Quotes by Sumit Bherwani in Bitesapp read free

Sumit Bherwani

Sumit Bherwani

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शून्य के शिखर पर खड़ा एक व्यक्ति,
ना पाने का कुछ, ना खोने की भीति।
अतः अत्यंत यह अति, विस्मरणीय इति!
यथास्थिति को पार कर, जानकर, कर स्वयं से प्रीति।
जीता जगत उसने, किया पुरुषार्थ जिसने,
कर्म- धर्म चक्र ब्रह्मांड का संजोए,
यही तो है सफ़ल बनने की रीति।

क्या हुआ, क्यों हुआ, इतनी भयभीति एक व्यक्ति,
शून्य तो है 'शिव' बनने की नीति!
यही तो है केंद्र भू का, अवकाश का,
जिसने निर्माण किया अनंत का!

तो पकड़ इसे, पुनः कर सृजन स्वयं का,
जय- विजय की प्रत्यंचा छोड़े, शीश उठायें,
जल- अनल को आत्मा में समाए,
जीत ह्रदय समस्त जगत के!!

शून्य के शिखर पर खड़ा एक व्यक्ति,
ना पाने का कुछ, ना खोने की भीति!!

-Sumit Bherwani

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"What If an M. B. A Aspirant or An Entrepreneur write a letter to his crush!! "

See the Scenario 👇👇
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प्रिय Angel (metaphorically used),

था मैं सीधा साधा, ना देखता किसी नार को, पर सादगी ने तेरी, मेरे इस व्यवहार का कर दिया PARADIGM SHIFT,

UNICORN जैसी अदाओं ने कर दिया मेरे दिल का DISRUPTION!

ना सवँरता- सजता था कभी, और Put the best face सा रहता हूँ अभी.

ना सोता, ना खाता समय पर, रहता मुझे हर दिन तेरी यादो का Monday Morning Sickness!

तेरे BILLION DOLLAR IDEA समान प्रेम ने कर दिया मेरे दिल को तेरी कंपनी समान दिल में Amalgamate इसीलिए कहता हूं कर दो मेरी आत्मा का Merger तुम्हारी आत्मा से!!

हाँ!! ले रहा हूँ सलाह INCUBATORS से क्योंकि हूँ Fresher प्यार के इस Enterprise में!!

इतना ना तड़पाओ, Don't boil the ocean and please accept my portfolio!

अब बस तेरी हामी भरने की जरूरत है, Aha moment की जरूरत है!!

हाँ कर दो ना......

अपने प्यार के START-UP का BOOTSTRAP करेंगे,

अपना नया Eco-system बनाएंगे,

और प्यार में सफल होने के बाद तुमे इस प्रेम की कंपनी का C.E.O बनाएंगे,

बाद में जल्द से जल्द अपनी निशानियो की different 'CATEGORIES' launch करेंगे!!!!


तुम्हारा,
Want to be partner

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अच्छा "लगे रहो मुन्नाभाई" फिल्म देखी ही होगी आपने? इस फिल्म में कैसे मुन्ना और सर्किट अपने जीवन में आए संकट को "गांधीगिरी" से टालते है।

यही देख तो मुझमें भी अहिंसा की भावना जगी थी।
कैसे जगी? चलो मैं आपको अपने बचपन में ले चलता हूं, जब हम गर्मियों की छुट्टियों में बड़ा-सा टोला बनाकर मैदान में क्रिकेट खेलने जाया करते थे। अच्छा, तो हुआ यूं कि एक बदमाश व असभ्य लड़का रोज़ हमारी क्रिकेट खेलने की पिच पर "मूत्र-विसर्जन" करता।हम भी उसे कुछ नहीं बोलते पर बस "विनम्रता" से एक छोटी सी स्माइल देकर, खुद मिट्टी डालकर उसकी गंदगी साफ कर देते!

वह असभ्य लड़का रोज़ आता और हमारी पिच खराब करता! एक दिन जब हमारी गेंद कांटो वाली झाड़ियों में फंस गई तो किसी से नहीं निकल रही थी, तभी हमें उस लड़के से मदद मांगने की तरकीब सूझी! उस लड़के से हमने गेंद निकलवाने की मदद मांगी, उसने हामी भरी और गेंद निकल गई। हम सबने उसे Thank You कहा और उसे हमारे साथ खेलने के लिए मनाया। अगले दिन वह असभ्य लड़का "सभ्य" बन चुका था और हमारा मित्र भी!
अभी आपके मन में ख्याल आ रहा होगा कि हमने किस तरह की गांधीगिरी की? तो मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अगर आपको आपके दुश्मन से मित्रता करनी है तो उसे सीधे तौर पर उनकी गलतियां मत समझाओ बल्कि उससे आप कोई मदद मांगो। इससे उस व्यक्ति को अपनेपन सी फीलिंग होगी और वह सुधर भी जाएगा!!!

#Gandhigiri #story

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"मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!"

समय के पंखों को ओढ़कर मैं सपनों के "आकाशगंगा" में उड़ना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

ना कल की कोई फिक्र, ना दिल में औरों के लिए 'छल' का कोई जिक्र,

ना रंग से, ना पैसों से, ना कोई जातपात से, बनाए जाते मित्र खेल-खेल में!

भूख की तो चिंता छोड़ो, खा लिया करते थे उन मिट्टी से बने "टीलों" को...!

पाठशाला था जैसे दूसरा "घर" तो वहां के शिक्षक थे हमारा दूसरा "परिवार"।

शिक्षकों के ना आने के कारण होती कक्षा में "वर्ग-व्यवस्था", तो पूरे चरम पर आ जाती हमारी "बाल्यावस्था"!

बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबू को मानो शरीर पर "इत्र" की तरह मल देते, कागज़ की नाव में कभी अपने "मन" को भी तैरा लिया करते थे।

पाठशाला की होती अगर आखिरी "परीक्षा", तो उस दिन ऐसा प्रतीत होता मानो जीत ली हो कोई कठिन सी "प्रतिस्पर्धा" !

गर्मियों की छुट्टियों में "ट्वेल्थ मेन" की तरह शामिल कूलर का फिर से गूंजना, गोले वाले की टीन-टीन सुनकर तेज़ी से उसकी ओर दौड़ना और दिनभर खेलते रहना....!

डोरेमोन की "टाइम मशीन" में बैठकर फिर से उन संकरी गलियों में क्रिकेट खेलना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

मां की गोद "स्वर्ग", तो पापा के दिए दो रुपए जितनी भी 'पॉकेट मनी' से मानो दुनिया खरीद ले ऐसी होती "हसरत"!

भाई की पिटाई पर हसना और बहन की रक्षा में बड़ों से भी उलझ जाना!

बचपन के "साम्राज्य" में हुआ करते थे राजा, पर अब जवानी में भरा हुआ "मन" रूपी तालाब भी लगता है सूखा।

मैं "शकलक बूम बूम" वाली पेंसिल से बचपन की "अदृश्य" हुई यादें बनाना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं।

कभी "बस्तों" में किताबों का वज़न भी हल्का लगता, पर अब तो लोगों की उम्मीदों के भार ऐसे लगते मानों किसी "गधे" पर सामान है ढोया !

कभी "कागज़" के जहाजों से तारों को तोड़ लाया करते थे, अब तो ये तारें टूटने का नाम ही नहीं लेते !

मैं विक्रम के साहस से जवानी की "मिथ्या" को सुलझाना और बेताल के उलझे हुए "सवालों" में फिर से उलझना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

समय के पंखों को ओढ़कर मैं सपनों के "आकाशगंगा" में उड़ना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

#Kavyotsav2 #childhoodmemories

(भावनाप्रधान कविता)

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"जब एक अंधे ने सही राह दिखलाई!!"

तकरीबन दो महीने बीतने को आए और आशिष आज भी बेरोज़गार बैठा है। ग्रेजुएशन अच्छे नंबरों से पास किया था,सोचा कि उसे अब आराम से नौकरी मिल जाएगी।
आशिष नौकरी की तलाश में भटकने लगा लगभग दस से ज्यादा कंपनियों में 'इंटरव्यूस' दिए...पर कोई भी कंपनी उसे लेने को तैयार नहीं हुई!

बेकारी के कारण घर में हमेशा सोते रहना, मोबाईल फ़ोन पर समय बर्बाद करना, जैसे उसकी 'दिनचर्या' बन गई हो। बेरोज़गारी के कारण वह चिड़चिड़ा-सा हो गया था, मानो 'डिप्रेशन' के झाल में फँसते जा रहा हो!
एक दिन उसे 'interview call' आया, कंपनी की H.R Head को दबी आवाज़ में interview देने के लिए हाँ तो कर लिया , पर उसका मन अब भी रो रहा था। हांलाकि मन को मनाया और interview देने के लिए निकल पड़ा।

बस में चढ़कर, दूसरी बस बदलने के लिए शहर के मुख्य बस स्टेशन पहुंच गया। लोगों की भीड़ और फेरिये वालों की आवाजों के बीच एक "गरजती" हुई आवाज आई "शू पोलिश...शू पोलिश,आपके जूतों को 'आइने' की तरह चमकाए, जब आपका मगन मोची आए!" आशिष ने भी अपनी 'जिज्ञाष़ा' को संतुष्ट करने के लिए पास जा़कर देखा तो आश्चर्यचकित हो गया! पता चला कि मगन "दिव्यांग" है, आँखो से देख नहीं पाता है, फिर भी वो इतना संघर्ष कर रहा था!

आँखों से न देख पाने पर भी जीवन की नाव को आगे बढ़ाते रहने का 'परिश्रम' और चहरे पे हंसी देखकर आशिष भावुक हो गया और उसे जीवन का सार समझ में आ गया! ठाना कि "चिंता करने से कुछ नहीं होता, मेरे पास तो पूरा शरीर है पैसे कमाने को और मैं इतनी जल्दी हार मान गया, अभी मैं संघर्ष करूँगा, लडूँगा इन खराब परिस्थितियों के खिलाफ, पर कभी हार न मानूंगा!"
#Moralstories #Motivational

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एक था "मास्टर"!

हर रोज़ जब भी स्कूल के बच्चों का "खेल" का पीरियड होता तो कुछ चार नौजवान 'लाश' की तरह बेहोशी की हालत में पड़े मिलते! असल में ये चार लोग किसान थे, पर अकाल पड़ने और ज़मीनदारो से परेशान होकर शहर में रोज़गारी की तलाश में आए थे। शहर में तो आ गए, पर रोज़गारी ना मिलने के कारण उन लोगों ने शराब पीना शुरू कर दिया था! ये लोग शराब की थैलियाँ लेकर आते और पास में स्थित स्कूल के ग्राउन्ड में शराब पीकर अगले दिन के सांज तक 'मुरदो' की तरह पड़े रहते।

एक दिन स्कूल के विद्यार्थियों ने मास्टरजी से शिकायत की इस बारे में, मास्टरजी चौंक गए और पुलिस से 'कम्पलेन' करने तक का सोचा!...पर उन्होंने गहन चिंतन किया और अगले ही दिन कुछ विद्यार्थियों के साथ, 'फूटबोल' लेकर ग्राउन्ड में पहुंच गए, उसी समय मास्टरजी ने उन चार नौजवान को खेलने के लिए प्रोत्साहित किया और वे लोग मान भी गए!
मास्टरजी हर रोज़ फूटबोल लेकर आते और उन चार नौजवानों को खेलना सिखाते।

आज एक महीना बीत गया है और उन्होंने आज तक शराब की एक बूंद तक नहीं पी है। ये लोग आज इतना अच्छा फूटबोल खेलते हैं कि "स्टेट लेवल" टीम में भी अपनी जगह बना दी है!

तो ये थी कहानी, जिसमे मास्टरजी ने शराब के नशे में खोए हुए कुछ नौजवानों को सही राह दिखलाई!

#Moralstories #Masterji #Motivation

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