भोर होने को है - लघुकथा -
किरण अपने माँ बापू की एक मात्र संतान थी। माँ बापू दोनों ही उच्च शिक्षा प्राप्त थे। दोनों ही सेवा रत थे।
उनकी यही अभिलाषा थी कि किरण भी पढ़ लिख कर, कुछ ऐसा करे कि उनका नाम रोशन हो। अतः दोनों ही उसकी शिक्षा के प्रति बहुत सजग थे। शहर के सबसे अच्छे विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रही थी। साथ ही एक कोचिंग सेंटर से कोचिंग भी ले रही थी।
उसके अध्यापकों और कोचिंग के शिक्षकों की आम राय थी कि यदि किरण इसी तरह मेहनत और लगन से पढ़ती रही तो निश्चित रूप से आई आई टी के लिये चुन ली जायेगी। ऐसा सुनकर माँ का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता था।
लेकिन किरण को बापू का उसके प्रति रूखापन अधीर कर देता था। वे कभी भी उसकी किसी उपलब्धि पर खुशी जाहिर नहीं करते थे।
"माँ, क्या बापू हमेशा से ऐसे ही हैं। हर वक्त गुमसुम। कभी उनको हँसते हुए नहीं देखा?"
"नहीं रे, वे तो बहुत खुश मिज़ाज़ थे। उनके जीवन के कुछ खट्टे मीठे उतार चढ़ाव ने उन्हें एकदम से खामोश कर दिया।"
"ऐसा क्या हुआ उनके साथ? माँ बताओ ना?"
"वे बचपन से एक ही सपना संजोये थे कि फ़ौजी अफ़सर बनना है। लेकिन एक दुर्घटना ने उनका यह ख्वाब चकनाचूर कर दिया। वे हमेशा के लिये अपाहिज हो गये।"
"पर वे तो सरकारी नौकरी कर रहे हैं?"
"हाँ, यह नौकरी उन्हें विकलांग कोटे से मिली है। फिर शादी के बाद उन्होंने निर्णय लिया था कि हम अपने बेटे को फ़ौजी अफ़सर बनांयेंगे।लेकिन तुम्हारे जन्म के बाद उनकी यह इच्छा भी धराशाई हो गयी क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय इतनी कंप्लीकेशंस हो गयीं थी कि मेरा गर्भाशय ही निकालना पड़ा।"
"माँ, तो क्या हम लोग कभी उनको हँसते मुस्कराते नहीं देख पांयेगे?"
"कौन जाने? इसका उत्तर तो ऊपरवाला ही दे सकेगा।"
"नहीं माँ इसका हल हमको ही खोजना होगा?"
"अरे बिटिया, तुम इन सब बातों में अपना समय बरबाद मत करो। अगले सप्ताह तुम्हारी आई आई टी की लिखित परीक्षा है| उसकी तैयारी करो।"
"नहीं माँ, मैंने निर्णय किया है कि मैं एन डी ए के माध्यम से भारतीय सेना में अधिकारी बनूंगी।"