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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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जयकरी छंद
माँ की ममता
*********
माँ की ममता बड़ी अपार।
मान रहे हम सब आधार।।
कौन हुआ इससे उद्धार।
करते रहिए माँ से प्यार।।

प्राणी जीवन का ये सार।
इनसे मिलता प्यार दुलार।।
माँ का खोता है सम्मान।
लोग बने मूरख अंजान।।

माता झेल रही है दंश।
पीछे इसके अपना अंश।।
माँ को होता भीषण दर्द।
पता चले कब चुभती सर्द।।

माँ का ये कैसा दुर्भाग्य।
अपने करते उसका त्याग्य।।
ये कैसा हम करते पाप।
नाहक है सब पूजा जाप।।

अब अपने में करो सुधार।
वरना निश्चित है बँटाधार।।
माँ की ममता नहीं उधार।
करते रहिए माँ को प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - माता
**********
हम सबकी है जीवन दाता।
कहें आप हम जिसको माता।।
पालन पोषण भी वो करती।
ममता आँचल अपना धरती।।

रातों दिन वो खटती रहती।
फिर भी कभी कहाँ वो थकती।।
ईश्वर की अनमोल धरोहर।
होती कब वो भला सहोदर।।

आज समय का खेल निराला।
हम सबका होता मुँह काला।।
नित माँ का अपमान करें हम।
जिसका हमको ना कोई ग़म।।

माँ का फटता आज कलेजा।
तड़प रहा है उसका भेजा।।
हम सब माँ को रुला रहे हैं।
पाप शीश निज चढ़ा रहे हैं।।

माँ की आहें भले मौन हैं।
हम भूलें वो भला कौन हैं।।
आखिर इसका दंड भी पाते।
अपने बच्चे मारें लातें ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - चिट्ठी

खुशियों का संदेशा लाती।
घर में जब भी चिट्ठी आती।
आँगन में सब दौड़े आते।
हाथों-हाथ खबर हैं पाते।।

स्याही से सब मन की बातें।
कागज पर सब पीड़ा गातें।।
दूर बसे प्रियजन की माया।
शब्दों में अपनापन छाया।।

द्वार डाकिया जब भी आता।
कोई हँसता कोई रोता।।
चिट्ठी की अपनी ही वाणी।
समझें सब अपने ही प्राणी।।

मोबाइल का युग अब आया।
चिट्ठी का है मान घटाया।।
हाथ लिखी जो प्रीत पुरानी।
वो डिजिटल से है अनजानी।।

भाव आज चिट्ठी का खोया।
नव पीढ़ी पूछे क्या गोया।।
चिट्ठी की है अजब कहानी।
कहती हमसे दादी नानी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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जीवन की किताब
--------------
जीवन एक किताब है
जिसमें होते हैं जीवन के
विविध रंग बिरंगे अध्याय,
जिसे हमको मन-बेमन से पढ़ना ही पड़ता है।
कभी हँसना, तो कभी रोना
खुशियों में नहाकर नाचते गाते हैं
तो वेदना को अपने आँसुओँ से सीँचना भी पड़ता है,
सब कुछ हमारे अनुरूप नहीं होता
कुछ सुंदर, तो कुछ कुरुप भी होता है।
कुछ प्रत्याशित तो कुछ अप्रत्याशित होता,
चाहें या न चाहें, हमें हर अध्याय पढ़ना पड़ता है,
इसे हम भले ही बेबसी कहें
पर जीवन की किताब हमें ही नहीं
हर किसी को पढ़ना पड़ता है,
परीक्षा देना पड़ता है।
कभी पास तो कभी फेल भी होना पड़ता है
बस जीवन की किताब का क्रय भर नहीं करना पड़ता है
तो किसी को देकर हाथ नहीं झाड़ सकते
न किसी को बेंच सकते हैं
और न ही कहीं फेंककर मुक्त हो सकते हैं।
यह जीवन की किताब है जनाब
इसे नदी नाले सागर में फाड़कर फेंक नहीं सकते
जलाकर अस्तित्व हीन भी नहीं कर सकते,
उसके एक भी शब्द को नजरंदाज नहीं कर सकते,
सिर्फ और सिर्फ पढ़ सकते हैं,
और जैसा चाहें, हँसकर या रोकर जी सकते हैं।

सुधीर श्रीवास्तब

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कुण्डलिया छंद
*********
मैंने जिस पर था किया, आँख मूँद विश्वास।
उसने धोखा दे दिया, तोड़ हमारी आस।।
तोड़ हमारी आस, दिखा दी अपनी रंगत।
खीस निपोरे आज, रहा खा पूड़ी पंगत।।
कहें मित्र यमराज, भीख ले उड़ता डैने।
अब कैसा विश्वास, बहुत झेला जब मैंने।।१२९

योगी - मोदी दे रहे, जनता को बहु भाव।
जो हैं आज विपक्ष में, उनको गहरा घाव।।
उनको गहरा घाव, नहीं मिले अब मरहम।
चिंता करते रोज, दिखे अब कोई हमदम।।
हर कोशिश बेकार, बने जाते सब रोगी।
मुश्किल गलनी दाल, सामने मोदी - योगी।।१३०

मथुरा - काशी की धरा, बोले जय श्री राम।
सारा विपक्ष बेहाल है, बिगड़े उनके काम।।
बिगड़े उनके काम, सूझता है कब चारा।
होता मनु लाचार, मिले नहिं आज सहारा।।
कहें। मित्र यमराज, जगत ने देखा मथुरा।
मोदी-योगी साथ, देख अब काशी- मथुरा।।१३१

देते हैं उपदेश जो, खुद समझें कब सार।
अंतर दिखता साफ है, वाणी अरु व्यवहार।।
वाणी अरु व्यवहार, दिखाते खुद को ज्ञानी।
चलें नहीं उस राह, याद आती हैं नानी।।
कहें मित्र यमराज, आज तक जो नहिं चेते।
नित नूतन उपदेश, वही आगे बढ़ देते।।१३२

जितना देते उपदेश हैं, औरों को हम-आप।
उतना मानें स्वयं भी, नहीं करेंगे पाप।।
नहीं करेंगे पाप, काश हम समझें इतना।
हमने बदला आज, रहा दिख खुद में कितना।।
कहें मित्र यमराज, सदा जीवन में पिसना।
अपने मन की यार, दिखा रहे हम जितना।।१३३

आशय जाने ही बिना, निर्णय लेना व्यर्थ।
इससे हो सकता बड़ा, समझो आप अनर्थ।।
समझो आप अनर्थ, बात बिन जाने बोले।
बिना डोर के कुँआ, भला कब पानी डोले।।
कहें मित्र यमराज, सुनो मम बात महाशय।
समय-समय पर गूढ़, बहुत होता है आशय।।१३४

आया है कैसा प्रलय, प्राणी हुए अधीर।
जाने मन में क्या धरे, आये हैं रघुवीर।।
कहें मित्र यमराज, धर्म का ध्वज फहराओ।
संकट का है दौर, ईश के शरण में जाओ।।
करें कृपा रघुवीर, छँटे तब विपदा साया।
प्रलय दिखाने आज, ईश खुद चलकर आया।।१३५

वर्षा रानी जब चली, लेकर मेघ बयार।
हर कोना धरती दिखे, लगता ज्यों त्योहार।।
लगता ज्यों त्योहार, तपन तन-मन के भागे।
नाचे मोर किसान, प्रकृति मुस्काकर जागे।।
कहें मित्र यमराज, सुनो अब राम कहानी।
जल ही जीवन मूल, गीत गा वर्षा रानी।।१३६

पानी टपके जब‌ गगन, जैसे मोती-हार।
सूखी नदियाँ भर चलीं, जागा जीवन-सार।।
जागा जीवन-सार, हरित धरती मुस्काई।
खेतों में उल्लास, स्वर्ण सी फसलें आई।।
कहें मित्र यमराज, आइए वर्षा रानी।
बूँद-बूँद से सींच, जगत को दो अब पानी।।१३७

छाई छटा के साथ, आया सावन द्वार।
मन हर्षाया देखकर, हरित धरा श्रृंगार।।
हरित धरा श्रृंगार, बरसती टप-टप बूँदें।
नाचें खुशी से मोर, भीगकर मेंढक कूदें।।
धन्यवाद प्रभु इंद्र, चले शीतल पुरवाई।
मिलता बड़ा सुकून, सुंदर छटा है छाई।।१३८

खोटी किस्मत दीन की , नयी नहीं है बात।
रोते गाते कट रहे, उनके भी दिन-रात।।
उनके भी दिन-रात, राम की माया कैसी।
देख रहे हम आप, कहें क्या क्षऐसी वैसी।।
कहें मित्र यमराज, मिले क्या उनको रोटी।
आये लेकर साथ, जन्म से किस्मत खोटी।।१३९

जाने कैसा हो गया, मानव का व्यवहार।
समझ नहीं अब आ रहा, कहाँ गया संस्कार।।
कहाँ गया संस्कार, बड़ी विचित्र है माया।
कलयुग का है दौर, उसी की दिखती काया।।
कहें मित्र यमराज, आप मत मेरी मानें।
बदले नहीं विचार, झूँठ है तुम भी जानें।।१४०

हमको सब हैं कह रहे, जलवा तेरा आज।
तेरा अब तक चल रहा, निष्कंटक है राज।।
निष्कंटक है राज, खूब हैं जलवे तेरे।
कोई नहीं करीब, आप सबसे प्रिय मेरे।।
कहें मित्र यमराज, कहो मत राजा इनको।
कहना हो तो आप, कहो बस राजा हमको।।१४१

जागे ज्योति साधना, भीतर बढ़े उजास।
करें समर्पण स्वयं का, मिट जाए सब त्रास।।
मिट जाए सब त्रास, आस्था दीप जलाना।
भावना हो निर्मल, तभी प्रभु दर्शन पाना।।
छिपा रहे जो पाप, सभी लग भागम-भागे।
मन की हो जो चाह, सफलता जीवन जागे।।१४२


जितने प्राणी जगत में, यहाँ सभी मेहमान।
फिर भी कहते गर्व है, क्या हम कोई दान।।
क्या हम कोई दान, हमें कोई ले लेगा।
बदले में आशीष, खूब केवल वो देगा।।
कहें मित्र यमराज, रंग दिखते हैं कितने।
कैसे मिटती भूख, नमूने सपने जितने।।१४३

होती अब वर्चस्व की, चर्चा चारों ओर।
जिधर देखिए उधर ही, पड़े सुनाई शोर।।
पड़े सुनाई शोर, सभी हैं दिखते ऐसे।
छोटी-छोटी बात, तने हैं तम्बू जैसे।
कहें मित्र यमराज, संभालो अपनी धोती।
लो हमसे गुरु ज्ञान, परीक्षा सबकी होती।।१४४

कलयुग के इस दौर में, हर रिश्ता बेकार।
नहीं जेब में दाम यदि, समझें सब लाचार।।
समझें सब लाचार, समय की मार देखिए।
चाहे जितना आज, लानतें आप भेजिए।।
कहें मित्र यमराज, गई सब चिड़िया अब चुग।
करो बैठ अब भजन, सीख देता है कलयुग।।१४५

इतना गंदा हो गया, अपना आज समाज।
दर्द झेलती बेटियाँ, बेशर्मों का राज।।
बेशर्मों का राज, तमाशा सभी देखते।
घोंट पी रहे चीख, तभी तो नहीं चेतते।।
कहें मित्र यमराज, गिरोगे अब तुम कितना।
सुता रही है पूछ, बता दो केवल इतना।।१४६

सतगुरु कृपा से हो गया, अपना जीवन धन्य।
वरना अब तक तो रहा, जैसे झाड़ी वन्य।।
जैसे झाड़ी वन्य, रहा बस आड़ा-तिरछा।
आते रहे विचार, करेगा कौन सुरक्षा।।
कहें मित्र यमराज, समय का बदला अब सुरु।
रखा शीश जब हाथ, आज मेरे श्री सतगुरु।।१४७

रखते जो खुद को सदा अपने आप प्रसन्न।
कहता है कब वह भला, मैं हूँ बड़ा विपन्न।।
मैं हूँ बड़ा विपन्न, सोच है पड़ती भारी।
करता कब है कौन, बताओ तुम तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, स्वाद खुशियों का चखते।
हर मुश्किल से आप, बचाए खुद को रखते।।१४८

हरियाली चहुँओर अब, शुरू हुई बरसात।
खेतों में जुटे किसान हैं, संग खुशी सौगात।।
संग खुशी सौगात, सभी आभारी ईश्वर।
गाते मन के गीत, बने हैं सभी कवीश्वर।।
कहें मित्र यमराज, यही होली दीवाली।
चहुँदिश में हो राज, सदा संचित हरियाली।।१४९

कितना कुछ हम तो कहें, रहा कौन सुन बात।
नाहक धमकाते फिरें, और मारते लात।।
और मारते लात, नहीं संयोग अपहरण।
ताना-बाना साथ, बहुत हैं इनके जन-गण।।
कहें मित्र यमराज, नहीं है तुमको मिटना।
इनसे रहिए दूर, करीबी चाहे जितना।।१५०

कलयुग में अब हो गया, आज अपहरण खेल।
अपने भी करने लगे, अब तो इससे मेल।।
अब तो इससे मेल, भला क्या हो सकता है।
इसके आगे आज, कहाँ रिश्ता टिकता है।।
बिल्कुल है बेकार, जियो कहना अब जुग-जुग।
समझाता यमराज, यही है असली कलयुग।।१५१

जलता आज जहान है, कैसी फैली आग।
होते इतने अपहरण, कौन सुनाए राग।
कौन सुनाए राग, लोभ लालच का चक्कर।
ले सकता है कौन, बताओ इनसे टक्कर।
कहें मित्र यमराज, इसी से अब डर लगता।
मजबूरी की आग, मनुज जब तब है जलता।।१५२

थोड़ी सी खैरात का, करते खूब प्रचार।
कलयुग में सिद्धांत का, अजब-गजब आधार।।
अजब-गजब आधार, भूख से कोई मरता।
पर इनकी जो भूख, सिर्फ है नाटक लगता।।
कहें मित्र यमराज, शर्म चढ़ती कब घोड़ी।
रत्तीभर खैरात, बाँटते थोड़ी -थोड़ी।।१५३

तुमको भले न याद हो, दादी नानी प्यार।
कलयुग का यह असर है, भूल गए आधार।।
भूल गए आधार, कौन तुमको समझाए।
शुभचिंतक जो आज, कुटिलता से मुस्काए।।
कहें मित्र यमराज, भले तुम भूले उनको।
भले दूर हैं आज, मगर आशीषें तुमको।।१५४

वर्षा बिन सूखी धरा, लगता जैसे पाप।
इंद्रदेव जी कर रहे, धरती से संताप।।
धरती से संताप, नहीं लगता है अच्छा।
नंगे होकर नाच, पहनता क्यों है कच्छा।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कितना अर्सा।
बतला दो अब आज, करोगे कब तुम वर्षा।।१५५

सतपथ के जो नाम पर, सिर्फ स्वार्थ का खेल।
जनहित का बिल्कुल नहीं, सत्याग्रह से मेल।।
सत्याग्रह से मेल, यही है नीयत जिसकी।
लोग करें जयकार, चाल बिन समझें इसकी।।
कहें मित्र यमराज, चलाते जो अपना रथ।
वही बड़ा है आज, मानते चलता सतपथ।।१५६

अन्ना ने भी था चला, सत्याग्रह का दाँव।
अंतिम था परिणाम जो, सिर्फ अधूरा काँव।।
सिर्फ अधूरा काँव, चाल चेले ने खेला।
अन्ना जी के हाथ, नहीं कुछ आया धेला।।
कहें मित्र यमराज, पलटकर पिछला पन्ना।
एक बार फिर आज, ढूंढ़ते हम सब अन्ना।।१५७

मिलती है पहचान अब, जो जितना शैतान।
आज भला इंसान की, कैसे हो पहचान।।
कैसे हो पहचान, सत्य कोई तो बोले।
वाले सब क्यों मौन, होंठ अपने तो खोले।।
कहें मित्र यमराज, सभ्यता रोज सिसकती।
करते जो नित पाप, पुण्य खुद आकर मिलती।।१५८

ईश्वर भी क्या जानते, इसीलिए तो मौन।
समझ रहे हम आप भी, कहने को है कौन।।
कहने को है कौन, छिपा है मन क्या किसके।
अब तक रहा अबूझ, कहें क्या पीछे इसके।।
कहें मित्र यमराज, भले सब कुछ है नश्वर।
पर दिखते लाचार, कहें हम जिनको ईश्वर।।१५९

सड़कें जल से हैं भरी, रुके नहीं जल धार।
छतरी वाला क्या करे, करता यही विचार।।
करता यही विचार, नहीं ईश्वर की माया।
लालच की है मार, भोगती मानव काया।।
कहें मित्र यमराज, बिजलियाँ अब भी कड़कें।
हम सब हैं लाचार, जलाजल गलियाँ सड़कें।।१६०

जितने भी पाखंड हैं, करते हैं ये लोग।
धर्म आड़ में सभी, फैलाते नित रोग।।
फैलाते नित रोग, एक अभियान चलायें।
बेशर्मी का राग, पकड़ जाने पर गाएँ।।
कहें मित्र यमराज, नहीं हम मूरख इतने।
झूठ और पाखंड, वार तुम चाहे जितने।।१६१

विधि का अजब विधान है, नयी नहीं ये बात।
कुछ को मिलता दुख तो, किसी को सुख सौगात।।
किसी को सुख सौगात, चक्र जीवन का चलता।
मगर यहाँ पर दाल, भला खुद किसका गलता।।
कहें मित्र यमराज, राज हम जानें किसका।
अजब-गजब विधान, यहाँ है केवल विधि का।।१६२

धरती पर नित बढ़ रहा, अब पापों का भार।
करना हमें विचार अब, क्या ये जीवन सार।।
क्या ये जीवन सार, सभी को हो बेचैनी।
मगर सभी हैं मस्त, बैठकर खाते खैनी।।
कहें मित्र यमराज, बने ये जीवन परती।
पूछे हमसे आज, बिलखकर अपनी धरती।।१६३

थोड़ी सी खैरात का, करते खूब प्रचार।
कलयुग में सिद्धांत का, अजब-गजब आधार।।
अजब-गजब आधार, भूख से कोई मरता।
पर इनकी जो भूख, सिर्फ है नाटक लगता।।
कहें मित्र यमराज, शर्म चढ़ती कब घोड़ी।
रत्तीभर खैरात, बाँटते थोड़ी -थोड़ी।।१६४

तुमको भले न याद हो, दादी नानी प्यार।
कलयुग का यह असर है, भूल गए आधार।।
भूल गए आधार, कौन तुमको समझाए।
शुभचिंतक जो आज, कुटिलता से मुस्काए।।
कहें मित्र यमराज, भले तुम भूले उनको।
भले दूर हैं आज, मगर आशीषें तुमको।।१६५

वर्षा बिन सूखी धरा, लगता जैसे पाप।
इंद्रदेव जी कर रहे, धरती से संताप।।
धरती से संताप, नहीं लगता है अच्छा।
नंगे होकर नाच, पहनता क्यों है कच्छा।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कितना अर्सा।
बतला दो अब आज, करोगे कब तुम वर्षा।।१६६

सतपथ के जो नाम पर, सिर्फ स्वार्थ का खेल।
जनहित का बिल्कुल नहीं, सत्याग्रह से मेल।।
सत्याग्रह से मेल, यही है नीयत जिसकी।
लोग करें जयकार, चाल बिन समझें इसकी।।
कहें मित्र यमराज, चलाते जो अपना रथ।
वही बड़ा है आज, कहें जो चलना सतपथ।।१६७

अन्ना ने भी था चला, सत्याग्रह का दाँव।
अंतिम था परिणाम जो, सिर्फ अधूरा काँव।।
सिर्फ अधूरा काँव, चाल चेले ने खेला।
अन्ना जी के हाथ, नहीं कुछ आया धेला।।
कहें मित्र यमराज, पलटकर पिछला पन्ना।
एक बार फिर आज, ढूंढ़ते हम सब अन्ना।।१६८

दिखते नित जग में नये, मित्र नमूने आज।
बात सत्य जो ना कहे, सत्याग्रह पहचान।।
सत्याग्रह पहचान, खेल बड़ा जो खेले।
छोटी सी जो बात, करें वो बड़े झमेले।।
कहें मित्र यमराज, झूठ जो सबको कहते।
हरिश्चंद्र औलाद, जगत में वो ही दिखते।।१६९

आया है जो द्वार पर, उसका हो सत्कार।
होना सबका चाहिए, हम सबका संस्कार।।
हम सबका संस्कार, मगर अब मरता जाता।
पैसा ही आधार, आज हर जन का नाता।।
कहें मित्र यमराज, देख सत्कारी माया।
नहीं है रिश्तेदार, द्वार जो मेरे आया।।११७०

ईश्वर रुप में द्वार पर, करो अतिथि सत्कार।
चलता आया देश में, सदियों का संस्कार।।
सदियों का संस्कार, नहीं तुम इसे मिटाना।
पुरखों का आधार, भूल मत आगे जाना।।
कहें मित्र यमराज, जगत में सब कुछ नश्वर।
जान रहे हम आप, अतिथि बन आते ईश्वर।।१७१

कहते वेद पुराण भी, प्रणव ब्रह्म का ‌ सार।
उत्पत्ति से सृष्टि के, ध्वनि गूँजी साकार।।
ध्वनि गूँजी साकार, चले जग जीवन धारा।
देव दनुज ऋषिगण साथ, शब्द सबको है प्यारा।। कहें मित्र यमराज, ध्यान नित मन जो जपते। प्रणव जगत आधार, मनुज हैं पल-छिन कहते।।१७२

समझेंगे कब लोग ये, बात कही सौ बार।
सहना है अन्याय भी, खुद पर अत्याचार।।
खुद पर अत्याचार, साधकर चुप्पी बैठे।
वो खुद ही जंजीर, बाँधकर रहते ऐंठे।।
मौन तोड़कर लोग, न्याय सारथी बनेंगे।
कहें मित्र यमराज, लोग कब खुद समझेंगे।।१७३

मिलता बिन मेहनत नहीं, खाली सपने चार।
समझेंगे कब लोग ये, जीवन का जो सार।।
जीवन का जो सार, राह जो भी हो देख।
कर्म करो दिन-रात, भाग्य भी तब ही लेखे।
जिसको होता ज्ञान, वही श्रम का फल गिनता।
वरना सब बेकार, मुफ्त क्या किसको मिलता।।१७४

सत्ता के हथियार का, दुरुपयोग पुरजोर।
चाहे जितना लें मचा, आप सभी नित शोर।।
आप सभी नित शोर, पीर सुनता नहिं कोई।
यही बनी है रीति, कहें क्या किस्सागोई।।
कहें मित्र यमराज, खोलिए अपना पत्ता।
बदलें अब कानून, मिले जन-मन को सत्ता।।१७५

मामा-माँ में खून का, रिश्ता सदा अटूट।
झगड़ा झंझट प्यार की, आपस में है छूट।।
आपस में है छूट, सभी के मामा प्यारे।
जाते जब हम रूठ, प्रेम से वही दुलारें।।
कहें मित्र यमराज, श्रेष्ठ रिश्तों का नामा।
रिश्तों का संसार, जगत में माँ अरु मामा।।१७६

दूजा माँ के रुप को मामा कहते लोग।
संग हमेशा हों खड़े, सुख-दुख हर संयोग।।
सुख-दुख हर संयोग, करें ना कभी शिकायत।
मुस्काते हैं खूब, देखकर आप शरारत।।
कहें मित्र यमराज, भरोसा जाता पूजा।
मामा होते साथ, नहीं दिखता जब दूजा।।१७७

धीरे-धीरे घट रहा, अब आपस में प्यार।
रिश्तों का अस्तित्व ही, लगता है बेकार।।
लगे नहीं बेकार, बढ़े नित कुंठा भारी।
मसला है गंभीर, आज की जो बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, कलेजा जन-मन चीरे।
भले कह रहे आप, जहर ये चढ़ता धीरे।।१७८

सबके वश का है नहीं, राजनीति का खेल।
सबसे मुश्किल है यही, रखना इससे मेल।।
रखना इससे मेल, बनाकर दूरी रखिए।
बैठे रहकर दूर, स्वाद इसका भी चखिए।।
कहें मित्र यमराज, सगे हैं सारे तबके।
उम्मीदों की डोर, हाथ में आते सबके।।१७९

झूठे सपने देखते, जस शहरों में मोर।
आसमान में देखते , हरियाली हर ओर।।
हरियाली हर ओर, ख्वाब यह पाले रहिए।
पकड़ पकड़ कर लोग, सभी से कहते चलिए।।
कहें मित्र यमराज, कर्म उन सबके फूटे।
बड़े गर्व से आप, हमेशा देखें झूठे।।१८०

करते रहिए मित्रवर, चुगली सुबहो-शाम।
इससे अच्छा कुछ नहीं, और जगत में काम।।
और जगत में काम, खूब होगी तब चर्चा।
हर प्राणी ही रोज, आपका खोले पर्चा।।
कहें मित्र यमराज, लीक पर अपने चलते।
निश्चित होता नाम, नित्य ऐसा जो करते।।१८१

अच्छा होगा कीजिए, मौन साधकर काम।
चुगली से बढ़ता नहीं, कभी किसी का नाम।।
अल्पकाल तो लोग, भले ही करें प्रशंसा।
मान लीजिए आप, करेंगे कल ये हिंसा।।
कहें मित्र यमराज, देख फूलों का गुच्छा।
होता नहीं है यार, समय सबका ही अच्छा।।११८२

करते हम सब लोग ही, इतने सारे काम।
जिसको मिलता है नहीं, जीवन में आयाम।।
जीवन में आयाम, समस्या इतनी भारी।
लगती नहीं लगाम, रहे दे खुद को गारी।।
कहें मित्र यमराज, नहीं हम इससे डरते।
मनमानी हम रोज, भला हम क्यों है करते।।१८३

सारे बाहर बैठकर, कहते हैं हड़ताल।
वादे जितने थे किए, कभी न पूछा हाल।।
कभी न पूछा हाल, हमारी भी मजबूरी।
नहीं समझते आप, बनाकर रखते दूरी।।
कहें मित्र यमराज, आज अब देखो तारे।
कफन शीश पर आज, बाँध हम बैठे सारे।।१८४

ज्ञानी बनकर घूमते, आज जगत में लोग।
और मिटाते नित्य हैं, हुआ नहीं जो रोग।।
हुआ नहीं जो रोग, चमकता इनका धंधा।
देखो मानव राज, बना है खुद से अंधा।।
कहें मित्र यमराज, सभी बनते हैं ध्यानी।
लूटें इनको आज, भेंट करते जब ज्ञानी।। १८५

करना मत तकरार अब, मुझ पर भूत सवार।
केवल नेक सलाह दो, कैसे हो उपचार।।
कैसे हो उपचार, किए जो गुंडागर्दी।
हिंसा अरु पथराव, चुनौती दे दी वर्दी।।
कहें मित्र यमराज, नहीं इन सबसे डरना।
अब तो ठोस इलाज, सभी का जमकर करना।। १८६

नाहक ही सहना पड़े, उनको अत्याचार।
जो निर्धन असहाय हैं, और संग लाचार।।
और संग लाचार, मान ईश्वर की इच्छा।
देते रहते रोज, बिचारे कठिन परीक्षा।।
कहें मित्र यमराज, सुनो जगती के दायक।
हुए धरा पर भार, नहीं हम कहते नाहक।।१८७

ऐसा ही अब वक्त है, सह लो अत्याचार।
रोना धोना व्यर्थ है, नहीं सुने सरकार।।
नहीं सुने सरकार, भले तुम कितना सीखो।
अच्छा होगा आज, मौन रहकर ही चीखो।।
कहें मित्र यमराज, बोलता केवल पैसा।
इसमें क्या है झूठ, सभी को दिखता ऐसा।।१८८

ऐसा क्यों अब हो रहा, भटक रहा इंसान।
फिर भी करता गर्व से, कुंठा में प्रतिदान।।
कुंठा में प्रतिदान, बढ़ी जाये बीमारी।
नहीं समझते लोग, भूलते जिम्मेदारी।।
बनते हम क्यों आज, देखकर दूजा जैसा।
क्या है इसका लाभ, सभी बनते जो ऐसा।।१८९

कलयुग का अब आज है, नहीं खोइए होश।
इतना भी बनिए नहीं, आप सभी खरगोश।।
आप सभी खरगोश, बचाओ अपनी इज़्ज़त।
भूले शिष्टाचार, करो बिल्कुल मत हुज्जत।।
कहें मित्र यमराज, मुफ्त का सब कुछ लो चुग।
और करो तारीफ, बड़ा अच्छा है कलयुग।।१९०

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा छंद
*******
डूबे सब निज स्वार्थ में, झूठी तेरी आस।
अब तो लगते हैं सभी, सड़ी हुई सी घास।।

सावधान रहिए सभी, और संग में ध्यान।
डूबे सब निज स्वार्थ में, झूठा है सम्मान।।

चाहे दे दो प्राण भी, इनकी खातिर खास।
डूबे सब निज स्वार्थ में, देंगे केवल त्रास।।

बादल छाए संदेह के, अब रिश्तों के बीच।
घटनाएं जो घट रहीं, हँसती इसको सींच।।

अब मानव संदेह से, कैसे होगा दूर।
नहीं पता चलता उसे, किस पल वो मजबूर।।

सत्य सनातन धर्म पर, जो करते संदेह।
कैसे हम इनसे करें, अपनेपन का नेह।।

समय-समय की बात है, समय मित्र यमराज।
अगर समय दे कष्ट तो, करिए उल्टे काज।।

दीवाना होना नहीं, बिना किसी आधार।
वरना होगे हम सभी, बिना नाव पतवार।।

वीराना सा लग रहा, अब तो घर परिवार।
मोबाइल के दौर में, छिनता प्यार दुलार।।

धरना दें जब सत्य हित, तब गूँजे आवाज।
सत्ता शासन भी करे, तब खुलकर परवाज़।।

जब प्रदर्शन हो कभी, भीड़ बने तलवार।
बिना लड़े मिलता नहीं, निज का ही अधिकार॥

अब अनशन के नाम पर, होते हैं बहु खेल।
जनता नाहक बन रही, बिन इंजन की रेल।।

यदि अंधा कानून हो, तो बढ़ता अन्याय।
निर्बल और गरीब जो, वह होता असहाय।।

चिंता फल की क्यों करें, यह ईश्वर का काम।
धीरज से मिलता सदा, अंत सुखद परिणाम।।

ध्वस्त आजकल हो रहा, अब समाज परिवेश।
चिंता है इस बात की, देख रहे अवधेश।।

सत्ता के हथियार का, उचित सदा उपयोग।
नहीं दंभ में हो कभी, जो बन जाए रोग।।

कुछ लोगों के हाथ में, सत्ता का अधिकार।
मान रहे वो लोग हैं, नीति नियम बेकार।।

सत्ता का अधिकार है, लोकतंत्र के नाम।
हर प्राणी को चाहिए, सुख-समृद्धि आयाम।।

यदि हाथों में आपके, सत्ता का अधिकार।
पूरा करिए कर्तव्य निज, बिना किसी तकरार।।

नेता जी पर चढ़ गया, आज रावणी भूत।
फिर भी खुद को मानते, रामभक्त अवधूत।।

नहीं रहेगा दबदबा, झूठा राग अलाप।
राम नाम की ओट में, फिर क्यों करते पाप।।

खुदा स्वयं को समझना, होगी भारी भूल।
आने वाला है समय, बन जाओगे धूल।।

अहंकार ही एक दिन, कारण होगा डूब।
इसीलिए वो हर कहीं, बोल रहे वो खूब।।

अहंकार का दबदबा, भले रहा फल फूल।
पर निश्चित यह मानिए, जल्द मिलेगा धूल।।

खेल खिलाड़ी खेलते, सब अपने मैदान।
सिर्फ जीत की चाह में, लगा रहे गुरु ज्ञान।।

राजनीति के खेल का, सहज नहीं मैदान।
सभी खिलाड़ी चाहते, मूँदे अपने कान।।

खेल खिलाड़ी को मिले, समुचित सुविधा मान।
खेलें वे मैदान में, नहीं चाहते दान।।

अपने-अपने कर्म का, फल पाते हैं लोग।
सुख-सुविधा सबको नहीं, कुछ को मिलता रोग।।

निज पर यदि विश्वास हो, तभी सफल हो कर्म।
ईश कृपा उसको मिले, जिसने समझा मर्म।।

सब अपने ही कर्म को, कहते पाक पवित्र।
नहीं चाहते और का, दुनिया देखे चित्र।।

सबको अपने कर्म का, होता बड़ा गुमान।
होता है हर एक को, अपनी खुद पहचान।।

युवा भटककर जा रहा, आज गर्त की ओर।
फिर भी खूब मचा रहा, झूठ-मूठ का शोर।।

आज युवा विश्वास से, होता है लबरेज।
दुनिया जितना सोचती, उससे ज्यादा तेज।।

मातु जानकी आज भी, देती जन को सीख।
मर्यादा की आड़ में, नहीं माँगना भीख।।

हर नारी हो जानकी, चाह रहे हम लोग।
और बिना संकोच के, बाँट रहे हैं रोग।।

सभी दबाना चाहते, जो होता कमजोर।
जिनके मन की कामना, वही रहें सिरमौर।।

सिर्फ कुचलना आपकी, नियत नहीं है मित्र।
आज जगत बदलाव के, खीँच रहा है चित्र।।

धीरे-धीरे घट रहा, मर्यादा संस्कार।
सबको केवल है पता, करना बस तकरार।।

अब परिजनों के मध्य में, फैल रहा संदेह।
धीरे-धीरे घट रहा, आज आपसी नेह।।

धीरे-धीरे घट रहा, मानवीय परिवेश।
स्वार्थ सिद्धि की भावना, भुला रहे हैं देश।।

लहजा आप संभालकर, करना कोई बात।
वरना निश्चित आपको, खाना जूता लात।।

जो गरजा बरसा नहीं, जाने सकल जहान।
अपने मुँह मिट्ठू मियाँ, नहीं बघारो ज्ञान।।

छह गज में लिपटी हुई, नारी का अभिमान।
लाज शर्म संकोच में, संस्कृति की पहचान।।

लहराता पल्लू जहॉं, बहे बयार सुगंध।
नारी साड़ी का अगर, हुआ सुखद अनुबंध।।

उत्सुक रहकर जो सदा, बढ़ता अपनी राह।
जीवन में मिलता उसे, नित नूतन उत्साह।।

इतना ही उत्सुक नहीं, होना हमको मित्र।
पहले आए सामने, तभी दिखेगा चित्र।।

राजनीति का खेल अब, खेले पक्ष विपक्ष।
सब अपना हित साधते, जिसमें जो है दक्ष।।

राजनीति के खेल में, वादों की भरमार।
सत्ता आती हाथ में, करते हैं बेजार।।

राजनीति का खेल है, धरने का षड्यंत्र।
नहीं फिक्र है छात्र की, ढूंढें कुर्सी मंत्र।।

नव पीढी़ है झेलती, राजनीति का दंड।
समाधान नहिं चाहते, झूठ विरोध का झंड।।

राजनीति के खेल में, बिगड़ रहा है तंत्र।
उड़ा रहे मखौल हैं, सिसक रहा जनतंत्र।।

मातृ भूमि के नाम से, बढ़ता अपना मान।
सीस झुकाएँ नित्य ही, करें वंदना ध्यान।।

मातृ भूमि सबसे बड़ी, देती सबको सीख।
धरती माँ की गोद में, सुखदा जीवन दीख।।

त्याग तपस्या से लिखी, मातृ भूमि की शान।
वीरों ने सींचा इसे, अपने लहू समान।।

मातृ भूमि के कर्ज से, यदि होना उद्धार।
जीना इसके नाम पर, संग मृत्यु का सार।।

नहीं व्यर्थ उपकार का, करिए आप प्रपंच।
चर्चा तक इसकी कभी, नहीं कीजिए मंच।।

रोग बहुत अब बढ़ गए, कैसे हो उपचार।
प्रभु जी जैसा चाहते, चलता है संसार।।

नहीं जताना चाहिए, उतरन दे अहसान।
इससे बढ़ता है नहीं, कभी किसी का मान।।

उतरन में यदि भाव हो, देता बड़ा सूकून।
मानवीय संवेदना, खुशियां करती दून।।

सत्य बोल मीठा लगे, मन को देता धीर।
कड़ुआ सच भी समय पर, चमका दे तकदीर।।

जिसने भी समझा नहीं, जीवन का जो मर्म।
उसके दिलो-दिमाग की, बत्ती रहती गर्म।।

रिश्तों का भी मर्म है, कहाँ समझते लोग।
इसीलिए तो बढ़ रहा, कटुता ईर्ष्या रोग।।

साधु-संत संगति मिले, तब हो मर्म का बोध।
गुरु वाणी से सीखिए, व्यर्थ न करिए शोध।।

नियमों की अब पालना, बनती जाती खेल।
निर्धन अरु कमजोर जो, बने घूमते रेल।।

आज नियम कानून से, डरते हैं कमजोर।
जन प्रतिनिधि मचा रहे, इसकी आड़ में शोर।।

चाहे जितना नियम का, करें लोग सम्मान।
भ्रष्टाचारी धारणा, करवाती अपमान।।

नीति नियम सब व्यर्थ है, बिना मान सम्मान।
उड़ता रहता नित्य ही, किसको इसका ध्यान।।

जितना भी कोशिश करें, फिर भी हैं मजबूर।
होता कम है आहरण, भाग्य हमारा क्रूर।।

राशन वितरण आड़ में, घटतौली का खेल।
भ्रष्टाचारी माफिया, चला रहे निज रेल।।

लगती नहीं लगाम है, कैसे कहते आप।
पहले करके देखिए, कंठी माला जाप।।

नाहक ही हम आप तो, होते हैं बदनाम।
जिन पर लगनी चाहिए, उन पर नहीं लगाम।।

अपने भीतर खोजिए, एक नई पहचान।
सतगुरु का सद्ज्ञान ही, जीवन का विज्ञान।।

आज हमारे बीच में, घटता शंख महत्व।
नव पीढ़ी नहिं जानती, इसका तत्व घनत्व।।

सविता से हम सीख लें, समय पालना आज।
पूरा होगा आपका, बिन तनाव सब काज।।

सारी दुनिया हो रही, सविता से उजियार।
तभी धरा पर चल रहा, प्राण जगत संसार।।

सोच समझकर आज क्यों, भटक रहा इंसान।
कोई सिखलाता नहीं, जीवन का विज्ञान।।

भटक रहा इंसान है, होता जाता दीन।
भले नहीं उसको पता, बजा रहा क्यों बीन।।

खेल समझकर भूलना, लाता मुश्किल दौर।
भटक रहा इंसान जो, करे देर से गौर।।

भटक रहे इंसान का, बस इतना है दोष।
आता उसको है नहीं, सही समय पर रोष।।

बातचीत मिश्री घुली, छोड़ दंभ अभिमान।
दिल से दिल मिल जाय तो, हर मुश्किल आसान।।

युवा वर्ग है देश का, कल का सुखद भविष्य।
कदम बढ़ाता जोश में, जस उर्जा आदित्य।।

समाधान की राह में, धीरज का है सार।
सोच समझ आगे बढ़ो, बना रहेगा प्यार।।

श्रम से मिलती जीत है, व्यर्थ हार की सोच।
विचलित होना है नहीं, छोटी-मोटी मोच।।

आप नतीजा सामने, जैसा होगा कर्म।
बीजारोपण सत्य का, मीठा मानव धर्म।।

मिलती उसको ही विजय, जिसका होता लक्ष्य।
मंजिल पाने के लिए, चलता रहता रक्ष्य।।

सिर्फ सोचने से नहीं, मिले विजय का छोर।
सतत करे जो साधना, पकड़े रहता डोर।।

हार-जीत को भूलकर, जो करता है काम।।
विजय तिलक उसको मिले, संग नया आयाम।।

विजय पताका चाहती, श्रद्धा अरु विश्वास।
इसके बिन मिलता नहीं, मत रख झूठी आस।।

गीत मेघ मल्हार अब, सुना रही बरसात।
भीगी धरती की सुनो, राग मधुरता गात।।

चित चिंतन में भी लगे, हो जीवन का सार।
नैतिक बल के साथ ही, उचित प्रेम व्यवहार।।

धीर वीर गंभीरता, मानव का बोध।
करना अपने आप से, हम सबको ही शोध।।

चाल-काल की कब भला, समझ सका है कौन।
चाहे जितना ज्ञान हो, रहना पड़ता मौन।।

आज मनुज ही बन रहा, अब अपनों का काल।
जो जितना जतला रहा, वही खींचता ढाल।।

काम सतह पर दिख रहा, नहीं देखते आप।
यही बात तो खास है, मन में बस संताप।।

सिर्फ बात से हो नहीं, कभी सतह पर काम।
बिना सत्य संकल्प के, कहाँ रचा आयाम।।

त्याग पत्र को मानना, काकरोच की जीत।
मूरख हैं वे लोग सब, गाते भौंड़ा गीत।।

सोच-समझकर हो गया, त्याग पत्र का खेल।
नहीं पता जो मगन हैं, आने वाली रेल।।

कैसे अपने जाल में, उलझ गये वो लोग।
जो कल तक थे सोचते, हम देते हैं रोग।।

सत्ता दल के जाल में, कैसे फँसा विपक्ष।
आया उनके सामने, खड़ा प्रश्न बन यक्ष।।

मौन भले संकेत है, पर उसका भी अर्थ।
नहीं समझता जो इसे, झेले बड़ा अनर्थ।।

भले समझते हम नहीं, युवा वर्ग संकेत।
इसका प्रतिफल झेलते, रंग बदलती रेत।।

समाधान की खोज में, भटक रहे हैं लोग।
भले भटकना व्यर्थ हो, नहीं समझते रोग।।

समाधान यदि चाहते, सुनो ध्यान से बात।
नहीं भावना हो हृदय, करना है प्रतिघात।।

ओछी हरकत जो हुई, बेशर्मी के साथ।
जो भी करना कीजिए, पहले बाँधो हाथ।।

जैसी हरकत हो रही, जगह-जगह हर रोज।
जैसे उनके बाप हैं, मुफ्त खिलाते भोज।।

जैसी हरकत कर रहे, लाज शर्म को भूल।
मित्र श्राप है दे रहा, जल्द मिलोगे धूल।।

हरकत के अनुरूप ही, निश्चित मिलना दंड।
हो जाओ तैयार तुम, सहो खंड ही खंड।।
********
सैनिक
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सीमा पर सैनिक खड़ा, रखता देश की लाज।
धूप छाँव की फ़िक्र बिन, करता अपना काज।।

घर का सब सुख छोड़कर, सीमा पर है जाग।
नींद बेच सैनिक भरे, दुश्मन सीना आग।।

माथे टीका वीरता, रहता सीना शान।
सैनिक बल पर है टिका, भारत का अभिमान।।

सीमाओं के ये प्रहरी, आँख भरे अंगार।
दुश्मन आवे लाख भी, कर देते संहार।।

सैनिक तन गलता यहाँ, लगा खुशी को दाँव।
हम सोते हैं चैन से, ये सीमा की ठाँव।।

सैनिक जन का हम सभी, करते जय-जयकार।
उसके बल पर ही टिका, देश और परिवार।।
*******
पुरी रथयात्रा
********
होती जय-जयकार है, जगन्नाथ सरकार।
निकल पड़े रथ बैठकर, उल्लासित संसार।।

रथयात्रा रथ खींचकर, पुण्य कमाते लोग।
जगन्नाथ प्रभु जी हरें, भक्त जनों के रोग।।ं

रथयात्रा रथ थामकर, कहें मित्र यमराज।
जगन्नाथ प्रभु दीजिए, सेवा अवसर आज।।

गुड़िचा में नौ दिन प्रभो, बसें भक्त के साथ।
तरसे दर्शन को जगत, जोड़े दोनों हाथ।।़

रथ यात्रा की वापसी, बजे शंख औ ढोल।
जगन्नाथ फिर आ रहे, भक्त खिले अनमोल।।

जगन्नाथ प्रभु कीजिए, आप जगत उद्धार।
जन-मन सब खुशहाल हो, आपस में हो प्यार।।
********
बिन वर्षा सूखी धरा
*********
बिन वर्षा सूखी धरा , कृषक सभी बेचैन।
कैसे रोपें धान वो, अश्रु बह रहे नैन।।

बिन वर्षा सूखी धरा, जीव जन्तु बेहाल।
सबको ऐसा लग रहा, बहुत निकट है काल।।

बिन वर्षा सूखी धरा , नहीं इंद्र को ध्यान।
समझा सकता कौन है, उन्हें धरा विज्ञान।।

बिन वर्षा सूखी धरा, गुस्से में यमराज।
इंद्रदेव से कह रहा, करो तनिक अब काज।।

इंद्रदेव क्या आजकल, कर बैठे हड़ताल।
मोदी जी कुछ कीजिए, वरना व्यर्थ बवाल।।

मौन साधकर बैठना, यदि जीवन का सार।
कहते हैं यमराज जी, जीना है बेकार।।

मौन साधकर बैठिए, देखो जब अन्याय।
बना यही सिद्धांत लो, करते हो क्यों हाय।।

बैठे हैं जो मौन में, करते नहीं विचार।
मानवता के धर्म का, भूल गए क्या सार।।

रिश्तों में विष फैलता, कब समझेंगे लोग।
आज यही सबसे बड़ा, मानवता में रोग।।

कब समझेंगे लोग अब, नहीं रहे क्या सोच।
अपने सब दुश्मन लगें, यह कैसा है लोच।।

रिश्तों के अपमान को, मत कहिए संयोग।
पूछ रहा यमराज भी, कब समझेंगे लोग।।
********
दान चोर
********
दान चोर का आप क्यों, उड़ा रहे उपहास।
उसको तो अंतिम यही, एक मात्र थी आस।।

जान रहे हैं राम जी, दान चोर का नाम।
मगर चाहते हैं नहीं, लटके उसका काम।।

दान चोर तो कर रहा, केवल अपना कर्म।
बिन समझें हम आप क्यों, देख रहे हैं धर्म।।

दान चोर भी भक्त है, समझ लीजिए आप।
नाहक ही बदनाम कर, नहीं करो तुम पाप।।

दान चोर हूँ मैं मगर, चिंता में क्यों आप।
पहले जाकर कीजिए, राम नाम का जाप।।
*******
अनुशासन
**********
समय पालना जो करे, रखे वचन की लाज।
अनुशासन हो द्वार पर, करता सदा विराज॥

अनुशासन की नींव पर, अटका है संसार।
जो तोड़े इस नींव को, गिरे धरा के पार।।

अनुशासन में तुम रहो, मान स्वयं आधार।
अपनाता है जो इसे, पाता जग में प्यार॥

नियम धर्म को मानिए, यही सिखाता ज्ञान।
अनुशासन बिन मनुज का, बेबस बने विधान॥

नियम धर्म को मानना, अनुशासन का ज्ञान।
इसके बिन सब व्यर्थ है, मानव रचित विधान॥

अनुशासन के संग ही, जीवन बने महान।
बिना नियम के जो चले, सहता है नुकसान॥

काम समय पर कीजिए, निज अनुशासन मान।
आलस तज कर जो चले, बने अलग पहचान॥

विद्या धन अनुशासन में , सीधा साधा मेल।
एक बिना दूजा सदा, हो जाता ह फेल॥
********
धर्म
********
कहाँ किसी के धर्म का, होता है अपमान।
जब तक होता है नहीं, धर्म मर्म का ज्ञान।।

धर्म न पूजा-पाठ में, धर्म न तीर्थ पठार।
धर्म वही जो सभी से, करे प्रेम व्यवहार।।

धर्म धरे जो सत्य का, मन करुणा का वास।
मानवता ही धर्म है, बाकी सब बकवास।।

बैर बढ़े जिस धर्म से, उसे मिले कब मान।
मेट सके जो पीर को, उसकी हो पहचान।।

स्वार्थ लोभ के मुक्ति से, मन निर्मल जस गंग।
जन-मन सेवा भावना, धर्म -कर्म का रंग।।
********
समय
********
उचित समय आता मगर, रखना पड़ता धैर्य।
मिले सुखद परिणाम भी, नहीं ठानिए बैर्य।।

जीवन धारा में बहो, समय सदा दे साथ।
बाधाओं से हारकर, नहीं छुड़ाओ हाथ।।

अपनी जैसी जिंदगी, करो आप स्वीकार।
समय हाथ में सौंपकर, भूलो निज अधिकार।।

अपनी गति से ही चले, समय नियति रफ्तार।
हमको करना अनुसरण, बिन माने बेकार।।

नहीं समय के साथ तुम, करो व्यर्थ तकरार।
अच्छा होगा मानिए, आप समय आभार।।
********
तिरंगा
*********
एक सूत्र में बाँधती, तीन रंग की डोर।
हाथ तिरंगा थामकर, चलें प्रगति की ओर।।

केसरिया रंग त्याग का, श्वेत शांति पहचान।
हरा रंग समृद्धि का, धर्म चक्र पहचान।।

हाथ तिरंगा शान से, बसा हिंद का मान।
लहराता है गर्व से, विश्व पटल पहचान।।

सीमाओं पर शान से, वीरों की पहचान।
आज तिरंगा विश्व में, नूतनता अभिमान।।

झुकने पायेगा नहीं, कभी तिरंगा शान।
भारत का गौरव यही, संग हमारी जान।।
*********
हरियाली हर ओर
**********
केवल चाहत से नहीं, हरियाली हर ओर।
वृक्षारोपण संग में, होना चहिए शोर।।

हरियाली हर ओर अब, आया वर्षा दौर।
सब मिलकर कोशिश करें, थोड़ी-थोड़ी और।।

हरियाली भी डूबती, जल प्लावन में खूब।
शेष आज दिखती नहीं, पहले वाली दूब।।

हरियाली हर ओर का, नारा है बेकार।
जब तक होंगी ख्वाहिशें, करे सिर्फ सरकार।।

घर मकान के संग में, खेत और खलिहान।
हरियाली की व्यथा से, हम सब क्यों अंजान।।

आँगन द्वारे पेड़ लगाना, बहु सुख देगा मीत।
फल लकड़ी छाया मिले, तब गाएँ हम गीत।।

बरगद की जो छाँव है, रोपें बीज का सार।
बेटे जैसा पालना, तभी मिला अधिकार।।
*********
सावन
**********
घन घमंड में गरजते, बरसे मेघा झार।
धरती ओढ़े चूनरी, हरियाली का सार॥

सावन की बूँदें गिरें, हृदय पिया की याद।
बिन देखे नहिं चैन है, करे मौन फरियाद॥

हाथों में त्रिशूल है, गले नाग का हार।
काँवड़िए हैं झूमते, जल अर्पण सत्कार॥

झूले पेड़ों पर पड़े, रही गीत गा नारि।
सावन का आया समय, सखियाँ जाएनं वारि॥

काली बदरी छा गई, मन में उठती हूक।
प्रियतम घर आ जाइए, सावन में मत चूक॥
*********
सबके राजा राम
*********
सबके राजा राम हैं, करिए कोई काम।
ऐसा आया दौर है, लगती नहीं लगाम।।

दुनिया कहती प्रेम से, बड़ा राम से नाम।
महिमा भी तो जानते, सबके राजा राम।।

सबके राजा राम हैं, जान रहे हैं आप।
चोरी जैसे कर्म का, फिर भी करते पाप।।

मंदिर में चोरी किया, दान चोर अब नाम॥
सबके राजा राम हैं, फिर क्यों हम बदनाम।।

सरयू पावन तट नगर , नाम अयोध्या धाम ।
जिसके राजा राम जी, मर्यादा आयाम।।

सबके राजा राम का, चित्रण ललित ललाम।
जीवन हो जाए सफल, लेने भर से नाम।।

मर्यादा प्रतिमूर्ति हैं, सबके राजा राम।
जो भी लेता नाम है, होते उसके काम।।
***********
राजनीति_हावी_हुई
**********
राजनीति हावी हुई, जस अधिनायक वाद।
माथा पकड़े व्यर्थ ही, करते हैं फरियाद।।

राजनीति हावी हुई, दिखे सड़क पर रोज।
छुपते दूजा आड़ में, सिर्फ स्वार्थ की खोज।।

सत्ता ही अब प्रथम है, बतला रहे नरेश।
राजनीति हावी हुई, पिछड़ रहा है देश।।

कैसे-कैसे हो रहा, बीच हमारे खेल।
राजनीति हावी हुई, सत्य धर्म बेमेल॥

अब तो घर परिवार में, घुस आया है आज।
राजनीति हावी हुई, बिखरन लगा समाज॥
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कैसे हो उपचार
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नेताओं के दंभ से, जन मानस बेजार ।
जहर घोलना चाहते,कैसे हो उपचार।।

जंतर-मंतर बन गया, नया युद्ध मैदान।
कैसे हो उपचार अब, जब सबमें अभिमान।।

राजनीति की ओट में, तरह-तरह के खेल।
कैसे हो उपचार अब, नहीं किसी में मेल।।

संसद में गतिरोध का, कैसे हो उपचार।
नहीं चाहते लोग कुछ, काम करे सरकार।।

धरना अनशन आड़ में, हिंसा का अधिकार।
क्या इसका उपचार है, इस पर भी तकरार।।
********
भूले शिष्टाचार
***********
कहते हम कुछ भी रहें, भूले शिष्टाचार।
इसीलिए तो घट रहा, मानवता आधार।।

भूले शिष्टाचार सब, जिसका है परिणाम।
अपने अपनों को करें, आये दिन बदनाम।।

भूले शिष्टाचार हम, बाँट रहे हैं ज्ञान।
खुद पर देते हैं नहीं, बनते बड़े महान।।

झूठे शिष्टाचार का, नहीं रहा अब ज्ञान।
खुद को हम भूले नहीं, किसने रचा विधान।।

भूले शिष्टाचार तो, किया कौन सा पाप।
सुबह-शाम तो रोज ही, करते माला जाप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा मुक्तक
*******
दोषारोपण से भला, मिले कौन सा ताज।
दुनिया को बतलाइए, जो भी इसका राज।
नाहक देते दिल दुखा, निज घमंड में चूर-
इससे कितना हो रहा, पूरण तव का काज।।

किया विदाई सुता की, उतर गया सिर भार।
अब लगता जैसे मुझे, दिया ईश ने तार।
यही हमारी सोच है, जब तक बेटी पास-
कर पाए जब हम विदा, समझ रहा उद्धार।।

जितने दुर्गुण आपमें, करो विदाई आज।
इसमें मिलना है नहीं, तव सिंहासन ताज।
ज्यादा सोच-विचार में, मिलना क्या है लाभ-
ईश कृपा जब शीश पर, जीवन सुंदर साज।।

मेरे मन ने जब कहा, बेच दिया ईमान।
नाहक लेता क्यों भला, आप बताओ ज्ञान।।
धर्म -कर्म मन मीत है, व्यर्थ सुनें क्यों गीत -
भले आप कहते रहो, यह मेरा अभिमान।।

घन गरजे नभ छा गए, बढ़ी धरा की आस।
तरुवर पर बूँदें गिरी, हरियाली उल्लास।।
मोर पपीहा गा रहे, सावन वाले गीत -
पड़ें फुहारें झूमकर, जीवन हुआ उजास।।

पावस आई है धरा, ले हरियाली साथ।
सूखे माथ किसान के, नव उम्मीदें हाथ॥
बिजली चमके गगन में, बगिया नाचे मोर-
पावस ही तो जगत का, सबसे प्यारा पाथ॥

बूँद-बूँद धरती हँसी, बादल करते शोर।
पावस आया गाँव में, हरियाली घनघोर।
नदियाँ मस्ती में बहें, सीमाओं को तोड़ -
कृषकों का भी ध्यान अब, नई फसल की ओर।।

जब नाचे काली घटा, बिजली करती ताल।
रिमझिम बारिश रागिनी, खुशियाँ सावन भाल।
पावस आने से लगे, जीवन पुनः जवान -
हर मुख पर मुस्कान है, खिलते गाल-कपाल।।

लीपापोती हम सभी, करते रहते रोज।
लेते इसकी आड़ बस, निहित स्वार्थ की खोज।
देते दूजा ज्ञान हैं, बनकर बड़े महान-
मुफ्त अगर मिल जाय तो, करते सतुआ भोज।।

आशा का अंशू लिए, उम्मीदों की छाँव।
फैल रही मुस्कान भी, चलती नन्हें पाँव।
हार नहीं माना कभी, बढ़ता जाता नित्य-
चमक रही किरणें जहाँ, वही हमारा गाँव।।

आँखों से जब भी बहा, अंशू पीड़ा धार।
दिल के अपने घाव को, दे मरहम का सार।
नहीं छुपाते हम जिसे, लेकर पर्दा ओट-
सहते हैं चुपचाप सब, समझ मौन व्यवहार।।

दर्द झेलती बेटियाँ, किसको इसका ध्यान।
हम सब केवल पढ़ रहे, मानवता विज्ञान।।
मरी हुई संवेदना, करें भला क्या फिक्र-
बेटी तो अपनी नहीं, फिर क्यों दे हम जान।।

जनसंख्या का हो रहा,अब नूतन विस्फोट।
आने वाले हैं समय, लगनी सबको चोट।।
समझ नहीं क्यों आ रहा, कहें मित्र यमराज -
जाने कैसा है भरा, हर जन-मन में खोट।।

खाना जैविक अन्न है, बनना है बलवान।
बीमारी भी दूर हो, जीवन सुखद सुजान।
रखना है अब राष्ट्र से, जहर रसायन दूर-
यारी करना प्रकृति से, संग ईश का गान।।

जैविक खेती सब करें, यही आज का ज्ञान।
प्रकृति संग में प्यार से, रहना लें हम जान।
जहर रसायन से नहीं, तन-मन होगा स्वस्थ-
जीना हमको क्यों भला, नियम विरुद्ध विधान।।

जैविकता से कीजिए, आप सभी गठजोड़।
कृत्रिम रसायन आज से, दें हम सब अब छोड़।
इतना भी विज्ञान के, बनिए नहीं गुलाम-
वरना इक दिन जगत को, रख देगा ये तोड़।।

बेमतलब नित बढ़ रहा, आज बहुत अपराध।
बड़ा प्रश्न है सामने, कौन रहा क्या साध।
जाने क्यों इनको लगे, यही हमारा लक्ष्य -
इसीलिए तो प्रगति पथ, श्रद्धा बड़ी अगाध।।

नफ़रत जो भी बो रहे, काटें वो विष बेल।
मीठा बेंचें जहर जो, कहर रहे नित झेल।।
घर-घर में है बढ़ रही, आपस में तकरार-
नफ़रत की आँधी चले, बिखर रहा है मेल।।

नफ़रत की दीवार में, बंधा आज इंसान।
प्रीत भूल कर बैर में, खो बैठा सम्मान।
यही आज का दर्द है, झेल रहे हैं लोग-
प्रेम बिना जीवन लगे, जैसे रेगिस्तान।।

आस्था ही वो दीप है, जलती जो दिन रात।
गिरे हुए इंसान भी, समझें इतनी बात।
टूटे सपने भी जुड़ें, अगर भरोसा साथ -
भरती सारी घाव को, बिना लगे आघात।।

मौन साधकर बैठे रहना, क्या जीवन का सार।
मानव होना व्यर्थ मानकर, क्यों जीते हो यार।
अन्याय के आगे भला क्यों , बंद किए क्यों होंठ-
भले बोध तुमको ना होता, पर यह तव की हार।।

चोरी भी तो कर्म है, करते हैं कुछ लोग।
फिर नाहक क्यों आप सब , लगा रहे अभियोग।
बुद्धि ज्ञान अरु धैर्य है, इसका अनुपम सूत्र -
लाज-शर्म से हीन जो, कहते इसको रोग।।

होती जय-जयकार है, जगन्नाथ सरकार।
निकल पड़े रथ बैठकर, उल्लासित संसार।
जगन्नाथ प्रभु कीजिए, आप जगत कल्याण-
जन-मन सब खुशहाल हो, आपस में हो प्यार।।

राजनीति के खेल का, अजब-गजब है रंग।
जैसे इसमें पड़ गया, स्वार्थ लोभ का भंग।
पीट रहे यमराज जी, माथा अपना रोज-
जाने कैसा हो गया, इसका जीवन ढंग।।

आसमान से जब गिरी, बूँद एक अनमोल।
स्वाति नाम की चमक से, मिश्री का रस घोल।
नाजुक सी पर है अडिग, चलती अपनी चाल-
बेटी स्वाति सी आँगना, मीठी वाणी बोल।।

कमज़ोरी बिल्कुल नहीं, स्वाति की पहचान।
खुद की धुन में ही चले, रखकर अपना ध्यान।
बनती मोती बूँद से, बात करे अनमोल -
स्वाति की मुस्कान से, खुशियाँ सकल जहान।।

आया ऐसा है समय, सहिए अत्याचार।
क्यों रोते हो व्यर्थ में, कब सुनती सरकार।।
यही भाग्य का खेल है, छोटी सी है बात-
चाहे जितना आप हों, भले आज लाचार।।

सुना कारगिल नाम तो, भरी आँख में नीर।
सीना छलनी हो गया, मगर न हारे वीर।।
कहते हैं यमराज जी, वो भी था इक दौर-
मातृशक्ति ने सीख दी, रहिए बस गंभीर।।

लिखा कारगिल युद्ध ने, एक नया इतिहास।
दुश्मन को बिल्कुल नहीं, था इसका आभास।।
कहते हैं यमराज जी, रोया था तब पाक-
कौशल देखा हिंद का, भूल गया तब आस।।

एक-एक इक्कीस को, नहीं मानिए बीस।
वरना प्यारे आपकी, सब देखेंगे खीस।।
कहें मित्र यमराज जी, बनो धीर गम्भीर -
रिश्तों के भी भाव अब, होंते हैं छत्तीस।।
*******
रोला मुक्तक
********
अलख जगाए धर्म, आज की बड़ी जरूरत।
करिए अपना काम, संग बदलिए सूरत।।
कहें मित्र यमराज, दौर आया अब मुश्किल -
सोचो सारे लोग, बने रहना क्यों मूरत।।

नयी नहीं है बात, रोज का काम हमारा।
झूठा कहे समाज, हमें तो लगता प्यारा।
लीपापोती काम, यार पुश्तैनी धंधा -
कहें मित्र यमराज, चले ऐसे जग सारा।।

विधि का अजब विधान, कौन है इसका दोषी।
बस इतनी सी बात, व्यर्थ बनना है रोषी।।
कहें मित्र यमराज, जमाना कैसा आया-
मानव माने आप, करे खुद पाला- पोषी।।

कुंठित धरती आज, प्रलय को दे आमंत्रण।
जूझ रहे हैं लोग, करें हम इससे क्या रण।
कहें मित्र यमराज, भूल है पड़ती भारी -
कहाँ प्रलय के पास, लाभ कोटा आरक्षण।।

जबसे यूपी में बनी, योगी की सरकार।
चहुँदिश में नित बढ़ रही, नाहक ही तकरार।
सत्ता से जो दूर हैं, वो इतना बेचैन-
पूछ रहे यमराज से, घर बैठें क्या यार।।

संगम जैसा आज, बचा क्या कोई रिश्ता।
मानवता का सार, आज सब जाता पिसता।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ मन पीड़ा कहना-
मजबूरी के नाम, मनुज अब खुद को घिसता।।

राजनीति का खेल, समझना सबसे भारी।
चाहे जितनी खास, आपकी इससे यारी।
कहें मित्र यमराज, खेल सब खेल न पाते-
सबसे ज्यादा आज, इसी में हो गद्दारी।।

इंद्रदेव जी आप, हठी मत बनिए इतना।
सूख रहे हैं होंठ, नहीं तुम जानो कितना।।
कहें मित्र यमराज, आप इतना मत ऐंठो।
कर पूरा कर्तव्य, आप फिर सोते बैठो।।

जल भराव चहुँओर, हुई वर्षा जब भारी।
हुए आज नाकाम, सभी की सब तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, इंद्र की कैसी माया।
गुस्से में अब लोग, खूब उनको दें गारी।।

कौन हमारी बात, भला कोई क्यों सुनता।
हम तो केवल आज, बने पिछलग्गू जनता।।
कहें मित्र यमराज, उठाओ सिर पर बोझा।
देता नेक सलाह, यही कलयुग का ओझा।।

मत डालो व्यवधान, नहीं तो मुश्किल होगी।
फिर मत कहना आप, बने हम नाहक रोगी।।
रहना हमसे दूर, यही बस अच्छा होगा।
पहले जाकर पूछ, जिसे उन सबने भोगा।।
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सरसी छंद मुक्तक
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कर्मो का परिणाम हमेशा, देता सबको सीख।
पर ऐसा सबको लगता है, नहीं रहा है दीख।।
भला कौन अब इन बातों पर, करता तनिक विचार -
सभी दंभ में अपने ही हम, मान रहे हैं भीख।।

खोटी किस्मत दीन दुखी की, सब किस्मत का खेल।
जैसे चलती है दुनिया में, तरह-तरह की रेल।।
भाग्य भरोसे काटें जीवन, हँसना रोना संग-
भला सभी का कब होता है, किस्मत बंधन मेल।।

क्या तू मुझको बदल सकेगा, कोशिश कर ले यार।
हर हथकंडे अपना देखा, बदले नहीं विचार।।
कर सकते सहयोग हमारा, मानूँगा एहसान -
मुझको तो ऐसा लगता है, मिलना केवल हार।।

परिणामों के भय से पापी, करते दो-दो हाथ।
नहीं मानते पाप कर्म को, चाहे फूटे माथ।
लुटा रहे दुनिया में गरिमा, मचा-मचा कर शोर-
कौन जगाने आने वाला, या फिर देने साथ।।

हरी भरी हो धरा हमारी, ईश्वर दो वरदान।
अतुलित खुशियाँ इतनी सारी, नित्य धरा पहचान।
हम सब प्राणी मिलकर देंगे, जग ऐसी सौगात-
निश्चित ही तब सभी करेंगे, इक दूजे पर अभिमान।।

सदा साफ पहचान धरा की, देनी है सौगात।
कैसे भी अब हमको करना, इतनी सी अब बात।
हरी भरी हो धरा हमारी, लेना है सौगंध-
नहीं किसी को छूट मिलेगी, करे धरा अब घात।।

याद रहेगा अब तुमको क्यों, जब है ऐसी सोच।
दारु पीकर नाचो-गाओ, भले कमर में मोच।।
रहा कौन कह बोलो तुमको, रखना इतना याद -
अब तो प्रिय यमराज हमारे, नहीं रहे हैं नोच।।

सूख रही बिन वर्षा धरती, किसका है ये पाप।
इंद्रदेव जी क्रोधित हैं क्या, या कोई संताप।।
सभी चाहते बरसें बादल, खूब झमाझम आज-
धरा संग हर प्राणी करता, कंठी माला जाप।।

मौन साधकर बैठे रहना, क्या जीवन का सार।
मानव होना व्यर्थ मानकर, क्यों जीते हो यार।
भला आप अनीति के आगे, बंद किए क्यों होंठ-
भले बोध तुमको ना होता, पर यह तव की हार।।

खुले गगन में थककर पंछी, लौट करें विश्राम।
थककर होते चूर बहुत वे, करते हैं आराम।
यही रीति सदियों से चलती, जान रहे हम आप-
फिर भी हम सब भला आज भी, क्यों इतना नाकाम।।

आज भरोसा टूट गया है, चिंता की यह बात।
नहीं किसी में शेष बचा है, अब सुंदरतम गात।
समय आड़ में कब है अच्छा, मुँह लेना ही मोड़ -
शांत भाव से कमियाँ खोजो, बिना किए उत्पात।।

चहुँदिश रार नित्य ही फैले, चेतो अब सरकार।
खोजो ऐसी राह आज अब, लगे एक हथियार।।
कैसे हो उपचार समस्या, बिना किसी अब द्वंद्व -
आज देश दुनिया भी देखे, होता कैसे वार।।

इतना तुम क्यों परेशान हो, नहीं समझते सार।
क्यों सारा कुछ अपने कंधे, लेते नाहक भार।
भूले शिष्टाचार सभी हैं, तुम्हें नहीं क्या ज्ञान -
यही आज का समय देखिए, रहो बने होशियार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिनी छंद
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मन की आँखें खोलिए, और लीजिए ज्ञान।
इतना भी अच्छा नहीं, मुफ्त बाँटना दान।।
मुफ्त बाँटना दान, सुनो मत नाहक सबकी।
निर्णय अंतिम आप, करो अब अपने मन की।।६९

आया है फिर से प्रलय, हम सब हुए अधीर।
जैसा चाहें अब करें, निज मन से रघुवीर।।
जो मन में रघुवीर, आज विपदा का साया।
प्रलय रुप में आज, परीक्षा लेने आया।।७०

जैसे हम बढ़ते गए, बदल गए आधार।
सब कुछ तो बदला मगर, बदले नहीं विचार।।
बदले नहीं विचार, समझता क्या मैं कैसे।
इसीलिए तो आज, सभी हैं मूरख जैसे।।७१

करना है यदि साधना, करो समर्पण आप।
जब हो मन में आस्था, नहीं स्वार्थ संताप।।
नहीं स्वार्थ संताप, भावना पावन रखना।
तभी सुखद परिणाम, चाह ईश्वर मन करना।।७२

मंजर ऐसा देखना, मन को देता दर्द।
ऐसे छूटे कँपकँपी, जैसे भीषण सर्द।।
जैसे भीषण सर्द, चुभाओ तुम मत खंजर।
नहीं चाहता विश्व, कभी अब ऐसा मंजर।।७३

माया बंधन में फँसे, होता कैसे ज्ञान।
और मानते कब भला, सभी यहाँ मेहमान।।
सभी यहाँ मेहमान, गए पा मानव काया।
इसी बात का दंभ, समझते कब हैं माया।।७४

जाने कैसा हो गया, अपना आज समाज।
दर्द झेलती बेटियाँ, गिरती उन पर गाज।।
गिरती उन पर गाज, हुए हम लोग सयाने।
कहें मित्र यमराज, भला वो कैसे जानें।।७५

हरियाली चहुँओर अब, स्वागत करते लोग।
लगता इनको देखकर, सब हो गये निरोग।।
सब हो गए निरोग, दिखी अब मुख पर लाली।
रखिए प्रभु जी आप, सदा ही ये हरियाली।।७६

कैसे हो पहचान, समस्या सबसे भारी।
अपने ही अब यार, लगे करने गद्दारी।।
कहें मित्र यमराज, नहीं सब बिल्कुल ऐसे।
यही बड़ा सवाल, आप हम जानें कैसे।।७७

किसके मन में क्या छिपा, बता रहे यमराज।
मूरख हमको मत कहो, लुट जायेगी लाज।।
लुट जायेगी लाज, यही बस आगे इसके।
चाह रहे गुरु मंत्र, भाव यह मन में किसके।।७८

पानी चहुँदिश देखकर, जन मन है हैरान।
दोषी भी हम आप है, इतना तो है ज्ञान।।
इतना तो है ज्ञान, याद आती क्यों नानी।
दिखा रहा है रंग, आज हम सबको पानी।।७९

बढ़ता ऐसे ही रहा, अगर झूठ पाखंड।
निश्चित मानो देश को, पड़े भोगना दंड।।
पड़े भोगना दंड, रही यदि अपनी जडता।
बनेगा ये नासूर, रोग जायेगा बढ़ता।।८०

इतना भी किसको नहीं, हुआ अभी तक ज्ञान।
चलता इस संसार में, विधि का अजब विधान।।
विधि का अजब विधान, चाह तू रखता कितना।
जाना खाली हाथ, भूल मत जाना इतना।।८१

दिन दिन बढ़ता जा रहा, आज धरा पर पाप।
नाहक हम क्यों कर रहे, सिर्फ दिखावा जाप।।
सिर्फ दिखावा जाप, देखते सब पल छिन-छिन।
कहें मित्र यमराज, गिरे जाते हम दिन-दिन।।८२

कैसे होगा याद अब , बिना सोच के आज।
तुमको तो बस लग रहा, जैसे हो ये खाज।।
जैसे हो ये खाज, मानते तुम हो ऐसे।
तब बतलाओ मित्र, याद फिर होगा कैसे।।८३


मिलता बिन मेहनत नहीं, खाली सपने चार।
समझेंगे कब लोग ये, जीवन का जो सार।।
जीवन का जो सार, राह जो भी हो दिखता।
कहें मित्र यमराज, बताओ कैसे मिलता।।८४

सत्ता का हथियार भी, बन जाता है अस्त्र।
भले किसी के हाथ में, होता भारी शस्त्र।।
होता भारी शस्त्र, वही तब बनती गत्ता।
कोशिश करके देख, दिखाती ताकत सत्ता।।८५

कैसे कहते आप हैं, करें नहीं हम फिक्र।
धीरे-धीरे घट रहा, चहुँदिश होता जिक्र।।
चहुँदिश होता जिक्र, सभी रोते हैं ऐसे।
खोते जाते आज, कहें तो भी हम कैसे।।८६

भाता सबको है नहीं, राजनीति का खेल।
सीधे-साधे लोग जो, अक्सर होते फेल।।
अक्सर होते फेल, नहीं रख पाते नाता।
जो नहिं पाते झेल, भला क्यों उनको भाता।।८७

हरियाली हर ओर का, नारा है बेकार।
जब तक होंगी ख्वाहिशें, करे सिर्फ सरकार।।
करें सिर्फ सरकार, बनेगा सदा बवाली।
जन मानस की सोच, कथित चाहत हरियाली।।८८

लगती नहीं लगाम है, चिंता की यह बात।
भटक रहे हैं अब युवा, दिन हो या फिर रात।।
दिन हो या फिर रात, दाल इनकी नहिं गलती।
जाने क्या जज़्बात, चोट भी इनको लगती।।८९

चलते-फिरते हो रहा, नाहक ही तकरार।
समझ नहीं आता हमें, कैसे हो उपचार।।
कैसे हो उपचार, रहेंगे कब तक डरते।
होगा अंतिम वार, प्यार से चलते-फिरते।।९०

सुख-सुविधा की चाह में, भटक रहा इंसान।
बनना चाहे देवता, बन जाता हैवान।।
बन जाता हैवान, नहीं दिखता है तब दुख।
मुश्किल में परिवार, भूलना पड़ता सब सुख।।९१

जैसे भूले मृत्यु को, वैसे शिष्टाचार।
मानव अब करता कहाँ, कोई सोच विचार।।
कोई सोच विचार, आज हम होते ऐसे।
नैया बिन पतवार, भटकती बिल्कुल जैसे।।९२

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद 
******** 
बाहर  निकलो  आप, कहाँ  हो  फंसे अतीत। 
तुमको  तो  है  ज्ञान,  व्यर्थ  है  इससे  प्रीत।। 
कहें  मित्र  यमराज,  बहुत  है  दुख  ये  देता। 
नहीं समय के साथ, मनुज जो खुद से चेता।।१५१

मन  की  आँखें  खोल,  हमें  है  आगे  बढ़ना।
करक  सोच  विचार, स्वप्न अपने तुम गढ़ना।।
कहें  मित्र  यमराज, सीख  हमसे  यह सीखो।
ऐसा क्यों हो आप, व्यर्थ तुम कल में चीखो।।१५२

दीप चंद्र  में वृक्ष, नवल  अंकुर  की आशा। 
सीढ़ी  चढ़ती  सोच, पंथ  नूतना  प्रकाशा।। 
किरणों में ही सदा,    पले जीवन अवतारा। 
उर्वर मन  की भूमि, बीज अंकुरण सहारा।।१५३

बदली जब छाने लगी, वर्षा की  तब आस।
सावन भी सूखा रहे, फिसल रहा विश्वास।।
फिसल रहा विश्वास, लगे चोट  की गुगली।
देख रहा किसान, बड़ी  उम्मीद से बदली।।१५४

बेंच   दिया   ईमान,    बड़ी   चिंता   है   तुमको।
क्या इतना अधिकार, नहीं अब  दोगे  मुझको।।
कहें  मित्र  यमराज,   करो  तुमको  जो  करना।
डरे  नहीं  हम  राम, आज फिर किससे डरना।।१५५

छाई  छटा  के  साथ, द्वार सावन है आया।  
हरित  धरा श्रृंगार, देखकर  मन  मुस्काया।
बूंदों  की  है  तान,  खुशी  से  मोर  नाचते।  
पीड़ा हर ली राम, प्राणि जन-मन हर्षाते ।।१५६

कहते  हैं  कुछ  लोग, दीन की  किस्मत फूटी।
कैसा  है  संयोग,     ईश  की  करुणा  रुठी।।
करते   सभी   विचार,  रहा  क्यों  होता  ऐसे।
सबका अपना भाग्य, मिला है जिसको जैसे।।१५७

हरियाली  के  साथ, आज  वर्षा  ऋतु  आई ।
भीगी धरती आज, सभी मुख खुशियाँ छाई।।
नभ में  गरजे मेघ, हुए  सब जन-मन गदगद।  
पावस  जैसा  साज,   मिटाता  सारे  सरहद॥१५८

मूरख  जैसी  चाल, समय की देखी  माया। 
बदले नहीं विचार, मनुज की झूठी काया।। 
सच है  सारा झूठ, व्यर्थ  मत करो  लड़ाई। 
स्वार्थ सिद्धि  के हेतु, हमारी करो  बड़ाई।।१५९

चलो साधना पाथ, समर्पण मन हो भाया।
तभी जलेगा दीप, भाव आस्था की छाया।।
कहें  मित्र  यमराज,  भावना  होगी  जैसी। 
वरना  सब बेकार, ईश  लीला  भी  वैसी।।१६०

मिला पिया का साथ, हुई जब ईश्वर इच्छा। 
नहीं किया था रार, समय की मान परीक्षा।। 
कहें  मित्र  यमराज, सृष्टि  कीअद्भुत माया। 
मातृ शक्ति है नारि, अनोखी इसकी काया।।१६१

होता कितना आज, भला परिजन का संगम।
कहते  ज्ञानी  संत,   मनुज  हो  रहे  नराधम।।
कहें  मित्र  यमराज,      ठने  कोई  आयोजन।
या फिर  होती मृत्यु, मिलें  तब  अपने बेमन।।१६२

कविगण संगम खूब, आड़ पैसे के होता।
निंदा  करते  लोग, प्रेम से  खाते  गोता।।
कहें मित्र  यमराज, सभी की है  मजबूरी।
नहीं किसी को लाभ, अगर रखते हैं दूरी।।१६३

सभी  यहाँ  मेहमान,   जानते  सब  हैं  इतना।
पर समझें कब लोग, मूर्ख बन रहते कितना।।
कहें   मित्र  यमराज,   खेल  चाहे  जो  खेलो।
अगर  नहीं है  ज्ञान, मुफ्त में  मुझसे  ले लो।।१६४

क्या इतना लाचार, आज के हम सब मानव।
नोचें  बेटी  जिस्म,      देख  शर्माते  दानव।।
कहें मित्र यमराज, डूब कर खुद मर जाओ।
बेटी  झेले  दर्द, उसे  मिल  सभी  बचाओ।।६५

कैसे  हो  पहचान,   आज हमको समझाओ।
फिर तुम उसके बाद, गीत अपने सब गाओ।।
कहें  मित्र  यमराज,    बने  कुछ  धर्म-धुरंधर।
बेशर्मी    से  रोज,       उछलते   जैसे   बंदर।। १६६

प्रलय प्रकति का आज, उठाए मुँह आ  जाता।
इसने  भी तो  जोड़, लिया विकास  से नाता।।
कहें  मित्र  यमराज, लिखें  हम  आप  कहानी-
देती  आँख  तरेर,  समझ क्या किसको आता।।१६७

खास नहीं ये आम,  छिपा कर मन में अपने।
बाँधे  मन  में  गाँठ,    देखता  नूतन  सपने।। 
कह सकता  है कौन, राज  दुबकाए  मन में।
यही बात यमराज,   हमें  समझाते  वन  में।।१६८

बरसा मेघ अपार, नगर  जलमग्न  समूचा।  
खड़ी बीच है राह, लबालब गली व कूचा।।
जनमानस हैरान, प्रभु जी अब  क्या होगा।
क्या हम अपना पाप, आज  भोगते रोगा।।१६९

झूठ  और पाखंड, रोग  बढ़ता  जहरीला।
भगवा की ले आड़, रंग फैले  भड़कीला।।
यह कैसा  है धर्म, नहीं  जिसकी  मर्यादा।
बनते क्यों हैं लोग, लोभ लालच में प्यादा।।१७०

विधि का अजब विधान,  भूल बनते हम ज्ञानी।
कटु  है मेरी  बात, आप  सब  हो  अभिमानी।।
कहें  मित्र  यमराज,       भूल क्यों करते भारी।
नहीं  मुझे  अफसोस,  हमें  कितना  दो  गारी।।१७१

माया  है  प्रभु  राम, चढ़ावा  चोरी  होना।
पापी मन का पाप, उजागर सारा होना।।
कहें मित्र यमराज, भले व्याकुलता भारी।
भले दिख रहे मौन, करें वो लीला सारी।।१७२

सावन की बरसात, कृषक मन को है भाती।
रिमझिम पड़े फुहार, दृश्य हरियाली छाती।।
सखियाँ  उठती  झूम,   पड़े  बागों  में  झूले-
छेड़ें वो सब तान, गीत सब मिलकर गाती।।१७३

आज बहुत दुर्व्यवहार, दिनों दिन बढ़ता जाता।
कैसा  आया  वक्त,  हुआ  हर   दूषित   नाता।।
कहें  मित्र  यमराज,    देखिए  कलयुग  लीला।
ईश्वर  भी  हैरान,        देख  मानव  जहरीला।।१७४

तुमको भले न याद, दौर कल  का था कैसा।
प्यार मोहब्बत खूब, मगर था कितना पैसा।।
कहें  मित्र  यमराज, नहीं देखे  तुम जिनको।
वही  आज  आधार,  गए  हैं  देकर तुमको।।१७५

सोचे विवश किसान, भला कैसे हो खेती।
धरा  हुई है  आज,  ठीक  जैसे  हो  रेती।।
जीव-जंतु  बेहाल, प्राण  संकट में  आया।
बिन वर्षा से आज, सूखती धरती काया।।१७६

आज नहीं वो बात, आप हम सबने देखा।
दिया गया है खींच, नये युग में जो रेखा।।
होता अब प्रतिघात, धीरे-धीरे सब घटता।
रोना है बेकार, कलेजा  अपना   फटता।।१७७

राजनीति  के  खेल,     बड़े   हो  रहे   निराले।
लक-दक ऊपर दीख, मगर भीतर बहु काले।।
नहीं दीन  है  धर्म , आज  कुछ  इसका  नाता।
सीधा  सा इंसान,  भला  इसको कब  भाता।।१७८

मन  में  रखना धीर, सत्य कड़ुआ तुम बोलो।
खुल जाएगा भाग्य, अगर पहले खुद तोलो।।
नदिया   करें   निनाद,   बहे   पवन   पुरवाई।
कोयल  कूके  बाग,  मोहती  ऋतु  मनभाई।।१७९

जल  भराव  चहुँओर, हुई  वर्षा जब  भारी।
हुई  आज नाकाम,  सभी की सब  तैयारी।।
कहें  मित्र  यमराज,   इंद्र  की  कैसी  माया।
लगता हुआ सवार, भूत की जालिम छाया।।१८०

बहु सुख  देगा मीत, द्वार  जब  पेड़  लगाया। 
तब गाएँ हम गीत, मिले फल लकड़ी छाया।। 
कहें  मित्र  यमराज, दिखेगी  तब  हरियाली।
जब  होंगे  हम आप, वृक्ष  के  प्यारे  माली।।१८१

लगती  नहीं  लगाम,  समय आया  है ऐसा।
सिर्फ चाहिए आज, सभी को केवल पैसा।।
कहें मित्र यमराज, बात कुछ हमें न जमती।
भले  हमारी  बात,  कलेजे  सबके  लगती।।१८३

कठिन  प्रश्न  है  आज, चुनौती  इतनी भारी।
कैसे   हो   उपचार,     करें   कैसी   तैयारी।।
कहें  मित्र  यमराज,   रहे  अब  नहीं  उधारी।
जागो अब सरकार,  शुरू कर अपनी बारी।।१८४

कौन जगत में आज, भला  इतना  अज्ञानी।
जानबूझकर  लोग,  खूब   करते   शैतानी।।
भटक   रहा   इंसान,    दोष  दूजे  को  देते।
पूछे खुद ही लोग, नहीं अब तक क्यों चेते।।१८५

करो नहीं तकरार, नहीं हम हैं अपराधी।
भूले  शिष्टाचार, मान लो आप  उपाधी।।
कहें मित्र यमराज, नया अब रंग चढ़ा है।
मानो मेरी बात, आदमी  बहुत कढ़ा है।।१८६

इंद्रदेव  जी आप, हठी मत  बनिए  इतना।
सूख रहे हैं होंठ, नहीं तुम जानो कितना।।
कहें मित्र यमराज, आप इतना  मत ऐंठो।
कर पूरा कर्तव्य, आप  फिर सोते  बैठो।।१८७

जल  भराव  चहुँओर, हुई  वर्षा जब  भारी।
हुए आज नाकाम,  सभी की  सब  तैयारी।।
कहें  मित्र  यमराज,   इंद्र  की  कैसी  माया।
गुस्से  में अब  लोग, खूब  उनको  दें  गारी।।१८८

कौन हमारी बात, भला  कोई  क्यों  सुनता।
हम तो केवल आज, बने पिछलग्गू जनता।।
कहें मित्र  यमराज, उठाओ  सिर पर बोझा।
देता नेक सलाह, यही कलयुग का ओझा।।१८९

मत डालो व्यवधान, नहीं तो  मुश्किल होगी।
फिर मत कहना आप, बने हम नाहक रोगी।।
रहना  हमसे  दूर,    यही  बस  अच्छा  होगा।
पहले जाकर  पूछ, जिसे  उन सबने  भोगा।।१९०


सुधीर श्रीवास्तव

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कहते हैं कहने दो
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लोग कहते हैं तो कहने दो
वो तो कहेंगे ही,
बस! आप ध्यान मत दो, उनको कहने दो,
क्योंकि लोगों का काम ही है
कुछ न कुछ कहते रहना,
आप भी सिर्फ अपना काम करो
आपको तो आगे बढ़ना है न?
हाँ! तो लोगों की बातों को नजरअंदाज करो
आँख खुली और कान बंद रखो
और बस! अपने लक्ष्य पर ध्यान दो।
लोग कहते रहेंगे, आप चुपचाप आगे बढ़ते रहो
लोगों की बातों का मौन प्रतिउत्तर
अपने धर्म -कर्म-श्रम से दो,
लक्ष्य जब छू लो तब
सिर्फ मुस्कराकर उन सबका आभार धन्यवाद करो
और कुछ कहते रहने की शुभकामनाएँ भी दो।

सुधीर श्रीवास्तव

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