#kavyotsav ('भावनायें ' शीर्षक के अंतर्गत )
'अनकही बातें '
हर पल
हर लम्हा
हर दिन
मै लग जाती हूं
तुम्हारे
घर को संवारने में
तुम्हारा ख्याल रखने में
हर वक़्त सोचती हूं मै
तुम्हें किस वजह से
ज्यादा खुशी मिलेगी
तुम्हारे जज्बातों को
समझती हूं मै
तुम्हारी हर बात सुन लेती हूं मै
वो बात कही हुई हो या
' अनकही '
मै
ये भी मानती हूं की
तुम
ये बात कभी नही मानोगे
की मै
तुम्हारे दिल ,
तुम्हारे जज्बातों ,
तुम्हारी ' अनकही बातों ' को
समझती हूं
तुम्हें लगता है
ये बात मान लेने से
तुम
अपना वर्चस्व खो दोगे
मेरे सामने
तुम ऐसा क्यूँ
होने दोगे कभी नही
क्यूंकि
तूम
एक
' पुरुष '
जो ठहरे
और
मै एक
' स्त्री '
जिसके सामने
झुकना तुम्हें
स्वीकार नही ।
शिल्पी कृष्णा
गोरखपुर ।
मौलिक व सर्वाधिकार सुरक्षित