चाहत
आ मुझमें अपनी चाहत
की रोशनी भर दे..
तेरा नाम बने पहचान मेरी
कुछ ऐसा कर दे...
कब तक यूं चिंगारी
दिल में दबाओगे...
कभी भूले से ये बात..
अपने लवों पर धर दे।
ईंट पत्थरों में तो मैं....
जमाने से रहती आई हूँ।
देना चाहते हो घरौंदा तो ..
दिल सा अपना घर दे।
तुम दिन की तरह हो..
रोशनी लेकर के चले आओ।
यूँ दूर रह कर मुझसे
अब ना अंधेरों का डर दे....।
सीमा शिवहरे "सुमन"
भोपाल।