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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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दोहा मुक्तक

कभी आप मत कीजिए, जानबूझकर पाप।
नाहक लेने से भला, दूर रहे संताप।
समझदार हो खुद बड़े, फिर भी देता सीख-
अच्छा होगा आप हित, करो नाम प्रभु जाप।।

दसकंधर ने था किया, हर सीता को पाप।
चढ़ा लिया निज शीश पर, बस दंभी संताप।
पाया अपने कर्म का, इक दिन ऐसा दंड-
जिसे आज दुनिया कहे, नारी का अभिशाप।।

आज मनुज के शीश पर, नृत्य करे संताप।
धैर्य भला अब है किसे, बस हो जाता पाप।
रहते इतने चूर हैं, जैसे वो ही श्रेष्ठ -
जाने क्यों इंसान का, उच्च शिखर पर ताप।।

भय का भार हटाइए, रखिए उत्तम भाव।
उल्टी पुल्टी सोच से, मन में होता घाव।
भय देता है आपको, सदा दुखद आधार- आप निशाचर मानकर, मानो मेरा सुझाव।।

सारी दुनिया इन दिनों, रही युद्ध से काँप।
भय का जो प्रभाव है, उसका क्या है नाप। जैसे-तैसे कट रहे, हम सबके दिन आज- इसके कारण नित्य का, रहे अधूरा जाप।।

भीड़ तंत्र की ओट में, सीमा लाँघें लोग।
आज देश में देखिए, फैल रहा ये रोग।
संविधान के संग में, भूल रहे निज कर्म-
अपराधी भी आजकल, लगा रहे अभियोग।।

ये वसुधैव कुटुंबकम्, देता नेक विचार।
मिल-जुलकर रहिए सभी, भाई-चारा सार।
जिसको दुनिया कर रही, हर्ष सहित स्वीकार-
प्राणी सब संसार के, मिला-जुला परिवार।।

मिलकर सभी जगाइए, जग में सुखदा भाव।
नहीं किसी को दीजिए, छोटा सा भी घाव।
दे वसुधैव कुटुंबकम्, शुभता का संदेश -
देना है तो दीजिए, कोई नया सुझाव।।

साहस से ही सभी के, पूरे होंगे काम।
भय को दोषी मानकर, करो नहीं बदनाम।
सोच समझकर कीजिए, निर्णय सारे आप-
छिपकर ओट में मित्रवर, मत टकराओ जाम।।

भय का अपना है अलग, नीति -नियम सिद्धांत।
उसको खुद पर गर्व है, वही बड़ा वेदांत।
चक्रव्यूह में जिसे भी, भय लेता है फाँस-
वही सुनाता सभी को, असफल अपना वृतांत।।

जो डर-डर कर जी रहे, करते निज गुणगान।
अपनी क्षमता का उसे, होता कहाँ है भान।
लीला भय की गा रहे, कहते मेरा यार-
कोचिंग में अब छात्र भी, बाँट रहे हैं ज्ञान।।

मौसम भी दिखला रहा, तरह-तरह के रंग।
प्राणी जन बेचैन हैं, होते रहते दंग।
पर दोषी हम आप हैं, मौसम का क्या दोष-
जल जंगल संग धरा को, करते निशदिन तंग।।

अंतर्मन के द्वंद्व का, समझ रहा हूँ राज।
यह तो मेरे मूल का, बस थोड़ा सा ब्याज।
चिंता इतनी मात्र है, बांटूँ किससे दर्द-
सब अपने ही स्वार्थ में, दिखें सजाए ताज।।

आज त्याग की बात भी, सपनों जैसी रात।
क्योंकि इसकी आड़ में, होते नित प्रतिघात।
अब तो ये बकवास है, शेष महज अपवाद -
त्याग दूर की भावना, रखिए भीतर जज़्बात।।

हिंसा और चुनाव तो, दोनों मिलकर साथ।
जब चुनाव का समय हो, थामें दूजा हाथ।
सरकारें भी क्या करें, रहती हैं हलकान-
हर चुनाव में ही सदा, जनता पीटे माथ।।

देख रहा हूँ आजकल, धोखा देते लोग।
जिनको अपना कह रहे, वही बने हैं रोग।
व्यर्थ आप हम मानते, करें खूब विश्वास -
कहें मित्र यमराज जी, मत मानो संयोग।।

करते रहिए चिंतन मनन, नित्य नियम से आप।
पीछे अपने कर्म से, शीश चढ़ाया पाप।
अपराधी भी स्वयं को, मान कीजिए न्याय-
नहीं किसी का दिल दुखे, दूर रहे अभिशाप।।

चिंता चिंतन संग में, रहना चाहें साथ।
दोनों ही हैं चाहते, थामे रहना हाथ।
जिम्मेदारी आपकी, दूर रहे टकराव -
नाहक ही क्यों पीटना, कल में अपना माथ।।

अंतर्मन में क्यों भला, भीतर इतना घाव।
जिससे इतना हो रहा, रहता नित्य स्राव।
मित्र बात यमराज की, रखिए थोड़ा मान-
रखिए अंतर्मन सदा, मानवता सद्भाव।।

अंतर्मन से वो सदा, रहती शीश सवार।
सबसे ज्यादा करे भी, हमको प्यार दुलार।
छोटी है तो क्या हुआ, लड़ती भी है खूब -
मात-पिता के बाद से, वही आज आधार।।

अपनी खिचड़ी पक गई, आओ खाएँ यार।
फिर मिलकर हम भी करें, आपस में तकरार।।
समय-समय की बात है, कहें मित्र यमराज -
किस्मत भले ही सो रही, चलना है उस पार।।

सब कुछ लिखा किताब में, जीवन का हर सार।
अगर पुस्तकें पढ़ लिया, सारी बाधा पार।।
हर मानव को चाहिए, पढ़े पुस्तकें नित्य -
इतने भर से मान लो, देंगी जन को तार।।

मानव अपने कर्म से, खींचे नई लकीर।
भाग्य भरोसे जो रहे, रहता सदा फकीर।
स्वयं विधाता आप हो, उठो चलो रख धैर्य -
खुद पर यदि विश्वास हो, लिख दो जगत नजीर।।

मानव का कृतित्व, रही मिट जैसे धरती।
क्या होगा अस्तित्व, ताल पोखरा जलती।।
कहें मित्र यमराज, बचाना जंग का जीवन-
करो सभी मिल आज, वृक्ष जीवन में भर्ती।

भले मिटे संसार, नहीं सुधरेगा मानव।
जैसे अत्याचार, बना है इंसाँ दानव।।
दें मानव को शाप, त्रस्त हैं सारी दुनिया-
धरती है बैचैन, देखकर रोती मुनिया।।

अब कितना अपनत्व है, देख रहे हम आप।
अपनेपन की आड़ में, बढ़ता जाता पाप।।
कहें मित्र यमराज जी, ऐसा क्यों है आज-
हर प्राणी के हृदय जो, इतना है संताप।।
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मुक्तक सरसी छंद
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अब जीवन की हर मुश्किल से, मैं ही तुझे बचाऊँगा।
तुझे छोड़कर मेरी बहना, कभी न मैं जा पाऊँगा।।
मेरा परिचय सिर्फ एक है, केवल तेरा नाम लिखूँ-
अब तो लक्ष्य एक है केवल, इतिहास नया बन जाऊँगा।।

सुधीर श्रीवास्तव

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विश्व पूस्तक दिवस 
फायकू
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पुस्तकें फैलाए जीत में 
ज्ञान का प्रकाश
तुम्हारे लिए।

पुस्तकें प्रकाशित करती हैं
जीवन राह दिखातीं 
तुम्हारे लिए।

सबसे अच्छी साथी हैं 
जानना जरूरी है 
तुम्हारे लिए।

मत उपेक्षित कीजिए कभी
वरना पछताना पड़ेगा 
तुम्हारे लिए।

जीवन का मजबूत आधार 
होती हैं पुस्तकें 
तुम्हारे लिए।

दिवास्वप्न से बाहर निकलो
पुस्तकें द्वारे आईं 
तुम्हारे लिए।

भ्रम का शिकार बनना 
करना पश्चाताप कल
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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विश्व पूस्तक दिवस (23 अप्रैल)
आइकू
******
पुस्तकें
फैलाती हैं
ज्ञान का प्रकाश
हम सबके जीवन में।

साथी
होती पुस्तकें
हमारे जीवन की
सबसे सच्ची दोस्त होतीं।

पुस्तकें
मौन होकर
निस्वार्थ भाव से
जीवन भर साथ निभाती।

जिसने
नहीं समझा
पुस्तकों का महत्व
पछताता है जीवन भर।

सीखिए
सम्मान देना
पुस्तकों को हमेशा
ये पूरी पाठशाला है।

जीवन
आइना बनेगा
पुस्तकों की बदौलत
अनुभव करने की जरूरत।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - कहें सुधीर कविराय
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माना मैं तो मूढ़ हूँ, तुम हो गुणी महान।
दिया मित्र यमराज ने, मुझे मुफ्त का ज्ञान।।

ऐसा क्यों अब हो रहा, लोगों का व्यवहार।
जिसमें अपनापन नहीं, निष्ठुर प्रेम, दुलार।।

मर्यादाएं मर रहीं, देख रहा है कौन।
दोषी भी हम आप हैं, इसीलिए तो मौन।।

रिश्तों में भी दिख रहा, भेदभाव पुरजोर।
शर्मसार कलयुग कहे, अंधकार घनघोर।।

कलयुग को दोषी कहें, बड़े गर्व से लोग।
नीति नियम सिद्धांत को, मान रहे जो रोग।।

जीवन के इस दौड़ में, हाँफ रहे लोग।
पीछा नहीं है छूटता, बढ़े नित्य नव रोग।।

माया के इस जाल में, उलझा है इंसान।।
जीवन के घुड़दौड़ में, किसे याद भगवान।।

आप भरोसा कीजिए, सोच-समझकर यार।
नहीं पता विश्वास के, पीछे छुपी कटार।।

ऊपर मीठा बोलते, मन में जहर अपार।।
किसके मन में क्या छुपा, वार करेगा यार।।

खंजर छुपा के दे रहे, रिश्तों को आधार।
भेद ले रहे प्रेम से, बस उनका है सार।।

आया संकट सामने, करिए सभी विचार।
कहीं युद्ध की भेंट ये, चढ़े नहीं संसार।।

आया संकट सामने, जनता है लाचार।
लाइन में हैं आमजन, गैस आस दरकार।।

सारी दुनिया युद्ध की, झेल रही है मार।
आया संकट सामने, मत करिए तकरार।।

मन का मैल मिटाइए, रहिए मिलकर साथ।
छोटी छोटी बात पर, नहीं छोड़िए हाथ।।

जिसके मन में मैल है, खुशियाँ उससे दूर।
पर बेचारे क्या करें, आदत से मजबूर।।

तन के मैल को हम सभी, हटा रहे हैं रोज।
हृदय मलिनता दूर हो, राहें भी तो खोज।।

आप सभी हम जानते, इस दुनिया का रोग।
सजे -धजे बाजार में, भाँति-भाँति के लोग।।

निर्धन है कब चाहता, कोई माने हीन।
जीवन यापन के लिए, बजा रहा वो बीन।।

सारा खेल है युद्ध का, दुनिया जाने मेल।
निकल रहा संसार का, अर्थव्यवस्था तेल।।

माहिर हैं कुछ लोग जो, समझ रहे हैं भाव।
कालाबाजारी तेल से, देते गहरा घाव।।

तेल लगाना सीखिए, बड़ी जरूरत आज।
स्वार्थ सिद्ध हो सहज ही, कठिन लगे जो काज।।

मन बेकाबू सा उड़े, पकड़े रहो लगाम।
अति उत्साही ही कहीं, जाकर गिरे धड़ाम।।

मन बेकाबू सा उड़े, चिंता की ये बात।
कैसे थामूँ मैं इसे, सोच रहा दिन रात।।

मन बेकाबू सा उड़े, बिना किसी आधार।
कहीं हाथ से एक दिन, छूटे ना पतवार।।

संहारा श्री कृष्ण ने, मामा अपने कंस।
संग सुदामा मित्रता, अमर हुआ यदुवंश।।

कृष्ण-सुदामा मित्रता, लिखा अमर आयाम।
अपने मामा कंस का, जीवन काम तमाम।।

धरती - पुत्र किसान का, बहे पसीना खेत।
फिर भी उसके लाभ की, फिसल रही है रेत।।

समय साथ बदलाव में, ढलते आज किसान।
भला मशीनीकरण से, बचा कौन इंसान।।

जो जितना धनवान है, उतना उसे गुरूर।
अपनों से ही रोज वो, होता जाता दूर।।

जो जितना धनवान है, कहे भाग्य का खेल।
कंजूसी जमकर करे, नहीं लगाए तेल।।

जो जितना धनवान है, उतना ले प्रभु नाम।
ईश कृपा सब मानकर, करता अपना काम।।

उतना ही वो रो रहा, जो जितना धनवान।
भले द्वार पर हो खड़ा, गाड़ी घोड़ा विमान।।

उतना बाँटे ज्ञान वो, जो जितना धनवान।
भले कोई कहता फिरे, ये उसका अभिमान।।

खेत और खलिहान का, सिमट रहा आधार।
इस पर भी अब ध्यान दे, जनता की सरकार।।

खेत और खलिहान में, फसलों का दरबार।
दुखी कृषक परिवार हैं, मौसम ठाने रार।।

जीवन में होता नहीं, अनायास कुछ काम।
जीवन पथ का है यही, सुख-दुख का आयाम।।

अनायास जो चाहते, मिल जाता परिणाम।
सुख-दुख जो भी हृदय में, करना पड़े प्रणाम।।

हलधर को हम मानते, रखें राष्ट्र का मान।
अन्न उगाते खेत में, इतनी सी पहचान।।

हलधर की थी कल तलक, हल से ही पहचान।
भाता इनको आज है, तकनीकी कृषि ज्ञान।।

प्रत्याशित फल हर समय, मिलना है अपवाद।
खुश रहिए जो भी मिला, दूर रहे अवसाद।।

सभी चाहते हैं सदा, प्रत्याशित परिणाम।
भले करें वो सब नहीं, नीति नियम से काम।।

ज्ञान सरोवर बह रहा, करिए डूब नहान।
हृदय मनन चिंतन करो, बनो नहीं अंजान।।

मर्यादा का दायरा, नहीं लाँघना आप।
ज्ञान सरोवर पावनी, मैला करना पाप।।

घर में करें प्रवेश जब, बाहर छोड़ें शेष।
चिंता शंका मुक्त हों, कोस दूर हो द्वेष।।

व्यर्थ अपेक्षा किसी से, देता है संताप।
आशाओं के बोझ से, हो जाता है पाप।।

नहीं उपेक्षा कीजिए, कभी सभी से आप।
कहते कवि यमराज जी, होता भारी पाप।।

छोड़ अयोध्या वन चले, पहुँचे गंगा तीर।
समझा था प्रभु राम ने, केवल मन की पीर।।

कहाँ सभी के भाग्य में, माँ का दूध नसीब।
सदा कोसते स्वयं को, क्यों हम रहे गरीब।।

तकनीकों के जाल से, बछड़ा है मजबूर।
माँ की ममता रो रही, बच्चा दूध से दूर।।

चाहे जितना आजकल, रहो धीर गंभीर।
सहना नियती आपकी, दूजा हिस्से पीर।।

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद
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भाॅंति-भाॅंति के लोग, जहाँ में दिख ही जाते।
फैले जैसे रोग, विविधता रंग दिखाते।
दुनिया बड़ी विचित्र, आप क्या नहीं जानते।
या इतना बेवकूफ, हमें हो आप मानते।।

जैसे कोई रोग, आज की दुविधा भारी।
डरें आम या खास, देखकर युद्ध जो जारी।
जाने कैसे लोग, सोच रखते हैं कैसी।
भाॅंति-भाॅंति के लोग, आपकी ऐसी-तैसी।।

इसका सबको ज्ञान, अंत में क्या आयेगा।
मिला युद्ध परिणाम, नहीं जनता भायेगा।
मानो मेरी बात, बातचीत एक रास्ता।
मानवता के नाम, सभी दे रहे वास्ता।

चाह रहे जो युद्ध, देख लो बढ़ती खाई।
चुपके चुपके चाल, रहे बन बड़के भाई।।
करता कैसे काम, नीति है कैसी तेरी।
भूलो रण की बात ,मान तू सम्मति मेरी।।

भला कहाँ अब काम, बिना नजराना होता।
जिसका फँसता काम, काम से पहले रोता।
उम्मीदों का ख़्वाब, कहाँ खो गया हमारा।
जिनके सिर पर भार, भला हो इनका सारा।।

करता युद्ध विनाश, जान सब रहे कहानी।
स्वार्थ, दंभ की जीत, मरा आँखों का पानी।
सारी दुनिया बेचैन, सोचता है हर कोई।
करे ईश अरदास, सुनूँ क्या किस्सागोई।।

लेता है नित जान, समझ में कब है आता।
ऐसा लगता आज, धरा से टूटा नाता।।
करता युद्ध विनाश, समझ लो मेरे भाई।
जन-मन की है चाह, नहीं रोये भौजाई।।

बासी रोटी चाय, कहाँ मिलता है नाश्ता।
हर घर में तो आज, रहे खा घर-भर पास्ता।।
अजब-गजब है चाल, इसी से बढ़े बिमारी।
कौन समझता यार, कहानी दुनिया सारी।।

हम तो हुए जवान,चाय रोटी खाकर के।
खड़ी हुई है दूर, करे कब अपने मन के।।
व्यर्थ सभी है आज, रहे खा दाना-पानी।
बीमारी का राज, सभी की करुण कहानी।।

मिला नहीं उपहार, सभी को हम सब जानें।
पर इतना आसान, नहीं जो इसको मानें।।
कहें मित्र यमराज, जगत की लीला न्यारी।
करते कहाँ विचार, चाह रखते त्योहारी।।

सुने कौन झंकार, हृदय में हर पल बजता।
इसकी धुन से दूर, व्यर्थ ही सबको लगता।।
कहें मित्र यमराज, समझ हम नहीं हैं पाते।
इसीलिए तो नित्य, लोग हमको ठुकराते।।

नीति नियम सिद्धांत, भूलना पड़ता है।
खुद विवेक से हीन, मान कर लगता है।।
सत्ता सुख की चाह, बनी जीवन की थाती।
करें न्याय की बात, नाचते भ्रष्ट बराती।।

होना मत मजबूर, सुनो मत आप कहानी।
छल से रहना दूर, व्यर्थ क्यों गाथा गानी।
पीतल की ले आड़, दिखाते जो हैं सोना।
जादूगरी दिखा रहे, यही सच उनका होना।।

समझेगा कब कौन, वेदना हृदय हमारी।
या फिर शायद हुई, सुप्त चेतना बिचारी।
क्यों रखते हम यार, भाव कुछ ऐसा मन में।
बढ़ता जिससे दर्द, रहे चुभ काँटे तन में।।

नीति नियम सिद्धांत, आज है कहाँ जरूरी।
नाहक ढोते आप, कौन सी है मजबूरी।
कहें मित्र यमराज, आज यदि जीना चाहें।
बदलो अब अंदाज, खोज लो नूतन राहें।।

अंर्तमन की पीर, भाव चेहरे पर आता।
इसका रौरव छंद, भले नहीं सुहाता।
कहें मित्र यमराज, मनुज की यही कहानी।
मानो प्यारे बात, सुनी जो बड़ी पुरानी।।

मन को रखिए शुद्ध, सरल ये जीवन होगा।
खुशियाँ हों भरपूर, करें जो हम सब योगा।
कहें मित्र यमराज, बोलिए मीठी वाणी।
जीवन का यह सूत्र, बनाए जग कल्याणी।।

माँ गंगा की खूब, आप सब आरति करिए।
पाप-पुण्य को भूल, खूब गंदगी भरिए।
कहें मित्र यमराज, मातु है मेरी भोली।
रहें मस्त हम आप, भाँग की खाकर गोली।।

मत समझो कमजोर, आज फौलादी बेटी।
सीमा पर तैनात, खड़ी है कसकर पेटी।।
कहें मित्र यमराज, नजर टेढ़ी मत डालो।
अबला है यह सोच, भावना शीघ्र निकालो।।

आज जहर का बीज, आप लोग मत घोलो।
बाँटों मीठी चीज, शब्द प्यारे दो बोलो।।
कहें मित्र यमराज, पड़ेगा वरना भारी।
बने नहीं नासूर, आज की ये बीमारी।।

कैसे हो विश्वास, समय अब बदल गया है ।
लगता जैसे आज, यहाँ कुछ खोया सा है।।
कहें मित्र यमराज, खेल होता ये भारी।
समझो इसका राज, साजिशें ढेरों सारी।।

धोखों का उपहार, आज मिलता अपनों से।
फिर कैसे विश्वास, करें जन-मन गैरों से।।
कहें मित्र यमराज, यही कलयुगिया लीला।
लाल हरे जो रंग, दीखते नीला पीला।।

धोखों का संसार, झेलते सब नर-नारी।
बेवकूफ वे लोग, समझते जो बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, समस्या लगती भारी।
नाहक हो हैरान, खेलना अपनी पारी।।

रस में विष मत घोल, बनो मत आप अनाड़ी।
कैसे किया विचार, बढ़ेगी अपनी गाड़ी।।
कहें मित्र यमराज, गढ़ो मत आप कहानी।
भले छिपाओ आप, मौन कह रहा जुबानी।।

मीठे बोलो बोल, सुखद आनंद मिलेगा।
रस में विष मत घोल, लाभ सब दूर रहेगा।।
कहें मित्र यमराज, बोलिए मीठी वाणी।
भव बाधा सब दूर, काम होंगे कल्याणी।।

समझा कीजै आप, ख्वाहिशों की भी सीमा।
नहीं तेज रफ्तार, तनिक चलने दो धीमा।।
कहें मित्र यमराज, कहीं पड़ जाय न भारी।
ख्वाहिश दे जब तोड़, आप से अपनी यारी।।

लू का कठिन प्रभाव, सहें हम आप थपेड़े।
सूर्यदेव जी आज, किए हैं नयना टेढ़े।
कहें मित्र यमराज, आप सब बचकर रहिए।
नहीं कीजिए दंभ, चलेंगे जीवन पहिए।।

जन सेवा के नाम, तमाशा हम हैं करते।
सबसे ज्यादा पुण्य, हमारी झोली भरते।
कहें मित्र यमराज, जगत की देखो लीला।
रोता दिखे गरीब, हुआ जब आटा गीला।।

बरसे नभ से आग, सभी पर पड़ती भारी।
हर कोशिश है व्यर्थ, विफल सबकी तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, सभी जन बचकर रहिए।
ताप समेटो आप, प्रार्थना प्रभु से करिए।।

तपन हुई विकराल, सभी व्याकुल हैं प्राणी।
सूर्यदेव का कोप, चुभे जैसे हो त्राणी।।
कहें मित्र यमराज, कर्मफल अपना पाते।
शुक्र मनाओ यार, नहीं जो लातें खाते।।

सुधीर श्रीवास्तव

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आइकू (वार्णिक छंद) - जल की कीमत
.....
छोड़िए
नादानी अब
जल की कीमत
एक -एक बूँद की।

संकट
आप खुद
पैदा कर रहे
जल की बरबादी कर।

गर्मी
फिर आई
जल संकट लेकर
आइना दिखा रही है।

वैश्विक
संकट बनेगा
पानी एक दिन
वो दिन दूर नहीं।

सावधान
लापरवाही छोड़ो
वरना तरसना पड़ेगा
जब जल रुलाएगी हमें।

सोचिए
केवल आप
कितना बर्बाद करते
उपयोग कम बेवजह बहाते।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - रिश्ता / रिश्ते

रिश्ता रखिए अपना पावन।
जीवन होगा तब मनभावन।
पड़े इसे क्यों कभी परखना।
रिश्ता ऐसा बने लुभावन।।

रिश्ता नहीं दिखावा होता।
दुख में सँबल बीज है बोता।।
रिश्ते खुशियां मिलकर बाँटें।
गलत राह पर मारे चाँटे।।

जन्म मृत्य का खेल निराला।
रिश्ता देता हमें उजाला।।
हर रिश्ते की अलग कहानी।
बतलाती हैं दादी-नानी।।

हर रिश्ता न खून का होता।
कभी इसे मानव मन बोता।।
रिश्ता विविध रंग फुलवारी।
सुख-दुख की होती है क्यारी।।

रिश्ता नहीं सदा सुख सागर।
दुख का भी ये भारी गागर।।
प्रेम भाव रिश्ते भी चाहें।
मर्यादा के साथ निबाहें।।

रिश्तों का आधार है प्यारा।
समझ रहा इसको संसारा।।
रिश्ता बिन है जगत अधूरा।
जीवन लगता जैसे चूरा।।

रिश्ता भाव बड़ा है भारी।
बहुत जरूरी इनसे यारी।।
जीवन को आयाम दें रिश्ते।
कभी बंदकर रख मत बस्ते।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - जीवन

अपना जीवन आप बनाना।
कभी नहीं बिल्कुल घबराना।।
कर्म सदा ही अच्छे करना।
मर्यादा पथ पर ही चलना।।

मात-पिता की सेवा करना।
कभी नहीं उनसे तुम लड़ना।।
मानव-धर्म पालना करना।
निंदा -नफरत से तुम डरना।।

लालच कभी न मन में लाना।
सदा सत्य पथ बढ़ते जाना।।
दुख में कभी नहीं घबराना।
सुख में आप नहीं इतराना।।

जीवन पथ बाधाएँ आएँ।
इससे नहीं कभी घबराएँ।।
काम सदा मानवता आना।
जिम्मेदारी भूल न जाना।।

जीवन की नव लिखो कहानी।
दुनिया में जाये पहचानी।।
अपनी इक पहचान बनाओ।
मान अरु सम्मान भी पाओ।।

जीवन सबका एक समाना।
फिर क्यों हमको है घिघियाना।।
जीवन मानो तो वरदानी।
मिलता नहीं मुफ्त में पानी।।

सोचो कैसे तुमको जीना।
हार-जीत का रस है पीना।।
जैसा चाहो वैसा जी लो।
सोच समझकर आगे बढ़ लो।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद (१६,११) गीतिका
आम आदमी सोच रहा है
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आया कैसा नया जमाना, देख-देखकर दंग।
कैसा हुआ आज का प्राणी, पल-पल बदले रंग।।

आम आदमी सोच रहा है, कैसे हो उद्धार।
माया बंधन झूल रहा है, चाहे प्रभु दें तार।।
ध्यान नहीं ईश्वर का करता, लालच है भरपूर।
अपनों से भी थोड़ा रिश्ता, प्रेम भाव से दूर।।

समय चक्र का खेल निराला, भला समझता कौन।
रहना चाहे आज न कोई, कभी कहाँ खुद मौन।।
कुंठा से पीड़ित है प्राणी , तजे नहीं अभिमान।
अपने को वह मान रहा है, जग में बड़ा महान।।

अच्छा नहीं सोच पाता है, चलता टेढ़ी चाल।
लीक छोडकर खुद जाता है, भले झुके निज भाल।। मर्यादा को भाव न देता, माने खुद को श्रेष्ठ।
छोटे बड़े सभी के आगे, कहता मैं ही ज्येष्ठ।।

नाहक उलझा मानव जग में, दोनों हाथ पसार।
प्रतिस्पर्धा की इस दुनिया में, लेता चढ़ा उधार।।
और सोचता है रहता वो, मेरा बेड़ा पार।
दौलत का दिमाग में कीड़ा, समझे जीवन सार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू - मजदूर दिवस
**********
मनाते हैं मजदूर दिवस
दशा पर दृष्टि
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ है मजदूर दिवस
कितना बदलाव आया
तुम्हारे लिए।

हालत मजदूर की देखी
भला समझे कितना
तुम्हारे लिए।

चिंतित रहता हमारा श्रमिक
भविष्य की चिंता
तुम्हारे लिए।

कितना कुछ कर रही
देश की सरकार
तुम्हारे लिए।
बेबस, लाचार, मजबूर वर्ग
सुविधा भी मिले
तुम्हारे लिए।

कितना कुछ हो गया
जिन्हें पता नहीं
तुम्हारे लिए।

थका हारा उम्मीद लिए
हारता नहीं सकता
तुम्हारे लिए।

माटी के सच्चे सपूत
गौरव गाथा भारी
तुम्हारे लिए।

सबका जो पेट भरते
तन मन जलाकर
तुम्हारे लिए।

तपती धूप की चिंता
कब करता वो
तुम्हारे लिए।

चिंता भला कहाँ करता
श्रमिक कभी अपना
तुम्हारे लिए।

थका हारा घर आता
कल की चिंता
तुम्हारे लिए।

देश आगे बढ़ता रहे
परिवार संग पलें
तुम्हारे लिए।

जिम्मेदारी सिखाता अनपढ़ मजदूर
बिना डिग्री के
तुम्हारे लिए।

इन्हें भी स्थायित्व चाहिए
मजबूरी नहीं अधिकार
तुम्हारे लिए।

उम्मीदों के साए में
जीने की विवशता
तुम्हारे लिए।

कर्म जिसकी पूजा साधना
अविरल बहता पसीना
तुम्हारे लिए।

इनका साथ सब देते
सिर्फ शोर करते
तुम्हारे लिए।

दिवस की जरूरत क्या
जीवन सुरक्षा चाहिए
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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