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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
(40k)

चौपाई - मूल

सूद मूल से प्यारा होता।
कौन चाहकर इसको खोता।।
भला भलाई दुनिया जाने।
बात भला कब किसकी माने।।

आज मूल से कटते जाते।
करते तरह-तरह की बातें।।
सबकी अपनी है मजबूरी।
इसीलिए तो बढ़ती दूरी ।।

मूलभूत सुविधाएँ गायब।
नाहक बनो आप मत नायब।।
शासन सत्ता की मजबूरी।
कभी नहीं चाहे वो दूरी।।

मूलमंत्र है बहुत जरूरी।
चाहे जितनी हो मजबूरी।।
पथ से भटक आप मत जाना।
तर्क वितर्क से मत घबराना।।

मूल आपसे दूर न होता।
यादों का बोझा है ढोता।।
भले आप उसको बिसराएँ।
मौन अश्रु भी नजर न आएँ।।

मूलभूत सुख सुविधा चाहें।
भरना पड़े कभी न आहें।।
जिम्मेदारी नहीं उठाएँ।
औरों को दोषी ठहराएँ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - मनोरथ

करो मनोरथ पूरे मेरे।
विपदा मुझको कभी न घेरे।।
इतनी किरपा करना दाता।
मुझे नहीं कुछ भी है आता।।

करूँ न पूजा पाठ आरती।
निंदा नफ़रत मुझको भाती।।
नहीं तुम्हारे दर मैं आऊँ।
कभी न तुमको शीश झुकाऊँ।।

बुद्धि विवेक हीन हूँ भगवन।
पर उपकार भाव है तन-मन।।
जैसी मर्जी वैसा करना।
कभी नहीं मुझको है डरना।।

अपनी लीला तुम ही जानो।
चाहे जैसा मुझको मानो।।
जो मन में था सब कह डाला।
चाह मनोरथ पूर्ण निवाला।।

प्रभो! जगत की रक्षा करिए।
भाव-भक्ति मम उर में भरिए।।
सकल मनोरथ पूरे करना।
सबकी झोली खाली भरना।।

आप जगत कल्याण कीजिए।
भले हमें कुछ नहीं दीजिए।।
बात हमारी मानो दाता।
आप सकल जग प्राण विधाता।।

सुधीर श्रीवास्तव

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आयकू
(वार्णिक छंद)
(विधान -कुल चार पंक्तियाँ, क्रमशः १,२,३,४ वर्ण)
*******
बाहर
भीषण गर्मी
बचकर रहिए आप
नहीं तो झुलस जाएंगे।

युद्ध
पड़ रहा
विश्व पर भारी
कुछ करें मिल -जुलकर।

सुबह
आए यमराज
हमारे भरोसे भैसा
छोड़कर फ़ुर्र हो गए।

मानो
मेरी बात
मत करना तकरार
मुश्किल में होगी सरकार।

जानते
नहीं मुझको
यमराज मेरा यार
बेकार है सब हथियार।

अपने
माता- पिता
दादा -दादी संग
बनता है अपना परिवार।

संवेदनाएं
मर गई
आज मानव की
हम कहाँ जा रहे।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू - युद्ध की विभीषिका

युद्ध की विभीषिका अब
पड़ रही भारी
तुम्हारे लिए।

क्या फायदा मिलेगा बताओ
बम-बारुद फोड़कर
तुम्हारे लिए।

जरुरी अब विचार करना
युद्ध का अत्याचार
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ अब नहीं फैले
युद्ध की आग
तुम्हारे लिए।

आज सारा जहान पीड़ित
दुविधा में जीवन
तुम्हारे लिए।

भारी पड़ेगी आपकी सनक
समूची दुनिया पर
तुम्हारे लिए।

आओ कोशिश हम करें
सबका भला होगा
तुम्हारे लिए।

शब्द मौन हो गए
कहें भी क्या
तुम्हारे लिए।

युद्ध की विभीषिका का
अंत में विनाश
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद

दुख-सुख है जीवन का हिस्सा।
सबका अपना-अपना किस्सा।।
समता के तुम गीत सुनाओ।
निज जीवन गाड़ी दौड़ाओ।।

सुख-दुख जीवन के दो चक्के।
दोनों मित्र हैं गहरे पक्के।।
जिसने दुख को जीत लिया हो।
मानो जीवन आप जिया हो।।

दुख की जो परवाह न करता।
सुख में दंभ नहीं वो भरता।।
खुद जिसमें विश्वास जगा हो।
समझो जीवन आप सगा हो।।

विपदा में जो डरा नहीं हो।
संयम जिसके हृदय भरा हो।।
मुस्कानों के साथ चला हो।
समझो दुख को जीत लिया हो।।

जिसने मन को जीत लिया हो।
हर पल ही मुस्कान नया हो।।
जिसने जीना सीख लिया हो।
अमृत सम विषपान किया हो।।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद

जीवन की है कामना, प्रभु जानें हैं आप।
रोग शोक से दूर कर, मेंटें सब संताप।
मेंटें सब संताप , तनिक प्रभु कृपा कीजिए।
प्रेम भक्ति सद्भाव, हृदय मन-भाव दीजिए।
कह सुधीर कविराय, सरल हो मेरा तन-मन।
नहीं चाह कुछ और, सफल जन-मन का जीवन।।

जीवन को मत मानिए, यारों कोई खेल।
कहते संत महंत हैं, मत कहना तुम रेल।।
मत कहना तुम रेल, बड़ी मुश्किल आयेगी।
रोना हँसना साथ, घड़ी पावन छाएगी।।
कह सुधीर कविराय, यही जीवन का सावन।
हँसते रहिए आप, लुत्फ लेना है जीवन।।

सेवा अरु संकल्प का, होता है नित मान।
मन घमंड से दूर हो, इतना रखिए ध्यान।।
इतना रखिए ध्यान, इसी में अपना गौरव।
नहीं बनेंगे आप, कभी तब शकुनी कौरव।।
कह सुधीर कविराय, सदा ही खाओ मेवा।
मत कर अनुचित बात, करो तुम सबकी सेवा।।

तर्पण करते जा रहे,अपना बुद्धि विवेक।
हमको ऐसा लग रहा, काम बचा है एक।।
काम बचा है एक, बड़ी है उलझन हमको।
रोते जाते आज, याद हम करते तुमको।।
कह सुधीर कविराय, देखते हैं हम दर्पण।
आती सबकी याद, करें हम मन से तर्पण।।

साजन रहते दूर हैं, फिर भी लगते पास।
सजनी खातिर सजन ही, जीवन का विश्वास।।
जीवन का विश्वास, नहीं है दूजा कोई।
थामेगा जो हाथ, कहे किससे वो रोई।
खड़े बहुत है लोग, बोलते सब मनभावन।
उसके मन की चाह, दरश मिल जाए साजन।।

संगम तट पर आ गये, माँ गंगा के लाल।
धर्म सनातन हो गया, आज बहुत खुशहाल।।
आज बहुत खुशहाल, देख माँ गंगा माया।
जैसे सारा विश्व, उमड़ तट संगम आया।।
कह सुधीर कविराय, देख लो दृश्य विहंगम।
आप झुकाओ शीश, शीघ्र पहुंच कर संगम।।

हीरा मानव मन बने, आज यही दरकार।
मर्यादा के साथ ही, चलती कब सरकार।।
चलती कब सरकार, बाँटती खूब मलाई।
जनता भी खुशहाल, मुफ्त की खिचड़ी खाई।
नीति नियम से चलें, नहीं हो कोई पीरा।
देश बढ़े जब साथ, मगन मानव हीरा।।

आया स्वारथ दौर है, जान रहे हम आप।
होते जिसकी ओट में, तरह-तरह के पाप।।
तरह-तरह के पाप, शर्म है किसको आती।
जलती सुबहो-शाम, प्रेम से दीपक बाती।
बनी आज की रीति, समझ लो मेरे भाया।।
कलयुग चढ़कर शीश, झूमते गाते आया।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - तारतम्य

तारतम्य ही सूत्र है, हर रिश्ते का सार।
इसके बिन चलता भला, कब लंबा व्यवहार।।

मन वाणी के साथ ही, मधुरिम जीवन सार।
तारतम्य संभावना, देती नव आधार।।

तारतम्य से जोड़ना, हमें आपसी प्यार।
रिश्तो में हो मधुरता, सुंदरतम संसार।।

तारतम्य का टूटना, देता गहरा घाव।
जीवन भर अफसोस हो, इसका यही प्रभाव।।

तारतम्य का देखिए, सेना में विस्तार।
नीति नियम से दे रहे, जिसका जो अधिकार।।

आज किसे परवाह है, व्यक्ति हो या परिवार।
सभी दंभ में तोड़ते, तारतम्य का तार।।

इतने भी अभिमान में, रहें नहीं हम आप।
तारतम्य से दूर हो, करना है क्या पाप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद - पद का मद

पद के मद में चूर हुआ जो, उससे रहिए दूर।
भूल गया वो कल तक क्या था, आज हुआ मगरूर।।

खुद को खुदा समझ बैठा है, हुआ बहुत अभिमान।
तनिक नहीं अब शेष बचा है, उसके भीतर ज्ञान।।
कल को जब ठोकर खायेगा, संग पीटेगा माथ।
कहाँ समझता आज भला वो, नहीं मिलेगा साथ।।

बँधी हुई आँखों पर पट्टी, उड़ता है आकाश।
अपने हाथों स्वयं लिख रहा, खुद के आप विनाश।।
शिकवा और शिकायत सबकी, चढ़े शीश बन पाप।। अपने पैरों मार कुल्हाड़ी, लेता है अभिशाप।।

ईर्ष्या द्वेष दंभ में प्राणी, कहाँ कभी खुशहाल।
अपनी स्वयं प्रशंसा कर ले, चलकर टेढ़ी चाल।।
हाल-चाल कोई जब पूछे, मुँह बिचकाता जोर।
नहीं किसी की वो है सुनता है, लगे व्यर्थ का शोर।।

ऐसे लोगों का नहीं भरोसा, करें मित्र हम आप।
ईश भरोसे आगे बढ़िए, मिटे सभी संताप।।
अपने पथ से आप भटककर, नहीं बदलिए रंग।
मानव जीवन की मर्यादा, मत करना तुम भंग।।

जब तक इनको समझ में आता, खट्टे हैं अंगूर।
हालत इनकी ऐसी होती, खुद कहते लंगूर।।
सत्य आइना दिखा ही देता, होता जब मजबूर।
कल तक जितना पास था इनके, आज वो उतना दूर।।

सुधीर श्रीवास्तव

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व्यंग्य - बुजुर्गों की अहमियत
*********
आज बड़े बुजुर्गो को वो अहमियत नहीं मिलती
जिसके वास्तव में वो हकदार हैं,
शायद ये कलयुग का ही प्रभाव है।
पर ऐसा केवल हम आप ही सोच सकते हैं
क्योंकि हम आधुनिकता के रंग में रंगे जा रहे हैं,
पर शायद हम यह भूल रहे हैं
कि अपने लिए गड्ढे और खाईं खोद रहे हैं।
जिस माँ बाप ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया
बड़े बुजुर्गों ने प्यार दुलार दिया, पढ़ाया, लिखाया,
आज सफलता के इस मुकाम तक पहुँचाया।
हमारी खुशी के अपनी खुशियों का गला घोंट दिया
जाने कितने कष्ट झेले, खून पसीना सब एक कर दिया,
पर हमारे लिए सब कुछ हँसकर सह लिया।
आज जब हमारी, आपकी बारी है
तब हम उन्हें अपमानित उपेक्षित करते हैं,
उनके पास बैठकर दो चार बात तक भी नहीं करते हैं
उनकी भावनाओं का गला घोंट देते हैं,
उनकी बात सुनने के बजाय उन पर चिल्लाते हैं
तीखे व्यंग्य बाण से उनका सीना छलनी कर देते हैं,
अपनी आजादी की आड़ में उन्हें अकेला छोड़ देते हैं
और तो और वृद्धाश्रम में भेजकर हाथ झाड़ लेते हैं,
ऊपर से बुजुर्गों की अहमियत का बड़ा ज्ञान बघारते हैं
शायद इसी तरह हम सब
भारत रत्न का खिताब अपने नाम करना चाहते हैं,
क्योंकि हम अपने बुजुर्गों को अहमियत छोड़िए
भगवान से भी ज्यादा मान-सम्मान देकर
सुबह शाम पूजा पाठ करते हैं,
उनके नाम का जाप करते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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काम तो राम ही आयेंगै

काम तो राम ही आयेंगे
यह तो हम सबको पता है,
पर ज्यादा भरोसा नहीं है।
क्योंकि हम खुद को राम समझते हैं,
राम से ज्यादा खुद पर विश्वास करते हैं
यह और बात है कि रोते भी उन्हीं से हैं
रो गाकर उनकी कृपा पा लेते हैं
और धन्यवाद तक कहने में
अपना अपमान समझते हैं,
क्योंकि हम स्वार्थी और कंगाल होते हैं।
अब राम जी तो ठहरे भोले-भाले
जो इतना ध्यान भी तो नहीं देते
हमारी गुस्ताखियाँ भी बिसार देते,
अपने तो दोनों हाथ में लड्डू संग खूब मजे हैं
अपना स्वार्थ भी सिद्ध कर लेते हैं
और राम जी श्रेय भी नहीं देते हैं।
वैसे भी राम जी तो अपने हैं
ऊपर से बेचारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,
ऐसे में उन्हें काम तो आना ही पड़ता है।
अब आप ही बताओ कि रामजी मेरे काम आते हैं
तो भला कौन सा अहसान करते हैं?
फिर हम भी तो राम जी के ही पास जाते हैं,
क्योंकि वे ही हमें सबसे पहले नजर आते हैं
जब वे हमारे काम आते हैं
तो हम भी राम नाम का थोड़ा गुण गा लेते हैं
अब राम जी को कोई शिकायत नहीं है
तो फिर आप क्यों फटे में टाँग अड़ाते हैं
ये हमारे और राम जी के बीच का मसला है
हम और राम जी आपस में कैसे रिश्ता निभाते हैं,
इस पर आप क्यों इतना खार खाते हैं,
या आपको राम जी समझ नहीं आते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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