यह शाम
शाम सुहानी ढल रही है; हवा ठंडी चल रही है ।
तन, मन, रूह को धीरे धीरे सहला रही है ।
पर इस सुहानी शाम, जला रही है, मोरा जिया;
पंखी घर लौट रहे हैं, तुम कब आओगे पिया ?
बस चंद्रमा खिल रहा है, बादलों से आंखमिचौली खेल रहा है ।
पर अमावस मेरी बड़ी लम्बी है, दर्द जुदाई का, लंबा सहा है ।
अब आ भी जाओ, इतना भी न तड़पाओ;
पुकारती हूं दिल से, आओ, आ भी जाओ ।
Armin Dutia Motashaw