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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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सरसी छंद - पद का मद

पद के मद में चूर हुआ जो, उससे रहिए दूर।
भूल गया वो कल तक क्या था, आज हुआ मगरूर।।

खुद को खुदा समझ बैठा है, हुआ बहुत अभिमान।
तनिक नहीं अब शेष बचा है, उसके भीतर ज्ञान।।
कल को जब ठोकर खायेगा, संग पीटेगा माथ।
कहाँ समझता आज भला वो, नहीं मिलेगा साथ।।

बँधी हुई आँखों पर पट्टी, उड़ता है आकाश।
अपने हाथों स्वयं लिख रहा, खुद के आप विनाश।।
शिकवा और शिकायत सबकी, चढ़े शीश बन पाप।। अपने पैरों मार कुल्हाड़ी, लेता है अभिशाप।।

ईर्ष्या द्वेष दंभ में प्राणी, कहाँ कभी खुशहाल।
अपनी स्वयं प्रशंसा कर ले, चलकर टेढ़ी चाल।।
हाल-चाल कोई जब पूछे, मुँह बिचकाता जोर।
नहीं किसी की वो है सुनता है, लगे व्यर्थ का शोर।।

ऐसे लोगों का नहीं भरोसा, करें मित्र हम आप।
ईश भरोसे आगे बढ़िए, मिटे सभी संताप।।
अपने पथ से आप भटककर, नहीं बदलिए रंग।
मानव जीवन की मर्यादा, मत करना तुम भंग।।

जब तक इनको समझ में आता, खट्टे हैं अंगूर।
हालत इनकी ऐसी होती, खुद कहते लंगूर।।
सत्य आइना दिखा ही देता, होता जब मजबूर।
कल तक जितना पास था इनके, आज वो उतना दूर।।

सुधीर श्रीवास्तव

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व्यंग्य - बुजुर्गों की अहमियत
*********
आज बड़े बुजुर्गो को वो अहमियत नहीं मिलती
जिसके वास्तव में वो हकदार हैं,
शायद ये कलयुग का ही प्रभाव है।
पर ऐसा केवल हम आप ही सोच सकते हैं
क्योंकि हम आधुनिकता के रंग में रंगे जा रहे हैं,
पर शायद हम यह भूल रहे हैं
कि अपने लिए गड्ढे और खाईं खोद रहे हैं।
जिस माँ बाप ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया
बड़े बुजुर्गों ने प्यार दुलार दिया, पढ़ाया, लिखाया,
आज सफलता के इस मुकाम तक पहुँचाया।
हमारी खुशी के अपनी खुशियों का गला घोंट दिया
जाने कितने कष्ट झेले, खून पसीना सब एक कर दिया,
पर हमारे लिए सब कुछ हँसकर सह लिया।
आज जब हमारी, आपकी बारी है
तब हम उन्हें अपमानित उपेक्षित करते हैं,
उनके पास बैठकर दो चार बात तक भी नहीं करते हैं
उनकी भावनाओं का गला घोंट देते हैं,
उनकी बात सुनने के बजाय उन पर चिल्लाते हैं
तीखे व्यंग्य बाण से उनका सीना छलनी कर देते हैं,
अपनी आजादी की आड़ में उन्हें अकेला छोड़ देते हैं
और तो और वृद्धाश्रम में भेजकर हाथ झाड़ लेते हैं,
ऊपर से बुजुर्गों की अहमियत का बड़ा ज्ञान बघारते हैं
शायद इसी तरह हम सब
भारत रत्न का खिताब अपने नाम करना चाहते हैं,
क्योंकि हम अपने बुजुर्गों को अहमियत छोड़िए
भगवान से भी ज्यादा मान-सम्मान देकर
सुबह शाम पूजा पाठ करते हैं,
उनके नाम का जाप करते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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काम तो राम ही आयेंगै

काम तो राम ही आयेंगे
यह तो हम सबको पता है,
पर ज्यादा भरोसा नहीं है।
क्योंकि हम खुद को राम समझते हैं,
राम से ज्यादा खुद पर विश्वास करते हैं
यह और बात है कि रोते भी उन्हीं से हैं
रो गाकर उनकी कृपा पा लेते हैं
और धन्यवाद तक कहने में
अपना अपमान समझते हैं,
क्योंकि हम स्वार्थी और कंगाल होते हैं।
अब राम जी तो ठहरे भोले-भाले
जो इतना ध्यान भी तो नहीं देते
हमारी गुस्ताखियाँ भी बिसार देते,
अपने तो दोनों हाथ में लड्डू संग खूब मजे हैं
अपना स्वार्थ भी सिद्ध कर लेते हैं
और राम जी श्रेय भी नहीं देते हैं।
वैसे भी राम जी तो अपने हैं
ऊपर से बेचारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,
ऐसे में उन्हें काम तो आना ही पड़ता है।
अब आप ही बताओ कि रामजी मेरे काम आते हैं
तो भला कौन सा अहसान करते हैं?
फिर हम भी तो राम जी के ही पास जाते हैं,
क्योंकि वे ही हमें सबसे पहले नजर आते हैं
जब वे हमारे काम आते हैं
तो हम भी राम नाम का थोड़ा गुण गा लेते हैं
अब राम जी को कोई शिकायत नहीं है
तो फिर आप क्यों फटे में टाँग अड़ाते हैं
ये हमारे और राम जी के बीच का मसला है
हम और राम जी आपस में कैसे रिश्ता निभाते हैं,
इस पर आप क्यों इतना खार खाते हैं,
या आपको राम जी समझ नहीं आते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - बजरंगी

शीश झुकाते हम बजरंगी।
मान रहे हम साथी संगी।।
भूत-प्रेत बाधा के मारे।
आप सभी को सदा उबारे।।

राम प्रभु के भक्त प्रिये हो।
छवि राम निज हृदय लिये हो।।
हम तो कहें आप बजरंगी।
लीला करते अनुपम रंगी।।

सुमिरन करें नित्य हनुमाना।
राम कृपा जीवन में जाना।।
जगत आपकी महिमा जाने।
लगता हम हो गये सयाने।।

सीता माँ का पता लगाए।
लक्ष्मण जी के प्राण बचाए।।
दर्शन सफल राम का होता।
अनुमति पहले तुमसे लेता।।

विघ्न विनाशक नाम तुम्हारा।
संकट में बस एक सहारा।।
जीवित देव आज भी स्वामी।
करते मनुज नमामि नमामी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद - कहें सुधीर कविराय
************
अपने मन के भाव, सदा ही उत्तम राखो।
जो भी मिले प्रसाद, प्रेम से उसको चाखो।
बच्चे हैं नादान , आप इसको स्वीकारो।
दीजै उनको प्यार, नहीं उनको दुत्कारो।।

बोल रहे जो आप, तनिक तो आप विचारो।
है कुंठा सैलाब, आप भी ताना मारो।।
नहीं सही ये कर्म, आप जो करते प्यारे।
उत्तम समझो धर्म, सभी के बनो दुलारे।।

जिनके कारण आज, आप दुश्मन बन जाते।
रख लो थोड़ा धैर्य, आज क्यों हो पछताते।।
इतना भी उत्साह, नहीं होता है प्यारा।
कल रोकर क्या आप , किसी का बनें सहारा।।

इतने उत्सुक आज, सोच कर बदला लोगे।
क्या सोचा है मित्र, भला क्या खुद को दोगे।।
कर लो आप विचार, अभी ये हितकर होगा।
जाकर मिल लें यार, जिसे उन सबने भोगा।।

चलो गाँव की ओर, आज नगरी को छोड़ो।
मानो मेरी बात, दिशा अपनी तो मोड़ो।।
निकल गया यदि वक्त, भला फिर क्या पायेगा।
सिर पर रखकर हाथ, सिर्फ तू पछताएगा।।


चलो न ऐसी राह, जहाँ तुम भटक न जाओ।
जिद से क्या है लाभ, आप कल को पछताओ।।
सोच समझकर मित्र, कदम तब आप निकालो।
कौन रहा कह आज, बला खुद पास बुला लो।।

आया गर्मी मास, सूर्य का आतप फैला।
लोग हुए बेजार, हुआ आतंकी खेला।।
सावधान हों आप, खेल जो मौसम खेले।
दोष नहीं वैशाख, चक्र मौसम के मेले।।

जान रहे हैं आप, सूर्य की अपनी लीला।
गर्मी का आतप, कहीं कुछ बचा न गीला।।
कुछ मत कहिए ताप, करो अपनी तैयारी।
बचकर रहिए आप, पड़े वैशाख न भारी।।

आया संकट आज, सामने सारी दुनिया।
मुश्किल का है दौर, रही रो मेरी मुनिया।।
समझ लीजिए आप, घड़ी मुश्किल ये आई।
दुनिया में कुछ लोग, कहें हम मुन्ना भाई।।

खट्टे हैं अंगूर, मान मत तुम घबराना।
बनो नहीं लंगूर, आप पथ छोड़ न जाना।
कोशिश करिए आप, पास में मंजिल होगी।
तब मीठे अंगूर, भला कहलाना रोगी।।

सुखदाता हैं राम, सभी हैं नित गुण गाते।
भवसागर से पार, हमें प्रभु राम कराते।
करते जाते काम, मनुज के कष्ट मिटाते।
दुनिया भर में राम, हृदय से पूजे जाते।।

हमको इतनी आस, किसी से करनी होगी।
जन-मन पर विश्वास, नहीं हो कोई ढोंगी ।।
अपने भी अब खेल, बने नाहक ही रोगी।।
यह जीवन की रेल, कहो बन जायें जोगी।।

खड़े हाथ पकड़कर, जिसे है नहीं पुकारा।
वही निभाते साथ, जिसे हमने दुत्कारा।
नाहक था बेचैन, छोड़ पथ साथ हमारा।
कल का दुश्मन आज, हमें है सबसे प्यारा।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - कहें सुधीर कविराय
**********
अंधे होकर स्वार्थ में, गिरे हुए हैं आप।
प्रतिफल निश्चित भोगिए, यह मेरा अभिशाप।।

आप भला क्यों मानते, औरों को नादान।
समझ नहीं क्या पा रहे, मिला उसे वरदान।।

निम्न सोच के साथ कब, हुआ लक्ष्य संधान।
जीवन का भी जानिए, निश्चित कर्म विधान।।

मानव अपने कर्म से, बनता सदा महान।
सतत कर्म की साधना, उसकी हो पहचान।।

नाहक नहीं बघारिए, व्यर्थ आपका ज्ञान।
अपने मुँह मिट्ठू मियाँ, बनिए नहीं महान।।

अधिकारों के नाम पर, होता बड़ा विवाद।
नहीं किसी को अब रहा, कर्तव्यों की याद।।

मातु-पिता का अब कहाँ, बच्चों पर अधिकार।
उनके हिस्से आ रहा, बस केवल दुत्कार।।

वही यहाॅं खुशहाल है, जिसे न कोई लोभ।
कभी किसी भी हाल में, करे नहीं जो क्षोभ।।

जो रहता संतुष्ट हैं, करता नहीं बवाल।
झूठ-मूठ रोता नहीं, वही यहाँ खुशहाल।।

प्रेम-प्यार सद्भाव का, पाठ पढ़ाए नित्य।
वही आज खुशहाल है, जिसका ये आदित्य।।

बिन उधार होता कहाँ, आज भला व्यापार।
जिम्मेदारी आपकी, बना रहे व्यवहार।।

यदि लें आप उधार तो, इतना रखिए ध्यान।
देने वाले का कभी, मत करना अपमान।।

हर कोई ऐसा नहीं, लायक इतना आज।
जिससे खोलें हम सभी, अपने मन के राज।।

अपने मन के राज को, रहो छिपाए आप।
करने जो तुम जा रहे, बने नहीं अभिशाप।।

श्रम से आप बनाइए, एक अदद पहचान।
जाति - धर्म के खेल से, बनता कौन महान।।

अपनी भी पहचान है, इसका हमको हर्ष।
आ जायेगा एक दिन, जीवन में उत्कर्ष।।

मानव जीवन जो मिला, ईश्वर का उपहार।
प्यार सभी को चाहिए, बाँटो प्यार दुलार।।

कभी आप भी सोचिए, सफल भला क्या जाप।
प्यार सभी को चाहिए, फिर क्यों करना पाप।।

शबरी राह निहारती, आयेंगे प्रभु राम।
उसके जीवन का यही, एकमात्र आयाम।।

राम प्रभो को देखकर, खोई शबरी होश।
जूठे बेर खिला रही, मन में इतना जोश।।

आशा देती है हमें, नित नूतन विश्वास।
हार-जीत का नियम है, आज दूर कल पास।।

छोड़ निराशा तो बढ़ो , करो भरोसा आप।
नाहक इतना क्यों भरे, मन अपने संताप।।

माँ गंगा तो आज भी, सहती हरदम त्रास।
बे-कदरी निज देखती, फिर भी मन में आस।।

नीति नियम को देखिए, सहती हरदम त्रास।
मानवता नित रो रही, देख स्वयं का ह्रास।।

अफवाहों में बढ़ रहा, तेल गैस का दाम।
करें स्वार्थी लोग कुछ, देशद्रोह का काम।।

तेल गैस के दाम की, चर्चा होती आम।
सत्य झूठ के फेर में, बेगुनाह बदनाम।।

आई संकट की घड़ी, आप बढ़ाएँ हाथ।
सभी धैर्य के साथ में, चलें राष्ट्र के साथ।।

बड़ी जरूरत आज की, सब मिल करिए काम।
घटा मान यदि देश का, सब होंगे बदनाम।।

भरे पड़े संसार में, ऋषि मुनि ज्ञानी संत।
जब तक प्राणी है धरा, चर्चा सदा अनंत।।

कमी नहीं संसार में, गुणी जनों का आज।
बदनामी के बाद भी, शोभित होता ताज।।

बिना कर्म के व्यर्थ है, अच्छे दिन की चाह।
हाथ बाँध मिलता किसे, आप बताओ राह।।

नहीं सिखाना चाहिए, चले गलत की राह।
उल्टा होगा एक दिन, निकलेगा मुखआह।।

हमें मिटाना चाहिए, कुंठित मन व्यवहार।
प्रेम प्यार से सब रहें, करें नहीं तकरार।।

करिए अपनी चाल में, अपने आप सुधार।
और संग में चित्र भी, तब मोहे संसार।।

चेहरा चुगली कर रहा, मन, वाणी, व्यवहार।
चर्चा स्वयं बखानती, क्या चरित्र का सार।।

छल-बल के इस दौर में, रहिए आप सतर्क।
जितना संभव हो सके, रहिए दूर कुतर्क।।

छल-छंदो का गूढ़ है, अजब-गजब विज्ञान।
सबके अपने तर्क है, सबका अलग विधान।।

नेता ऐसा चाहिए, करे सभी के काम।
सेवा और संवेदना, सब जनता के नाम।।

नेता ऐसा चाहिए, जिसकी ऐसी चाह।
कार्य सदा ऐसा करे, हो जनता में उत्साह।।

नेता ऐसा चाहिए, हो मिलना आसान।
जिसके भीतर तनिक भी, नहीं स्वार्थ अभिमान।।

नेता ऐसा चाहिए, करें नहीं जो भेद।
भूल-चूक पर वो करे, क्षमा याचना खेद।।

नेता ऐसा चाहिए, जिसका एक विचार।
जनता भी जिसके लिए, लगे आप परिवार।।

सेवक मिलना आजकल, अपवादों की बात।
लोग स्वार्थ में आजकल, कहते दिन को रात।।

दास प्रथा के दंश की, उठती अभी भी टीस ।
भले निकालें हम सभी, व्यर्थ मानकर खीस।।

सब नौकर हैं जगत में, मान रहा है कौन।
सत्य नहीं स्वीकारना, इसीलिए तो मौन।।

चाकर बनने की रही, कितनों की अब चाह।
चाटुकारिता में करें, दीन-धर्म सब स्याह।।

किंकर बनिए गुरू का, दृष्टा बनकर आप।
कर्ता बन वो स्वयं ही, हर लेंगे संताप।।

राम कृपा जिस पर रही, दूत नाम हनुमान।
यश -वैभव उसका बढ़ा, मिला मान-सम्मान।।

ईश-कृपा यदि चाहिए, तो करिए विश्वास।
सुख-समृद्धि संग में, तब पूरी हर आस।।

वक्त साथ जो चल रहे, बुद्धिमान वे लोग।
किस्मत उनके साथ है, लोग कहें संयोग।।

वक्त सगा किसका हुआ, नाम बताओ आप।
चलता अपनी चाल है, क्या ये उसका पाप।।

अपनेपन के भाव का, होता जाता अंत।
यूँ तो सब ही बन रहे, सभी बड़े ही संत।।

आज किसी से व्यर्थ है, अपने पन की चाह।
सभी ढूँढते इन दिनों, केवल स्वारथ राह।।

अपने पन की चाह में, बोलें मीठे बोल।
वाणी में रस घोलकर , हृदय जहर अनमोल।।

शेर गाय थे सामने, क्यों होते हैरान।
दोनों की ये सौम्यता, देती हमको ज्ञान।।

दोनों ही निश्चिंत है, बिना किसी संदेह।
मुखमंडल को देखिए, जैसे लगें विदेह।।

बाबा मेरे देश में, भाँति-भाँति के लोग।
आप हमें समझा रहे, ये केवल संयोग।।

करें धर्म की आड़ में, उल्टे सीधे काम।
डर जिनको लगता नहीं, होने बदनाम।।

कोशिश कितनी हो चुकी, इन पर नहीं लगाम।
बदनामी जिनके लिए, जस सुखदा आयाम।।

आज चाहते हम सभी, गाड़ी बंगला कार।
नीति नियम सिद्धांत से, करें नहीं हम प्यार।।

बाबा बनकर देखिए, खुल जायेगा भाग्य।
हम भी आपके साथ में, ले लेंगे वैराग्य।।

होना सबसे चाहिए, समता का व्यवहार।
संविधान की आड़ में,मत करिए तकरार।।

समता के संदेश का, तभी सफल आयाम।
जब चाहेंगे हम सभी, करना ऐसा काम।।

धर्म जाति की ओट में, राजनीति का खेल।
सत्ता कुर्सी के लिए, फैल रहा विषबेल।।

समता के व्यवहार का, नित होता उपहास।
सिर्फ दिखावे के लिए, होते कुटिल प्रयास।।

पहले उसने प्यार से, लिया भरोसा जीत।
चतुराई से फिर ठगा, बनकर मेरा मीत।।

व्यर्थ आप लिखते रहे, सुंदर मोहक गीत।
उसने धोखा संग में, लिया भरोसा जीत।।

सब जानें हनुमान जी, महावीर बलवान।
राम भक्ति थी हृदय में, तनिक नहीं अभिमान।।

महावीर का एक था, पंचशील सिद्धांत।
पाप-पुण्य की सीख का, संदेशा वेदांत।।

रिश्ते भी अब रक्त के, देते गहरे घाव।
जैसे लहरों बीच में, घिर जाती है नाव।।

बूंद-बूंद के रक्त का, अमृत जैसा मोल।
पड़े जरुरत जब कभी, समझ रहे तब तोल।।

नहीं रक्त संबंध है, फिर भी होता प्यार।
कुछ रिश्ते संसार में, ईश्वर का उपहार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू- हकीकत
*********
आप भी जानते हैं
क्या है हकीकत
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ अब माथा लगाना
समझना जरूरी है
तुम्हारे लिए।

मेरी बात नहीं मानी
अब सब बेकार
तुम्हारे लिए।

हकीकत तो सामने है
अब क्या कहना
तुम्हारे लिए।

हकीकत से कोसों दूर
खड़े रहना क्या
तुम्हारे लिए।

कौन सुनेगा बात मेरी
सब सोचते हैं
तुम्हारे लिए।

दुःखी मत हो यार
बहुत कुछ शेष
तुम्हारे लिए।

मुँह मत मोड़ तू
सच स्वीकारना बेहतर
तुम्हारे लिए।

हार-जीत जीवन में
आता जाता रहेगा
तुम्हारे लिए।

कहाँ जायेगा भागकर
पीछा छोड़ दे
तुम्हारे लिए।

क्या करेगा आखिर अब
हकीकत बदलेगा क्या
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा मुक्तक
***************
दोषारोपण कर रहे, अब अपने ही लोग।
तेजी से है बढ़ रहा, कोरोना जस रोग।
दोषी भी हम आप हैं, देख रहे निज स्वार्थ -
और स्वयं भी सह रहे, इसकी पीड़ा भोग।।

यह जीवन है आपका, इसका रखिए ध्यान।
इसमें कुछ ऐसा नहीं, जिसे कहें विज्ञान।
नाहक खुद पर ले रहे, आप स्वयं ही भार,
अच्छा है अब छोड़ दो, बने रहो नादान।।

अब अपने ही दे रहे, बड़े प्यार से घाव।
या शायद बतला रहे, वो सब अपना भाव।।
फ़र्क मुझे पड़ता नहीं, मेरी तो‌ है मौज -
रोक नहीं वे पा रहे, दौड़ रही मम नाव।।

चीर हरण अब हो रहा, मर्यादा का नित्य।
समझ नहीं आता हमें, इसका क्या औचित्य।
ऐसा लगता इन दिनों, हम सब बड़े अधीर-
समझ रहे सबसे बड़ा, हम तो हैं आदित्य।।

जिंदा होकर स्वयं को, मुर्दा माने लोग।
जाने क्यों हैं सोचते, उन पर है अभियोग।।
समझ नहीं है आ रहा, कैसी है यह रीति -
कोई बतलाए मुझे, रोग है या संयोग।।


हर प्राणी पर डालता, ग्रहण अपना प्रभाव।
कुछ पाते हैं बहुत कुछ, कुछ को मिले अभाव।।
दीन, धर्म, ईमान भी, घोले इसमें रंग -
सबकी अपनी भूमिका, सबका अलग स्वभाव।।

बढ़ता जाता जाल है, आज युद्ध का रोज।
पहले आपस में लड़ें, बाद शान्ति की खोज।।
कोशिश पहले हो अगर, तब बिगड़े क्यों बात-
पर दंभी जन मगन हैं, सारी दुनिया भोग।।

यादों के साए हमें, रुला रहे हैं रोज।
कभी-कभी लगता हमें, नाहक है ये खोज।
जितना हम हैं चाहते, दूर रहें ये रोग-
उतना ही हमको लगे, जैसे प्यारा भोज।।

सप्त सुरों के मूल का, सरगम है आधार।
सुर साहित्य के भाव, पढ़-सुन करें विचार।
गीत ग़ज़ल कविता लिखें, सब अपने प्रिय छंद-
सबको अपने दर्द का, मरहम सरगम संसार।।

जैसा सोचा था नहीं, वही सामने बात।
वाणी में रस घोलकर, होता है प्रतिघात।
टूट गया अब आज मैं, देख जगत की चाल-
बेशर्मी भी गर्व से, आज मारती लात।।

प्रिये मित्र यमराज की, मानी जबसे बात।
तबसे अपनी कट रही, बड़े प्रेम से रात।
शुभचिंतक अब कौन है, कैसे कह दूँ आप-
भला समझता कौन है, अब मेरे जज़्बात।।

मन उपवन सूना हुआ, मौन हृदय के भाव।
कैसी माया राम की, गहरे होते घाव।
इसमें किसका दोष है, सबसे बड़ा सवाल -
उत्तर कोई दे मुझे, जिसको बड़ा लगाव।।

उपवन में अब वो नहीं, आता है आनंद।
छिटपुट ही अब दीखते, फूलों पर मकरंद।
लगता इस पर भी चढ़ा, आज समय का रंग -
या फिर कोई कर रहा, राजनीति छलछंद।।

नव संवत्सर आ गया, लेकर नव उत्कर्ष।
प्रकृति में भी दिख रहा, अद्भुत पावन हर्ष।
हम सबको ही गर्व है, बढ़े सनातन मान
सत्य सनातन धर्म का, करते रहें विमर्श।।

नव संवत्सर दे हमें, नव उर्जा विश्वास।
और संग में रख रहा, हमसे थोड़ी आस।
हमको भी तो दीजिए, वही मान सम्मान -
जितना होता आपको, आंग्ल वर्ष उल्लास।।

आते हमको याद हैं, वो भी आँसू आज।
जिसे देख मैं था डरा, जब समझा था राज।
ममता की सौगात का, मिला एक उपहार -
ईश्वर की अनुपम कृपा, रिश्तों का ये ताज।।

भक्ति शक्ति का आ गया, फिर नवरात्रि पर्व।
श्रद्धा और विश्वास का, अद्भुत दिखता गर्व।
आदिशक्ति माँ की कृपा, बरस रही चहुँओर-
जन-मानस की साधना, हर्षित गर्वित सर्व।।

देवी दुर्गा शक्ति की, महिमा अमिट अपार।
पूजन पाठन भजन में, डूबा है संसार।
धूप-दीप संग आरती, जप-तप होता ध्यान -
निज भक्तों को माँ करें, भव-बाधा से पार।।

भक्ति, शक्ति, विश्वास का, अद्भुत है गठजोड़।
व्यर्थ समय मत कीजिए, नहीं खोजिए तोड़।
खुशियों संग जीवन सदा, जीते रहिए आप-
समदर्शी निज भाव से, पार करो हर मोड़।।

संकट में भी चल रहे, नेता अपनी चाल।
शर्म नहीं है आ रही, बजा रहे हैं गाल।
लगता इनका लक्ष्य है, बना रहे गतिरोध -
जैसे केवल चाहते, जनता करे बवाल।।

जीवन में सबके कभी, आता है गतिरोध।
चाहे जितना हम सभी, करते रहें विरोध।
चिंता छोड़ के कीजिए, स्वागत इसका आप-
लेने आता कब भला, यह कोई प्रतिशोध।।

फटे वस्त्र फैशन बने, देख आधुनिक रंग।
शर्म बेच खाई सभी, पीते जमकर भंग।
लाज किसे अब आ रही, आजादी के नाम -
अभिव्यक्ति की आड़ में, नाचें नंग धड़ंग।।

शर्म किसे अब आ रही, बनी नग्नता धर्म।
संकट का आधार है, पीछे इसके मर्म।
फैशन के इस दौर में, आती किसको लाज-
फटे वस्त्र फैशन बने, मात-पिता भी नर्म।।

प्रेम-प्यार सद्भावना, मृदुल आप व्यवहार ।
बना रहे हम सभी के, खुशियों का संसार।।
ऐसा कुछ करना नहीं, जिसका नाम गुरूर-
जीवन सबका तरल हो, जस नदिया रसधार।।
******
राम कहानी
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राम कहानी हम सभी, भले रहे हैं जान।
पर देते कब राम को, आप उचित सम्मान।
भले आप हम कुछ कहें, और मान लें भक्त-
मर्यादा के राम का, हम करते अपमान।।

राम नाम का कीजिए, जाप भले ही नित्य।
तब तक इसका है नहीं, मानें हम औचित्य।
जब तक गुण भी राम का, लेते नहीं उतार -
राम कहानी व्यर्थ है, झूठा नभ आदित्य।।
********
सरसी छंद
*********
देख-देख सब काँप रहे हैं, बढ़ता जाता युद्ध।
हाथ जोड़कर देख रहे हैं, राह महात्मा बुद्ध।
नहीं बोध है आज किसी को, कल क्या होगा हाल-
आँख मींच बस करते चिंता, संग चित्त को शुद्ध।।

सुधीर श्रीवास्त

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दोहा - कहें सुधीर कविराय 
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सतगुरु 
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अपना  कोई  है  नहीं,    आप  लीजिए  जान।
केवल सतगुरु आपका, यही आज का ज्ञान।। 

समझ नहीं यदि आ रहा, करिए आप विचार। 
सकल सृष्टि आधार है, सतगुरु पद आधार।। 
*******
जय माता दी 
*******
भक्तों  की  विनती  सुनो, मैया  दो  वरदान।
सुख-समृद्धि संग में,    मानवता  पहचान।।

बस  इतनी  सी  चाह  है,   मैया  दो  वरदान।
निंदा -नफरत से सदा, मुक्त जगत पहचान।।

मैया  दो  वरदान  ये,    रुके  फैलता  युद्ध।
अहम सभी का दूर हो, बड़ी जरुरत बुद्ध।।

मैया  दो  वरदान  अब,     माँग  रहे  हम  आज।
सबके हित का हम करें, मिल-जुल सारे काज।।

मन  में  पावनता  रहे,   मैया  दो  वरदान।
एक सूत्र में जगत का, बंधन बने विधान।।

करूँ नित्य आराधना, थोड़ा तो दो ध्यान।
पूजन -पाठन ज्ञान का, मैया दो वरदान।।

देवी   की   आराधना,     करते   पूजा  पाठ।
जन-मन जो भी भक्ति से, खुलती उसकी गाँठ।।

सजा हुआ दरबार है, चहुँदिश माँ का आज।
लगती भारी भीड़ है, जान  रहे  सब  राज।।

आदिशक्ति का देखिए, जन-जन करते भक्ति।
बढ़ जाती नवरात्रि में,  मातृ  चरण आशक्ति।।

मैया जगदम्बे सुनो, मेरी  तनिक  पुकार।
सारा जग बैरी हुआ, आप मुझे दो तार।।

जगदंबा का  हो  रहा, चहुँदिश  में  गुणगान।
धूप-दीप संग आरती, मातु कृपा सब मान।।

भक्ति-भाव जन-मन करे, मैया  का सत्कार।
जगदंबे  करिए  कृपा,     हो  जाए  उद्धार।।

ममता चादर ओढ़नी, सजा मातु दरबार।
जन  मानस  है मानता, जगदंबे  संसार।।

माँ जगदम्बे की बड़ी, लीला अपरम्पार।
पापी को दंडित करें, भक्तों को दे तार।।
*******
विविध 
*******
जिसका जैसा आचरण, वैसी उसकी सोच।
दुविधा जिसके हृदय में, देते  वही खरोच।।

निज चरित्र की आड़ में, नहीं कीजिए दंभ।
आप जानिए समय को, नित नूतन आरंभ।।

बिगड़ गया है आजकल, लोगों का बर्ताव।
इसीलिए तो बढ़ रहा, घर-घर में बिखराव।।

चाल चलन ऐसा रहे, जिस पर सबको नाज।
यही जरुरत आपकी,  सबसे  पहले  आज।।

अपने निज व्यवहार से, लो मन सबका जीत।
सदा  रहोगे  हृदय  में, सबके मन  का  मीत।।

हर मुश्किल आसान हो, कभी न मानो हार।
आप नहीं यदि ठानिए, नाहक  में  ही  रार।।

कभी न माने हार जो, मिलती उसको जीत।
जिसकी होती स्वयं से, केवल विजयी प्रीत।।

आती जब मुश्किल घड़ी, तब ही खुलते नैन।
उससे  पहले  हम  सभी, सोते हैं सुख  चैन।।

आता जब मुश्किल समय, दुनिया देती सीख।
जिन पर हमको गर्व था,   वही नहीं दें भीख।।

आता जब मुश्किल समय, सब हो जाते दूर।
बिना कहे ही कह रहे, हम  भी  हैं  मजबूर।।

बैल सरीखी जिन्दगी, जीते हम सब आज।
कलयुग के इस दौर में, यही राम का राज।।

अब  गाँवों  में  भी  नहीं, दिखते  द्वारे  बैल।
इसीलिए क्या मनुज के, मन में बढ़ता मैल।।

कौन  लक्ष्य के  पास है, और कौन  है दूर।
जो खुद से कहता नहीं, वो तो है मजबूर।।

मिले न जब तक लक्ष्य तो, करते रहें प्रयास।
बैठे  ठाले  व्यर्थ  ही,     झूठी  होगी  आस।।

लक्ष्य आपके सामने, आगे बढ़िए आप।
भाव हृदय में सफलता, रखें दूर संताप।।

चमक  आपके  नाम  की, कर्मों  के  आधीन।
नाहक ही क्यों व्यर्थ में, कहते खुद को दीन।।

बच्चे यदि लायक हुए, तो चमका दें नाम।
वरना ईश्वर की कृपा, नहीं हुए बदनाम।।

माता पिता की पूजिए, ईश मानकर आप।
बस इनकी आराधना, करें सदा निष्पाप।।

निंदा नफ़रत भूलकर, करो इबादत आप।
हम भी करें उपासना, व्यर्थ छोड़ संताप।।

ईद पर्व  पर  भर  गया, आज  इबादत  गाह।
हिंदू मुस्लिम बीच में, दिखा मिलन उत्साह।।

अपने-अपने धर्म का, करिए पूजा-पाठ।
हम करते आराधना, नहीं डालिए काठ।।

मातु पिता  हैं  चाहते, बनिए  आप  सशक्त।
लोभ लालसा मुक्त हों,  रहें  कर्म  आशक्त।।

तन-मन-धन से तो सदा, बनिए आप सशक्त।
प्रेम-प्यार  संवेदना,      कर्म-धर्म  के  भक्त।।

शंकित मन से भी कभी, हो जाता है घाव।
बिन पानी भी डूबती, नाहक अपनी नाव।।

मन शंकित यदि आप का, करिए आप विचार।
आपस  में  संवाद  से, मिले  उचित  आधार।।

जिसने ये जीवन दिया,  और  संग  पहचान।
मात-पिता को ईश सम, सदा दीजिए मान।।

आए  हो  इस  जगत  में, आप करो  स्वीकार।
जिसने ये जीवन दिया, उसका भी अधिकार।।

औरों का तू छोड़कर, दामन ख़ुद का देख।
अपना भी तो देख ले,नाहक बनता शेख।।

दामन ख़ुद का देख लो, कितना पाक पवित्र।
बाद  खींच  लेना  कभी, मेरा  पावन  चित्र।।

क्यों  करते  हो  व्यर्थ  में, तुम  इतना अभिमान।
दामन ख़ुद का देख लो, फिर गाओ निज गान।।

भला युद्ध से कब मिला, कभी सुखद परिणाम।
कूटनीति -संवाद  ही,  सरल   सहज  आयाम।।

जनता में डर बढ़ रहा, संकट में है जान।
शान्ति सभी हैं चाहते, दीन धर्म ईमान।।
     
नेताओं में अब कहाँ, दिखता सेवा भाव।
अपने मद अनुरूप ही, देते  रहते  घाव।।
      
जन-धन  के  नुक़सान  से, दुनिया  है  हैरान।
पर कुछ लोगों का अहम, बन आया शैतान।।

 
तेल नीति टकराव से, जन-मन है गमगीन।
बेबस  मानवता  हुई,    बन  बेचारी  दीन।।

बना  रहे  परिवार  का,    मर्यादा   सम्मान।
यही सोच भारी पड़ी, व्यर्थ गया बलिदान।।

रिश्ता  फलता  है  वही, जहाँ  प्रेम  विश्वास।
आपस में जिनमें रहे, अधिकारों की आस।।

रिश्ता फलता है वही, जिसमें मधुरिम भाव।
जहाँ स्वार्थ की ओट में, नहीं  डराए  घाव ।।

इक दूजे की भावना, और  उचित  सम्मान।
रिश्ता फलता है वही,   हो सबको ये ज्ञान।।


कफ़न बाँधकर  आइए, करना  है  बलिदान।
यही समय की माँग है, व्यर्थ छोड़ अभिमान।।

मंगलमय नववर्ष हो, कृपा करो प्रभु राम।
जो अतीत में कष्ट था, भूल  रचें  आयाम।। 

भक्ति, शक्ति, विश्वास का, अद्भुत है गठजोड़।
व्यर्थ समय मत कीजिए, नहीं  मिलेगा  तोड़।।

खुशी संग जीवन सदा, जीते रहिए आप।
समदर्शी निज भाव से,  मिटे शोक संताप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा -कहें सुधीर कविराय 
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श्रद्धांजलि/श्रद्धासुमन 
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सदा शिकायत जो रही, वही  मुझे  है आज।
छोड़ अधर में क्यों गए, इतना सारा काज।।

सूक्ष्म रूप में ही सही, रखें शीश पर हाथ।
बस इतनी सी चाह है,  रहें  हमारे  साथ।।
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विविध 
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करो  भरोसा  ईश  का, चाहे  जैसे  आप।
सदा नाम उनका करें, सोते-जगते आप।।   

मूर्खों का बाजार है, मालिक होगा कौन। 
भैया बाबू हैं सभी, आखिर बोलो कौन।।

कद-पद तो है बाद में, पहले हम इंसान।
दंभी बनिए मत कभी, देना सीखो मान।।

कर्म-धर्म के साथ ही, खुद को भी ले जान।
ज्ञानी  विज्ञानी  सही,  पहले  हम  इंसान।।

बहुत याद आता हमें, सदा आपका साथ।
सूना-सूना शीश है, कौन रखे  अब हाथ।।

बहुत याद आती हमें, मिली  आपसे  मार।
तब तो समझा था नहीं, आज हुए लाचार।।

बहुत याद आता हमें, कल में उसका साथ।
अपने भ्राता शीश पर, रोकर  फेरा  हाथ।।

जीवन जीना है कठिन,   कहते हैं वे लोग।
जो खुद ही फैला रहे, जन-जीवन में रोग।।

जीवन जीना आपको, इसका रखिए ध्यान।
क्यों कोई देगा भला, तव को सुखदा ज्ञान।।

धीमा  चलते आप  हैं, मगर  नहीं  बैचैन।
लक्ष्य दिख रहा सामने, कहें आपके नैन।।

आखिर इतना तेज क्यों,  भाग रहे थे आप।
या फिर  कोई  चाहते, आप  छुपाना पाप।।

सोच समझ अब लीजिए, देना नहीं उधार।
वरना करना आपको, कल नाहक तकरार।।

चाहे  जितना  हम  कहें,    देना  नहीं  उधार।
इसके बिन चलता कहाँ, जीवन मधुर बयार।।

आप स्वयं ही देखिए,  कितना उचित विचार।
तब  ही  निर्णय  कीजिए, देना  नहीं  उधार।। 

बिन उधार चलता भला, आज कहाँ व्यापार।
आज  इसी पर चल  रहा, रोजगार  आधार।।

नहीं जरुरत आपको, आज खड़ा जो द्वार।
सख्ती से  उसको कहें, देना  नहीं  उधार।।

तू मम जीवन ज्योति है, और तुही संसार।
ईश्वर अनुकंपा  बड़ी, बन  आई आधार।।

ज्ञान ज्योति फैलाइए, शिक्षित हों सब लोग।
उन्नति पथ पर राष्ट्र के, सबका उचित प्रयोग।।

विश्व  विजेता  फिर  बने,    आज  तीसरी  बार।
आठ मार्च छब्बीस का, सफल  हुआ  रविवार।।

गर्वित हम सब हो रहे, बना विजेता देश।
टीम इंडिया ने दिया, आज पुनः परिवेश।।

निज कर्मों से बन गये, कितने लोग महान।
फिर भी बहुतों को नहीं, रहा स्वयं का ज्ञान।।

अपने मुँह से क्या कहें, कहना नहीं महान।
ऐसा  करते  हैं  वही,  केवल मूर्ख बखान।।

लोग स्वयं के देश को, कहते  सदा  महान।
ऊँचा  इसका  भाल हो, चाहे  जाए  जान।।

महँगाई का डर बढ़ा,    देख-देखकर युद्ध।
विश्व  प्रार्थना कर रहा, एक आस है बुद्ध।।

महँगाई  की  आड़  में, भूल  गए  ईमान।
जनता को हैं लूटते, कहाँ छुपे भगवान।।

सुरसा डायन की तरह, लीले खुशियाँ रोज।
महँगाई  की  मार  से, बचना  राहें  खोज।।

झूठ  बोलते  वे  सभी,      लोग  हुए  बेशर्म।
जिनका अपना है नहीं, जीवित मानव धर्म।।

जरा नहीं है शर्म क्या, भूले जो माँ-बाप।
तुमसे अच्छे लोग वे, जो करते हैं पाप।।

शरम नाम की चीज को, बेंच  खा रहे  आप।
व्यर्थ दिखावा कर रहे,   ईश नाम का जाप।।

झूठ  बोलते  शान  से,      नेता  बड़े  महान।
जनता जब होती खफा, खा जाती पहचान।।

परंपरा को ढो रहे,    हम सब सारे लोग।
और कह रहे गर्व से, व्यर्थ पालना रोग।।

नहीं पुरातन कह करें, आप सभी अपमान।
पुरखों की ये परँपरा,  है  अपनी  पहचान।।

मान   प्रतिष्ठा  के   लिए,      रहते   सब   बेचैन।
कर्म-धर्म को भूलकर, करते तिकड़म दिन-रैन।।

ईश्वर  इच्छा  के  बिना, क्या  होता है काम।
मान-प्रतिष्ठा छोड़िए, खो तक जाता नाम।।

व्यर्थ  भौंकना  छोड़िए, चाहे  जो  हों  आप।
देश से बढ़कर कुछ नहीं, करते रहो विलाप।।

प्राण  प्रतिष्ठा  बाद  से,  फैल  रहा  उत्कर्ष।
दशरथ नंदन की कृपा, सत्य सनातन हर्ष।।

सागर भी अब सह रहा, आज युद्ध की मार।
सनकी पागल बन गये, मानवता  पर  भार।।

सागर सा जिसका हृदय, जहर हो रहा आज।
छिड़ा  हुआ  जो  युद्ध है, दुनिया जाने राज।।

अपने-अपने  पक्ष  की, करते  हम‌ सब बात।
देख रहे निज स्वार्थ का, खूब करें प्रतिघात।।

कौन पक्ष में है खड़ा, इसका भी हो ध्यान।
नहीं दिखाना है हमें, दंभ और अभिमान।।

सदा संतुलित ही रखें, अपना आप विचार।
बात तर्क के साथ में, मत विपक्ष तकरार।।

जो  विपक्ष  में  सामने, उसका भी सम्मान।
तर्क बुद्धि से कीजिए, रखना मान विधान।।

जब तक मन मिलता नहीं, नाहक है सब खेल।
कुंठा   ईर्ष्या   हृदय   में,    कैसे   होगा   मेल।।

मन में बाँधे गाँठ हो, और कर रहे खेल।
आप नहीं जब चाहते, कैसे होगा मेल।।

सत्य जीतता है सदा, यदि मन में विश्वास।
अपनों से होती बहुत, उसको इतनी आस।।

संघर्षों  के  बाद  में, मिले सुखद परिणाम।
सत्य जीतता है सदा, पर नाहक बदनाम।।

सदा  सत्य की  जीत  हो, ऐसी  बनती  राह।
निश्चित इक दिन झूठ का, होना ही है दाह।।

सदा प्रीति का कीजिए, आप सभी सम्मान।
वरना इक दिन आपका, होगा ही अपमान।।

रिश्तों की इक डोर का, छोर प्रीति के साथ।
जिनकी चाहत है खुशी,  पकड़े रहते हाथ।।

अब  कोई  अपना  नहीं, रखो आप सब याद।
चिंतित होते क्यों भला, जो करना फरियाद।।

वो निज अंक में भर करे, ममता की बौछार।
पर  मेरी  लाचारगी,  न
  मुझ  पर चढ़े उधार।। 

बच्चे  कुंठित  हो  रहे, देख  अंक  का खेल।
पद समान के बाद भी, नहीं रहा जब मेल।।

आज जिसे भी देखिए, अपने में ही मस्त।
और एक दिन स्वयं ही, हो जाते हैं पस्त।।

आज  जिसे  भी  देखिए, मुफ्त  बाँटता  ज्ञान।
नहीं देखता जो कभी, कटा हुआ निज कान।।

आज जिसे भी देखिए, दिखलाता है शान।
जिसे पता भी है नहीं, मान और अपमान।।

कालर ऊँची कर रहे, जिसको देखो आज।
एक मात्र सिद्धांत का, केवल करते काज।।

मर्यादा  को  भूलते,    जिसको  देखो  आज।
मातु-पिता को भले ही, कुंठित करती लाज।।

सुधीर श्रीवास्तव

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