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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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चौपाई छंद - रिश्ता / रिश्ते

रिश्ता रखिए अपना पावन।
जीवन होगा तब मनभावन।
पड़े इसे क्यों कभी परखना।
रिश्ता ऐसा बने लुभावन।।

रिश्ता नहीं दिखावा होता।
दुख में सँबल बीज है बोता।।
रिश्ते खुशियां मिलकर बाँटें।
गलत राह पर मारे चाँटे।।

जन्म मृत्य का खेल निराला।
रिश्ता देता हमें उजाला।।
हर रिश्ते की अलग कहानी।
बतलाती हैं दादी-नानी।।

हर रिश्ता न खून का होता।
कभी इसे मानव मन बोता।।
रिश्ता विविध रंग फुलवारी।
सुख-दुख की होती है क्यारी।।

रिश्ता नहीं सदा सुख सागर।
दुख का भी ये भारी गागर।।
प्रेम भाव रिश्ते भी चाहें।
मर्यादा के साथ निबाहें।।

रिश्तों का आधार है प्यारा।
समझ रहा इसको संसारा।।
रिश्ता बिन है जगत अधूरा।
जीवन लगता जैसे चूरा।।

रिश्ता भाव बड़ा है भारी।
बहुत जरूरी इनसे यारी।।
जीवन को आयाम दें रिश्ते।
कभी बंदकर रख मत बस्ते।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - जीवन

अपना जीवन आप बनाना।
कभी नहीं बिल्कुल घबराना।।
कर्म सदा ही अच्छे करना।
मर्यादा पथ पर ही चलना।।

मात-पिता की सेवा करना।
कभी नहीं उनसे तुम लड़ना।।
मानव-धर्म पालना करना।
निंदा -नफरत से तुम डरना।।

लालच कभी न मन में लाना।
सदा सत्य पथ बढ़ते जाना।।
दुख में कभी नहीं घबराना।
सुख में आप नहीं इतराना।।

जीवन पथ बाधाएँ आएँ।
इससे नहीं कभी घबराएँ।।
काम सदा मानवता आना।
जिम्मेदारी भूल न जाना।।

जीवन की नव लिखो कहानी।
दुनिया में जाये पहचानी।।
अपनी इक पहचान बनाओ।
मान अरु सम्मान भी पाओ।।

जीवन सबका एक समाना।
फिर क्यों हमको है घिघियाना।।
जीवन मानो तो वरदानी।
मिलता नहीं मुफ्त में पानी।।

सोचो कैसे तुमको जीना।
हार-जीत का रस है पीना।।
जैसा चाहो वैसा जी लो।
सोच समझकर आगे बढ़ लो।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद (१६,११) गीतिका
आम आदमी सोच रहा है
**********
आया कैसा नया जमाना, देख-देखकर दंग।
कैसा हुआ आज का प्राणी, पल-पल बदले रंग।।

आम आदमी सोच रहा है, कैसे हो उद्धार।
माया बंधन झूल रहा है, चाहे प्रभु दें तार।।
ध्यान नहीं ईश्वर का करता, लालच है भरपूर।
अपनों से भी थोड़ा रिश्ता, प्रेम भाव से दूर।।

समय चक्र का खेल निराला, भला समझता कौन।
रहना चाहे आज न कोई, कभी कहाँ खुद मौन।।
कुंठा से पीड़ित है प्राणी , तजे नहीं अभिमान।
अपने को वह मान रहा है, जग में बड़ा महान।।

अच्छा नहीं सोच पाता है, चलता टेढ़ी चाल।
लीक छोडकर खुद जाता है, भले झुके निज भाल।। मर्यादा को भाव न देता, माने खुद को श्रेष्ठ।
छोटे बड़े सभी के आगे, कहता मैं ही ज्येष्ठ।।

नाहक उलझा मानव जग में, दोनों हाथ पसार।
प्रतिस्पर्धा की इस दुनिया में, लेता चढ़ा उधार।।
और सोचता है रहता वो, मेरा बेड़ा पार।
दौलत का दिमाग में कीड़ा, समझे जीवन सार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू - मजदूर दिवस
**********
मनाते हैं मजदूर दिवस
दशा पर दृष्टि
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ है मजदूर दिवस
कितना बदलाव आया
तुम्हारे लिए।

हालत मजदूर की देखी
भला समझे कितना
तुम्हारे लिए।

चिंतित रहता हमारा श्रमिक
भविष्य की चिंता
तुम्हारे लिए।

कितना कुछ कर रही
देश की सरकार
तुम्हारे लिए।
बेबस, लाचार, मजबूर वर्ग
सुविधा भी मिले
तुम्हारे लिए।

कितना कुछ हो गया
जिन्हें पता नहीं
तुम्हारे लिए।

थका हारा उम्मीद लिए
हारता नहीं सकता
तुम्हारे लिए।

माटी के सच्चे सपूत
गौरव गाथा भारी
तुम्हारे लिए।

सबका जो पेट भरते
तन मन जलाकर
तुम्हारे लिए।

तपती धूप की चिंता
कब करता वो
तुम्हारे लिए।

चिंता भला कहाँ करता
श्रमिक कभी अपना
तुम्हारे लिए।

थका हारा घर आता
कल की चिंता
तुम्हारे लिए।

देश आगे बढ़ता रहे
परिवार संग पलें
तुम्हारे लिए।

जिम्मेदारी सिखाता अनपढ़ मजदूर
बिना डिग्री के
तुम्हारे लिए।

इन्हें भी स्थायित्व चाहिए
मजबूरी नहीं अधिकार
तुम्हारे लिए।

उम्मीदों के साए में
जीने की विवशता
तुम्हारे लिए।

कर्म जिसकी पूजा साधना
अविरल बहता पसीना
तुम्हारे लिए।

इनका साथ सब देते
सिर्फ शोर करते
तुम्हारे लिए।

दिवस की जरूरत क्या
जीवन सुरक्षा चाहिए
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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फायकू
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नियमों का नियमित उलंघन
हमारा सिद्धांत है
तुम्हारे लिए।

मान-मर्यादा भूल गए
स्वयंभू श्रेष्ठ जन
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ है आँसू बहाना
जीवन खुलकर जीना
तुम्हारे लिए।

कौन लगता आज अपना
कैसे पहचानें हम
तुम्हारे लिए।

उसने जब खूब रुलाया
तब समझ आया
तुम्हारे लिए।

चोरी की कविता से
बड़ा कवि बना
तुम्हारे लिए।

खत्म हुआ अब लिहाज
छोटे -बड़े का
तुम्हारे लिए।

बेवकूफ बनना उसकी आदत
फायदा लोग उठाते
तुम्हारे लिए।

बहुत रुलाया अब तक
बस! और नहीं
तुम्हारे लिए।

मुझे भारत रत्न मिलेगा
यमराज की भविष्यवाणी
तुम्हारे लिए।

स्वार्थ में अंधे होकर
क्या पाया हमने
तुम्हारे लिए।

हाथ जब शीश उसने
आँख भीड़ गई
तुम्हारे लिए।

यमलोक ब्रेकिंग सुनी देखी
माथा पीट लिया
तुम्हारे लिए।

इतना हैरान क्यों होना
यमराज मेरा यार
तुम्हारे लिए।

आओ जाओ याद रखो
क्रम मत छोड़ो
तुम्हारे लिए।

हारना सबसे अच्छा विकल्प
कल जीतने के लिए
तुम्हारे लिए।

नाहक पंगा क्यों लिया
हिटलर बनी बीबी
तुम्हारे लिए।

मरना चाहता जीना छोड़
सोच विचार कैसा
तुम्हारे लिए।

आ गया सुबह -सुबह
यमराज चाय पीने
तुम्हारे लिए।

कल लड़ गया यमराज
बिना बात हमसे
तुम्हारे लिए।

यार है वो मेरा
क्यों होता हैरान
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई
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उसने शीश हाथ जब फेरा।
मुखमंडल मुस्कान बिखेरा।।
छोटी को इससे क्या लेना।
माँ बन खिला रही जब छेना।।

आओ मिलकर शोर मचाएं।
हंँसे हँसाएँ और रुलाएँ।।
नव जीवन सौगातें बाँटें।
भूल जाइए चुभते काँटे।।

इतना तो नादान नहीं हो।
वही गलत या आप सही हो।।
व्यर्थ नहीं तकरार कराओ।
सदा मान- सम्मान दिलाओ।।

ममता देती माँ के जैसी।
जब-तब बिल्कुल दिखती वैसी।।
फिर भी भूल नहीं तुम जाना।
हिटलर लगते उसके नाना।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दर्द भला वो क्या जाने
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जिन पर गुजरी कभी नहीं,
दर्द भला वो क्या जाने।
जिनसे रिश्ता नहीं हमारा,
भला हमें वे क्यों मानें।

सबके अपने दर्दों की
अलग ही एक कहानी है।
आप बताओ आज हमें,
कितना सुनें और हम जानें।

बस इतना बतला दो मुझको,
क्यों आये हो हमें सुनाने।
आखिर इतनी कृपा भला क्यों
जो चलकर आये हमें बताने।

राम भरोसे रहना सीखो
सुनना नहीं किसी के ताने।
रोने से न बात बनेगी
लोग सुनाते कथा पुराने।

अनुभव पास नहीं जब तेरे,
छेड़ रहा क्यों व्यर्थ तराने।
या फिर मन में पाप है तेरे,
जो आया हमको भरमाने।

सुधीर श्रीवास्तव

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माता पिता की यादें
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आज जब आप दोनों हमारे साथ नहीं हैं
तब लगता है मैं एकदम अकेला हो गया हूँ,
सुख-समृद्धि, मान सम्मान के बाद भी
खुशियों को अकाल से जूझ रहा हूँ।
आज समझ में आता है आप-दोनों के होने का दम,
पर हम नासमझ, नादान तब नहीं समझ पाये,
और आज जब समझ में आता है
तब आप हमसे दूर, बहुत दूर हैं।
आपके होने भर से हर कमी पूरी हो जाती थी,
आज तो हर समय कुछ न कुछ कमी ही नजर आती है।
बच्चे बड़े हो रहे हैं, तब माँ-बाप का मतलब
हम सब अच्छे से समझ पा रहे हैं,
जो हमने आपके रहते किया
वही आज के बच्चे हमारे साथ कर रहे हैं,
बिल्कुल वैसा ही जैसा हम आपके साथ कर रहे थे।
दिन रात कोल्हू का बैल बने रहते हैं
फिर भी शिकवा शिकायतों के अंबार लगे रहते हैं,
अपने लिए समय ही नहीं निकल पाता,
ऐसा लग रहा है जीने के बजाय जीवन बस ढो रहे हैं,
या शायद माँ-बाप होने का पाठ पढ़ रहे हैं,
अपनी नैतिक जिम्मेदारी किसी तरह निभा रहे हैं।
मुँह छुपाने के लिए माँ का आँचल
और रोने के लिए सिर रखने का कंधा खोज रहे हैं,
पर अफसोस सिर्फ खुद को कोसने के सिवा
कुछ भी तो नहीं कर पा रहे हैं।
माँ- बाप क्या होते हैं, यह अब समझ रहे हैं,
क्योंकि आज जब हम खुद माँ-बाप बनकर
इसका वास्तविक अनुभव कर रहे हैं,
सच कहूँ, तब आप दोनों बहुत याद आ रहे हैं
और हम आँसू बहाते हुए तड़प कर रह जा रहे हैं,
हमारी बेबसी देखिए कि हम अपने अपराधों की
माफी भी नहीं माँग पा रहे हैं,
सिर्फ सिर झुकाकर आप दोनों के
चरणों में नमन, वंदन कर रहे हैं,
आपके साथ बीते एक-एक पल को याद कर रहे हैं
और मन-मसोस कर रह जा रहे हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - मात-पिता की सेवा

मात-पिता की कर ले सेवा।
खायेगा तू मिश्री मेवा।।
मानो प्यारे मेरा कहना।
जीवन का ये सुंदर गहना।।

सबके कहाँ भाग्य में होता।
जान-बूझकर तू क्यों खोता।।
सबकी अपनी अलग कहानी।
जिसे सुनाती दादी-नानी।।

धरती पर जबसे वो लाए।
आप स्वयं को हैं बिसराए।।
बच्चों खातिर दिन भर खटते।
फिर भी कभी नहीं है थकते।।

अधकचरे होते हैं बच्चे।
कहते सदा मात-पितु सच्चे।।
समय खेलता खेल निराला।
जिसने हमको दिया निवाला।।

आई आज हमारी बारी।
बूढ़े हुए पिता महतारी।।
नहीं करो सेवा उपकारी।
कर्ज़ मुक्त कब हो संसारी।।

ईश्वर कृपा मातु-पितु साथा।
नहीं पीटिए अपना माथा।।
सबसे बड़े मातु-पित देवा।
सेवा करके खाओ मेवा।।

अपना जीवन धन्य बनाओ।
इनका दिल मत आप दुखाओ।।
सारे तीरथ इन चरणों में।
आप बसा लो रोम-रोम में।।

मानो तुम भी मेरा कहना।
आशीषों का पाओ गहना।।
सेवाव्रती आप कहलाओ।
अपना जीवन धन्य बनाओ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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आरंभ करते हैं

आइए! नया आरंभ करते हैं
नव संकल्प का जयघोष करते हैं।
कम से कम कुछ तो नव आरंभ करते हैं
हृदय की वेदना के पार चलते हैं।
एक नया इतिहास रचते हैं
हार-जीत से कोसों दूर चलते हैं।
आशा-निराशा के लफड़े में नहीं फँसते है
अपने दम पर नींव मजबूत कर
आलीशान महल खड़ा करने का
आज और अभी से नव आरंभ करते हैं।
अपने काँधे को मजबूत करते हैं
एक जिम्मेदार पुत्र, पिता, पति और
जिम्मेदार नागरिक बनते हैं,
नव आयाम के नव आरंभ का आधार बनते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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