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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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आइकू - चंदा चोरी 
*********
चंदा 
चोरी हुई 
सब अंजान बने 
आस्था से खिलवाड़ हुआ।१

अपने
और अपनों 
की संदिग्ध भूमिका 
राम मंदिर के सेवादार।२

मंदिर 
चंदा चोरी 
जिम्मेदार मौन रहे
और दान गायब हुए।३

चंदा 
चोरी नहीं 
राम नाम बदनाम 
सनातनी आस्था से खिलवाड़।४

अचानक 
भाव बढ़ा 
बंदर बांट करता 
खासम-खास सिपहसालार अपना।५

राम
बड़े बेचैन 
अपने धाम आकर
वनवास ही अच्छा था।६

हम
रामभक्त हैं 
चंदा ही चुराया 
कौन सा अपराध किया।७

चढ़ावा
चोरी हुई 
राम मंदिर में 
आप क्यों परेशान हैं।८

जिसकी
चोरी हुई 
वह मुस्कुराता है 
राम कृपा मुझ पर।९

सुनियोजित 
साजिश है 
चढ़ावा चोरी नहीं 
बहुत बड़ा षड्यंत्र है।१०

जिम्मेदार 
मौन रहा
पता नहीं आपको 
रामाज्ञा का पालन किया।११

सेवादार 
हम सब
भगवान राम के
चोरी राम-दान की।१२

हमारा
पूरा अधिकार 
चंदा-चढ़ावा पर,
फिर कैसे चोरी कहते।१३

बेचारे  
तमाशा देखते
पर कहते कुछ 
मजे ले रहे हैं।१४

यमराज 
बहुत चिंतित 
हिस्सा नहीं मिला 
चंदा चोरी होती रही।१५

काश
हम-आप 
भी मौका पाते 
और खूब चढ़ावा चुराते।१६

प्रभु 
मुझे शिकायत 
बहुत है आपसे
चंदा सीधे हमें भिजवाते।१७

चोरी 
करते क्यों 
चंदा आपके नाम 
खाते में मेरे जाते।१८

सुधीर श्रीवास्तव

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01 जुलाई 
मेरा जन्मदिन और यमराज की बधाई 
***************
अलख सुबह मित्र यमराज ने फोन घनघनाया,
मुझे गुस्सा तो आया फिर भी फोन उठाया 
क्या यार! सुबह-सुबह और कोई काम नहीं था 
जो तूने मेरी नींद से दुश्मनी निभाया।
यमराज ने मुझे हड़काया- 
क्या तूने भाँग खाकर अपना जन्मदिन बिसराया 
आज तेरा जन्मदिन है, बस इसीलिए मैंने फोन लगाया।
जन्मदिन की बधाइयाँ, शुभकामनाएँ सँभाल
धमाकेदार पार्टी का इंतजाम कर।
ओह! धन्यवाद प्यारे, जो तूने बताया 
पर इसमें मेरा क्या लाभ है?
मेरी तो उम्र रोज ही घट रही है 
और मुझे लगता है कि लोग मेरा मजाक उड़ा रहे हैं
या फिर जन्मदिन की आड़ में दुश्मनी निकाल रहे हैं 
तभी तो मेरी लंबी उम्र की कामना कर रहे हैं,
बधाइयाँ शुभकामनाओं के साथ उपहास कर रहे हैं।
मैंने अपने मन का भाव जब उसे बताया 
तो वो एकदम से भड़क गया -तू एकदम गधा है,
दो चार कविताएँ क्या लिख लिया 
पूरी तरह बेवकूफ हो गया है।
ये सब एक तरीका है लोगों से जुड़ने का
सुख-दुख बाँटने, औपचारिकता निभाने का
उम्मीद जगाने और विश्वास बढ़ाने का
जन्म के साथ ही प्राणी का जीवन छोटा होता जाता है 
पर यह बात कौन और कितना मानता है?
अब ये सब छोड़ और नहा धोकर तैयार हो जा
यमलोक में तेरे जन्मदिन की 
विशेष पार्टी की तैयारियां चल रही है।
सबसे बड़े केक का आर्डर दिया जा चुका है,
तेरे लिए अनोखे उपहार की कार्ययोजना को
अंतिम रूप दिया जा रहा है।
मैंने उसे रोका - अरे यार!
मैं उपहार लेकर भला क्या करुँगा 
यहाँ भी तो ला नहीं सकूँगा।
यमराज मुस्कराया - धैर्य रख मेरे भाया
तुझे लाने, ले जाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी,
क्योंकि तुझे यमलोक ही उपहार में देने काअध्यादेश लाया गया है,
नियमानुसार सारी प्रक्रिया को कानूनी स्वरूप दिया जा चुका है 
साथ ही तेरे निवास का स्थाई प्रबंध भी 
यमलोक के नवनिर्मित शांति निकेतन में कर दिया या गया है।
उसकी बात सुन मुझे गुस्सा आ गया 
तू दोस्त है या दुश्मन भाया
जो इतना सब कुछ कर मेरा मजाक उड़ा रहा है,
जन्मदिन की आड़ में उपहार स्वरूप 
मेरे गले में फंदा डाल रहा है,
यहाँ इतना बवाल क्या कम झेल रहा हूँ
जो वहाँ भी तू नया जाल बुनने में 
नाहक अपना समय जाया कर रहा है?
फिलहाल तो मैंने तेरी बधाइयाँ शुभकामनाएँ सहेज ली है 
तुने इतना सोचा - इसके लिए आभार धन्यवाद 
और अब चुपचाप फोन रख दे भाया।
केक खाने का मन करे, तो शाम को लेकर आ जाना
दोनों मिलकर केक खायेंगे, जाम लड़ाएँगे
और जन्मदिन की आड़ में कम होते जीवन का
जमकर जश्न मनाएंगे, और अपनी कविता भी सुनाएंगे,
अच्छे होटल में खाना खायेंगे
खाने का बिल तुझसे भरवाएंगे 
इस तरह अपना जन्मदिन मनाएंगे,
अखबार, टीवी और सोशल मीडिया पर छा जाएँगे
मेरे यार को दुनिया वाले भी तब अच्छे से जान जायेंगे।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा छंद
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आशीष
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आज कौन अब दे रहा, आप बताओ भाव।
सबको अब आशीष भी, लगता जैसे घाव।।

मातु-पिता आशीष लो, गुरुजनों के साथ।
तभी हमारे शीश पर, समझो ईश्वर हाथ।।

जैसी करनी हम करें, वैसा पाते रोज।
कलयुग में आशीष की, करें स्वार्थ की खोज।।

छलछंदो की आड़ में, आशीषों पर वार।
समय साथ अब खो रहा, हम सबका संस्कार।।

मीठे बोल की आड़ में, कपट छिपाकर लोग।
देते हैं आशीष भी, मन में शापित रोग।।

चाह रहे आशीष हैं, मम प्रियवर यमराज।
कहते हैं प्रभु दीजिए, बने हमारा काज।।
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पाते वही मुकाम
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सत पथ पर चलते हुए, लेते हैं प्रभु नाम।
वे सब इसके पात्र हैं, पाते वही मुकाम।।

जिनको खुद पर विश्वास है, अरु चलते अविराम।
बिना किसी अवरोध के, पाते वही मुकाम।।

जो चलते जिस राह पर, जैसा है आयाम।
अपने ढंग से एक दिन, पाते वही मुकाम।।

कर्म कंस रावण किए, फिर भी उनका नाम।
राम-कृष्ण गाथा गढ़े, पाते वही मुकाम।।

पाते वही मुकाम है, जो करते हैं कर्म।
सदा फिसड्डी वे रहें, जो रटते हैं धर्म।।

जो भी रचना चाहते, नूतनता आयाम।
वे सब निश्चित एक दिन, पाते वही मुकाम।।
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प्राण प्रतिष्ठा
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प्राण प्रतिष्ठा हो गई, मंदिर में श्रीराम।
आज जगत में बस गया, अवध नाम आयाम।।

प्राण प्रतिष्ठा संग में, अवध में भारी भीड़।
बालरूप श्रीराम जी, मुस्काते निज नीड़।।

भक्ति-भाव से हो रहा, पूजन अपने राम।
कितने वर्षों बाद अब, मिला प्रभो को धाम।।

उत्साहित था विश्व भी, जागा नव विश्वास।
प्राण प्रतिष्ठा बाद अब, पूरी होगी आस।।

नहीं आप हम जा सके, भले अयोध्या धाम।
प्राण प्रतिष्ठा ज्यों हुई, मन बोला श्री राम।।
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चंदा चोर
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आया ये कैसा समय, कलयुग में घनघोर।
भेष बदलकर भक्त का, चंद चढ़ावा चोर।।

चंद चढ़ावा चोर में, लिखा लिया यदि नाम।
आप बिलबिला क्यों रहे, देख रहे श्री राम।।

बैठे हैं श्री राम जी, होता है जो खेल।
चंद चढ़ावा चोर की, चला रहे हैं रेल।।

राम हमारे हैं प्रभो, हम हैं उनके भक्त।
जब तक उनकी है कृपा, कौन करे परित्यक्त।।

मंदिर में श्रीराम के, बैठे चंदा चोर।
रामराज्य में हो रहा, पाप बड़ा घनघोर।।

चंद चढ़ावा चोर ही, करें नाम बदनाम।
पाप कर्म करते रहें, बैठ छाँव श्रीराम।।

मन में कलुषित भावना, वाणी में श्री राम।
चंद चढ़ावा चोर का, ऐसे चलता काम।।

जान रहे प्रभु राम जी, सब चोरों के नाम।
गलती पर क्या दें सजा, और बहुत है काम।।

चंद चढ़ावा चोर को, कर देंगे बर्बाद।
कहते हैं यमराज जी, खा लेने दो खाद।।

गुस्से में यमराज भी, करें शिकायत राम।
चंदा चोरों में प्रभो, लिख लो मेरा नाम।।

चंद चढ़ावा चोर को, खोज रहे यमराज।
जब इनको होगी सजा, तभी करूँगा काज।।

छाया में प्रभु राम के, बैठे करते काम।
अधम कृत्य करते रहे, सनातनी बदनाम।।

चंदा चोरी से बड़ा, और भला क्या काम।
पापी मन में सोचते, क्या कर लेंगे राम।।

माना हम तो अधम हैं, फिर भी करें न शर्म।
तेरे उत्तम कर्म से, रोता मानव धर्म।।

चंदा चोरी से बड़ा, उत्तम क्या है काज।
मंदिर में प्रभु राम जी, सबसे बड़ा है राज।।

कहा मित्र यमराज ने, कर ले उत्तम कर्म।
चंदा चोरी कर निभा, पापी अपना धर्म।।

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जीवन का आधार
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मातु-पिता को मानिए, जीवन का आधार।
ईश्वर की इतनी कृपा, कर देते संसार।।

जीवन के आधार को, करता चल मजबूत।
खुशियाँ तब ही साथ में, बनकर रहती दूत।।

जिनका खंडित हो गया, जीवन का आधार।
उनके हिस्से में नहीं, अपनेपन का सार।।

जीवन के आधार को, देना पड़ता मान।
इसके बिन सब व्यर्थ है, जितना भी हो ज्ञान।।

रोना-धोना छोड़िए, नहीं ठानिए रार।
अभी आपके हाथ निज, जीवन का आधार।।
*****
समय
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समय-समय की बात है, बैठे प्रभु दरबार।
चंदा चोरी हो रहा, करते भक्त पुकार।।

लीला देखो काल की, करता है उपहास।
बेबस हैं अब मातु-पितु, टूट रही सब आस।।

कहते हैं यमराज भी, समय महज संयोग।
तेजी से यह बढ़ रहा, आज समाजी रोग।।

जो करता है काल का, सदा उचित सम्मान।
कितनी हो मुश्किल बड़ी, मिलता उसे निदान।।

वर्तमान का दे रहा, समय हमेशा सीख।
कुछ के हिस्से खीर है, कुछ के हिस्से भीख।।
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बात हमारी मान
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कहते थे जब दादा -भैया, बात हमारी मान।
तब लगता था है हमें, इनसे ज्यादा ज्ञान।।

सतपथ पर चलना सदा, बात हमारी मान।
निंदा नफ़रत क्रोध का , मत पढ़ना विज्ञान।।

मातृशक्ति सम्मान का, नहीं भूलना पाठ।
बात हमारी मान लो, बाँधे रखना गाँठ।।

मातु-पिता, ईश्वर गुरू, सब है एक समान।
बात हमारी मान लो, नहीं बघारो ज्ञान।।

मर्यादा के पार तुम, कभी न जाना मित्र।
बात हमारी मानना, धुँधला होगा चित्र।।

अपने बड़ों को मान दो, अरु छोटों को प्यार।
बात हमारी मान लो, तब सुंदर संसार।।

छोटा सा संदेश है, बात हमारी मान।
नहीं दिखाना तुम कभी, झूठी अपनी शान।।

नहीं छेड़ना व्यर्थ में, कभी बेसुरा तान।
प्रेम सहित रहना सदा, बात हमारी मान।।

अज्ञानी बनकर सदा, लेना सबसे ज्ञान।
बात हमारी मान लो, व्यर्थ सभी अभियान।।
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योग दिवस
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जून आज इक्कीस है, योग दिवस के नाम।
चहुँदिश में ही भोर से, यही एक बस काम।।

कोटा पूरा हो रहा, योग दिवस पर आज।
कौन आज खाली भला, सबको ढेरों काज।।

योगसूत्र देता हमें, मधुरिम जीवन ज्ञान।
जिसे समझ में आ गया, वही बड़ा विद्वान।।

करता है नित योग जो, रहता सदा निरोग।
रहता इससे दूर जो, वही रहा है भोग।।

हमें तनावों से अगर, रहना कोसों दूर।
करो दोस्ती योग से, बिन माने मजबूर।।

आप योग अपनाइए, चित्त रहे खुशहाल।
दवा-वैद्य का सदा ही, सारा दूर बवाल।।

योग दिवस यमलोक में, मना सफलता साथ।
प्रिए मित्र यमराज जी, बने योग के नाथ।।

चर्चा मेरी हो रही, योग दिवस पर खास।
मम प्रियवर यमराज था, फिर भी बड़ा उदास।।

पत्र भेज यमराज ने, किया एक अनुरोध।
मोदी जी यमलोक में, भेजो योग प्रबोध।।
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पिता दिवस
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पिता दिवस पर जब नहीं, पिता हमारे साथ।
कोई भी नहिं थामता, अब मुश्किल में हाथ।।

पिता दिवस पर याद में, आँखें सूनी आज।
आशीषों की छाँव बिन, सभी अधूरे काज।।

पिता दिवस पर हैं दुखी, मम प्रियवर यमराज।
सभी पिता को ढ़ूँढ़ते, अपने -अपने आज।।

पिता साथ जब तक रहे, बढ़ती रही विरक्ति।
आज साथ जब ना रहे, तब उपजी आसक्ति।।

कौन पिता किसका पिता, यही पिता दर्द।
सुनकर ऐसे शब्द को, हो जाता वो सर्द।।

समय आधुनिक आ गया, मगर पिता लाचार।
बच्चे अब कहने लगे, अनपढ़ और गँवार।।

समय साथ खोने लगा, पिता शब्द का भाव।
पहले से अब वो अधिक, सहता गहरे घाव।।

बने आज जब हम पिता, समझ में आया दर्द।
पिता सदा परिवार का, होते पूरा फर्द।।

आँसू छिपा के हँस रहा, कहें पिता हम लोग।
पर कितना हम जानते, जो वो रहा है भोग।।

लड़ता रहता है पिता, अपने आप से रोज।
फिर भी पूरा कब पड़े, हम सबकी जो खोज।।

पिता को हम सब मानते, प्राणी नहीं मशीन।
बस हर पल चलता रहे, बिना हुए ग़मगीन।।
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दमन
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इच्छाओं का अब दमन, लगता मुश्किल काम।
नव पीढ़ी में दंभ का, फैल रहा आयाम॥

दमन हीन की भावना, छोड़ बढ़े जो लोग।
सच मानो पथ छोड़कर, भाग गया है रोग।।

हर कोई कहता फिरे, दमन हमारा रोज।
नाहक राग अलापते, करते मृग की खोज।।

लोभ-मोह का कर दमन, बन क्या है संत।
जीवन का तो एक सा, होना सबके अंत।।

दमद द्वीव गोवा चलें, घूम के आएँ आज।
मोदी जी ने दे दिया, नया पर्यटन ताज।।

आज योग्यता को नहीं, पूरा मिलता मान।
बच्चे जीवन त्यागते, बन बेबस अज्ञान।।

बिना योग्यता कूदकर, नेता बनते लोग।
यही बड़ा दुर्भाग्य है, देश रहा है भोग।।
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पद
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पद पाकर मद ना करें, यही संत दें सीख।
आज मिला कल छूटना, झूठा है पद भीख।।

मातु-पिता पद में बसा, सारा सकल जहान।
कलयुग में सबसे बड़ा, सीख लीजिए ज्ञान।।

पद रज चाहें देवता, ब्रह्मा विष्णु महेश।
मानव कैसे पा सके, हरि के पद का देश।।

ब्रह्मा विष्णु महेश का, पद रज चाहें देव।
पर मानव है चाहता, हमको मिले स्वमेव।।

पद का भला घमंड क्यों, करते हैं हम-आप।
इसीलिए तो हो रहा, हमसे ढेरों पाप।।

पद पाकर मोदी बने, भारत राष्ट्र प्रधान।
पर करते ना वो कभी, निज पद का अभिमान।।
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रोया होगा काल
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पाप धरा जब भी बढ़ा,चीख उठा आकाश।
रोया होगा काल भी, होता देख विनाश।।

वज्र पड़ा जब न्याय पर, मौन हुआ संवाद।
रोया होगा काल भी, करूणा का अपवाद।।

देखा होगा जल मरे, जो पंद्रह मासूम।
रोया होगा काल भी, दृश्य देखता घूम।।

कल की घटना देखकर, रोया होगा काल।
शर्म उसे भी आ रही, पर क्या करे बवाल।।

स्वार्थ लोभ के चक्र ने, लीले पंद्रह लाल।
बेशर्मी नित देखकर, रोया होगा काल।।

नयनन जिम्मेदार के, हुआ मोतियाबिंद।
रोया होगा काल भी, संग बोल जयहिंद।।

काल क्रूर जब देखता, जग का हाहाकार।
रोता होगा तब स्वयं, होकर वह लाचार॥

कालचक्र जब थम गया, सुनकर क्रंदन तान।
रोया होगा काल भी, तज कर निज अभिमान॥

सुधीर श्रीवास्तव

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लघु कथा
यमराज का इंतजार

आज सुबह-सुबह मित्र यमराज ने फोन करके बताया कि वह आ रहा है और नाश्ता हमारे साथ ही करेगा।
मैंने कहा - स्वागत है तेरा।मगर जल्दी आना
.....और उसके बाद मैं दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर उसका इंतजार करने लगा। इंतजार करते-करते दोपहर हो गई मगर तब भी जब वह नहीं आया, तो मैंने उसको फोन लगाया, तो उसका फोन बंद आया। अब मुझे गुस्सा भी आने लगा।
फिर भी उसका इंतजार करने के अलावा और मेरे पास कोई विकल्प भी नहीं था। क्योंकि ऐसा वह कभी-कभी ही करता है और जब कहता है, तो समय पर आता की इसलिए मुझे थोड़ी चिंता भी होने लगी और जिसके कारण मेरा बीपी और शुगर दोनों अपना रंग दिखाने लगे । यह देखकर श्रीमती जी ने पहले तो मन की भड़ास निकाली और फिर यमराज को कोसते हुए मेरे मित्र डॉक्टर के पास ले गईं। मुझे देखते ही मित्र बोला- क्या हुआ तुझे मैंने कहा कुछ नहीं यार! बस वह यमराज का इंतजार करने के चक्कर में अभी तक सुबह से भूखा बैठा हूँ।
मेरी बात सुनकर डॉक्टर दोस्त ठहाका मारकर हँसा। श्रीमती जी का चेहरा और सवालिया हो गया।
डॉक्टर बोला - "भाभी जी, हुआ ये कि सुबह-सुबह यमराज खुद मेरे क्लीनिक आ धमका। कहने लगा 'तेरे दोस्त के यहाँ नाश्ते का न्योता है, पर पहले तुझे चेक कर लूँ। कहीं उसके बीपी-शुगर की वजह से मेरा प्रोग्राम ही न बिगड़ जाए।'"
मैं चौंका - "क्या? वो तो मेरे घर आया ही नहीं?"
"नहीं भाई", डॉक्टर ने मेरी रिपोर्ट देखते हुए कहा, "वो सीधा मेरे पास आया। बोला - 'तेरा दोस्त मेरा इंतजार सुबह से भूखा बैठा है। जरा देख तो, कहीं इंतजार में ही ऊपर न आ जाए। फिर तो मेरा आना बेकार चला जाएगा।'"
श्रीमती जी ने घूरकर मुझे देखा - "तो सुबह से भूखे बैठे हो, और यमराज से मिलने की इतनी जल्दी?"
मैं झेंप गया - "अरे वो मित्र है अपना... जब कहता है आता हूँ, तो आता है। बस आज लेट हो गया।"
डॉक्टर ने दवा लिखते हुए कहा - "सुन बे, यमराज का फोन आया था अभी। कह रहा था 'तेरे दोस्त को बोल दे, नाश्ता मैंने तेरे क्लिनिक पर ही कर लिया। उसके बीपी-शुगर देखकर मेरा पेट भर गया। अब मैं चलता हूँ। उससे कहना, अगली बार खा-पीकर मेरा इंतजार करे। भूखे पेट मैं किसी को नहीं ले जाता - मेरा भी उसूल है।'"
हम तीनों हँस पड़े। श्रीमती जी बोलीं - "चलो, शुक्र है यमराज भी उसूलों वाला निकला। अब घर चलो, पहले खाना खाओ। इंतजार बाद में कर लेना।"
मैं मन ही मन सोच रहा था - कभी-कभी इंतजार जान बचाता है, और कभी-कभी यमराज खुद इंतजार करवा कर जान बचा देता है।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद

सारा जग परिवार हमारा।
अब कैसा चाहें विस्तारा।।
धन वैभव जब काम न आये।
निज परिवार साथ हो जाये।।

ऊँच नीच सब व्यर्थ की बातें।
जीवन की कलुषित सौगातें।।
जग परिवार एक आधारा।
इसमें खुशियां बने सहारा।।

भेदभाव जब कुंठित करता।
तब प्राणी खुद भी डरता।।
छोटे-बड़े सभी हैं इसमें।
अपनापन भी होता सबमें।।

जब हम सबको अपनाएंगे।
खुशियाँ जीवन भर पायेंगे।।
सबका बनिए आप सहारा।
बने रहोगे जग का प्यारा।।

सुधीर श्रीवास्तव

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यमराज की राम जी को सलाह
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आज रात प्रभु श्रीराम जी
अभी अपने शयनकक्ष में पहुँचे ही थे
कि पीछे से यमराज भी पहुँच गए,
उन्हें देख राम जी चौंक गए और आने का कारण पूछा -
पहले तो यमराज ने प्रभु को साष्टाँग प्रणाम किया
फिर बिना किसी भूमिका का कहने लगा-
प्रभु! मुझे आपसे शिकायत है
लगता है अपने नए निवास में आकर
आप कुछ आलसी हो गए हैं,
बस! इसीलिए कुछ ध्यान भी नहीं दे पा रहे हैं।
आपके इसी निवास क्षेत्र में चंदा चोरी के खेल हो रहे हैं
और आपको कुछ पता ही नहीं चल पा रहे हैं।
क्या आपके गुप्तचर नकारा हो गए हैं,
या वे सब खुद ही इस चोरी-बेईमानी में शामिल हो
अब आपको भी गुमराह कर रहे हैं।
प्रभु! मेरी सलाह मानिए ,
संकोच छोड़कर सबसे पहले अपने लिए
एक दिन का साप्ताहिक अवकाश घोषित कीजिए,
भेष बदलकर राज्य का भ्रमण कीजिए
वास्तविकता से सीधे रुबरू होइए,
कभी-कभी थकावट के बहाने एकांत में आकर
औचक निरीक्षण का विकल्प भी तय कीजिए।
आपके मंदिर परिसर में ही
जब आपके सिपहसालार राजकोष लूट रहे हैं,
आपकी प्रजा के भरोसे का खून कर रहे हैं
और आप हैं कि बस मज़े से सिर्फ दर्शन दे रहे हैं।
पता नहीं कुछ खा पी भी रहे हैं
या उसमें भी संकोच कर भूखे रह रहे हैं।
ये मैं नहीं आपकी प्रजा भी कह रही है,
सच कहूँ तो रो रही है
बस! आपसे कहने का साहस नहीं कर पा रही है।
वैसे यदि आपको ये सब मुश्किल
और मेरा सुझाव औचित्य हीन लग रहा हो
तो फिर दूसरे विकल्प पर विचार कीजिए
पूरे मंदिर परिसर की देख-रेख और
हिसाब-किताब का जिम्मा तत्काल मुझे दे दीजिए,
और आप सिर्फ भक्तों को दर्शन दीजिए,
मुस्कराइए और चैन की नींद सोइए।
विश्वास कीजिए! मैं सब संभाल लूँगा,
हर दिन का रिपोर्ट कार्ड आपको भेजता रहूँगा
चंदा, जेवर तो छोड़िए एक पत्ता भी चोरी नहीं होने दूँगा
अपने दूतों का पहरा लगा दूँगा
अपने यार को अपना सलाहकार बना
सारा पक्का इंतजाम कर लूंगा,
उसके बाद भी यदि कोई दिक्कत मुझे महसूस हुई
तो सीधे आपके पास आ जाया करुँगा।
अब आप विचार करो या क्रोध में आकर
मुझे दंडित कर अपने मन को शांत करो
यह आपका एकदम निजी मसला है
पर चंदा चोरी का मामला सीधे आपके भक्तों से जुड़ा है,
अब फैसला आपको अभी करना है
या फिर थोड़ा समय लेना है,
यह निर्णय आपको चाहे आज या फिर कल में करना है,
पर मेरी क्या अपने भक्तों की भावनाओं का
अटूट सम्मान तो सुरक्षित रखना ही है।
फिलहाल अब मुझे भी आप से विदा लेना है,
क्योंकि ढेर सारा अधूरा काम भी पूरा करना है।
मेरा प्रणाम स्वीकार कर आशीर्वाद दीजिए,
मेरा नियुक्ति पत्र तैयार कर यथाशीघ्र
भिजवाने का गंभीरता से विचार कीजिए,
अपनी जय-जयकार कीजिए,
कम से कम आप भी तो एक बार
मेरे साथ जय श्री राम बोलिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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नारा / स्लोगन - योग दिवस
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- इक्कीस जून विशेष है। आज योग परिवेश है।।

- योग सभी घर-घर पहुँचाओ, व्यर्थ बहाने नहीं बनाओ।।

- हर प्राणी जब योग करेगा।भारत तभी निरोग बनेगा।।

- काम संग है योग जरूरी।तभी हमारी बातें पूरी।।

- रखना हमें तनाव से दूरी। योग सभी के लिए जरूरी।।

- स्वस्थ हमें यदि रहना होगा। रिश्ता योग से रखना होगा।।

- दवा नहीं योग अपनाओ। कभी चिकित्सक पास न जाओ।।

- गाँव-गली अभियान चलाओ।योग ज्योति प्रकाश फैलाओ।।

- हर आँगन योग की शाला, हर जीवन तब हो खुशहाला।।

- वसुधैव कुटुंबकम का आधार, योग करे सारा संसार।।

- योग नहीं कोई मजबूरी।सेहत सबकी बहुत जरूरी।।

- सेहत तो हम सबका धन है।योग बड़ा बहुमूल्य रत्न है।।

- स्वस्थ जीवन का ये है योग। सबको रहना सदा निरोग।।

- बाधाएं जीवन में जितना। पास योग के रहना उतना।।

- योग सूत्र दे मधुरिम जीवन। खुशहाली हो आप सजीवन।।

सुधीर श्रीवास्तव

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यमराज की गरिमा
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अभी-अभी मित्र यमराज मेरे पास आकर कहने लगा-
प्रभु अब आप ही कुछ कीजिए
मेरा न सही तो राम जी की ही गरिमा का ख्याल कीजिए
और पूरी गरिमा के साथ
राम मंदिर में चंदा गणना के काम का
मुझे इंचार्ज बनवा दीजिए।
मैं इन बेवकूफों की तरह चोरी नहीं करुँगा,
राम जी की बात छोड़िए
अपनी गरिमा का पूरा ख्याल रखूँगा,
एक पैसा भी चोरी नहीं होने दूँगा
और जो करना भी होगा, वो सिर्फ मैं ही करुँगा
उसका सारा प्रबंध यमलोक में और आपका कमीशन
पूरी ईमानदारी से बैंक भिजवाता रहूँगा।
भरोसा रखिए कभी पकड़ में नहीं आऊँगा।
चाहे जितनी जाँच एजेंसियाँ लग जाएँ
कभी कुछ नहीं कर पायेंगी,
मेरा या मेरे परिवार के नाम का बैंक खाता,
चल अचल संपत्ति का कोई रिकार्ड भी नहीं पायेंगी।
क्योंकि मैं तो यमलोक में आपके नाम से
एन जी ओ चलाकर आपको भी बचाऊँगा,
दोनों जमकर मौज करेंगे,
समय - समय पर राम जी से मिलकर
उनका भी हालचाल लेते रहेंगे,
चोरी का पूरा हिसाब उनको भी देते रहेंगे
इस तरह उनके कोप से भी बचें रहेंगे।
बस! अब आप कुछ जुगाड़ करो
योगी -मोदी से काम न बने, तो सीधे राम जी से मिलो
राज की बात प्यार से समझाओ
चंदा चोरी से बचाने के लिए मेरा नाम सुझाओ।
निश्चित मानो अपना काम हो जाएगा
कल से चंदा गणना का काम
जब हमारी आपकी टीम के हाथ आ जायेगा,
भविष्य के लिए चंदा चोरी का अस्तित्व ही मिट जायेगा,
तब सनातनी आस्था पर कोई सवाल भी नहीं उठाएगा,
राम जी का सारा तनाव भी दूर हो जाएगा
अब तक की चोरी का सारा धन, जेवर-गहना
मेरी टीम द्वारा खोजकर वापस ले आया जाएगा,
प्रभु राम और सनातन का नाम कैसे भी हो
बदनाम तो नहीं होने दिया जाएगा,
तब हमारे साथ आपकी भी गरिमा का स्तर
ऊँचा.... बहुत ऊँचा हो जायेगा।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा मुक्तक - देश
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गर्व सदा हो आपको, अपना मानो देश।
जैसा अपना राष्ट्र है, अब वैसा परिवेश।
मनन आप भी कीजिए, देवें ये सौगात-
माथ राष्ट्र का उच्च हो, दूर रहे सब क्लेश।।

लोकतांत्रिक देश है, भारत की पहचान।
हम चुनते सरकार हैं, अपना देश महान।
विश्व पटल के शिखर पर, चढ़ता जाता राष्ट्र-
नित्य नई उपलब्धियाँ, करतीं इसका गान।।

देश भक्ति की भावना, करते सब गुणगान।
पावन मंगल साधना, बनी हुई पहचान।
अर्थ धर्म के संग में, संवेदना सुचार-
योग्य नेतृत्व हाथ में, दुनिया करें बखान।।

सुधीर श्रीवास्तव

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विश्व रक्तदाता दिवस (१४ जून)
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आज विश्व रक्तदाता दिवस हैं
यह हम आप सब जानते हैं,
पर विचारणीय है कि कितना इसका मान बढ़ाते हैं,
रक्तदान की सार्थकता को कैसा आयाम देते हैं?
रक्त की कमी से जाने कितने दम तोड़ देते हैं
कितने परिवार बिखर जाते हैं
कितनों के अपने पारिवारिक सदस्य
माता-पिता, बेटी, बेटा संसार छोड़ जाते हैं
कितनों के बुढ़ापे की लाठी टूट जाती है
कितनी माँओं की गोद सूनी हो जाती है
कितनी सुहागनों की माँग उजड़ जाती है।
जाने कितने बच्चे अनाथ हो जाते हैं
तो जाने कितने परिवारों के आधार ही बिखर जाते हैं।
यह भी हम आप जानते हैं
आये दिन देखते, सुनते, पढ़ते भी हैं
अपने और अपनों को बचाने की खातिर
रक्त की पूर्ति के लिए जी जान लगा देते हैं
खुद ही नहीं परिवार के लोग, इष्ट-मित्र तक
आगे बढ़कर रक्तदान भी करते हैं।
मगर क्या हम विचार भी करते हैं
जो असहाय हैं, रक्त की तलाश में निराश हो जाते हैं
अपनों को अपने सामने
दम तोड़ते देखने को विवश होते हैं।
उनके लिए हम क्या कर सकते हैं?
और क्या कुछ करते हैं?
तर्क वितर्क कुतर्क छोड़िए
और सब अपनी नैतिक जिम्मेदारी के प्रति गंभीर होइए
रक्तदाता दिवस मनाएँ या बिल्कुल न मनाएँ,
मगर रक्त को एक अटूट जन- आंदोलन बनाएँ
सिर्फ एक दो दिवस नहीं, हर दिन अनवरत चलाएं।
रक्त के अभाव में किसी एक के भी प्राण न जाने पाए
हम सब मिलकर ये सौगंध उठाएँ।
तभी आज के दिवस की सार्थकता होगी,
जब किसी के प्राण रक्त के अभाव में नहीं छूटेंगे,
तब हमारा-आपका ही नहीं
राष्ट्र और समूचे विश्व का सिर ऊँचा उठेगा,
जब रक्तदाता दिवस के अलावा भी
रक्त का भंडार कहीं भी, कभी भी,
हर जरुरतमंद के समय पर काम आयेगा
किसी को नव प्राण देकर उसका घर परिवार बचायेगा,
किसी के बुढ़ापे की लाठी नहीं टूटेगी
किसी की गोद नहीं सूनी होगी
किसी की माँग नहीं उजड़ेगी
एक भी बच्चा अनाथ नहीं होगा
किसी का आँगन सूना होने से बच जायेगा,
तब ये विश्व रक्तदाता दिवस भी मुस्कराएगा
अपनी सार्थकता पर इतराएगा
हम सबका आभार धन्यवाद कर खुशी के गीत गायेगा।

सुधीर श्रीवास्तव

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