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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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चौपाई - श्रमिक

श्रमिक धरा हम तुम है सारे।
कोई यहाँ विशेष न प्यारे।।
सबके काम अलग बस होते।
करने पड़ते हँसते रोते।।

इसका हल्का उसका भारी।
कुछ की बैठे जिम्मेदारी।।
कोई भाग-दौड़ है करता।
ठकोई बैठे बैठे खटता।।

श्रमिक भला श्रम से कब डरता।
किसका पेट बिना श्रम भरता।।
श्रमिक बने सब घूम रहे हैं।
सबके अपने भाग्य रचे हैं।।

करे जरूरत सबकी पूरी।
चाहे पास हो या फिर दूरी।।
रूप रंग का भेद न होता।
श्रम के बीज श्रमिक ही बोता।

श्रम सम्मान सभी को मिलता।
जन परिवार देश है खिलता।।
श्रमिक देश का मान बढ़ाते।
उन्नति के पथ पर ले जाते।।

बड़ी निराली इनकी लीला।
रुखा-सूखा, सुखद कंटीला।।
श्रमिक ही करते जग उद्धार।
इनको सभी दीजिए प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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विश्व हास्य दिवस (03 अप्रैल)
हँसना मना है
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आज हास्य दिवस है
इस पर किसका वश है।
कहते हैं यमराज मित्र हँसना मना है यही इस दिवस का सम्मान है।
मगर आप तो मानोगे नहीं, इसीलिए तो आप जैसे बेवकूफों का इतना नाम है।
हास्य की कसम आप सबको
स्वस्थ, प्रसन्न रहना है
तो हँसना एकदम गैर जरुरी है
मगर आप सब ये गलती है मत करना
क्योंकि हँसने के लिए हँसना मना है।
हम आप सबसे ज्यादा शरीफ हैं
यमराज के यार हैं, सबसे बड़का लंबरदार हैं।
आप समझ गए तो आपका कल्याण कर देंगे
यदि नहीं समझे, और मुझ हँस दिए तो
सबको काला पानी की सजा दे देंगे।
हँसने का शौक अगर इतना ही रहा
तो यमराज की कसम हँसी का नामोनिशान ही मिटा देंगे, हँसने और हास्य दिवस दोनों का अस्तित्व ही
खत्म कर हास्य दिवस को इतिहास बना देंगे।

सुधीर श्रीवास्तव

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जीने के लिए
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उम्मीदों की राह का मिटता सन्नाटा
मुस्कान बिखेरती चाँदनी सपने दिखाती,
दिल की धड़कन बेकाबू सी हो जाती है।
तब मन में विश्वास जगाना पड़ता है
अपने आप से तर्क-वितर्क करना पड़ता है,
उम्मीदों को यथार्थ के धरातल पर
उतारने का प्रयत्न भी करना पड़ता है।
राह के काँटे खुद हटाता पड़ता है,
सन्नाटे को चीरना पड़ता है,
ऊहापोह से बचकर आगे बढ़ना पड़ता है
धड़कनों पर काबू रखना पड़ता है।
इन सबके लिए अपने आप से लड़ना पड़ता है।
जीवन में विडंबनाएं बहुत हैं,
यह बात अच्छे से समझना पड़ता है,
आँसुओं को ताकत बनाकर
हौसलों को पंख देना पड़ता है,
जीवन जीने के लिए
जाने क्या-क्या जतन करना पड़ता है
और अकेले ही जूझते हुए
आगे बढ़ना और जीतना पड़ता है।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया
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ममता की वो खान है, मानें हम संताप।
अपने निज व्यवहार से, करते हम सब पाप।।
करते हम सब पाप, सभी हम जो हैं भरते।
उसकी पीड़ा आज, देख क्यों नहीं समझते।
कहें मित्र यमराज, समझिए इतनी समता।
प्यारे पढ़ लो आप, मित्र लाचारी ममता।।९

मानो ज्ञान भंडार का, निज जीवन आयाम।
अज्ञानी बन बैठना, बदनामी तव नाम।।
बदनामी तव नाम, भलाई आखिर किसमें।
करना वो ही काम, भाव सुखदा हो जिसमें।
आप बढ़ाओ कोष, मित्र अब इतना जानो।
बाकी सबकुछ आप, सोच समझकर मानो।।१०

जिनकी होती है नहीं, स्वाभिमान पहचान।
हम सब उनको जानते, इतना होता ज्ञान।।
इतना होता ज्ञान, व्यर्थ है चर्चा करना।
होशोहवास में आप, मित्र संभलकर रहना।
दूरी रखिए आप, कहानी जो है इनकी।
क्यों उनकी पहचान, शोर है चहुँदिश जिनकी।।११

सबके नहीं नसीब में, होता माँ का प्यार।
जो इससे वंचित रहे, वही समझता सार।।
वही समझता सार, दंश ये होता भारी।
पर बेचारा आप, कहे किससे लाचारी।
कहें मित्र यमराज, जगत में ऐसे तबके।
धक्के खाते नित्य, जहाँ में रहते सबके।।१२

बनिए नहीं बिचौलिया, मिलता केवल दोष।
सहना पड़ता व्यर्थ में, कल में ढेरों रोष।।
कल में ढेरों रोष, काम जब उसका निकले।
काम बिगड़ यदि जाय, फोड़ना चाहे टकले।
कहें मित्र यमराज, बात मेरी तो सुनिए।
अच्छा होगा आप, सामने मूरख बनिए।।१३

सबसे ज्यादा आजकल, अपने लगते भार।
कलयुग का यह सार है, लगभग हर परिवार।
लगभग हर परिवार, सुनें हम यही कहानी।
सभी सुनाते आज, कथाएं आप जुबानी।
कहें मित्र यमराज, शिकायत नहीं किसी से।
सभी दुखी हैं आज, मगर हम अच्छे सबसे।।१४


अंर्तमन की पीर का, होता गहरा घाव।
आज छोड़कर कल उसे, आप दीजिए भाव।
आप दीजिए भाव, रंग चेहरे मत लाना।
नाहक उसको आज, नहीं दो पानी दाना।
इसका रौरव छंद, तोड़ देता है हर तन।
कहें मित्र यमराज, गजब होता अंर्तमन।।१५

दिखता है दृश्यमान जो, करता सबको तंग।
जो हो रहा समाज में, आज बहुत बदरंग।।
आज बहुत बदरंग, जमाना कैसा आया।
कलयुग के दौर ने, जगत को है भरमाया।।
कहें मित्र यमराज, सत्य भी खूब है बिकता।
मान लीजिए आप, झूठ ही आगे दिखता।।१६

आया मुश्किल समय है, होते सब बेहाल।
सूर्यदेव इतने कुपित, तपन हुई विकराल।।
तपन हुई विकराल, हमें भी तो समझा दो।
या लाकर चुपचाप, एक बोतल पकड़ा दो।।१७
कहें मित्र यमराज, शर्म आती है भाया।
गर्मी का यह रूप, आप से मिलने आया।।

बनते न्यायाधीश जो, होते नहीं महान।
संविधानक्ष की पालना, रखें ईश का ध्यान।।
रखें ईश का ध्यान, न्याय के जो अनुरागी।
नीति नियम सिद्धांत, बने रहते बिरहागी।
कहें मित्र यमराज, धर्म का पोषण करते।
तब जाकर कुछ लोग, योग्य तब इसके बनते।।१८

तुमको जो अच्छा लगा, किया वही हर काम।
और मुफ्त में हो गए, घर बैठे बदनाम।।
घर बैठे बदनाम, पीटते अब क्यों माथा।
करते जिन पर नाज , आज कोई ना साथा।
कहें मित्र यमराज, बुलाओ इनको उनको।
हम भी देखें आज, यहाँ जो लाए तुमको।।१९

ऐसे भी कुछ लोग हैं, नहीं आस्था ज्ञान।
कुंठा में हैं जी रहे, बनते बड़े महान।।
बनते बड़े महान, बता कर वे खुश होते।
नहीं समझते आज, उड़ेंगे इक दिन तोते।
कहें मित्र यमराज, बनो मत इनके जैसे।
ये सब हैं बेशर्म, रहेंगे बिल्कुल ऐसे।।२०

आस्था के साथ अब क्यों, खेल रहे हैं लोग।
या फिर इन सबको मिला, जन्मजात ये रोग।।
जन्मजात ये रोग, दवा अब बहुत जरूरी।
मान लीजिए आप, भले ही हो मजबूरी।
कहें मित्र यमराज, बढ़ाओ सब मिल हाथा।
तभी बचेगी लाज, सत्य जब होगी आस्था।।२१

गाना गाते बेसुरा, या फिर कोई रोग।
दुश्मन से लगने लगे, अपने सारे लोग।।
अपने सारे लोग, दुश्मनी लगे निभाने।
बिना बात के आज, बेवजह देते ताने।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ इनको समझाना।
रहें दंभ में चूर, बेसुरा गाते गाना।।२२

नफरत ही नफरत भरी, मानव मन में आज।
क्या होता अब जा रहा, कैसा हुआ समाज।।
कैसा हुआ समाज, राम जाने क्या होगा।
भोग रहे सब आज, नहीं जो कल तक भोगा।।
कहें मित्र यमराज, दिखाओ यार शराफत।
करो सभी से प्रेम, नहीं आपस में नफरत।।२३


सुधीर श्रीवास्त

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सेदोका १
********
हमें चाहिए
एक ऐसा संसार
हो आपस में प्यार।
बनाना होगा
हम सबको मिलकर
ऐसा जग आधार।।१।।

यमराज जी
गले पड़े हमारे
अब वही सहारे।
पर बेचारे
हमसे ही हैं हारे
लग रहे बेचारे।।२।।

गुरुजनों का
आदर करना है
यही सीखा हमने।
तभी जलती है
हममें ज्ञान ज्योति
पूरे होते सपने।।३।।

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद 
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उम्मीदों की ज्योति, सदा ही आप जलाना।
भ्रम  से  रहना  दूर,  व्यर्थ  बनना  दीवाना।
कहें  मित्र यमराज, नहीं  करना  मनमानी।
मंजिल  होगी  दूर,    याद  आयेगी  नानी।।

कपटी चलते चाल, सजा के मुख पर लाली।
होते  हैं   बेशर्म,       भले  ये  खाएँ  गाली।।
चाहे  जैसे  आप,      बचे  ही  मित्रों  रहना।
इनसे  रहिए  दूर,    मानकर  सुंदर  गहना।।

आया  है  बदलाव, दिवस  बालिका  मनाएँ।
दोषी आखिर कौन,  नाहक कयूँ गाना गाएँ।।
कहें  मित्र  यमराज,   दिखावा  पड़े न  भारी।
करिए   केवल  आप,    मान  दीजिए  नारी।।

करिए  नहीं  विवाद, आप  को  पड़े  न भारी।
नहीं  जानते  आप,    किए  वो  क्या  तैयारी।
कहें  मित्र  यमराज, जोश में  तुम  मत आना।
बिना किए तकरार, आप बस बचकर जाना।।

जीवन  का  विस्तार,     बहुत  पड़ता  है  भारी।
कर लो आप विचार, किया क्या निज  से यारी।
कहें  मित्र  यमराज,   समय  की  कैसी  लीला।
दिखता  हमको आज, चित्र सब  नीला-पीला।।

सबका अपना स्वार्थ, आज है सब पर भारी।
समय  देख  प्रतिघात,  करें  जमकर  गद्दारी।
कैसा  आया  दौर,        बढ़ी  नूतन  बीमारी।
और  एक  हैं  आप,  उतरती  नहीं  खुमारी।।

सबके अपने भाग्य, सभी की कर्म कमाई।
नाहक रहते आप, समय को व्यर्थ गँवाई।।
कहें मित्र यमराज, भरोसा खुद पर रखिए।
जो पाया है आज, प्रेम से  उसको चखिए।।

भले सुनो ना आप, मुझे बस कुछ कहना है।
क्या  है  कोई  पाप, नहीं  तुमको  सुनना है।
मेरा  क्या  है  जोर, कीजिए  अपने मन की।
पता  चला  है आज, मरी मानवता जन की।।

मानव कितना आज, मुखौटा  आप चढ़ाए।
चाहे  जितने  लोग,      घुमाएं    दाएँ- बाएँ।
कहें  मित्र  यमराज,   पड़ेगा  तुमको  भारी।
 होगा   पर्दाफाश,    मुफ्त  पाओगे  गारी।।

उम्र, समय का ज्ञान, भला होता है किसको।
धन  ना देता  साथ, हमेशा दँभ  है  जिसको।
जीवन  का ये  खेल, बड़ा  है  सदा  निराला।
करो  सदा  सम्मान, नहीं  मुँह होगा काला।।

कौन निभाता फ़र्ज़, आज का हम सब जाने। 
करते  बड़ा  गुनाह,  सत्य  को  जो  पहचाने। 
कहें  मित्र  यमराज, समय  का देखो  खेला। 
क्यों  करना है  आज, फ़र्ज़ को मारो ढेला।।       

निभा रहे हैं फ़र्ज़, महज है कुछ अपवादी। 
किस्मत  वाले  लोग, बाप दादा  या दादी। 
कहें मित्र यमराज, आप अपने इठलाओ। 
फ़र्ज़ निभाते लोग, शीश अपने बैठाओ।।      

व्यर्थ   निभाते  फ़र्ज़, आप  करते  नादानी। 
कहाँ  मिलेगा  यार,  मुफ्त  में  दाना-पानी। 
कहें मित्र यमराज, नया मत  खोलो रास्ता। 
अच्छा होगा आप, बाँध लो अपना बस्ता।।

क्या समझे अभिशाप, जहर है गाढ़ा जिसका।
जिनके मन  में पाप, भला वो होता किसका।।
कहें मित्र यमराज, आप  सब  बचकर  रहिए।
हमें  बचाओ  आप,   ईश से  विनती  करिए।।

जिनके  मन  में पाप, बड़े वो  जालिम  होते।
मौका  रहे  तलाश,     बीज   संवेदन  बोते।।
कहें मित्र यमराज, पिघलकर गिर मत जाना।
पीट-पीटकर  माथ,    पड़े  ना  रोना  गाना।।

वाणी  में विष  घोल,  सुनाते  राम  कहानी।
लगते  हैं  बीमार,     सुनाते  आप  जुबानी।
कहें मित्र यमराज, समझ तू  इसकी माया।
कभी न देना घाव, आप वाणी  से  भाया।। 

वाणी  ऐसी  बोल, लगे  जो  सबको  प्यारी।
नहीं  जहर  तू घोल,    मान  दुश्मन  संसारी।
करना खूब विचार, आप जब भी मुँह खोलो।
कहें  मित्र  यमराज, घोलकर  मिश्री  बोलो।।                                        
बोलचाल  का रंग,आज बदला  है कितना।
जितना हुआ विकास, सभी जानते इतना।
कहें मित्र यमराज, क्षुब्ध होकर क्या होगा। 
संस्कार  का  पतन,  बढ़ाता  भारी  रोगा।।

जहर घोलकर आप,  बोलिए मीठी वाणी।
खूब दिखाओ प्यार, मानकर पागल प्राणी।                    कहें मित्र  यमराज, खेल  समय का  ऐसा। 
करना यही प्रयास,  बनाना  अपने  जैसा।।

बिखर  गए  सब  ख्वाब,    टूटी  उम्मीदें  सारी।
कैसे   हुआ   शिकार,     व्यर्थ   सारी   तैयारी।
कहें  मित्र  यमराज, तनिक  भी  मत घबराओ।
खुद पर रख विश्वास, नए फिर ख्वाब सजाओ।

मुनाफ़कत  का  रोग, आज  पड़ता  है  भारी।
आता   नहीं   है   काम,    पूर्व   कोई   तैयारी।
कहें  मित्र  यमराज, सभी  को  बचकर रहना।
करके आप विचार, तभी कुछ कहना सुनना।।

प्रकट  करें  आभार,    मानकर  कृपा  ईश्वर।
मिलना सबके साथ, प्रेम-भाव  संग रखकर।
कहें मित्र यमराज,  खिलेगी सुख की क्यारी।
इतनी  छोटी  बात,      भगा  देगी  बीमारी।।

रखिए  उत्तम  भाव, हृदय कटुता  मत लाना।
ईश्वर  पर  विश्वास, कभी ना  आप  डिगाना।
कहें मित्र यमराज,  करो  जब भी  आराधन।
रखना  दूर  विकार,   प्रार्थना  होगी  पावन।।

शुभचिंतक  है  कौन,     नहीं   जान  तू   पाया।
कोशिश की दिन रात, तुझे कितना समझाया।।
कहें  मित्र  यमराज,    छोड़  अब  दुनियादारी।
बहुत हुआ  अब यार, कहीं पड़ जाय न भारी।।

मुफ्त  का है  उपहार,          रोग  ये  पक्षाघाती।
मित्र  बने  यमराज,     ज्ञसुनाते  जी की  पाती।।
कहते  हमसे  रोज,        बात  मेरी  अब  मानो।
दुनिया की भी आज, असलियत को पहचानो।।

मम प्रियवर  यमराज, जानती दुनिया सारी।
कहते  वेद  पुराण,     नहीं  कोई  बीमारी।।
कहने  में  संकोच,     बजाता  हूँ मैं  बाजा।
क्यो  करना आभार,  मित्र  मेरे  यमराजा।।

मत  होना  नाराज,    प्रार्थना  सुन लो  मैय्या।
करता  हूँ  फरियाद,  पार कर दो  अब  नैय्या।
हम  बच्चे  नादान,       आप  हो  गंगा  माता।
हम अबोध-अज्ञान, जगत की तुम सुखदाता।।

निर्मल और पवित्र, मातु का  जल है पावन।
हर प्राणी खुशहाल, लगे माँ आप सुहावन।।
कहें  मित्र  यमराज, सोचना हम  कब चाहें।
दूषित  करते  नित्य,     चाह  गंगा दें  राहें।।

तेरी  मेरी  प्रीत,       बनेगी  एक  कहानी।
नीरस दिखते लोग, सुनाते आप जुबानी।।
कहें मित्र यमराज, जगत की लीला न्यारी।
तू  ही मम का ताज, हमें लगती है प्यारी।। 

सुधीर श्रीवास्तव  
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दोहा -
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अपने ही करने लगे, अब पीछे से वार।
मौका सदा तलाशते, घोंपें पीठ कटार।।

कभी नहीं हम जा सके, वादा किया हजार।
अब तो अंतिम बार ही, मिल आते इक बार।।

कोटा पूरण ही सही, मात-पिता दरकार।
बीबी का फरमान है, मिल आते इक बार।।

जीते जी पूछा नहीं, मोह जगा क्यों आज।
सारी दुनिया जानती, क्या है इसका राज।।

कहें मित्र यमराज जी, नहीं ठानिए रार।
जीते जी पूछा नहीं, अब करते तकरार।।

खाई इतनी चोट है, कितना करूंँ बखान।
दोषी किसको मैं कहूँ, नहीं लिया संज्ञान।।

लूट-खसोट में हैं फँसे, अपने नेता आज।
जनता इनको लग रही, दाद सरीखा खाज।।

धोखा देकर खा रहे, वो तो छप्पन भोग।
नहीं जानते आज ये, कल में होगा रोग।।

अब जमीर का भाव भी, गिरता जाता नित्य।
कहें मित्र यमराज जी, चुरा रहे साहित्य।।

माँ की ममता भव्यता, नहीं रहा क्यों जान।
मानव कलयुग दौर में, बनता क्यों नादान।।

सभी बताते स्वयं का, अपना भव्य चरित्र।
जानबूझ दिखला रहे, खुद का गंदा चित्र।।

मानवता के धर्म का, आप करो अपमान। और सदा कहते फिरो, मैं मूरख अज्ञान।।

हास और परिहास का, अलग-अलग है रंग।
नहीं डालना चाहिए, हमें रंग में भंग।।

बचना हमको चाहिए, करने से परिहास।
सबकी अपनी सोच है, संग आस विश्वास।।

जब मौका दस्तूर हो, करो खूब परिहास।
आनंदित होंगे सभी, फैलेगा उल्लास।।

हम अपने गंतव्य का, रखें सदा ही ध्यान।
तभी पास हम एक दिन, होगा इसका भान।।

सबके अपने गंतव्य हैं, भले पास या दूर।
मिले किसी को प्रेम से, पर कोई मजबूर।।

चलते रहना आपके, जीवन का है काम।
मिलता है गंतव्य भी, संग नया आयाम।।

सब के सब हैं लालची, टपकाते हैं लार।
रग-रग में लालच भरा, आदत से लाचार।।

लालच जाता ही नहीं, होता रोग वियोग।
जो होते हैं जन्म से, लालच करते लोग।।

अपने-अपने स्वार्थ से, सबका है मंतव्य।
इसमें आखिर नया क्या, चलते हैं गंतव्य।।

शबरी कुटिया आ गए, रघुकुल नंदन राम।
खाकर जूठे बेर भी, रचा ललित आयाम।।

सबका दाता एक है, समझ रहा संसार।।
फिर जाने क्यों भटकता, बना हुआ लाचार।।

ग्राही बनकर हम भला, माँग रहे हैं भीख।
स्वाभिमान से क्यों नहीं, जीना लेते सीख।।

आप किसी से बाँटिए, अपने मन की बात।
घुट-घुटकर मत काटिए, अपनी सारी रात।।

मोदी करते आ रहे, अपने मन की बात।
कुछ लोगों को लग रहा, नाहक ही प्रतिघात।।

झुलस रहा है आदमी, गर्मी का आतंक।
पारा बढ़ता जा रहा, जीना हुआ कलंक।।

पशु-पक्षी इंसान सब, बहुत हुए बेहाल।
तपती धरती लग रही, जैसे भट्ठी लाल।।

बजती पायल मोहती, देती नव उल्लास।
नारी की गरिमा बढ़े, इसका मौन प्रयास।।
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धरती / पृथ्वी दिवस
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दिवस एक मना रहे, आप सभी हर वर्ष।
इससे ज्यादा चाहती, धरा कहाँ उत्कर्ष।।

धरती के इस साल के, हम सब जिम्मेदार।
निहित स्वार्थ विकास के, बनकर लंबरदार।।

धरा दिवस की आड़ में, नाहक पश्चाताप।
करते इसकी जो दशा, निश्चित है अभिशाप।।

जल से बनती है धरा, हरी भरी खुशहाल।
बड़ी जरूरत आज है, रखिए इसका ख्याल।।

हर प्राणी व्याकुल दिखे, धरती है बेचैन।
तकनीकों के जाल में, तोड़ रहा दम चैन।।

अभी अभी यमराज ने, खेला ऐसा दाँव।
हरियाली के संग में, दूर हो गई छाँव।।

धरती की क्या फिक्र है, जाना जब यमलोक।
पर्यावरण की आप भी, नाहक करते शोक।।

सबकी मंजिल एक है, हम हों या फिर।
जीवन जीते हैं सभी, करें पुण्य या पाप।।

सबकी मंजिल एक है, मत बनिए नादान।
बेवकूफी में क्यों भला, बाँट रहे भगवान।।

दिन प्रतिदिन ही कीजिए, सारे अच्छे काम।
सदा नियम पालन करें, प्रातःकाल व्यायाम।।

दिवस मनाने से भला, बढ़ता कितना भाव।
वर्ष शेष दिन देखिए, मिलता उसको घाव।।

वार का यारों काम है, बना रहे वो पूंँछ।
इसके बिन हर दिवस ही, जैसे लागे छूँछ।।

दिवा स्वप्न वो देखते, जो आलस में चूर।
करना जिनको कुछ नहीं, आदत से मजबूर।।

गाते मिलकर हम सभी, सुंदर मोहक गीत।
संग नृत्य उल्लास के, बनते दूजा मीत।।

हृदय बढ़े जब वेदना, देती गहरी टीस।
कोशिश कितनी भी करें, नहीं निकलती खीस।।

आज हृदय पत्थर हुए, देख रहे हम आप।
नजर लगी किसकी इसे, करते सब हैं पाप।।
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भ्रष्टाचार
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भ्रष्टाचारी लोग की, होती जय-जयकार।
करते लूट-खसोट जो, गिरगिटिया व्यवहार।।

करते भ्रष्टाचार जो, बनते बड़का संत।
उनके आगे मौन हैं, ज्ञानी गुणी महंत।।

करें कमाई ऊपरी, मान रहे अधिकार।
बड़े गर्व से कह रहे, अपनी है सरकार।।

कुछ ऐसे भी लोग हैं, कभी न भरता पेट।
इनका मुख तो देखिए, जैसे दिल्ली गेट।।

घूसखोर की जिंदगी, रहती डाँवाडोल।
नहीं जानते स्वयं का, बिगड़ जाय भूगोल।।
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यमराज
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मम प्रियवर यमराज जी, निभा रहे हैं साथ।
जब से मैं बीमार हूँ, कसकर पकड़े हाथ।।

याराना यमराज से, देख चकित हैं। लोग।
कुछ हँसकर हैं कह रहे, बुरे कर्म का भोग।।

बहुत दिनों से तुम मुझे, दिखे नहीं यमराज।
तेरी भौजाई करे, याद बहुत ही आज।।

बिना किसी तकरार के, गया मित्र यमराज।
सोच रहा हूँ तभी से, क्या था बड़ा अकाज।।

पक्षाघाती रोग ने, दिया मुफ्त उपहार।
मित्र बने यमराज जी, डरती है सरकार।।

नहीं पता क्या आपको, मम प्रियवर यमराज।
मुश्किल के इस दौर में, करता मेरे काज।।

आज बहुत नाराज़ है, शुभचिंतक यमराज।
गुस्से में लड़कर गया, चाह रहा था ताज।।
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सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद

कभी-कभी ऐसा कुछ होता।
मानव उसको जबरन ढोता।।
पर ऐसा अवसर भी आता।
खुशियों का अम्बर पा जाता।।

मान समय का जो भी रखता।
मीठे फल वो निशदिन चखता।।
समझे पल की जो मर्यादा।
वह पाता है हक से ज्यादा।।

समय साथ हरदम कब देता।
आप परीक्षा भी तो लेता।।
धैर्य कभी अपना मत खोना।
बिलख व्यर्थ मत रोना-धोना।।

आज हुआ है पैसा भारी।
हुई दूर सब रिश्तेदारी।।
सोचो अब हमको क्या करना।
किससे कितना रिश्ता रखना।।
मित्र एक यमराज हमारे।
लगते सबसे हमको प्यारे।।
मन करता तब ही आ जाते।
लड़े बिना सूकून न पाते।।

चाय पिए बिन कहीं न जाते।
खाते -पीते रंग जमाते।।
इधर-उधर की बातें करते।
पर बीबी जी से वो डरते।।

गर्मी की आई फिर बारी।
व्यर्थ हुई सारी तैयारी।।
ताल-तलैया सूख रहे हैं।
पशु-पक्षी भी तड़प रहे हैं।।

कोस रहा अपने को मानव।
कहता हमसे अच्छे दानव।।
गर्मी के हम सब दोषी हैं।
सबने मिलकर ही पोसी है।।

कंकड़ पत्थर बाग लगाए।
धरती को वीरान बनाए।।
भोग रहे कर्मों को अपने।
नाहक देखे इतने सपने।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा मुक्तक

कभी आप मत कीजिए, जानबूझकर पाप।
नाहक लेने से भला, दूर रहे संताप।
समझदार हो खुद बड़े, फिर भी देता सीख-
अच्छा होगा आप हित, करो नाम प्रभु जाप।।

दसकंधर ने था किया, हर सीता को पाप।
चढ़ा लिया निज शीश पर, बस दंभी संताप।
पाया अपने कर्म का, इक दिन ऐसा दंड-
जिसे आज दुनिया कहे, नारी का अभिशाप।।

आज मनुज के शीश पर, नृत्य करे संताप।
धैर्य भला अब है किसे, बस हो जाता पाप।
रहते इतने चूर हैं, जैसे वो ही श्रेष्ठ -
जाने क्यों इंसान का, उच्च शिखर पर ताप।।

भय का भार हटाइए, रखिए उत्तम भाव।
उल्टी पुल्टी सोच से, मन में होता घाव।
भय देता है आपको, सदा दुखद आधार-
आप निशाचर मानकर, मानो मेरा सुझाव।।

सारी दुनिया इन दिनों, रही युद्ध से काँप।
भय का जो प्रभाव है, उसका क्या है नाप। जैसे-तैसे कट रहे, हम सबके दिन आज- इसके कारण नित्य का, रहे अधूरा जाप।।

भीड़ तंत्र की ओट में, सीमा लाँघें लोग।
आज देश में देखिए, फैल रहा ये रोग।
संविधान के संग में, भूल रहे निज कर्म-
अपराधी भी आजकल, लगा रहे अभियोग।।

ये वसुधैव कुटुंबकम्, देता नेक विचार।
मिल-जुलकर रहिए सभी, भाई-चारा सार।
जिसको दुनिया कर रही, हर्ष सहित स्वीकार-
प्राणी सब संसार के, मिला-जुला परिवार।।

मिलकर सभी जगाइए, जग में सुखदा भाव।
नहीं किसी को दीजिए, छोटा सा भी घाव।
दे वसुधैव कुटुंबकम्, शुभता का संदेश -
देना है तो दीजिए, कोई नया सुझाव।।

साहस से ही सभी के, पूरे होंगे काम।
भय को दोषी मानकर, करो नहीं बदनाम।
सोच समझकर कीजिए, निर्णय सारे आप-
छिपकर ओट में मित्रवर, मत टकराओ जाम।।

भय का अपना है अलग, नीति -नियम सिद्धांत।
उसको खुद पर गर्व है, वही बड़ा वेदांत।
चक्रव्यूह में जिसे भी, भय लेता है फाँस-
वही सुनाता सभी को, असफल अपना वृतांत।।

जो डर-डर कर जी रहे, करते निज गुणगान।
अपनी क्षमता का उसे, होता कहाँ है भान।
लीला भय की गा रहे, कहते मेरा यार-
कोचिंग में अब छात्र भी, बाँट रहे हैं ज्ञान।।

मौसम भी दिखला रहा, तरह-तरह के रंग।
प्राणी जन बेचैन हैं, होते रहते दंग।
पर दोषी हम आप हैं, मौसम का क्या दोष-
जल जंगल संग धरा को, करते निशदिन तंग।।

अंतर्मन के द्वंद्व का, समझ रहा हूँ राज।
यह तो मेरे मूल का, बस थोड़ा सा ब्याज।
चिंता इतनी मात्र है, बांटूँ किससे दर्द-
सब अपने ही स्वार्थ में, दिखें सजाए ताज।।

आज त्याग की बात भी, सपनों जैसी रात।
क्योंकि इसकी आड़ में, होते नित प्रतिघात।
अब तो ये बकवास है, शेष महज अपवाद -
त्याग दूर की भावना, रखिए भीतर जज़्बात।।

हिंसा और चुनाव तो, दोनों मिलकर साथ।
जब चुनाव का समय हो, थामें दूजा हाथ।
सरकारें भी क्या करें, रहती हैं हलकान-
हर चुनाव में ही सदा, जनता पीटे माथ।।

देख रहा हूँ आजकल, धोखा देते लोग।
जिनको अपना कह रहे, वही बने हैं रोग।
व्यर्थ आप हम मानते, करें खूब विश्वास -
कहें मित्र यमराज जी, मत मानो संयोग।।

करते रहिए चिंतन मनन, नित्य नियम से आप।
पीछे अपने कर्म से, शीश चढ़ाया पाप।
अपराधी भी स्वयं को, मान कीजिए न्याय-
नहीं किसी का दिल दुखे, दूर रहे अभिशाप।।

चिंता चिंतन संग में, रहना चाहें साथ।
दोनों ही हैं चाहते, थामे रहना हाथ।
जिम्मेदारी आपकी, दूर रहे टकराव -
नाहक ही क्यों पीटना, कल में अपना माथ।।

अंतर्मन में क्यों भला, भीतर इतना घाव।
जिससे इतना हो रहा, रहता नित्य स्राव।
मित्र बात यमराज की, रखिए थोड़ा मान-
रखिए अंतर्मन सदा, मानवता सद्भाव।।

अंतर्मन से वो सदा, रहती शीश सवार।
सबसे ज्यादा करे भी, हमको प्यार दुलार।
छोटी है तो क्या हुआ, लड़ती भी है खूब -
मात-पिता के बाद से, वही आज आधार।।

अपनी खिचड़ी पक गई, आओ खाएँ यार।
फिर मिलकर हम भी करें, आपस में तकरार।।
समय-समय की बात है, कहें मित्र यमराज -
किस्मत भले ही सो रही, चलना है उस पार।।

सब कुछ लिखा किताब में, जीवन का हर सार।
अगर पुस्तकें पढ़ लिया, सारी बाधा पार।।
हर मानव को चाहिए, पढ़े पुस्तकें नित्य -
इतने भर से मान लो, देंगी जन को तार।।

मानव अपने कर्म से, खींचे नई लकीर।
भाग्य भरोसे जो रहे, रहता सदा फकीर।
स्वयं विधाता आप हो, उठो चलो रख धैर्य -
खुद पर यदि विश्वास हो, लिख दो जगत नजीर।।

मानव का कृतित्व, रही मिट जैसे धरती।
क्या होगा अस्तित्व, ताल पोखरा जलती।।
कहें मित्र यमराज, बचाना जंग का जीवन-
करो सभी मिल आज, वृक्ष जीवन में भर्ती।

भले मिटे संसार, नहीं सुधरेगा मानव।
जैसे अत्याचार, बना है इंसाँ दानव।।
दें मानव को शाप, त्रस्त हैं सारी दुनिया-
धरती है बैचैन, देखकर रोती मुनिया।।

अब कितना अपनत्व है, देख रहे हम आप।
अपनेपन की आड़ में, बढ़ता जाता पाप।।
कहें मित्र यमराज जी, ऐसा क्यों है आज-
हर प्राणी के हृदय जो, इतना है संताप।।
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मुक्तक सरसी छंद
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अब जीवन की हर मुश्किल से, मैं ही तुझे बचाऊँगा।
तुझे छोड़कर मेरी बहना, कभी न मैं जा पाऊँगा।।
मेरा परिचय सिर्फ एक है, केवल तेरा नाम लिखूँ-
अब तो लक्ष्य एक है केवल, इतिहास नया बन जाऊँगा।।

सुधीर श्रीवास्त

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विश्व पूस्तक दिवस 
फायकू
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पुस्तकें फैलाए जीत में 
ज्ञान का प्रकाश
तुम्हारे लिए।

पुस्तकें प्रकाशित करती हैं
जीवन राह दिखातीं 
तुम्हारे लिए।

सबसे अच्छी साथी हैं 
जानना जरूरी है 
तुम्हारे लिए।

मत उपेक्षित कीजिए कभी
वरना पछताना पड़ेगा 
तुम्हारे लिए।

जीवन का मजबूत आधार 
होती हैं पुस्तकें 
तुम्हारे लिए।

दिवास्वप्न से बाहर निकलो
पुस्तकें द्वारे आईं 
तुम्हारे लिए।

भ्रम का शिकार बनना 
करना पश्चाताप कल
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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