घौंट रहा, किंचित भी ना डर है, कुकर्मी बड़ा बेईमान है
दुराचारी कर रहा अत्याचार ऐसे, दानव भी देख देख इठलाए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
इलाज, इलाज नहीं, अब यह पेशा है
मरीज तो अब मुद्रा माया का खेस सा है
रोम रोम में धोखा है, मक्कारी में डूबा हर अंग का रेशा रेशा है
निर्लज्ज मार काट कर रहा सरे आम ऐसे, कातिल भी देख देख टेसू बहाए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!
कोई बैठा है बस में, कोई खड़ा है रेलगाड़ी में
कोई खुला सड़क पर रहा फिर, कोई छुपा है झाड़ी में
तरह - तरह के सांग बनाए, ताक में चलता, दाएं - बाएं, अगड़ी - पिछड़ी में
बिछा रहा है झंसिया जाल ऐसे, मर्कटक देख देख चिल्लाए
पग पग पर बैठा है ठग, भोली सूरत बनाए
चकाचौंध दिखा आह्वाहन करे, फिर लूट पाट मचाए!