लगाव (औरत की ज़बान में)
लगाव
औरत के हिस्से
अक्सर विरासत की तरह आता है
ना माँगने की आज़ादी,
ना छोड़ने की छूट।
हमने जिसे प्रेम कहा,
वह अक्सर
समझौते की एक लम्बी परछाईं था
जहाँ चाहत
धीरे-धीरे
कर्तव्य में बदल दी गई।
लगाव ने
मुझसे मेरा समय लिया,
मेरी देह की थकान,
मेरे मौन की मेहनत
और बदले में
मुझे समझदार कहलाने का तमगा दिया।
जब मैंने सवाल किया,
कहा गया
“ज़्यादा मत सोचो,
तुम जुड़ी हुई हो।”
जुड़ाव यहाँ
एक खूबसूरत शब्द था
मेरे हक़ काटने का।
मुझे सिखाया गया
कि लगाव त्याग है,
पर किसी ने नहीं बताया
कि त्याग की क़ीमत
हमेशा औरत ही क्यों चुकाती है।
आज समझ आता है
लगाव अगर
मेरी आवाज़ दबा दे,
मेरी आकांक्षा छोटा कर दे,
मेरी पहचान को
किसी और के नाम पर टिका दे
तो वह प्रेम नहीं,
एक सलीकेदार क़ैद है।
मैं अब भी जुड़ सकती हूँ,
पर झुककर नहीं।
मैं लगाव चुनूँगी
वहाँ,
जहाँ मुझे
पूरा इंसान रहने दिया जाए।
@निशा अनकही