#kavyotsav
" बारिश की बूँदे"
आज थोड़ी सी उठी आंधी और
जोर से आया पवन,
कुछ कुछ सामान को कैसे हिला गया ?
अखबारे उड़ने लगे और
पर्दे सरकने लगे जैसे
मन को हिला दिया।
थोड़ी सी ही गिरी थी बारिश की बूँदे
पर यादें कितनी सारी टपका गया !
आज थोड़ी सी उठी ....... पवन।
बचपन में भागते थे बारिश को
देख कर नहाने, नानी भागती थी
पीछे डंडा लेकर की बीमार हो जाओगे।
कागज की कश्ती बनाते थे और
कितना खेलते थे !
आज लगा वही फिर वापस करें,
पर आज ना रही वह नानी और
ना रहा वह बचपन।
महार दौड़ के नहायेंगे तो कैसा लगेगा,
कश्ती बनाकर खेलेंगे कागज की
तो कहीं पागल नहीं समझेंगे लोग ?
आज थोड़ी सी उठी........ पवन ।
करना बहुत कुछ है मन को,
खयालों की इस उधेड़बुन में,
उलझा हुआ, एक के बाद एक विचार
बूने जा रहा था...
दीवार पर टंगी घड़ी वक्त
दिखा रही थी, बस वक्त ही तो नहीं था।
वक्त जब मिला तब बारिश रुक गई थी।
आज थोड़ी सी उठी आंधी
जोर से आया पवन ,
ना रही नानी और ना रहा वह बचपन।
- श्वेता तलाटी
-वडोदरा