#kavyotsav
ग़ज़ल (रात)
हर रात मेरी ग़ुज़रती है गोया क़यामत की रात,
कुछ ना-मुकम्मल ला-कामिल मलामत की रात,
आज कल ख़फ़ा-ख़फ़ा है न जाने क्यों मुझसे,
रात भर जागने की मेरी आदत की रात,
क्यो ना-गवार है ज़माने को मेरा रातों मे तन्हा रोना,
हर रात लौट आती है क्यों नदामत की रात,
क्या तुम भूल गई मेरी शब-ग़ुज़ारी तेरे गेसुओं तले?
क्या तुम भूल गई वो मासूम सी शरारत की रात?
जा... दे दी रिहाई तुझेे महव-ए-ख़याल से मैंने,
जा...कर दी अता तुझेें जावेदां फ़रागत की रात,
मलिक-उल-मौत का आना हो न जाने कब 'सादिक़',
मयस्सर होगी न जाने कब मुझे राहत की रात।
©Sadique