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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
(40.4k)

माता पिता की यादें
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आज जब आप दोनों हमारे साथ नहीं हैं
तब लगता है मैं एकदम अकेला हो गया हूँ,
सुख-समृद्धि, मान सम्मान के बाद भी
खुशियों को अकाल से जूझ रहा हूँ।
आज समझ में आता है आप-दोनों के होने का दम,
पर हम नासमझ, नादान तब नहीं समझ पाये,
और आज जब समझ में आता है
तब आप हमसे दूर, बहुत दूर हैं।
आपके होने भर से हर कमी पूरी हो जाती थी,
आज तो हर समय कुछ न कुछ कमी ही नजर आती है।
बच्चे बड़े हो रहे हैं, तब माँ-बाप का मतलब
हम सब अच्छे से समझ पा रहे हैं,
जो हमने आपके रहते किया
वही आज के बच्चे हमारे साथ कर रहे हैं,
बिल्कुल वैसा ही जैसा हम आपके साथ कर रहे थे।
दिन रात कोल्हू का बैल बने रहते हैं
फिर भी शिकवा शिकायतों के अंबार लगे रहते हैं,
अपने लिए समय ही नहीं निकल पाता,
ऐसा लग रहा है जीने के बजाय जीवन बस ढो रहे हैं,
या शायद माँ-बाप होने का पाठ पढ़ रहे हैं,
अपनी नैतिक जिम्मेदारी किसी तरह निभा रहे हैं।
मुँह छुपाने के लिए माँ का आँचल
और रोने के लिए सिर रखने का कंधा खोज रहे हैं,
पर अफसोस सिर्फ खुद को कोसने के सिवा
कुछ भी तो नहीं कर पा रहे हैं।
माँ- बाप क्या होते हैं, यह अब समझ रहे हैं,
क्योंकि आज जब हम खुद माँ-बाप बनकर
इसका वास्तविक अनुभव कर रहे हैं,
सच कहूँ, तब आप दोनों बहुत याद आ रहे हैं
और हम आँसू बहाते हुए तड़प कर रह जा रहे हैं,
हमारी बेबसी देखिए कि हम अपने अपराधों की
माफी भी नहीं माँग पा रहे हैं,
सिर्फ सिर झुकाकर आप दोनों के
चरणों में नमन, वंदन कर रहे हैं,
आपके साथ बीते एक-एक पल को याद कर रहे हैं
और मन-मसोस कर रह जा रहे हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - मात-पिता की सेवा

माता पिता की कर ले सेवा।
खायेगा तू मिश्री मेवा।।
मान ले प्यारे मेरा कहना।
जीवन का ये सुंदर गहना।।

सबके कहाँ नसीब में होता।
जान-बूझकर तू क्यों खोता।।
भाग्य-भाग्य की अलग कहानी।
जिसे सुनाती दादी-नानी।।

धरती पर जबसे वो लाए।
आप स्वयं को हैं बिसराए।।
बच्चों खातिर दिन भर खटते।
फिर भी कभी नहीं है थकते।।

जीवन का आधार हैं बच्चे।
कहते सदा मात-पितु सच्चे।।
समय खेलता खेल निराला।
जिसने हमको दिया निवाला।।

आई आज हमारी बारी।
बूढ़े हुए पिता महतारी।।
नहीं करो सेवा उपकारी।
कर्ज़ मुक्त कब हो संसारी।।

ईश्वर कृपा मातु-पितु साथा।
नहीं पीटिए अपना माथा।।
सबसे बड़े मातु-पित देवा।
सेवा करके खाओ मेवा।।

अपना जीवन धन्य बनाओ।
इनका दिल न कभी दुखाओ।।
सारे तीर्थ इन्हीं चरणों में।
आप बसा लो रोम-रोम में।।

यमराज मित्र का मानो कहना।
आशीषों का पाओ गहना।।
सेवाव्रती आप कहलाओ।
अपना जीवन धन्य बनाओ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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आरंभ करते हैं

आइए! नया आरंभ करते हैं
नव संकल्प का जयघोष करते हैं।
कम से कम कुछ तो नव आरंभ करते हैं
हृदय की वेदना के पार चलते हैं।
एक नया इतिहास रचते हैं
हार-जीत से कोसों दूर चलते हैं।
आशा-निराशा के लफड़े में नहीं फँसते है
अपने दम पर नींव मजबूत कर
आलीशान महल खड़ा करने का
आज और अभी से नव आरंभ करते हैं।
अपने काँधे को मजबूत करते हैं
एक जिम्मेदार पुत्र, पिता, पति और
जिम्मेदार नागरिक बनते हैं,
नव आयाम के नव आरंभ का आधार बनते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - मूल

सूद मूल से प्यारा होता।
कौन चाहकर इसको खोता।।
भला भलाई दुनिया जाने।
बात भला कब किसकी माने।।

आज मूल से कटते जाते।
करते तरह-तरह की बातें।।
सबकी अपनी है मजबूरी।
इसीलिए तो बढ़ती दूरी ।।

मूलभूत सुविधाएँ गायब।
नाहक बनो आप मत नायब।।
शासन सत्ता की मजबूरी।
कभी नहीं चाहे वो दूरी।।

मूलमंत्र है बहुत जरूरी।
चाहे जितनी हो मजबूरी।।
पथ से भटक आप मत जाना।
तर्क वितर्क से मत घबराना।।

मूल आपसे दूर न होता।
यादों का बोझा है ढोता।।
भले आप उसको बिसराएँ।
मौन अश्रु भी नजर न आएँ।।

मूलभूत सुख सुविधा चाहें।
भरना पड़े कभी न आहें।।
जिम्मेदारी नहीं उठाएँ।
औरों को दोषी ठहराएँ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - मनोरथ

करो मनोरथ पूरे मेरे।
विपदा मुझको कभी न घेरे।।
इतनी किरपा करना दाता।
मुझे नहीं कुछ भी है आता।।

करूँ न पूजा पाठ आरती।
निंदा नफ़रत मुझको भाती।।
नहीं तुम्हारे दर मैं आऊँ।
कभी न तुमको शीश झुकाऊँ।।

बुद्धि विवेक हीन हूँ भगवन।
पर उपकार भाव है तन-मन।।
जैसी मर्जी वैसा करना।
कभी नहीं मुझको है डरना।।

अपनी लीला तुम ही जानो।
चाहे जैसा मुझको मानो।।
जो मन में था सब कह डाला।
चाह मनोरथ पूर्ण निवाला।।

प्रभो! जगत की रक्षा करिए।
भाव-भक्ति मम उर में भरिए।।
सकल मनोरथ पूरे करना।
सबकी झोली खाली भरना।।

आप जगत कल्याण कीजिए।
भले हमें कुछ नहीं दीजिए।।
बात हमारी मानो दाता।
आप सकल जग प्राण विधाता।।

सुधीर श्रीवास्तव

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आयकू
(वार्णिक छंद)
(विधान -कुल चार पंक्तियाँ, क्रमशः १,२,३,४ वर्ण)
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बाहर
भीषण गर्मी
बचकर रहिए आप
नहीं तो झुलस जाएंगे।

युद्ध
पड़ रहा
विश्व पर भारी
कुछ करें मिल -जुलकर।

सुबह
आए यमराज
हमारे भरोसे भैसा
छोड़कर फ़ुर्र हो गए।

मानो
मेरी बात
मत करना तकरार
मुश्किल में होगी सरकार।

जानते
नहीं मुझको
यमराज मेरा यार
बेकार है सब हथियार।

अपने
माता- पिता
दादा -दादी संग
बनता है अपना परिवार।

संवेदनाएं
मर गई
आज मानव की
हम कहाँ जा रहे।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू - युद्ध की विभीषिका

युद्ध की विभीषिका अब
पड़ रही भारी
तुम्हारे लिए।

क्या फायदा मिलेगा बताओ
बम-बारुद फोड़कर
तुम्हारे लिए।

जरुरी अब विचार करना
युद्ध का अत्याचार
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ अब नहीं फैले
युद्ध की आग
तुम्हारे लिए।

आज सारा जहान पीड़ित
दुविधा में जीवन
तुम्हारे लिए।

भारी पड़ेगी आपकी सनक
समूची दुनिया पर
तुम्हारे लिए।

आओ कोशिश हम करें
सबका भला होगा
तुम्हारे लिए।

शब्द मौन हो गए
कहें भी क्या
तुम्हारे लिए।

युद्ध की विभीषिका का
अंत में विनाश
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद

दुख-सुख है जीवन का हिस्सा।
सबका अपना-अपना किस्सा।।
समता के तुम गीत सुनाओ।
निज जीवन गाड़ी दौड़ाओ।।

सुख-दुख जीवन के दो चक्के।
दोनों मित्र हैं गहरे पक्के।।
जिसने दुख को जीत लिया हो।
मानो जीवन आप जिया हो।।

दुख की जो परवाह न करता।
सुख में दंभ नहीं वो भरता।।
खुद जिसमें विश्वास जगा हो।
समझो जीवन आप सगा हो।।

विपदा में जो डरा नहीं हो।
संयम जिसके हृदय भरा हो।।
मुस्कानों के साथ चला हो।
समझो दुख को जीत लिया हो।।

जिसने मन को जीत लिया हो।
हर पल ही मुस्कान नया हो।।
जिसने जीना सीख लिया हो।
अमृत सम विषपान किया हो।।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद

जीवन की है कामना, प्रभु जानें हैं आप।
रोग शोक से दूर कर, मेंटें सब संताप।
मेंटें सब संताप , तनिक प्रभु कृपा कीजिए।
प्रेम भक्ति सद्भाव, हृदय मन-भाव दीजिए।
कह सुधीर कविराय, सरल हो मेरा तन-मन।
नहीं चाह कुछ और, सफल जन-मन का जीवन।।

जीवन को मत मानिए, यारों कोई खेल।
कहते संत महंत हैं, मत कहना तुम रेल।।
मत कहना तुम रेल, बड़ी मुश्किल आयेगी।
रोना हँसना साथ, घड़ी पावन छाएगी।।
कह सुधीर कविराय, यही जीवन का सावन।
हँसते रहिए आप, लुत्फ लेना है जीवन।।

सेवा अरु संकल्प का, होता है नित मान।
मन घमंड से दूर हो, इतना रखिए ध्यान।।
इतना रखिए ध्यान, इसी में अपना गौरव।
नहीं बनेंगे आप, कभी तब शकुनी कौरव।।
कह सुधीर कविराय, सदा ही खाओ मेवा।
मत कर अनुचित बात, करो तुम सबकी सेवा।।

तर्पण करते जा रहे,अपना बुद्धि विवेक।
हमको ऐसा लग रहा, काम बचा है एक।।
काम बचा है एक, बड़ी है उलझन हमको।
रोते जाते आज, याद हम करते तुमको।।
कह सुधीर कविराय, देखते हैं हम दर्पण।
आती सबकी याद, करें हम मन से तर्पण।।

साजन रहते दूर हैं, फिर भी लगते पास।
सजनी खातिर सजन ही, जीवन का विश्वास।।
जीवन का विश्वास, नहीं है दूजा कोई।
थामेगा जो हाथ, कहे किससे वो रोई।
खड़े बहुत है लोग, बोलते सब मनभावन।
उसके मन की चाह, दरश मिल जाए साजन।।

संगम तट पर आ गये, माँ गंगा के लाल।
धर्म सनातन हो गया, आज बहुत खुशहाल।।
आज बहुत खुशहाल, देख माँ गंगा माया।
जैसे सारा विश्व, उमड़ तट संगम आया।।
कह सुधीर कविराय, देख लो दृश्य विहंगम।
आप झुकाओ शीश, शीघ्र पहुंच कर संगम।।

हीरा मानव मन बने, आज यही दरकार।
मर्यादा के साथ ही, चलती कब सरकार।।
चलती कब सरकार, बाँटती खूब मलाई।
जनता भी खुशहाल, मुफ्त की खिचड़ी खाई।
नीति नियम से चलें, नहीं हो कोई पीरा।
देश बढ़े जब साथ, मगन मानव हीरा।।

आया स्वारथ दौर है, जान रहे हम आप।
होते जिसकी ओट में, तरह-तरह के पाप।।
तरह-तरह के पाप, शर्म है किसको आती।
जलती सुबहो-शाम, प्रेम से दीपक बाती।
बनी आज की रीति, समझ लो मेरे भाया।।
कलयुग चढ़कर शीश, झूमते गाते आया।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - तारतम्य

तारतम्य ही सूत्र है, हर रिश्ते का सार।
इसके बिन चलता भला, कब लंबा व्यवहार।।

मन वाणी के साथ ही, मधुरिम जीवन सार।
तारतम्य संभावना, देती नव आधार।।

तारतम्य से जोड़ना, हमें आपसी प्यार।
रिश्तो में हो मधुरता, सुंदरतम संसार।।

तारतम्य का टूटना, देता गहरा घाव।
जीवन भर अफसोस हो, इसका यही प्रभाव।।

तारतम्य का देखिए, सेना में विस्तार।
नीति नियम से दे रहे, जिसका जो अधिकार।।

आज किसे परवाह है, व्यक्ति हो या परिवार।
सभी दंभ में तोड़ते, तारतम्य का तार।।

इतने भी अभिमान में, रहें नहीं हम आप।
तारतम्य से दूर हो, करना है क्या पाप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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