मनुष्य पहली किताब है
जिसे हम पढ़ते हैं,
प्यार से लबालब हो
आवश्यक नहीं,
अहिंसा में सराबोर हो
आवश्यक नहीं,
सत्य कहता हो
आवश्यक नहीं,
उसकी सभी शक्तियां परोपकारी हों,
आवश्यक नहीं।
लेकिन मनुष्य पहली किताब है,
जिसे हम पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं,
जैसा भी हो
फटा-पुराना या नया,
अनुरोधी हो या विरोधी।
मनुष्य ही पहली किताब है,
जिसे हम गुनगुनाते हैं।
***महेश रौतेला