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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
(34k)

युद्ध नहीं विश्व शांति अभियान
*****
आज समूचा विश्व आशंकित है, होना भी चाहिए,
कुछ सनकी लोगों की सनक से
तीसरे विश्व युद्ध का खतरा जो बढ़ गया है।
पर समझ नहीं आता है कि क्या मिलेगा उस जीत से?
जिसमें सब कुछ तबाह हो जायेगा,
संसाधन बर्बाद हो जायेंगे,
मूलभूत सुविधाएं भी संघर्ष का कारण बनेंगी
घर, दुकान, मकान, संस्थान खंडहर हो जायेंगे।
लाशों पर मंडराते गिद्धों के बीच
जीवित रहने के लिए कुछ खाने की तलाश करते
अभाव ग्रस्त मानव, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े
और आदिम युग के दिनों की आधुनिक तस्वीर
क्या यही नहीं है चल रहे युद्ध की विभीषिका का
अत्यंत भयावह और अंतिम परिणाम।
जबकि बच्चा-बच्चा जानता है कि
युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है
बुद्ध के रास्ते पर चलकर ही
सौहार्दपूर्ण समाधान ही अंतिम विकल्प है,
पर कुछ लोगों के लंबरदार बनने की सनक ने
दुनिया को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है,
या मान लें इन सबके दिमाग में गोबर भरा है।
क्या वे इतने नासमझ हैं, जो बिल्कुल नहीं जानते
कि दुष्परिणाम उनको और उनके देशों,
लोगों को भी भोगना पड़ेगा,
युद्ध का दंश उनको भी न भूलने वाला ग़म
और अभावों की सौगात ही देगा।
तब वे किससे और किसके लिए युद्ध करेंगे
क्या युद्ध से ही खुद दो-दो हाथ कर
ऐसे ही अपनी मनमानी करेंगे?
चलो मान भी लिया तो भला उसका बिगाड़ क्या लेंगे?
पर इतना ज़रुर होगा कि आने वाली पीढ़ियों के मन में
अपने लिए नफरत की आग जरुर भर देंगे।
क्योंकि जब आने वाली पीढ़ियों को अहसास होगा
कि उनके पुरखे ही उनके जीवन में
अभावों, दुश्वारियों, बीमारियों के
माली बनने के बाद ही दुनिया छोड़कर गए हैं,
तब क्या वे सब उनके गुण गायेंगे?
बिल्कुल नहीं! पानी पी-पीकर कोसेंगे, गरियाएंगे।
मगर अब कुछ भी कहना बेकार है
दुनिया तबाही के पायदान पर आकर खड़ी है,
धरा खुद प्राणी विहीन होने के डर से काँप रही है,
हमें भी अब तैयार हो जाना चाहिए,
जीने की उम्मीद छोड़ घुट-घुटकर
मरने के लिए कफ़न बांध लेना चाहिए।
वैसे एक अंतिम विकल्प अभी शेष है
युद्ध के सौदागरों को सत्ता से दूर भगाइए,
और युद्ध नहीं विश्व शांति अभियान
हम आप सब या हमारा भारत ही नहीं
समूचे विश्व के साथ एकजुट होकर चलाइए,
और जैसे भी हो युद्ध का नामोनिशान मिटाइए
तभी फिर से मुस्कराने का विचार मन में लाइए।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू

अब जीना बेकार है
समझ में आया
तुम्हारे लिए।

पावन भाव लिए वो
आगे बढ़ता रहा
तुम्हारे लिए।

बेकार है शिकवा-शिकायत
समझना नहीं जब
तुम्हारे लिए।

बंद करो विधवा विलाप
खोखला है सब
तुम्हारे लिए।

कैसे कह दूँ तुमसे
दूर नहीं जाना
तुम्हारे लिए।

हार-जीत तो खेल है
समझ लिया हमने
तुम्हारे लिए।

विश्वास तोड़ दिया मैंने
रोना बेकार है
तुम्हारे लिए।

जीवन की डोर बनी
व्यर्थ रुलाती है
तुम्हारे लिए।

ईश्वर से आस है
पूरा विश्वास है
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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सायली छंद- जिंदगी

जिंदगी
आसान है
जीकर तो देखिए
हँसते मुस्कुराते
रहिए।

जिंदगी
एक मेला
सुख-दुख का
झमेला भी
समझिए।

जिंदगी
आपकी है
जीते ही रहिए
हँसिए-गाइए
मुस्कराइए।

जिंदगी
मानिए तो
ईश्वर का उपहार
धन्यवाद -आभार
साभार।

जिंदगी
सिखाती है
जीवन का पाठ
पढ़ना रोज
सीखिए।

जीवन
का एक
ही अंतिम सत्य
आना-जाना
जानिए।

जिंदगी
कट जायेगी
रोता क्यों है?
बेकार यार
तकरार।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद (१६,११) - मुस्कान

नित नूतन मुस्कानों का हम, रोज लगाएं ‌ बाग।
और बुझाएं सुलग रही जो, मन की अपने आग।।

शांत चित्त हो चिंतन करिए, निज जीवन का सार।
कितना उचित है या फिर अनुचित, नाहक लेना भार।।
अपनी भी है जिम्मेदारी, यही सीख लो बाँट।
प्रेम प्यार से चाहें कुछ को, या फिर कुछ को डाँट।।

खुद के ही दुश्मन बन जाते, जाने कैसे लोग।
रोग बढ़ाते पालपोस कर, झेंप-झेंप कर भोग।।
नादानी अब हम सब छोड़े, दें सबको संदेश।
मानों सब कुछ पास तिहारे, मानो स्वयं नरेश।।

मुस्कानों की छोटी-छोटी, बगिया रोपें रोज।
निंदा नफ़रत क्रोध ईर्ष्या, क्यों करना है खोज।।
यही सूत्र है मुस्कानों का, आप करो स्वीकार।
मिल-जुलकर सबको रहना, चाह छोड़ दरकार।।

बात सरल सीधी साधी है, बाँध रखो सब गाँठ।
नहीं किसी को हममें बनना, जानबूझकर काठ।।
समझ गए सब तो है अच्छा, छोटी सी ये बात।
नहीं समझ आया तो जाओ, खाओ जूता लात।।

नाहक नहीं नसीहत मेरी, मत कहना तुम व्यर्थ।
सोच-समझकर बात हमारी, जानो पहले अर्थ।।
बस इतनी सी दुआ हमारी, ऐसा दिन हो खास।
मानव मन मे मुस्कानों की, अपनी बगिया खास।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू- करुणा 
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करुणा का भाव लिए 
निहारती राह वो
तुम्हारे लिए।

आँसुओं को पीकर भी 
करुणा लुटाती रही
तुम्हारे लिए।

मार दिया ममता को
पी लिया करुणा 
तुम्हारे लिए।

अब सब व्यर्थ है
करुणा संवेदना भी
तुम्हारे लिए।

कौन समझता है आज
करुणा की भाषा 
तुम्हारे लिए।

दबानी पड़ती है उसे 
करुणा का वेग
तुम्हारे लिए।

ऐसा कैसे हो सकता 
करुणा समझ नहीं 
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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देव-दानव
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यही तो कलयुग की माया है
सभी देव हैं और दानव भी,
पर विडंबना यह कि पहचान का संकट है।
दानवों को तो हम पहचान सकते हैं
पर देवों को पहचान पाना मुश्किल है
पहचान भी लें, तो विश्वास करना कठिन है,
झिझक और डर भी लगता है
क्योंकि इन्हीं देवों और दानवों के बीच
हमें जीना भी होता है।
उम्मीदों के आसमान को ऊँचा रखना पड़ता है
फूँक-फूँककर कदम रखना होता है,
राह के देव-दानवों से बचकर चलना पड़ता है।
क्योंकि देव कब दानव और दानव कब देव बन जाए
कहना बहुत मुश्किल होता है,
बस! इसी ऊहापोह में आगे बढ़ना भी होता है।
देव हों या दानव, सबसे रिश्ता रखना ही पड़ता है,
क्योंकि कौन कब काम आ जाए हमारे
समय से पहले इसका पता भी तो नहीं होता है,
इसीलिए देव हो या दानव
दोनों के महिमा मंडन से बचना पड़ता है,
जीने के लिए बार-बार मरना तक पड़ता है

सुधीर श्रीवास्तव

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नारी जीवन
*********
नारी ममता की मूर्ति
करुणा का सागर, त्याग तपस्या की देवी है,
जिसके आँचल में मिलती है
शीतलता की छाँव और सूकून का अहसास।
माँ, बहन, बेटी, पत्नी के रूप में
सँवारती है हमारा जीवन,
और अपने आशीष से देती है प्रेरणा, प्रोत्साहन,
निराशा में आशाओं का संचार करती है
मुसीबतों से बचाने के लिए
जाने क्या-क्या, कैसे -कैसे जतन करती है,
बदले में वो हमसे सिर्फ इतना ही तो चाहती है
बस! अपनापन, विश्वास और खुशियों की सौगात
परिवार की एकता, उन्नति की चाह
और हँसता, मुस्कराता घर-परिवार।
बस! यही तो है ममता की देवी नारी,
जिसका अपना कुछ भी नहीं होता
फिर भी सब उसका अपना ही होता है,
जैसे सारी जिम्मेदारियाँ उसके ही शीश पर हों।
ऐसे में हम सबकी भी तो कुछ जिम्मेदारी है
उसकी ममता, करुणा, त्याग, तपस्या के प्रति
ताकि मिलता रहे हमें उसका आशीष,
सँवर जाए हमारा जीवन और खुशहाल रहें
हम, आप, सब और हमारा परिवार।

सुधीर श्रीवास्तव

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टीम इंडिया ने इतिहास रचा

टीम इंडिया के टी-20 विश्वकप जीतने के बाद
मेरे मित्र यमराज ने मुझे फोन किया,
बधाइयाँ शुभकामनाओं से लाद दिया।
मैंने धन्यवाद के साथ उसे समझाया
प्रिय मित्र! बधाइयाँ शुभकामनाएं तो
टीम इंडिया, बीसीसीआई, कोच, कप्तान
साथी खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ को दो।
जवाब में उसने कहा -
प्रभु! क्या मैं आपको बेवकूफ लगता हूँ
ये बधाइयाँ शुभकामनाएं आपके लिए हैं भी नहीं,
जो इतना तने जा रहे हो।
अब जब टीम इंडिया ने रचा इतिहास
तो मैंने भी किया एक छोटा सा प्रयास
अब तुझे छोड़कर और भला किससे करता आस।
बस! अब आप मुझ पर इतना एहसान कीजिए
मेरी बधाइयाँ शुभकामनाएँ
चुपचाप उचित स्थान और व्यक्ति तक पहुँचाइए,
भले ही मेरा नाम छुपा अपने नाम का लेबल लगाइए।
अब अपने खोल से तनिक बाहर तो आइए
टीम इंडिया ने इतिहास रचा, इस बात का जश्न मनाइए,
इस नेक सुझाव के लिए मुझे दावत पर बुलाइए
हम -आप मित्र हैं, यह दुनिया को बताइए
यमराज मित्र होने का फ़र्ज़ निभाने के साथ
टीम इंडिया की तारीफ में एक कविता भी सुनाइए,
और मेरे नाम के साथ छपवाइए।

सुधीर श्रीवास्तव

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छठ पूजा

शुक्लपक्ष कार्तिक छठ तिथि को
छठी मातु की पूजा होती,
नर नारी के मन में जगती एक अलौकिक ज्योति ।
आस्था, श्रद्धा, विश्वास का त्योहार
छठ मइया की महिमा अपार,
जिसने लिया है इसको जान
सदा निरोग उसकी संतान।
प्रकृति से जुड़ा है इसका रिश्ता
सूर्यदेव से पावन नाता,
त्रिदिवसीय यह पर्व है प्यारा
गातीं गीत व्रती संसारा।
बिन पंडित त्योहार यह होता
हर परिजन सहयोगी बनता,
अद्भुत खुशियों का नव उल्लास
वातावरण में जन-मन को दिखता ।
देवी संज्ञा मातुरुप में
छठी मैया मानी जाती,
ठेकुआ, ईख, फल, फूल अर्पित कर
छठ पर्व की पूजा होती।
संध्या को सूर्य संग देवी संज्ञा का,
व्रती नारियाँ स्वागत करतीं
फिर प्रातः काल में अर्घ्य देकर
फिर शाम विदाई रस्म निभातीं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - होली

सबके साथ मनाएं होली।
बोलो सबसे मीठी बोली।।
निंदा नफरत दूर भगाओ।
मन संशय होलिका जलाओ।।

रंगों का त्योहार सुहाना।
सभी गा रहे इसका गाना।।
होली का संदेश पुराना।।
मिलकर गले फाग है गाना।।

मर्यादा में खेलों होली।
बन जाओ सबके हमजोली।।
रंग बिरंगी सूखी गीली।
लाल रही या नीली पीली।।

बच्चे बूढ़े नहीं छेड़ना।
बीमारों को आप देखना।।
नहीं किसी का हृदय दुखाना।
रंग अबीर गुलाल लगाना।।

मिलकर हम हुड़दंग मचाएँ।
रंग अबीर गुलाल लगाएँ।।
प्रेम प्यार से खेलें होली।
मिश्री जैसी मीठी बोली।।

रंगों से हर गाल सजाएँ।
हिल मिलकर त्योहार मनाएँ।।
छोटों को अपने दुलराएँ।
शीश बड़ों के चरण झुकाएं।।

सुधीर श्रीवास्तव

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