Hindi Quote in Shayri by Kumar Durgesh Vikshipt

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#काव्योत्सव
'जीवन शय्या '
सोचता हुँ तुम्हें लिखू इक सुनहरी सी शाम तभी याद हों आतें तमाम जरूरी काम कही तिजोरी से गिरी नहीं प्यारी मोह माया उलझन की खेती से क्षीण होती काया चाहूँ तुझे अब स्मरण करू मरण समय हों आया मन के छविगृह में उठता समर्तियों का साया बचपन बाढ़ के नीर सा लहराता सा उतर गया समझ को अज्ञानी दिमक कब का ही चटक गया युवा घमण्ड में इतरानें का जब नशा हमारा उतर गया तब समझा क्या खोया क्या पाया झुरियों की छावों में कहाँ सो पाता हूँ क्या होगा मेरे वंशज यही सोंच घबराता हूँ जैसे गूजर हुआ हैं मेरा क्या तू जी पायेगा मेरा जीवन हुआ व्यर्थ यू कहाँ तृप्त हो पाया हूँ खोकर मोके जमाने मे 'विक्षिप्त' कहलाया हूँ।

-- Kumar Durgesh Vikshipt

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Hindi Shayri by Kumar Durgesh Vikshipt : 111034358
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