हम मनुज इसी जगत के
कितने खुले, कितने बुझे,
सहस्र बार चलते रहे
कितने खरे,कितने परे।
जब बुझ गयी लौ हमारी
स्वप्न हमारा नहीं बुझा,
मृत्यु के पास भी
एक जीवन हमें लगा खड़ा।
लो आ गये फूल भी
कुछ आगमन के, कुछ प्रस्थान के,
फूल में उत्तर लिखा है
कुछ इधर का, कुछ उधर का।
* महेश रौतेला