Hindi Quote in Blog by Roopanjali singh parmar

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ये पुरुष भी काफी अजीब होते हैं,
खामियों पर ये आह नहीं करते,
और खूबियों पर अपनी वाह नहीं करते।
बस में लटके खड़े धक्के खाते हैं,
और आराम भरी ज़िन्दगी बताते हैं।
दफ़्तर की थकान और दिन भर के काम,
सब भूल जाते हैं, और मुस्कुराते हुए वापस घर आते हैं।
अपनी फटी हुई कमीज, और टूटे हुए बटनों को,
सबसे छुपा कर रखते हैं, मगर नई कमीज सिलवाने से कतरा जाते हैं।
कहीं जेब में शायद खुशियां खनक जाए,
और अपनो की पूरी हो जाये ख्वाहिशें..
इसलिए टटोलते रहते हैं उस जेब को,
जिसमें कुछ देर पहले खुद की ख्वाहिशों को पूरा करने कुछ भी नहीं था।
चोट लग जाये तो मुस्कुरा जाते हैं,
ना ही चीखते हैं, और ना बताते हैं।
इनके चहरे पर सिकन भी तब तक होती है,
जब तक घर की दहलीज पर पैर नहीं रख देते..
छूमंतर कर लेते हैं हर दुःख को और चहकने लगते हैं।
इन्हें दिखावा करना भी खूब आता है,
चहरे से इनकी चिंताएं भांपना बड़ा मुश्किल होता है..
आँख के कोरों में रुके आँसू भी बहते नहीं,
और ये पलट जाते हैं.. खुद को कहीं व्यस्त दिखाने..
ये पुरुष भी कुछ हद तक महिलाओं जैसे हैं..
कहते नहीं बस सहते रहते हैं..
मगर इनको पता ही नहीं.. कि कब इनकी तकलीफों की चुगलियां, इन्हीं की आँखें कर देती हैं..।।

#रूपकीबातें

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