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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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नवरात्रि से पहले
*********
पहले तो स्वीकारिए मैया मेरा प्रणाम
और ध्यान से तब सुनो बात मेरी अविराम
फिर जो करना कीजिए आगे कोई काम।
यह मेरी शिकायत नहीं मेरे मन की पीड़ा है
जिसे कहने में डर भी लगता है, पर उठाया मैंने बीड़ा है।
बात इतनी सी है कि आप कहाँ विचरण कर रही हो
देश-दुनिया में क्या हो रहा है,
इस पर भी कुछ ध्यान दे रही हो?
मुझे तो नहीं लगता कि इस पर विचार भी कर रही हो,
बस नवरात्रि में अपने पूजा पाठ की तैयारियों का
घूम-घूमकर सिर्फ इंतजाम देख रही हो।
अब आप मेरा कहना मानो, मानव-मन की पीड़ा जानो।
मुझे लगता है कि आपको शायद ध्यान ही नहीं है
कि रुस-यूक्रेन युद्ध अभी तक चल रहा है
इजरायल-फिलीस्तीन में भी वार-पलटवार हो रहा है,
भारत पाकिस्तान की बात छोड़िए
कम से कम अफगानिस्तान -पाकिस्तान के मध्य
आये दिन संघर्ष के बारे में ही सोचिए।
ऊपर से अमेरिका इजरायल गठजोड़ के साथ
ईरान के युद्ध का नया वर्जन विनाशक हो रहा है,
विश्व युद्ध का डर दुनिया को सोने नहीं दे रहा है,
निरीह, असहाय निर्दोष मारे जा रहे हैं,
जगह-जगह खंडहर के ढेर डरा रहे हैं,
नित नये श्मशान आबाद होते जा रहे हैं।
अब ये मत कहना माते!
कि मैं आपको ये समाचार क्यों सुना रहा हूँ?
तो आप भी जान लो मैं तो सिर्फ अनुरोध कर रहा हूँ,
डरता भी हूँ, मगर अपनी माँ से ही तो बक-बक रहा हूँ।
अब आप कुछ कीजिए माते
चण्डी-काली-दुर्गा रुप दिखाइए
युद्ध के रावणों-राक्षसों को मारिए,
आम जन-मानस को अपने होने का अहसास कराइए।
सिर्फ भारत ही नहीं अखिल विश्व में
शांति स्थापित करने की राह दिखाइए,
शक्ति से, शांति से, प्यार या प्रहार से
जैसे भी हो हर युद्ध की आग अब बुझाइए,
विराम लगाने के लिए अपने प्रभाव का दर्शन कराइए।
अपने भक्तों, अभक्तों के मन से
विश्व युद्ध का डर अबिलंब दूर भगाइए,
हे आदशक्ति मैया! नवरात्रि से पहले
बस इतना कर धरती के हर प्राणी को
भयमुक्त होने का आभास कराइए,
इस नादान की फरियाद पर नाराज़ होने के
पहले अट्टहास कीजिए या मुस्कराइए,
पर जैसे भी हो सारे युद्ध पर
अब तो लगाम लगाइए, संदेह के बादल हटाइए।
और फिर निश्चिंत होकर आइए
नवरात्रि में अपनी पूजा, आरती, जप, साधना कराइए,
अपने भक्तों के दिलों में आसन जमाइए
अपनी जय-जयकार खूब कराइए
सबके साथ मुझ पर भी अपनी कृपा बरसाइए।

सुधीर श्रीवास्तव

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स्मृतियों में शेष
*************
आना-जाना प्रकृति का नियम है
जिस पर हमारे नियम-कानून,
सुख-दुख, मान-मर्यादा, अच्छे-बुरे,
अनुकूल -प्रतिकूल, स्थिति-परिस्थिति
कद-पद, प्रतिष्ठा, आभामंडल का
रंचमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता है।
जाने वाला चला गया
फिर भी हमें जीना ही पड़ता है,
इस जीने के पीछे भी सबके बहाने
कुछ तीखे तो कुछ मीठे तराने हैं।
सबका अपना नजरिया है
मगर जाने वाले का जीवन जीने का भी
तो अपना अलग पहिया था।
आचार्य पंडित तिलक धारी मिश्र 'शास्त्री' जी
जब आज हमारे बीच नहीं हैं,
तब उनके परिजनों का
उन्हें याद करने का अपना अंदाज है,
उनके अंदाज, नजरिए, रहन- सहन, चिंतन,
पांडित्य को आत्मसात करने का विविध आयाम है।
हमारे अपने जो आज स्मृति शेष हैं
कुछ के लिए अशेष, कुछ के लिए विशेष
तो कुछ के लिए महज अवशेष हैं।
अब यह हमें सोचना है कि
कल हमें भी जाना ही है,
तब भी हमारे परिजनों का नजरिया
ठीक वैसा ही होगा,
जैसा अपने स्मृति शेष परिजनों के लिए आज हमारा है,
कौन प्यारा, न्यारा, दुलारा, हमारा है
या हमने ही उसे मारा है।
जीवन का ये चक्र चलता ही रहेगा,
समय के साथ हमारे सोचने समझने में
बुनियादी अंतर भी नहीं होगा।
जरुरत आज ही नहीं आने वाले कल में भी होगी
कि हम स्मृति शेष परिजनों की आत्मा को
कितना सुकून दे पाते हैं?
अथवा औपचारिकताओं के भंवर जाल मे
उलझकर खुद हँसते और उन्हें रुलाते हैं।
जो भी है, हम आपको ये क्यों बताकर सताते हैं
आपके जीवन में दखल देने का दुस्साहस करते हैं।
माफ़ कीजिए! हम तो सिर्फ
स्मृतिशेष विभूतियों को नमन करते हैं
अपनी भूल-चूक माफ करने का अनुरोध करते हैं,
मधुब्रत जी के साथ अपनी संवेदनाओं के साथ खड़े हैं
उनके पिता नहीं, पिता के उच्च आदर्श
श्रेष्ठ व्यक्तित्व, पाण्डित्य, आचार्य, छंदाचार्य
और उनकी कलम का गान करते हैं,
बारंबार नमन वंदन, प्रणाम करते हैं
अपने श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं
उनकी स्मृतियों को जीवंत रखने का
एक अल्प, अंकिचन प्रयास करते हैं,
उनको याद करते और शीश झुकाते हैं,
उनके सूक्ष्म संरक्षण का भाव संजोते हैं,
एक विभूति सदृश उनकी स्मृतियों को
सहेजने का हम भी आपके साथ प्रयास करते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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अहम का संघर्ष : विनाश का द्योतक
*****
आज समूचा विश्व अहम के संघर्ष में फँसता जा रहा है
विश्व आशंकाओं के बीच डर-डर कर जी रहा है,
निरपराध, निर्दोष मारे जा रहे हैं,
मूलभूत सुविधाएं गर्त में जा रही हैं,
संसाधन बर्बाद हो रहे हैं,
प्रकृति के साथ विनाश का खेल खेला जा रहा है।
बम, गोला, बारुद से मौत का ताँडव किया जा रहा है
लाशों के ढेर लगते जा रहे हैं
जहाँ जीवन की खुशहाली थी
घर, दुकान, मकान, संस्थान, बड़ी - इमारतें
वर्षों की साधना से तैयार जन जीवन को
सुविधा देने वाली खोजें,
लाखों करोड़ों, अरबों खर्च कर
विकास की गंगा में बारुद रुपी जहर घोला जा रहा है,
रोजी, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा को
आदिम युग की ओर ढकेला जा रहा है।
विचारणीय प्रश्न है कि इसका परिणाम क्या होगा?
अहम का यह संघर्ष कब और कहां जाकर रुकेगा?
कुछ सनकी और विकृत मानसिकता का शिकार
क्या समूची मानवता और धरा के
विनाश का द्योतक बनेगा?
और इस धरती से मानव ही नहीं
जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे
और खरपतवारों के नामोनिशान के साथ ही खत्म होगा?
क्या अहम के संघर्ष का इस तरह ही अंत होगा?
क्या धरती पर भूत-प्रेतों का डेरा होगा,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, गुरुद्वारों में
भक्त नहीं सिर्फ, ईश्वर, अल्लाह, ईशामसीह
और गुरुग्रंथ साहिब के सिवा परिंदा भी नहीं होगा?
तब इस संघर्ष का लाभ आखिर किसको मिलेगा?
जब धरा पर कुछ भी नहीं होगा,
अपना तो छोड़िए जब कोई दुश्मन भी
हमारे सामने ही नहीं होगा।

सुधीर श्रीवास्तव

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युद्ध नहीं विश्व शांति अभियान
*****
आज समूचा विश्व आशंकित है, होना भी चाहिए,
कुछ सनकी लोगों की सनक से
तीसरे विश्व युद्ध का खतरा जो बढ़ गया है।
पर समझ नहीं आता है कि क्या मिलेगा उस जीत से?
जिसमें सब कुछ तबाह हो जायेगा,
संसाधन बर्बाद हो जायेंगे,
मूलभूत सुविधाएं भी संघर्ष का कारण बनेंगी
घर, दुकान, मकान, संस्थान खंडहर हो जायेंगे।
लाशों पर मंडराते गिद्धों के बीच
जीवित रहने के लिए कुछ खाने की तलाश करते
अभाव ग्रस्त मानव, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े
और आदिम युग के दिनों की आधुनिक तस्वीर
क्या यही नहीं है चल रहे युद्ध की विभीषिका का
अत्यंत भयावह और अंतिम परिणाम।
जबकि बच्चा-बच्चा जानता है कि
युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है
बुद्ध के रास्ते पर चलकर ही
सौहार्दपूर्ण समाधान ही अंतिम विकल्प है,
पर कुछ लोगों के लंबरदार बनने की सनक ने
दुनिया को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है,
या मान लें इन सबके दिमाग में गोबर भरा है।
क्या वे इतने नासमझ हैं, जो बिल्कुल नहीं जानते
कि दुष्परिणाम उनको और उनके देशों,
लोगों को भी भोगना पड़ेगा,
युद्ध का दंश उनको भी न भूलने वाला ग़म
और अभावों की सौगात ही देगा।
तब वे किससे और किसके लिए युद्ध करेंगे
क्या युद्ध से ही खुद दो-दो हाथ कर
ऐसे ही अपनी मनमानी करेंगे?
चलो मान भी लिया तो भला उसका बिगाड़ क्या लेंगे?
पर इतना ज़रुर होगा कि आने वाली पीढ़ियों के मन में
अपने लिए नफरत की आग जरुर भर देंगे।
क्योंकि जब आने वाली पीढ़ियों को अहसास होगा
कि उनके पुरखे ही उनके जीवन में
अभावों, दुश्वारियों, बीमारियों के
माली बनने के बाद ही दुनिया छोड़कर गए हैं,
तब क्या वे सब उनके गुण गायेंगे?
बिल्कुल नहीं! पानी पी-पीकर कोसेंगे, गरियाएंगे।
मगर अब कुछ भी कहना बेकार है
दुनिया तबाही के पायदान पर आकर खड़ी है,
धरा खुद प्राणी विहीन होने के डर से काँप रही है,
हमें भी अब तैयार हो जाना चाहिए,
जीने की उम्मीद छोड़ घुट-घुटकर
मरने के लिए कफ़न बांध लेना चाहिए।
वैसे एक अंतिम विकल्प अभी शेष है
युद्ध के सौदागरों को सत्ता से दूर भगाइए,
और युद्ध नहीं विश्व शांति अभियान
हम आप सब या हमारा भारत ही नहीं
समूचे विश्व के साथ एकजुट होकर चलाइए,
और जैसे भी हो युद्ध का नामोनिशान मिटाइए
तभी फिर से मुस्कराने का विचार मन में लाइए।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू

अब जीना बेकार है
समझ में आया
तुम्हारे लिए।

पावन भाव लिए वो
आगे बढ़ता रहा
तुम्हारे लिए।

बेकार है शिकवा-शिकायत
समझना नहीं जब
तुम्हारे लिए।

बंद करो विधवा विलाप
खोखला है सब
तुम्हारे लिए।

कैसे कह दूँ तुमसे
दूर नहीं जाना
तुम्हारे लिए।

हार-जीत तो खेल है
समझ लिया हमने
तुम्हारे लिए।

विश्वास तोड़ दिया मैंने
रोना बेकार है
तुम्हारे लिए।

जीवन की डोर बनी
व्यर्थ रुलाती है
तुम्हारे लिए।

ईश्वर से आस है
पूरा विश्वास है
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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सायली छंद- जिंदगी

जिंदगी
आसान है
जीकर तो देखिए
हँसते मुस्कुराते
रहिए।

जिंदगी
एक मेला
सुख-दुख का
झमेला भी
समझिए।

जिंदगी
आपकी है
जीते ही रहिए
हँसिए-गाइए
मुस्कराइए।

जिंदगी
मानिए तो
ईश्वर का उपहार
धन्यवाद -आभार
साभार।

जिंदगी
सिखाती है
जीवन का पाठ
पढ़ना रोज
सीखिए।

जीवन
का एक
ही अंतिम सत्य
आना-जाना
जानिए।

जिंदगी
कट जायेगी
रोता क्यों है?
बेकार यार
तकरार।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद (१६,११) - मुस्कान

नित नूतन मुस्कानों का हम, रोज लगाएं ‌ बाग।
और बुझाएं सुलग रही जो, मन की अपने आग।।

शांत चित्त हो चिंतन करिए, निज जीवन का सार।
कितना उचित है या फिर अनुचित, नाहक लेना भार।।
अपनी भी है जिम्मेदारी, यही सीख लो बाँट।
प्रेम प्यार से चाहें कुछ को, या फिर कुछ को डाँट।।

खुद के ही दुश्मन बन जाते, जाने कैसे लोग।
रोग बढ़ाते पालपोस कर, झेंप-झेंप कर भोग।।
नादानी अब हम सब छोड़े, दें सबको संदेश।
मानों सब कुछ पास तिहारे, मानो स्वयं नरेश।।

मुस्कानों की छोटी-छोटी, बगिया रोपें रोज।
निंदा नफ़रत क्रोध ईर्ष्या, क्यों करना है खोज।।
यही सूत्र है मुस्कानों का, आप करो स्वीकार।
मिल-जुलकर सबको रहना, चाह छोड़ दरकार।।

बात सरल सीधी साधी है, बाँध रखो सब गाँठ।
नहीं किसी को हममें बनना, जानबूझकर काठ।।
समझ गए सब तो है अच्छा, छोटी सी ये बात।
नहीं समझ आया तो जाओ, खाओ जूता लात।।

नाहक नहीं नसीहत मेरी, मत कहना तुम व्यर्थ।
सोच-समझकर बात हमारी, जानो पहले अर्थ।।
बस इतनी सी दुआ हमारी, ऐसा दिन हो खास।
मानव मन मे मुस्कानों की, अपनी बगिया खास।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू- करुणा 
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करुणा का भाव लिए 
निहारती राह वो
तुम्हारे लिए।

आँसुओं को पीकर भी 
करुणा लुटाती रही
तुम्हारे लिए।

मार दिया ममता को
पी लिया करुणा 
तुम्हारे लिए।

अब सब व्यर्थ है
करुणा संवेदना भी
तुम्हारे लिए।

कौन समझता है आज
करुणा की भाषा 
तुम्हारे लिए।

दबानी पड़ती है उसे 
करुणा का वेग
तुम्हारे लिए।

ऐसा कैसे हो सकता 
करुणा समझ नहीं 
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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देव-दानव
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यही तो कलयुग की माया है
सभी देव हैं और दानव भी,
पर विडंबना यह कि पहचान का संकट है।
दानवों को तो हम पहचान सकते हैं
पर देवों को पहचान पाना मुश्किल है
पहचान भी लें, तो विश्वास करना कठिन है,
झिझक और डर भी लगता है
क्योंकि इन्हीं देवों और दानवों के बीच
हमें जीना भी होता है।
उम्मीदों के आसमान को ऊँचा रखना पड़ता है
फूँक-फूँककर कदम रखना होता है,
राह के देव-दानवों से बचकर चलना पड़ता है।
क्योंकि देव कब दानव और दानव कब देव बन जाए
कहना बहुत मुश्किल होता है,
बस! इसी ऊहापोह में आगे बढ़ना भी होता है।
देव हों या दानव, सबसे रिश्ता रखना ही पड़ता है,
क्योंकि कौन कब काम आ जाए हमारे
समय से पहले इसका पता भी तो नहीं होता है,
इसीलिए देव हो या दानव
दोनों के महिमा मंडन से बचना पड़ता है,
जीने के लिए बार-बार मरना तक पड़ता है

सुधीर श्रीवास्तव

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नारी जीवन
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नारी ममता की मूर्ति
करुणा का सागर, त्याग तपस्या की देवी है,
जिसके आँचल में मिलती है
शीतलता की छाँव और सूकून का अहसास।
माँ, बहन, बेटी, पत्नी के रूप में
सँवारती है हमारा जीवन,
और अपने आशीष से देती है प्रेरणा, प्रोत्साहन,
निराशा में आशाओं का संचार करती है
मुसीबतों से बचाने के लिए
जाने क्या-क्या, कैसे -कैसे जतन करती है,
बदले में वो हमसे सिर्फ इतना ही तो चाहती है
बस! अपनापन, विश्वास और खुशियों की सौगात
परिवार की एकता, उन्नति की चाह
और हँसता, मुस्कराता घर-परिवार।
बस! यही तो है ममता की देवी नारी,
जिसका अपना कुछ भी नहीं होता
फिर भी सब उसका अपना ही होता है,
जैसे सारी जिम्मेदारियाँ उसके ही शीश पर हों।
ऐसे में हम सबकी भी तो कुछ जिम्मेदारी है
उसकी ममता, करुणा, त्याग, तपस्या के प्रति
ताकि मिलता रहे हमें उसका आशीष,
सँवर जाए हमारा जीवन और खुशहाल रहें
हम, आप, सब और हमारा परिवार।

सुधीर श्रीवास्तव

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