#काव्योत्सव
#प्रेम
मैं नहीं जानती
मैं सही हूं या गलत
पर सुनो....
इतना जरूर जानती हूं
प्रेम पवित्र है सबसे
जिसे जरूरत नहीं मौजूदगी की
न छुअन की, न बातों की
और न ही रंग-रूप की
यह तो अहसासों की धरती पर
पनपने वाला पौधा है
बांझ बनी दिल की ज़मी में
हरियाली लाने वाला सावन
जिसमें भीग कर खिलते हैं
तरह तरह के फूल
लाल, सफेद, पीले, गुलाबी
कुछ काले भी उग आते हैं
पर बढा देते हैं वो भी
सुंदरता इस उपवन की
इसलिये डरना मत इस
काले रंग से ....
यही तो एक ऐसा रंग है
जो सच्चा है, साफ है
यही तो वो रंग है
जो जज़्ब कर लेता है
अपने आप में सारे रंग।
प्रिया