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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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चौपाई - संत्रास

अब संत्रास विश्व में आया।
डरा रहा है युद्धक साया।।
पड़ जाए ना डर ये भारी।
सबकी दिखती है तैयारी।।

विश्व भला क्या झेल सकेगा।
या दामन बारूद भरेगा।।
आज सभी हैं डर में जीते।
एक -एक दिन कैसे बीते।।

मानवता पर पड़े न भारी।
निष्ठुर करते गोलाबारी।।
इनकी उनकी सब तैयारी।
निज विनाश की लीला न्यारी।।

इक दूजे को हैं धमकाते।
मुस्काते दिखते सकुचाते।।

रिश्ते नाते भूल गए हैं।
रार सभी के नए-नए हैं।।
उजड़ रहे परिवार घराने।
इसके पीछे नए बहाने।।

प्रभु जी अब कुछ आप कीजिए।
बर्बादी से बचा लीजिए।।
जीत हार की चिंता भारी।
दुनियाँ चाह रही तव यारी।।

आने वाला संकट भारी।
तुम भी अब कर लो तैयारी।।
या फिर कोई राह दिखाओ।
आकर मुझमें आप समाओ।।

कैसे भी संत्रास मिटाओ।
काले बादल आप भगाओ।।
साँस चैन की लेगी दुनियाँ।
मुस्काएगी जग की मुनियाँ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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जीवन मूल्य
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समय-समय की बात है,
क्योंकि बदलाव ही प्रकृति का नियम है,
जीवन मूल्य भी इससे अछूता कहाँ है।
तभी तो आज के जीवन का मूल्य स्वार्थी हो गया है, संवेदनहीन मुर्दों सरीखा हो गया है,
अनाचार, अत्याचार, भ्रष्टाचार का
गुलाम होता जा रहा है।
सभ्यता, संस्कार, मर्यादा से हीन हो रहा है,
अपने सम्मान को ठेस पहुंचाने में भी
आज बड़ा गर्व कर रहा है।
बेशर्मी से अट्टहास कर रहा है,
नीति, नियम, सिद्धांतों से दूर जा रहा है
जीवन मूल्यों के अवमूल्यन का
नया सिद्धांत प्रतिपादित कर
नव आयाम रच रहा है,
जीवन मूल्य के नव मापदंड रच रहा है।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई
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दिखे भव्यता, लुप्त सभ्यता।
किस मतलब की आज भव्यता।।
दौरे स्वारथ सजी जिंदगी।
होती देखी बहुत बंदगी।।

माना नाम बड़ा है तेरा।
लगता कहाँ किसी का फेरा।।
धन वैभव का दंभ न कीजै।
पहले ईश परीक्षा दीजै।।

अपने होते दुश्मन पहले।
बाजी मारें नहले -दहले।।
अपना किसको अब हम मानें।
दुश्मन को कैसे पहचानें।।

रुकना तेरा काम नहीं है।
सब कुछ बस आराम नहीं है।।
पहन चले सुंदर परिधाना।
मुदित भये मंगल गुण गाना।।

सकल मनोरथ पूरण सारे।
शीश झुके जब प्रभु के द्वारे।।
मातु पिता अरु गुरु के चरना।
मस्तक सदा झुकाए रखना।।

मान कौन अब किस को देता।
छीन-झपट अपना कर लेता।।
मातु पिता अब बैरी लगते।
पूत आज पहले हैं ठगते।।

जाने कैसी चली हवाएं।
जीवन पथ की नव बाधाएं।।
बीमारी से मुश्किल आए।
दर्द सभी का बढ़ता जाए।।

संसद गरिमा धूमिल होती।
सिसक-सिसक मर्यादा रोती।।
निज कर्तव्य भूलते नेता।
अलग नाव अपनी है खेता।।

हमने चुनकर संसद भेजा।
काम किया क्या हमने बेजा।।
शर्म नहीं तुमको है आती।
भूल रहे पुरखों की थाती।।

आओ नाहक गाना गाएं।
बैठे ठाले समय बिताएं।।
प्रभु लीला का लाभ उठाएं।
जो करना उसको बिसराएं।।

शासन सत्ता से भी डरिए।
उल्टे सीधे काम न करिए।।
डर दहशत तुम मत फैलाओ।
सोचो समझो मत भरमाओ।।

हमने जीना सीख लिया है।
मदिरा हमने पान किया है।।
क्या कोई अपराध किया है।
या फिर दीपक बुझा दिया है।।

हमको तो खुश रहकर जीना।
निंदा नफरत रस क्यों पीना।।
आपस में काहे टकराना।
मिलता क्या कोई शुकराना।।

आज सुबह जब धरती डोली।
बंद हुई हम सबकी बोली।।
समझ लीजिए इसकी लीला।
रंग बिरंगा नीला-पीला।।

काम नहीं तुम ऐसा करना।
कभी पड़े जो तुमको डरना।।
नहीं हमें है डरकर जीना।
प्रेम भाव रस मीठा पीना।।

कर्म- धर्म की करिए पूजा।
श्रेष्ठ नहीं कुछ इससे दूजा।।
सुखद भाव का बोध कराओ।
हीन भावना मन मत लाओ।।

आओ खेलें खेल नया हम।
वैसे भी क्या हमको है ग़म।।
चिंता है तो खूब पियो रम।
रोके-टोके किसमें है दम।।

खेल नया आओ हम खेलें।
अपने सारे ग़म को भूलें।।
समय बिताएं जमकर सोके।
किसमें दम है रोके-टोके।।

आज समय ने खेल दिखाया।
समझ नहीं कुछ हमको आया।।
मैंने उससे माँगी माफी।
बोला समय यही है काफी।।

साथ नहीं कोई अब देता।
बनते केवल सब हैं नेता।।
निज चरित्र अपना दिखलाते।
केवल जनता को भरमाते।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - विनय

विनय हमारी सुनिए रामा।
खड़ा हुआ हूँ तेरे धामा।।
मुझ पर कृपा तनिक तो कीजै।
सुध मेरी भी अब लै लीजै।।

आप सभी मम सुनो कहानी।
मीठी प्यारी मेरी बानी।।
विनय शील मम दाना-पानी।
करूं नहीं कोई मनमानी।।

आज विनय सुनता नहिं कोई।
कहते हैं सब किस्सा गोई।।
विनय मोल अब बचा नहीं है।
दंद-फंद ही पचा सही है।।

करके विनय बार इक देखो।
करुण कथा उसकी तुम पेखो।।
समय विनय का हुआ पुराना।
गाओ गीत मनोहर नाना।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई
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गणपति
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प्रथम पूज्य हैं गणपति देवा।
श्रद्धा भाव से करिए सेवा।।
शुभ फल दायक देव गणेशा।
मिले कृपा कुछ रहे न शेषा।।
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-शिव जी
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श्रद्धा से शिव सुमिरन करिए।
भक्ति भाव नित पूजन करिए।।
संकट भोलेनाथ हरेंगे।
हर दुविधा से मुक्त करेंगे।।

शिव शंकर हैं औघड़ दानी।
महिमा उनकी किसने जानी।।
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चौपाई - बजरंगबली
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विनय हमारी हनुमत सुनिए।
कष्ट मुक्त जन-जन को करिए।।
आप हमें नादान समझिए।
राम कृपा का साधन बनिए।।
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चौपाई - शनिदेव
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शनीदेव जी किरपा कीजै।
भक्तों के सब दुख हर लीजै।।
भक्त आपके डरे हुए हैं।
रोग शोक से घिरे हुए हैं।।
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सकल मनोरथ पूरण सारे।
शीश झुके जब प्रभु के द्वारे।।
मातु पिता अरु गुरु के चरना।
मस्तक सदा झुकाए रखना।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - प्रकृति
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प्रकृति दर्द महसूस करोगे।
या फिर सतत कष्ट भोगोगे।।
करो नहीं खिलवाड़ सभी अब।
जीवन सुखमय होगा ही तब।

रुदन प्रकृति का भी है जारी।
पड़ जाए ना हम पर भारी।।
जल जंगल को आप बचाएं।
दूर धरा की सब बाधाएं।।

पशु पक्षी भी आज पुकारें।
हरियाली है कहाँ दुआरे।।
सुनिए इसकी करुण कहानी।
सूख गया आँखों का पानी।।

जीव जंतु अस्तित्व बचाना।
धन दौलत से बड़ा कमाना।।
मरने वाले वृक्ष पुकारें।
तनिक आप भी आज बिचारें।।

प्रकृति संतुलन करना होगा।
वरना बढ़ जायेगा रोगा।।
बहुत पड़ेगा कल जब रोना।
काम नहीं आयेगा सोना।।

मौन छोड़ अब आगे आओ।
आप स्वयं को मत भरमाओ।।
एक नया अभियान चलाओ।
नये सिरे से इसे सजाओ।।

पीड़ा कितनी प्रकृति कहेगी।
मौन भला कब तलक रहेगी।।
तरस तनिक बेशर्मों खाओ।
या निज का अस्तित्व मिटाओ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू -महाशिवरात्रि
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इस बार की महाशिवरात्रि
बहुत खासमखास है
तुम्हारे लिए।

प्रतीक्षा में बेचैन हैं
औघड़ दानी भोलेनाथ
तुम्हारे लिए।

एक लोटा जल चढ़ाना
कितना मुश्किल है
तुम्हारे लिए।

शिव मंदिर में भीड़
लगती भारी है
तुम्हारे लिए।

बेलपत्र, भाँग, धतूरा, बेर
संग लेकर आए
तुम्हारे लिए।

भोले भाले शिव शंकर
आसन छोड़ आए
तुम्हारे लिए।

भूख प्यास से व्याकुल
अपने भोले भंडारी
तुम्हारे लिए।

शिवरात्रि का व्रत-पूजन
खोलेगा शिवलोक द्वार
तुम्हारे लिए।

नीलकंठ बन गये शिव
जब विषपान कर
तुम्हारे लिए।

शिव ने विष पिया
संसार के बहाने
तुम्हारे लिए।

चलो हम चलते हैं
शिव पूजन को
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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संत रविदास जयंती

गोवर्धनपुर, वाराणसी में जन्मे
भक्ति आंदोलन के संत रैदास,
पिता संतोख दास, माता कर्मा देवी की संतान,
चर्मकार परिवार में जन्म लिए
महान कवि, समाज सुधारक
जाति-पाति, छुआछूत के विरोधी रहे।
निर्गुण ईश्वर भक्ति संदेश फैलाया
उनके आदर्श वाक्य-भाव
'मन चंगा तो कठौती में गंगा' को
आज भी सम्मान दिया जाता है।
बाल्यावस्था से ही भावुक और ईश्वर भक्त रैदास
अपने पुश्तैनी चमड़े के कर्म में रमे रहे,
संत रामानंद के शिष्य, कबीर के समकक्ष थे।
जीवन भर समाज को मानवता,
एकता का पाठ पढ़ाते रहे,
'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल उनके रचित पद
आज भी अमर हो दिल को छूते आ रहे,
मीराबाई के गुरु रैदास ने कर्म को प्रधान माना
दलित समाज में चेतना ज्योति जगाते रहे।
अपना जीवन समाज की सेवा के नाम किया,
और अंत में भी ईश्वर का नाम जाप करते हुए
भौतिक शरीर का परित्याग किया।
कबीर, सूर, तुलसी की परंपरा के संत कवि
रैदास जी को आज भी हम श्रद्धा भाव से याद कर रहे हैं
उनके विचारों, संदेशों का अनुसरण कर रहे हैं
महान संत, कवि को बारंबार नमन वंदन कर
अपने श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - जीवन
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जीवन है अनमोल खजाना।
जिसने इसे नहीं पहचाना।।
जिसने मर्म नहीं पाया है।
उस पर अंधकार छाया है।।

इसको पढ़ना बड़ा सरल है।
समझ सको तो सुधा गरल है।।
जीवन में सुख दुख का मेला।
समझो नाटक है या खेला।।

जीवन की है अजब कहानी।
प्रेम सुधा रस गरल निशानी।।
कभी हँसाती, कभी रुलाती।
जमकर खिल्ली कभी उड़ाती।।

जीवन का आशय तुम जानो।
तभी भाव इसका तुम मानो।।
नहीं उपेक्षा इसकी करिए।
प्रेम भाव रस पावन भरिए।।

जीवन का आयाम बड़ा है।
कहाँ आपसे दूर खड़ा है।।
बस इसका सम्मान कीजिए।
सुधा-सिक्त आनंद पीजिए।।

जीवन में अनमोल मिला है।
फिर भी शिकवा और गिला है।।
यही भूल पड़ती है भारी।
धोखा देती हर तैयारी।।

कल की चिंता आज न करिए।
वर्तमान में हँसकर रहिए।।
जीवन सूत्र पकड़ कर रहिए।
निज सौभाग्य मानकर चलिए।।

जीवन कठिन परीक्षा लेता।
यह परिणाम समय पर देता।।
इसका आना उसका जाना।
जीवन तो बस एक बहाना।।

नहीं एक रस जीवन होता।
कोई हँसता कोई रोता।।
धैर्य सदा सुख का पथ दाता।
चंचलता दुख राह दिखाता।।

जीवन अपना आप सुधारो।
खोया पाया सदा विचारो।
जीवन दोष कभी मत देना।
यह सतरंगी साबुन फेना।।

जल जीवन का गहरा नाता।
इक दूजे का भाग्य विधाता।।
जल बिन नहीं रहेगा जीवन।
जल ही है असली संजीवन।।

सुधीर श्रीवास्तव

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संत रविदास जयंती (०१ फरवरी) पर विशेष
चौपाई


माघ मास पूनम को जन्में।
भक्ति भाव था खासा जिनमें।।
पितु संतोष मातु हैं कर्मा।
रविदास ईश प्रभु धर्मा।।

कर्मशील प्राणी रविदासा।
रखता सदा ईश विश्वासा।।
समाजिक सुधार थे लाए।
संत शिरोमणि आप कहाए।।

सामाजिक सद्भाव दिखाया ।
जाति पाति का भेद मिटाया॥
निश्चल धारा भक्ति बहाया।
जीवन का फिर सार बताया॥

कर्म निरंतर करते रहते।
ध्यान मगन रह सदा विचरते।।
गंगा मैय्या आप थीं आईं।
लाज भक्त की मातु बचाईं।।

कभी नहीं मन मैला राखा।
ईश कृपा का फल था चाखा।।
धर्म कर्म की ज्योति जगाए।
योगी संत सुजान कहाए।।

छोटा-बड़ा कर्म नहीं माना।
ईश कृपा को सबमें माना।।
भटक रहा क्यों प्राणी जग में।
ईश्वर तो है तेरे मन में।।

मीराबाई गुरु रैदासा।
सतपथ पर उनका विश्वासा।।
गुरु ग्रंथ में जगह हैं पाए।
भक्ति भजन रसधार बहाए।

सत्य मार्ग दर्शाए ज्ञानी।
दुनिया कहती आप कहानी।।
मीरा के गुरु पद अनुरागी।
अद्भुत संत दास बैरागी।।

जन्म जयंती आज मनाऊँ।
श्रद्धा से नित पुष्प चढ़ाऊँ।
नमन आपको शत-शत बारा।
शीश झुकाए सब संसारा।।

सुधीर श्रीवास्तव

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