?सुना ही होगा ->ओतप्रोत पर मंच पर नहीं मंच के नीचे ही ऐसा क्यु !?!...ॐD
ओतप्रोत हो जाना जो भी काम करें उसमें घुलमिल जाए तो बहुत ही मजा आता है | पुरी लगन के साथ करें तो काम अच्छे से होता है | पर क्या वाकई में कीया जाता है ? नहीं क्युकि करने की खातिर करने वाले लोग कभी काम में ओतप्रोत नहीं होते इसलिए उसके काम/ बात आदि में दम नहीं होता |
एक सवाल उठ खड़ा होता है काफी देखा भी है कि कथाकार या गाना गाने वाले या वक्ता या ओर कोई स्टेज में आते है बात करते है श्रोतागए / सुनने वाले तो जुम उठते हैं | तो क्या वक्ता को कभी मन न करता होगा कि भगवान का भजन चल रहा है या कुछ तो जुम उठे !?! क्यो वो इच्छा को दबाकर बैठते है ? या असभ्यता माना जाता है ? क्या सोच वो खुल कर मनमें आए तो जुम नहीं उठते ? ऐसे भी है जो सतर्क रेहकर जुम लेते है पर संख्या में बहोत कम लोग ऐसे हैं जो मंच पर होने के बावजुद भी अच्छे से ओतप्रोत दीखाई नहीं देते ऐसा क्यु ? मंच पर ओतप्रोत होना मना होता है क्या ? पर क्यु ?...ॐD