काव्योत्सव-2
॥गजब की दुनियाँ ॥
गजब ये खेल दुनियाँ का,
अजब दस्तूर निराला है।
कुछ भूखे पेट सोते हैं,
कोई फेके निवाला है॥
यह दलगत राजनीति में
कहीं जनतंत्र खोया है।
क्या हुए जनता से वादे
यहाँ हर आँख रोया है?
जिसनें पाई है सत्ता
उसी ने जम के लूटा है।
शहीदों ने जो देखें थे
वो सपना हरपल टूटा है॥
यहाँ बेटी, बहू की अस्मत
से खिलवाड़ करते हैं,
किसी की कोख लूटे
औ,कोई देते हलाला हैं॥
यहाँ उल्फतो के चमन मे
नफरतें कौन बोता है,
कान्हा दिवानी राधा को
राणा विष प्याला देता है॥
कहीं न रिश्ते, नाते है
न कोई संगी -साथी है,
जो भी मिलता है उसका मन ,
विषधर से भी काला हैं॥
( नमिता प्रकाश)