जब जीवन को खोला तो
कितने किस्से, कितनी बातें
कितने सुख ,कितने दुख
कितनी रातें ,कितने दिन
पढ़- लिख कर बड़े हो गये थे।
कितने आकाश, कितने अंदाज,
कितने लड़के,कितनी लड़कियां
कितने आदमी, कितनी महिलाएं,
कितनी नदियां, कितने सागर
चल-फिर कर बड़े हो गये थे।
जब जीवन को खोला तो
कितनी सुबहें, कितनी शामें,
कितने त्योहार, कितने मेले
कितना प्यार, कितना आवास,
आते-जाते बदल गये थे।
-महेश