एक लकड़ी का सहारा लिए
अभी पास से जो गुजरी थी
फैला कर हाथ बेबस
जैसे कुछ मांग रही थी
थकी सी थी थोड़ी
थोड़ी वो गफलत मै थी
मुस्कराहट तो दूर है, चेहरे पर
कोई मायूसी भी ना रही थी
मेहरबान थोड़े हुए भी
नजरअंदाज बोहोत हुई थी
मिला जो, ना था ज्यादा ना कम
की ना गम हुआ ना खुशी हुई थी
यह तो समझ आया
की उससे था जरूरतो ने ठुकराया
कुछ समाज ने भी धूत्कारा
कुछ सच्चाईओं ने डराया
कुछ भूख ने भी रुलाया
कुछ हौसलों ने भी हराया
तो क्या था जो हाथ फैला कर
वो बदनसीब मांग रही थी
ना पैसे ना खाना
ना नाम ना इज्जत
की मुझ जैसी ही वह जिन्दगी
भिख में थोड़ी. जिन्दगी मांग रही थी