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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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चौपाई - होली

सबके साथ मनाएं होली।
बोलो सबसे मीठी बोली।।
निंदा नफरत दूर भगाओ।
मन संशय होलिका जलाओ।।

रंगों का त्योहार सुहाना।
सभी गा रहे इसका गाना।।
होली का संदेश पुराना।।
मिलकर गले फाग है गाना।।

मर्यादा में खेलों होली।
बन जाओ सबके हमजोली।।
रंग बिरंगी सूखी गीली।
लाल रही या नीली पीली।।

बच्चे बूढ़े नहीं छेड़ना।
बीमारों को आप देखना।।
नहीं किसी का हृदय दुखाना।
रंग अबीर गुलाल लगाना।।

मिलकर हम हुड़दंग मचाएँ।
रंग अबीर गुलाल लगाएँ।।
प्रेम प्यार से खेलें होली।
मिश्री जैसी मीठी बोली।।

रंगों से हर गाल सजाएँ।
हिल मिलकर त्योहार मनाएँ।।
छोटों को अपने दुलराएँ।
शीश बड़ों के चरण झुकाएं।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - कहें सुधीर कविराय
***********
नूतन सूर्य उजास में, मत छोड़ो तुम आस।
सतगुरु चरनन सौंप सब, करो नवीन प्रयास।।

इसका उसका कुछ नहीं, सब कुछ प्रभु के नाम।
जैसा भी वो चाहते, करते रहिए काम।।

सभी अजनबी इन दिनों, बने हुए हैं लोग।
जबसे पीड़ित मैं हुआ, सब कहते हैं भोग।।

कल तक थी जो अजनबी, आज वही संसार।
आज लुटाती खूब है, बेटी बहन दुलार।।

हो जाते सब अजनबी, जब दुख में हों आप।
कल तक नहीं अघा रहे, कहते माई-बाप।।

फेंक रहे हैं अजनबी, प्रेम प्यार का जाल।
बहन बेटियाँ जो फँसी, गईं काल के गाल।।

अच्छा है बनकर रहें, आज आप से दूर।
कल बनकर क्यों अजनबी, रोने को मजबूर।।

ताकत जिसके पास है, उनसे डरते लोग।
यह कैसी है बेबसी, या केवल सुख भोग।।

जो हैं ताकतवर यहाँ, करें खूब अन्याय।
बड़े मजे से बैठकर, पीते दिनभर चाय।।

चाहे जैसा युद्ध हो, मरती जनता आम।
फिर भी कहते आप हैं, न्यायोचित है काम।।

युद्ध न होना चाहिए, सब मिल खोजो राह।
तभी भला है विश्व का, मौन रहे तब आह।।

मरते अक्सर नागरिक, जब भी होता युद्ध।
भूल रहे अब तो सभी, जो संदेशा बुद्ध।।

हम कितने पाषाण है, आद्र न होती आँख।
पर सबसे आगे रहें, सदा मानने माख।।

ज्ञान और विज्ञान का, अद्भुत होता मेल।
दोनों मिलकर खेलते, लाभ- हानि के खेल।।

भारत के विज्ञान का, बढ़ता नित्य प्रभाव।
शुभचिंतक खुश हो रहे, दुश्मन माने घाव।।

ज्यों ज्यों आगे बढ़ रहा, आज तंत्र विज्ञान।
उतना निर्भर हो रहा, जन जीवन अभियान।।
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यमराज मित्र के होली दोहे
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कहते हैं यमराज जी, छोड़ो रंग गुलाल।
भंग आप जमकर पियो, सारे दूर मलाल।।

भंग पिए यमराज जी, पहुँच गये दरबार।
मस्ती में कहने लगे, क्यों करना तकरार।।

पत्नी जी को देखकर, उतर गया सब रंग।
दारू बोतल हाथ में, और पिए थी भंग।।

होली में कहने लगे, मम प्रियवर यमराज।
अब तू मेरा काम कर, मुझे आ रही लाज।।

होली में करते सभी, जमकर खूब धमाल।
बूढ़े बच्चे युवा हों, सबके मुखड़े लाल।।

माथ अबीर सजाइए, प्रेम प्यार के साथ।
सभी बड़ों का पाइए, शीश अशीषे हाथ।।

रंग अबीर गुलाल से, होली खेलो आप।
मर्यादा को लाँघकर, मत करिएगा पाप।।

प्रेम प्यार से हम सभी, खेलें रंग गुलाल।
बहुरंगी इस पर्व का, ऊँचा रखिए भाल।।

होली का संदेश है, छोड़ो बीती बात।
अब से पहले जो हुआ, दादा भैया तात।।

होली की शुभकामना, आप करो स्वीकार।
रंग अबीर गुलाल का, है पावन त्योहार।।

प्रेम प्यार सद्भावना, रंगों की बौछार।
भेदभाव को भूलकर, बाँटो प्यार दुलार।।

मनभेदों को भूल कर, गले मिलें हम आप।
होली की सौगात दें, मिटा सभी संताप।।

छोटों को हम प्यार दें, संग अबीर गुलाल।
और बड़ों से लीजिए, ऊंचा करिए भाल।।

नाली में पीकर पड़े, भूल गए हुड़दंग।
हाथ जोड़कर गा रहे, डालो मुझ पर रंग।।

भंग रंग में पड़ गया, नशा हो गया दूर।
बीबी ने दौड़ा लिया, टपकाती मुख नूर।।

आपस की तकरार से, होता है नुकसान।
बंद करो तकरार अब, रहे देश की आन।।

होली का त्योहार है, खूब लगाओ रंग।
भाईचारे से रहे , भारत की पहचान।।

रंग बिरंगा आ गया, होली का त्योहार।
प्रेम प्यार सद्भाव का, अनुपम बहे बयार।।

बूढ़े बच्चे वृद्ध के, लाल गुलाबी गाल।
रंगों के त्योहार की , माया करे कमाल।।

रंग बिरंगे लोग सब, हैं मस्ती में चूर।
होली के संदेश का, मान रखें भरपूर।।

नाहक में अब मत करो, आपस में तकरार।
होली के संदेश का, आप समझिए सार।।

अर्पण अपने पाप को, दहन होलिका संग।
भक्ति रुप प्रहलाद का, पीत पावनी रंग।।

ईश कृपा से बचे थे, भक्ति प्रिए प्रहलाद।
जली होलिका स्वयं ही, था उसको उन्माद।।

जली होलिका स्वयं ही, पाक-साफ प्रहलाद।
दोनों को अपना मिला, कर्मों का प्रसाद।।

सब मिल जुलकर गाइए, रंग-रंगीला फाग।
चाहे जैसा आपका, सुरो ताल लय राग।।

मस्ती में सब गा रहे, अपने धुन में फाग।
रंग अबीर गुलाल से, सुना भैरवी राग।।

रंगोत्सव का लीजिए, आप सभी आनंद।
मर्यादा के साथ हम, करें नहीं छलछंद।।

रंगोत्सव का कीजिए, आप सभी सम्मान।
रंग अबीर गुलाल को, दें मधुरिम पहचान।।

रंगोली पर भी चढ़ा, आज संजीला रंग।
ईश कृपा इतनी रहे, रंगीला नहिं भंग।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - होलिका दहन

आओ हम होलिका जलाएँ।
भक्ति भाव की ज्योति जगाएँ।।
निंदा नफरत दंभ मिटाएँ।
अपने सारे पाप जलाएँ।।

दहन होलिका भाव समझिए।
अपने मन को पावन रखिए।।
धर्म सत्य की जीत सदा हो।
चाहे जैसी भी विपदा हो।।

विष्णु भक्त प्रहलाद को जानो।
राक्षस कुल का था पहचानो।।
पितु-सुत में कब कोई मेला।।
ईश्वर का ये सब था खेला।।

पिता दंभ में निशिदिन रहता।
ईश जाप अवरोधक बनता।।
पर प्रहलाद कहाँ कम जिद्दी।
पुत्र भला होता क्यों पिद्दी।।

हिरण्यकश्यप मारन चाहे।
पर हर कोशिश व्यर्थ बिगाहे।।
बुआ होलिका दंभी रानी।
करना चाही थी मनमानी।।

चिता एक खासा बनवाया।
भक्त दुलार गोद बैठाया।।
सेवक उसमें आग लगाए।
तव ज्वाला आकाश छुआए।।

बहुत हुआ तब हाहाकारा।
पावक जब प्रहलाद से हारा।
राखी हुई होलिका माया।
काम नहीं उसके कुछ आया।।

ईश कृपा की अद्भुत लीला।
हिरण्यकश्यप का मुँह पीला।।
ईश भक्ति की महिमा जानी।
दंभ हो गया पानी -पानी।।

दहन होलिका यही कहानी।
वही कहा जो मैंने जानी।।
सतपथ पर हम सबको चलना।
दंभी पाप घड़ा मत भरना।।

सुधीर श्रीवास्तव

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अंतिम संस्कार का ठेका
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आज सुबह से मन बड़ा खिन्न था
कुछ सोच रहा था, मगर समझ नहीं पा रहा था,
तब तक मेरी नजर यमराज पर पड़ी
आज उसने पहन रखी थी घड़ी।
मैंनें उसे अपने पास बुलाया
और घड़ी की ओर इशारा करते हुए पूछा
कहीं इनाम पाया या फिर चुरा लाया
उसने मेरा हाथ पकड़कर बैठाया और फरमाया
इस घड़ी की माया से ही तो मैं तुझे नजर आया,
पर लगता है कि नाहक मैंनें खुद को फँसाया।
मैंने झुँझलाते हुए कहा - जरा मैं भी तो सुनूँ
तू कहाँ फँस गया भाया।
यमराज ने कहा - प्रभु! समय के साथ चलना सीखिए,
कलयुग की माया को भी जानिए,
मरने से पहले अपने अंतिम संस्कार का
यथाशीघ्र अग्रिम इंतजाम कर लीजिए।
फिर आज मरो या कल कोई फर्क नहीं पड़ेगा,
अच्छा है मेरी सलाह पर अमल कीजिए
मरने से पहले हर हाल में ऐसा इंतजाम कर लीजिए।
इतना नहीं कर सकते तो मेरे भरोसे
मरने के बारे में सोचना ही छोड़ दीजिए।
मैं हड़बड़ाया - तू ये क्या बकवास कर रहा है?
भला ऐसा कैसे हो सकता है?
यमराज गुस्से से तमतमाया - यार तू निपट अनाड़ी है,
जो अपने आस-पास भी नहीं देख पाता है,
जाने कितने हैं जिनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाता है।
अर्थ की इस दुनिया में अपनों के पास अब
ऐसे फालतू कामों के लिए समय नहीं है भाया,
लाखों करोड़ों के मालिक तक को भी
किसी तरह लावारिसों की तरह गया निपटाया,
तू मेरा यार है, इसलिए तुझे समझाया।
यमराज की बात सुन मैं चौंक गया
और अपने अंतिम संस्कार का ठेका
कमीशन काटकर उसे ही दे दिया,
लावारिसों की तरह अंतिम संस्कार का
अपना छोड़, उसका डर दूर कर दिया।
आखिर वो मेरा यार है यार
उसने यार होने का फ़र्ज़ निभाया
तो मैंने भी यारी को नव आयाम दे दिया।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - होली
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आओ हम सब खेलें होली।
मुँह खोलो तब मीठी बोली।।
गुझिया पापड़ संग मिठाई।
गले लगाओ सबको भाई।।

देखो फिर से होली आई।
रंग अबीर गुलाल है लाई।।
चलो खूब हुड़दंग मचाएँ।
फगुआ होली गीत सुनाएँ।।

सावधान रह खेलो होली।
चाहे जितनी सूरत भोली।।
पिचकारी से मारो गोली।
सबकी अपनी-अपनी टोली।।

रंग अबीर गुलाल लगाओ।
हँसी खुशी सब जश्न मनाओ।।
नहीं रंग में भंग मिलाओ।
रंग रंगीला फगुआ गाओ।।

नशा मुक्त होली को रखना।
उल्टे सीधे स्वाद न चखना।।
होली का बस इतना कहना।
प्रेम प्यार सद्भाव समझना।।

रंग बड़ों को आप लगाओ।
और अबीर से मात सजाओ।।
चरण छुओ आशीषें पाओ।
होली का त्योहार मनाओ।।

छोटों को अपने दुलराओ।
रंग अबीर गुलाल लगाओ।।
अपने संग उनको ले जाओ।
होली का हुड़दंग मचाओ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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यमराज का होली हुड़दंग
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रंग भरी बाल्टी लिए मित्र यमराज
होली की बधाई, शुभकामना देने पधारे,
औपचारिक शुभकामनाओं के साथ बोले -
प्रभु! यहीं पर रंग रोगन लगाऊँ
या आप स्वयं चलेंगे द्वारे।
मैंने कहा - यमराज प्यारे,
बस हम एकमात्र तुम्हीं से हम हारे,
इसलिए अभी चल रहे हैं आपके सहारे।
तब तक श्रीमती जी कमरे में आ गईं
और सख्त लहजे में बोलीं -कोई कहीं नहीं जायेगा
मुझे सब पता है तुम दोनों का,
द्वारे जाना तो बस बहाना है,
होली की आड़ में पीना और पिलाना है,
यमलोक तक मेरी नाक कटवाना है।
फिर यमराज से सीधे मुखातिब हो कहने लगीं
सुनो प्यारे! होली मनाओ, रंग अबीर गुलाल लगाओ
आपस में गुत्थमगुत्था हो जाओ
जमकर हाथापाई करो, बस घर से बाहर नहीं जाओ,
और यदि चले भी गए तो
लौटकर यहाँ आने के बजाय सीधे यमलोक ही जाओ
गुझिया, कचरी, पापड़, मिठाई, पकवान भूल ही जाओ।
यमराज मासूमियत से बोला -
जी भाभी जी! बहुत हो गया
पहले होली का रंग लगाओ,
फिर कुछ हमको खिलाओ, पिलाओ,
और थोड़ी देर के लिए इसे भूल जाओ,
हमारी इतनी हिम्मत नहीं जो आपकी बात काट सकें
और भूखे पेट जाने की जहमत उठा सकें।
इतना कहकर उसने श्रीमती जी के गालों पर रंग लगाया
माथे पर अबीर गुलाल सजाया
और साष्टांग उनके पैरों में गिर गया।
श्रीमती जी ने पहले मेरी ओर देखा
फिर उसे उठाया, गले लगाया, पीठ थपथपाया
आशीर्वाद का पूरा गोदाम सौंप सम्मान से बैठाया
पूड़ी पकवान गुझिया पापड़ अपने हाथों से खिलाया।
बंदा बड़ा समझदार निकला -
मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहने लगा
होली का त्योहार है, भाभी जी की सरकार है
मान लें अब बस! तू ही बेकार है।
इतना सुन मुझे गुस्सा आ गया -
वाह हहहहहहह बेटा! तो तू भी दल बदलू हो गया,
यमराज हँसते हुए बोला -
आपकी कसम प्रभू! ऐसा बिल्कुल नहीं है
आप इसे कुछ भी कहें - मगर ये सब स्वार्थ की माया है,
तभी तो तेरा यार आज यहाँ आ पाया,
तुझसे यारी का यह प्यारा इनाम पाया।
इससे ज्यादा कुछ कहूँ भी तो क्या?
कि यमराज धरती पर तुझसे होली खेलने आया है?
पर दारू नहीं पी, न ही पिला पाया है
सिर्फ गुझिया पापड़ पकवान से काम चलाया है।
इतना कहकर यमराज फ़ुर्र हो गया
अपनी रंग भरी बाल्टी में दो बोतल चुपचाप छोड़ गया,
यार से ग़ज़ब की यारी प्यार से निभा गया,
सच कहूँ! तो बंदा कमाल कर गया
होली हुड़दंग बड़े सलीके से कर गया
अपने यार पर इतना तो अहसान कर गया।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - कहें सुधीर कविराय
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महाशिवरात्रि
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शिव महिमा को जानिए, या फिर शव लो मान।
बस इतना इस नाम का, मंत्र लीजिए जान।।

शिव ही शास्वत सत्य है, प्राणि मात्र का सार।
फिर चाहे जितना करो, निज कल्पित विस्तार।।

भोलेनाथ की आड़ में, नशा करें कुछ लोग।
लीला अद्भुत शिव प्रभो, मत कहिए संयोग।।

भूखे हैं शिव भाव के, और नहीं की चाह।
औघड़ दानी ने किया, माँ गौरा से ब्याह।।

जिसका आदि न अंत है, उसका है शिव नाम।
निर्मल मन जन पूजते, आप बनाते काम।।

शिव जी के दरबार में, भारी भीड़ अपार।
नीलकंठ से सब कहें, हमको भी दो तार।।

सुबह-सुबह यमराज जी, पहुँचे शिव दरबार।
शीश झुका कहने लगे, दर्शन दो सरकार।।
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नशा/सिगरेट
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बड़ी प्रिए जो आपकी, चिता बनी सिगरेट।
रोने से क्या फायदा, अंतिम है यह भेंट।।

सो‌च समझकर पीजिए, दारु शराब सिगरेट।
चाहे जितना पीजिए, नहीं भरेगा पेट।।

नशा किसी भी चीज का, देता दु:ख हजार।
सुख-समृद्धि से दूर कर, बिखराए परिवार।।

जो पीते सिगरेट हैं, बड़े मजे से नित्य।
डुबो रहे हैं आप ही, निज जीवन आदित्य।।

नशा किसी भी चीज का, होता नहीं विकल्प।
जितना जल्दी हो सके, ढ़ूँढों मित्र प्रकल्प।।
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तंग
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भाई बहनों में सदा, होती रहती जंग।
अपनों से जब दूर हों, तब रहते हैं तंग।।

मर्यादा का हो रहा, बुरा बहुत अब हाल।
उससे ज्यादा तंग है, मनुज हृदय का जाल।।

तंगहाल तो हैं मगर, उनका हृदय विशाल।
खाते हैं मिल-बाँटकर, दिखें सदा खुशहाल।।

कपड़े छोटे हो रहे, और संग में तंग।
फैशन के इस दौर के, अजब-गजब के रंग।।

अंग प्रदर्शन के लिए, कपड़े होते तंग।
और शिकायत आप से, कर्म पिता सब भंग।।
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होली
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बच्चों के हुड़दंग से, बूढ़े होते तंग।
मारपीट जब वो करें, देख-देखकर दंग।।

होली में अब वो कहाँ, पहले वाला रंग।
महँगाई से तंग है, संग मिलावट भंग।।

ननद भाभियों का नहीं, प्रेम प्यार का संग।
दोनों दिल से तंग हैं, लक्ष्मण रेखा भंग।।

होली का त्योहार है, डालो प्यारा रंग।
बूढ़े, बच्चे, बीमार को, पर मत करना तंग।।

होली के अब आड़ में, दुष्ट ढ़ूँढ़ते दाँव।
नारी होती तंग है, वो करते हैं काँव।।
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विविध
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सतगुरु सुमिरन कीजिए, हो कोई भी वार।
वही करेगा आपका, जीवन बाधा पार।।

सतगुरु सुमिरन नाम का, इतना सा है सार।
द्वंद्व छोड़ निश्चिंत हो, रखकर दूर विकार।।

सचमुच मैं पागल हुआ, समझा मैंने आज।
फिक्र किसी की क्यों करूँ, समझ गया जब राज।।

नाहक इतना ज्ञान क्यों, व्यर्थ बाँटते आप।
कलयुग का इक सार है, करो स्वार्थ का जाप।।

चलो न ऐसे मार्ग पर, जिसका ओर न छोर।
मन की वाणी भी सुनो, व्यर्थ करो मत शोर।।

कांटे पर चलिए मगर, बड़े ध्यान से आप।
चलो न ऐसे मार्ग पर, घात लगाए पाप।।

मन दुविधा में हो तनिक, चलो न ऐसी राह।
पहले खूब विचारिए, रोको मन की चाह।।

बड़ा अनूठा जन्म से, देता स्वयं प्रमाण।
हँसता है वो प्रेम से, सहत जीवन त्राण।।

गाँव भूल हम फँस गए, यहाँ बहुत है शोर।
समय हमारे पास है, चलें गाँव की ओर।।

धन वैभव यूँ ही नहीं, मिलता ये लो जान।
व्यर्थ बैठकर आप भी, नहीं खुजाओ कान।।

बिना कर्म कुछ कब मिले, मुफ्त दे रहा ज्ञान।
जानबूझ मूरख बने, या फिर हो अंंजान।।

खुशियाँ देकर वो गई, था उसका अधिकार।
आँखों में आसूँ लिए, सौंपा प्यार दुलार।।

मेरी वो है लाड़ली, मेरा जीवन सार।
ऐसा मुझको लग रहा, देगी मुझको तार।।

जिसकी मुझे तलाश थी, ईश कृपा के साथ।
आकर पीछे से रखा, मम कंधे पर हाथ।।

पहले आप उधार दो, पीछे करो तलाश।
या फिर घर बैठिए, होते रहो निराश।।

आप मदद जाकर करो, होना है बेकार।
और एक दिन आप से, वहीं करें तकरार।।

भला धरा पर कौन है, जिसको कहें अशोक।
किस माई के लाल में, सके शोक को रोक।।

कभी -कभी सच मौन हो, कहता दर्पण बात।
मानो मेरी बात या, चाहे मारो लात।।

आज जान पहचान का, होता है नुकसान।
बुद्धिमान यदि आप हैं, तभी बनेगा काम।।

आज स्वयंभू बन करें, खुद का खूब बखान।
भले शून्य से अधिक का, उन्हें नहीं है ज्ञान।।

आप कलम को दीजिए, सदा उचित सम्मान।
माँ शारद की हो कृपा, नित्य बढ़ेगा ज्ञान।।

अपना कहना सरल है, मगर कठिन अपनत्व।
काम पड़े तब गुम रहें, बक-बककारी तत्व।।

धोखों का संसार है , माथा-पच्ची व्यर्थ।
जिसे समझ इतनी नहीं, निश्चित लिखा अनर्थ।।

समय पड़े तब पूछते, वही हमारे मित्र।
बिना स्वार्थ जो खींचते, मम जीवन का चित्र।।

संत वेश धारण किए, करते ऐसे काम।
कलयुग के ये हैं सभी, कालिनेम के राम।।

शांत सौम्य स्वभाव ही, रखते संत सुजान।
व्यर्थ तमाशा मत करें, पाते अतुलित मान।।

मुखिया केवल नाम के, नहीं रहा अब भाव।
नीरस जीवन हो गया, छुपा रहे निज घाव।।

फैल रहा है जगत में, उन्मादी उत्पात।
ज्वालाएं प्रतिशोध की, चलता जूता लात।।

ज्वाला शीतल कीजिए, क्यों कर व्यर्थ विवाद।
सब मिल ऐसा कीजिए, सुखदा जिसका याद।

सतरंगी परिधान में, बच्चों का अंदाज।
अकड़ दिखाते इस तरह, जैसे हों महराज।।

भला चाहते देश का, बंद करो खैरात।
कुछ सोचो सरकार अब, नहीं खिलाओ भात।।

बेमतलब की रेवड़ी, बढ़ा रही है भार।
चाह रहा है देश भी, बाँटो मत उपहार।।

बिना शर्त के कीजिए, आप सभी व्यवहार।
बढ़े प्रेम सद्भाव भी, दूर रहे तकरार।।

शर्त सदा ही जीत की, देती हमको राह।
ऐसी शर्त से क्या भला, पैदा करती आह।।

दाना-पानी के लिए, करना पड़ता कर्म।
हर प्राणी का यही है, सबसे पहला धर्म।।

अभिमानी जन नित करें, निज का ही गुणगान।
समझ नहीं वे पा रहे, सिमट रहा है मान।।

मुखिया बनने के लिए, मची देखिए होड़।
अपने भी इस द्वंद्व में, देते रिश्ता तोड़।।

आये खाली हाथ थे, जाना खाली हाथ।
फिर भी गाना गा रहे, जन्म-जन्म का साथ।।

उस रास्ते पर मत चलो, जिसका ना हो बोध।
निश्चित ही उस राह में, आना है अवरोध।।

क्यों जाना उस राह पर, जिसका ओर न छोर।
नहीं पकड़ में आ रही, हाथ किसी के डोर।।

ज्ञान नहीं यदि आपको, चलो न ऐसी राह।
इच्छा अपने आपकी, करो दबाकर आह ।।

ऐसा रस्ता मन चुनो, जो दे तुमको घाव।
जानबूझकर व्यर्थ में, आप गिराओ भाव।।

अपने भी लगने लगे, अब तो आज सूदूर।
कलयुग का यह रंग है, या बनते मजबूर।।
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कौन निकट है आपके, बड़ा प्रश्न है आज।
सोच समझ अब लीजिए, तभी बचेगा लाज।।

बच्चे अब सुनते नहीं, मातु-पिता की बात।
अपने मन की कर रहे, रुला रहे दिन रात।।

हमने माना आपको, सदैव अपना ज्येष्ठ।
मगर कभी क्या आप भी, बनकर आए श्रेष्ठ।।

ताना हमको मारते, सब अपने ही लोग।
भला फिक्र मैं क्यों करूँ, यह सामाजिक रोग।।

अब दुनिया में दिख रहे, कैसे - कैसे लोग।
जैसे नित अब बढ़ रहे, भाँति-भाँति के रोग।।

चिंता अपनी कीजिए, करते रहिए योग।
इस चक्कर में बिन पड़े, कैसे-कैसे लोग।।

चिंता अपनी कीजिए, करते रहिए योग।
इस चक्कर में बिन पड़े, कैसे-कैसे लोग।।

कैसे -कैसे लोग अब, दूषित रखें विचार।
नीति-नियम सिद्धांत का, भूल रहे आधार।।

आप नहीं क्या जानते, राजनीति का खेल।
कैसे -कैसे लोग भी, बेंच रहे हैं तेल।।

ताना हमको मारते, सब अपने ही लोग।
भला फिक्र मैं क्यों करूँ, यह सामाजिक रोग।।

समय आड़ में कूदकर,आ जाता संयोग।
आप सोचिए ईश का, है बेवजह प्रयोग।।

मत कहिए संयोग से, बिगड़े सारे काम।
इसके पीछे आप हैं, टकराते थे जाम।।

यह कैसा संयोग है, दुनिया में उत्पात।
दुश्मन चाहें इन दिनों, कैसे हो प्रतिघात।।

कवि-लेखक के साथ में, यह कैसा संयोग।
निर्धनता अरु बेबसी, आया चला प्रयोग।।

आया समय मशीन का, यही समय की माँग।
चूक हुई तो एक दिन,सब कुछ होगा राँग।।

ए आई की शरण में, गिरे जा रहे लोग।
बहती गंगा में सभी, करें दिखावा योग।।

तकनीकों के जाल में, उलझ रहें हैं लोग।
लोग हुए बेकार अब, क्यों मानें संयोग।।

रोजगार गायब सभी, बढ़ा मशीनी जाल।
मानव नित अब हो रहा, दिनों -रात बेहाल।।

सुधीर श्रीवास्त

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चौपई - होलिका
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दहन होलिका छाया रंग।
नाच रहे हैं पीकर भंग।।
बच्चे बूढ़े सब हैं मस्त।
सभी आज लगते हैं व्यस्त।।

आगे बढ़कर आओ आप।
प्रेम प्यार का करिए जाप।।
दहन होलिका होगा शाम।
जल्दी से निपटा लो काम।।

प्रेम प्यार से खेलो रंग।
खुशियों में मत घोलो भंग।।
दहन होलिका का संदेश।
समझो मानवता परिवेश।।
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सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - जन्मभूमि
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जन्मभूमि होती अति प्यारी।
हो अमीर गरीब दुखियारी।।
जन्मभूमि की अजब कहानी।
खट्टी-मीठी बोली बानी।।

जन्मभूमि को भूल न जाना।
इसकी मिट्टी माथ सजाना।।
सदा गर्व इस पर नित करना।
वैसे भी इक दिन है मरना ।।

जन्मभूमि का समय नहीं है।
आज यहाँ कर और कहीं हैं।।
जन्मभूमि हम छोड़ रहे हैं।
इससे नाता तोड़ रहे हैं।।

जन्मभूमि की पीड़ा सुनिए।
बंशी इसके सुरों की बनिए।।
नाहक में रिश्ता मत तोड़ो।
अरे बेशरम मुँह ना मोड़ो।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई
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उसने शीश हाथ जब फेरा।
मुखमंडल मुस्कान बिखेरा।।
छोटी को इससे क्या लेना।
माँ बन खिला रही जब छेना।।

आओ मिलकर शोर मचाएं।
हंँसे हँसाएँ और रुलाएँ।।
नव जीवन सौगातें बाँटें।
भूल ही जाएँ चुभते काँटे।।

इतना तो नादान नहीं हो।
वही गलत या आप सही हो।।
व्यर्थ नहीं तकरार कीजिए।
स्वागत कर सम्मान दीजिए।।

ममता देती माँ के जैसी।
जब-तब बिल्कुल दिखती वैसी।।
फिर भी भूल नहीं तुम जाना।
हिटलर लगते उसके नाना।।

सुधीर श्रीवास्तव

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