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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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फायकू - युद्ध की विभीषिका

युद्ध की विभीषिका अब
पड़ रही भारी
तुम्हारे लिए।

क्या फायदा मिलेगा बताओ
बम-बारुद फोड़कर
तुम्हारे लिए।

जरुरी अब विचार करना
युद्ध का अत्याचार
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ अब नहीं फैले
युद्ध की आग
तुम्हारे लिए।

आज सारा जहान पीड़ित
दुविधा में जीवन
तुम्हारे लिए।

भारी पड़ेगी आपकी सनक
समूची दुनिया पर
तुम्हारे लिए।

आओ कोशिश हम करें
सबका भला होगा
तुम्हारे लिए।

शब्द मौन हो गए
कहें भी क्या
तुम्हारे लिए।

युद्ध की विभीषिका का
अंत में विनाश
तुम्हारे लिए।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद

दुख-सुख है जीवन का हिस्सा।
सबका अपना-अपना किस्सा।।
समता के तुम गीत सुनाओ।
निज जीवन गाड़ी दौड़ाओ।।

सुख-दुख जीवन के दो चक्के।
दोनों मित्र हैं गहरे पक्के।।
जिसने दुख को जीत लिया हो।
मानो जीवन आप जिया हो।।

दुख की जो परवाह न करता।
सुख में दंभ नहीं वो भरता।।
खुद जिसमें विश्वास जगा हो।
समझो जीवन आप सगा हो।।

विपदा में जो डरा नहीं हो।
संयम जिसके हृदय भरा हो।।
मुस्कानों के साथ चला हो।
समझो दुख को जीत लिया हो।।

जिसने मन को जीत लिया हो।
हर पल ही मुस्कान नया हो।।
जिसने जीना सीख लिया हो।
अमृत सम विषपान किया हो।।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद

जीवन की है कामना, प्रभु जानें हैं आप।
रोग शोक से दूर कर, मेंटें सब संताप।
मेंटें सब संताप , तनिक प्रभु कृपा कीजिए।
प्रेम भक्ति सद्भाव, हृदय मन-भाव दीजिए।
कह सुधीर कविराय, सरल हो मेरा तन-मन।
नहीं चाह कुछ और, सफल जन-मन का जीवन।।

जीवन को मत मानिए, यारों कोई खेल।
कहते संत महंत हैं, मत कहना तुम रेल।।
मत कहना तुम रेल, बड़ी मुश्किल आयेगी।
रोना हँसना साथ, घड़ी पावन छाएगी।।
कह सुधीर कविराय, यही जीवन का सावन।
हँसते रहिए आप, लुत्फ लेना है जीवन।।

सेवा अरु संकल्प का, होता है नित मान।
मन घमंड से दूर हो, इतना रखिए ध्यान।।
इतना रखिए ध्यान, इसी में अपना गौरव।
नहीं बनेंगे आप, कभी तब शकुनी कौरव।।
कह सुधीर कविराय, सदा ही खाओ मेवा।
मत कर अनुचित बात, करो तुम सबकी सेवा।।

तर्पण करते जा रहे,अपना बुद्धि विवेक।
हमको ऐसा लग रहा, काम बचा है एक।।
काम बचा है एक, बड़ी है उलझन हमको।
रोते जाते आज, याद हम करते तुमको।।
कह सुधीर कविराय, देखते हैं हम दर्पण।
आती सबकी याद, करें हम मन से तर्पण।।

साजन रहते दूर हैं, फिर भी लगते पास।
सजनी खातिर सजन ही, जीवन का विश्वास।।
जीवन का विश्वास, नहीं है दूजा कोई।
थामेगा जो हाथ, कहे किससे वो रोई।
खड़े बहुत है लोग, बोलते सब मनभावन।
उसके मन की चाह, दरश मिल जाए साजन।।

संगम तट पर आ गये, माँ गंगा के लाल।
धर्म सनातन हो गया, आज बहुत खुशहाल।।
आज बहुत खुशहाल, देख माँ गंगा माया।
जैसे सारा विश्व, उमड़ तट संगम आया।।
कह सुधीर कविराय, देख लो दृश्य विहंगम।
आप झुकाओ शीश, शीघ्र पहुंच कर संगम।।

हीरा मानव मन बने, आज यही दरकार।
मर्यादा के साथ ही, चलती कब सरकार।।
चलती कब सरकार, बाँटती खूब मलाई।
जनता भी खुशहाल, मुफ्त की खिचड़ी खाई।
नीति नियम से चलें, नहीं हो कोई पीरा।
देश बढ़े जब साथ, मगन मानव हीरा।।

आया स्वारथ दौर है, जान रहे हम आप।
होते जिसकी ओट में, तरह-तरह के पाप।।
तरह-तरह के पाप, शर्म है किसको आती।
जलती सुबहो-शाम, प्रेम से दीपक बाती।
बनी आज की रीति, समझ लो मेरे भाया।।
कलयुग चढ़कर शीश, झूमते गाते आया।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - तारतम्य

तारतम्य ही सूत्र है, हर रिश्ते का सार।
इसके बिन चलता भला, कब लंबा व्यवहार।।

मन वाणी के साथ ही, मधुरिम जीवन सार।
तारतम्य संभावना, देती नव आधार।।

तारतम्य से जोड़ना, हमें आपसी प्यार।
रिश्तो में हो मधुरता, सुंदरतम संसार।।

तारतम्य का टूटना, देता गहरा घाव।
जीवन भर अफसोस हो, इसका यही प्रभाव।।

तारतम्य का देखिए, सेना में विस्तार।
नीति नियम से दे रहे, जिसका जो अधिकार।।

आज किसे परवाह है, व्यक्ति हो या परिवार।
सभी दंभ में तोड़ते, तारतम्य का तार।।

इतने भी अभिमान में, रहें नहीं हम आप।
तारतम्य से दूर हो, करना है क्या पाप।।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद - पद का मद

पद के मद में चूर हुआ जो, उससे रहिए दूर।
भूल गया वो कल तक क्या था, आज हुआ मगरूर।।

खुद को खुदा समझ बैठा है, हुआ बहुत अभिमान।
तनिक नहीं अब शेष बचा है, उसके भीतर ज्ञान।।
कल को जब ठोकर खायेगा, संग पीटेगा माथ।
कहाँ समझता आज भला वो, नहीं मिलेगा साथ।।

बँधी हुई आँखों पर पट्टी, उड़ता है आकाश।
अपने हाथों स्वयं लिख रहा, खुद के आप विनाश।।
शिकवा और शिकायत सबकी, चढ़े शीश बन पाप।। अपने पैरों मार कुल्हाड़ी, लेता है अभिशाप।।

ईर्ष्या द्वेष दंभ में प्राणी, कहाँ कभी खुशहाल।
अपनी स्वयं प्रशंसा कर ले, चलकर टेढ़ी चाल।।
हाल-चाल कोई जब पूछे, मुँह बिचकाता जोर।
नहीं किसी की वो है सुनता है, लगे व्यर्थ का शोर।।

ऐसे लोगों का नहीं भरोसा, करें मित्र हम आप।
ईश भरोसे आगे बढ़िए, मिटे सभी संताप।।
अपने पथ से आप भटककर, नहीं बदलिए रंग।
मानव जीवन की मर्यादा, मत करना तुम भंग।।

जब तक इनको समझ में आता, खट्टे हैं अंगूर।
हालत इनकी ऐसी होती, खुद कहते लंगूर।।
सत्य आइना दिखा ही देता, होता जब मजबूर।
कल तक जितना पास था इनके, आज वो उतना दूर।।

सुधीर श्रीवास्तव

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व्यंग्य - बुजुर्गों की अहमियत
*********
आज बड़े बुजुर्गो को वो अहमियत नहीं मिलती
जिसके वास्तव में वो हकदार हैं,
शायद ये कलयुग का ही प्रभाव है।
पर ऐसा केवल हम आप ही सोच सकते हैं
क्योंकि हम आधुनिकता के रंग में रंगे जा रहे हैं,
पर शायद हम यह भूल रहे हैं
कि अपने लिए गड्ढे और खाईं खोद रहे हैं।
जिस माँ बाप ने हमें पाल पोस कर बड़ा किया
बड़े बुजुर्गों ने प्यार दुलार दिया, पढ़ाया, लिखाया,
आज सफलता के इस मुकाम तक पहुँचाया।
हमारी खुशी के अपनी खुशियों का गला घोंट दिया
जाने कितने कष्ट झेले, खून पसीना सब एक कर दिया,
पर हमारे लिए सब कुछ हँसकर सह लिया।
आज जब हमारी, आपकी बारी है
तब हम उन्हें अपमानित उपेक्षित करते हैं,
उनके पास बैठकर दो चार बात तक भी नहीं करते हैं
उनकी भावनाओं का गला घोंट देते हैं,
उनकी बात सुनने के बजाय उन पर चिल्लाते हैं
तीखे व्यंग्य बाण से उनका सीना छलनी कर देते हैं,
अपनी आजादी की आड़ में उन्हें अकेला छोड़ देते हैं
और तो और वृद्धाश्रम में भेजकर हाथ झाड़ लेते हैं,
ऊपर से बुजुर्गों की अहमियत का बड़ा ज्ञान बघारते हैं
शायद इसी तरह हम सब
भारत रत्न का खिताब अपने नाम करना चाहते हैं,
क्योंकि हम अपने बुजुर्गों को अहमियत छोड़िए
भगवान से भी ज्यादा मान-सम्मान देकर
सुबह शाम पूजा पाठ करते हैं,
उनके नाम का जाप करते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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काम तो राम ही आयेंगै

काम तो राम ही आयेंगे
यह तो हम सबको पता है,
पर ज्यादा भरोसा नहीं है।
क्योंकि हम खुद को राम समझते हैं,
राम से ज्यादा खुद पर विश्वास करते हैं
यह और बात है कि रोते भी उन्हीं से हैं
रो गाकर उनकी कृपा पा लेते हैं
और धन्यवाद तक कहने में
अपना अपमान समझते हैं,
क्योंकि हम स्वार्थी और कंगाल होते हैं।
अब राम जी तो ठहरे भोले-भाले
जो इतना ध्यान भी तो नहीं देते
हमारी गुस्ताखियाँ भी बिसार देते,
अपने तो दोनों हाथ में लड्डू संग खूब मजे हैं
अपना स्वार्थ भी सिद्ध कर लेते हैं
और राम जी श्रेय भी नहीं देते हैं।
वैसे भी राम जी तो अपने हैं
ऊपर से बेचारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,
ऐसे में उन्हें काम तो आना ही पड़ता है।
अब आप ही बताओ कि रामजी मेरे काम आते हैं
तो भला कौन सा अहसान करते हैं?
फिर हम भी तो राम जी के ही पास जाते हैं,
क्योंकि वे ही हमें सबसे पहले नजर आते हैं
जब वे हमारे काम आते हैं
तो हम भी राम नाम का थोड़ा गुण गा लेते हैं
अब राम जी को कोई शिकायत नहीं है
तो फिर आप क्यों फटे में टाँग अड़ाते हैं
ये हमारे और राम जी के बीच का मसला है
हम और राम जी आपस में कैसे रिश्ता निभाते हैं,
इस पर आप क्यों इतना खार खाते हैं,
या आपको राम जी समझ नहीं आते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - बजरंगी

शीश झुकाते हम बजरंगी।
मान रहे हम साथी संगी।।
भूत-प्रेत बाधा के मारे।
आप सभी को सदा उबारे।।

राम प्रभु के भक्त प्रिये हो।
छवि राम निज हृदय लिये हो।।
हम तो कहें आप बजरंगी।
लीला करते अनुपम रंगी।।

सुमिरन करें नित्य हनुमाना।
राम कृपा जीवन में जाना।।
जगत आपकी महिमा जाने।
लगता हम हो गये सयाने।।

सीता माँ का पता लगाए।
लक्ष्मण जी के प्राण बचाए।।
दर्शन सफल राम का होता।
अनुमति पहले तुमसे लेता।।

विघ्न विनाशक नाम तुम्हारा।
संकट में बस एक सहारा।।
जीवित देव आज भी स्वामी।
करते मनुज नमामि नमामी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद - कहें सुधीर कविराय
************
अपने मन के भाव, सदा ही उत्तम राखो।
जो भी मिले प्रसाद, प्रेम से उसको चाखो।
बच्चे हैं नादान , आप इसको स्वीकारो।
दीजै उनको प्यार, नहीं उनको दुत्कारो।।

बोल रहे जो आप, तनिक तो आप विचारो।
है कुंठा सैलाब, आप भी ताना मारो।।
नहीं सही ये कर्म, आप जो करते प्यारे।
उत्तम समझो धर्म, सभी के बनो दुलारे।।

जिनके कारण आज, आप दुश्मन बन जाते।
रख लो थोड़ा धैर्य, आज क्यों हो पछताते।।
इतना भी उत्साह, नहीं होता है प्यारा।
कल रोकर क्या आप , किसी का बनें सहारा।।

इतने उत्सुक आज, सोच कर बदला लोगे।
क्या सोचा है मित्र, भला क्या खुद को दोगे।।
कर लो आप विचार, अभी ये हितकर होगा।
जाकर मिल लें यार, जिसे उन सबने भोगा।।

चलो गाँव की ओर, आज नगरी को छोड़ो।
मानो मेरी बात, दिशा अपनी तो मोड़ो।।
निकल गया यदि वक्त, भला फिर क्या पायेगा।
सिर पर रखकर हाथ, सिर्फ तू पछताएगा।।


चलो न ऐसी राह, जहाँ तुम भटक न जाओ।
जिद से क्या है लाभ, आप कल को पछताओ।।
सोच समझकर मित्र, कदम तब आप निकालो।
कौन रहा कह आज, बला खुद पास बुला लो।।

आया गर्मी मास, सूर्य का आतप फैला।
लोग हुए बेजार, हुआ आतंकी खेला।।
सावधान हों आप, खेल जो मौसम खेले।
दोष नहीं वैशाख, चक्र मौसम के मेले।।

जान रहे हैं आप, सूर्य की अपनी लीला।
गर्मी का आतप, कहीं कुछ बचा न गीला।।
कुछ मत कहिए ताप, करो अपनी तैयारी।
बचकर रहिए आप, पड़े वैशाख न भारी।।

आया संकट आज, सामने सारी दुनिया।
मुश्किल का है दौर, रही रो मेरी मुनिया।।
समझ लीजिए आप, घड़ी मुश्किल ये आई।
दुनिया में कुछ लोग, कहें हम मुन्ना भाई।।

खट्टे हैं अंगूर, मान मत तुम घबराना।
बनो नहीं लंगूर, आप पथ छोड़ न जाना।
कोशिश करिए आप, पास में मंजिल होगी।
तब मीठे अंगूर, भला कहलाना रोगी।।

सुखदाता हैं राम, सभी हैं नित गुण गाते।
भवसागर से पार, हमें प्रभु राम कराते।
करते जाते काम, मनुज के कष्ट मिटाते।
दुनिया भर में राम, हृदय से पूजे जाते।।

हमको इतनी आस, किसी से करनी होगी।
जन-मन पर विश्वास, नहीं हो कोई ढोंगी ।।
अपने भी अब खेल, बने नाहक ही रोगी।।
यह जीवन की रेल, कहो बन जायें जोगी।।

खड़े हाथ पकड़कर, जिसे है नहीं पुकारा।
वही निभाते साथ, जिसे हमने दुत्कारा।
नाहक था बेचैन, छोड़ पथ साथ हमारा।
कल का दुश्मन आज, हमें है सबसे प्यारा।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा - कहें सुधीर कविराय
**********
अंधे होकर स्वार्थ में, गिरे हुए हैं आप।
प्रतिफल निश्चित भोगिए, यह मेरा अभिशाप।।

आप भला क्यों मानते, औरों को नादान।
समझ नहीं क्या पा रहे, मिला उसे वरदान।।

निम्न सोच के साथ कब, हुआ लक्ष्य संधान।
जीवन का भी जानिए, निश्चित कर्म विधान।।

मानव अपने कर्म से, बनता सदा महान।
सतत कर्म की साधना, उसकी हो पहचान।।

नाहक नहीं बघारिए, व्यर्थ आपका ज्ञान।
अपने मुँह मिट्ठू मियाँ, बनिए नहीं महान।।

अधिकारों के नाम पर, होता बड़ा विवाद।
नहीं किसी को अब रहा, कर्तव्यों की याद।।

मातु-पिता का अब कहाँ, बच्चों पर अधिकार।
उनके हिस्से आ रहा, बस केवल दुत्कार।।

वही यहाॅं खुशहाल है, जिसे न कोई लोभ।
कभी किसी भी हाल में, करे नहीं जो क्षोभ।।

जो रहता संतुष्ट हैं, करता नहीं बवाल।
झूठ-मूठ रोता नहीं, वही यहाँ खुशहाल।।

प्रेम-प्यार सद्भाव का, पाठ पढ़ाए नित्य।
वही आज खुशहाल है, जिसका ये आदित्य।।

बिन उधार होता कहाँ, आज भला व्यापार।
जिम्मेदारी आपकी, बना रहे व्यवहार।।

यदि लें आप उधार तो, इतना रखिए ध्यान।
देने वाले का कभी, मत करना अपमान।।

हर कोई ऐसा नहीं, लायक इतना आज।
जिससे खोलें हम सभी, अपने मन के राज।।

अपने मन के राज को, रहो छिपाए आप।
करने जो तुम जा रहे, बने नहीं अभिशाप।।

श्रम से आप बनाइए, एक अदद पहचान।
जाति - धर्म के खेल से, बनता कौन महान।।

अपनी भी पहचान है, इसका हमको हर्ष।
आ जायेगा एक दिन, जीवन में उत्कर्ष।।

मानव जीवन जो मिला, ईश्वर का उपहार।
प्यार सभी को चाहिए, बाँटो प्यार दुलार।।

कभी आप भी सोचिए, सफल भला क्या जाप।
प्यार सभी को चाहिए, फिर क्यों करना पाप।।

शबरी राह निहारती, आयेंगे प्रभु राम।
उसके जीवन का यही, एकमात्र आयाम।।

राम प्रभो को देखकर, खोई शबरी होश।
जूठे बेर खिला रही, मन में इतना जोश।।

आशा देती है हमें, नित नूतन विश्वास।
हार-जीत का नियम है, आज दूर कल पास।।

छोड़ निराशा तो बढ़ो , करो भरोसा आप।
नाहक इतना क्यों भरे, मन अपने संताप।।

माँ गंगा तो आज भी, सहती हरदम त्रास।
बे-कदरी निज देखती, फिर भी मन में आस।।

नीति नियम को देखिए, सहती हरदम त्रास।
मानवता नित रो रही, देख स्वयं का ह्रास।।

अफवाहों में बढ़ रहा, तेल गैस का दाम।
करें स्वार्थी लोग कुछ, देशद्रोह का काम।।

तेल गैस के दाम की, चर्चा होती आम।
सत्य झूठ के फेर में, बेगुनाह बदनाम।।

आई संकट की घड़ी, आप बढ़ाएँ हाथ।
सभी धैर्य के साथ में, चलें राष्ट्र के साथ।।

बड़ी जरूरत आज की, सब मिल करिए काम।
घटा मान यदि देश का, सब होंगे बदनाम।।

भरे पड़े संसार में, ऋषि मुनि ज्ञानी संत।
जब तक प्राणी है धरा, चर्चा सदा अनंत।।

कमी नहीं संसार में, गुणी जनों का आज।
बदनामी के बाद भी, शोभित होता ताज।।

बिना कर्म के व्यर्थ है, अच्छे दिन की चाह।
हाथ बाँध मिलता किसे, आप बताओ राह।।

नहीं सिखाना चाहिए, चले गलत की राह।
उल्टा होगा एक दिन, निकलेगा मुखआह।।

हमें मिटाना चाहिए, कुंठित मन व्यवहार।
प्रेम प्यार से सब रहें, करें नहीं तकरार।।

करिए अपनी चाल में, अपने आप सुधार।
और संग में चित्र भी, तब मोहे संसार।।

चेहरा चुगली कर रहा, मन, वाणी, व्यवहार।
चर्चा स्वयं बखानती, क्या चरित्र का सार।।

छल-बल के इस दौर में, रहिए आप सतर्क।
जितना संभव हो सके, रहिए दूर कुतर्क।।

छल-छंदो का गूढ़ है, अजब-गजब विज्ञान।
सबके अपने तर्क है, सबका अलग विधान।।

नेता ऐसा चाहिए, करे सभी के काम।
सेवा और संवेदना, सब जनता के नाम।।

नेता ऐसा चाहिए, जिसकी ऐसी चाह।
कार्य सदा ऐसा करे, हो जनता में उत्साह।।

नेता ऐसा चाहिए, हो मिलना आसान।
जिसके भीतर तनिक भी, नहीं स्वार्थ अभिमान।।

नेता ऐसा चाहिए, करें नहीं जो भेद।
भूल-चूक पर वो करे, क्षमा याचना खेद।।

नेता ऐसा चाहिए, जिसका एक विचार।
जनता भी जिसके लिए, लगे आप परिवार।।

सेवक मिलना आजकल, अपवादों की बात।
लोग स्वार्थ में आजकल, कहते दिन को रात।।

दास प्रथा के दंश की, उठती अभी भी टीस ।
भले निकालें हम सभी, व्यर्थ मानकर खीस।।

सब नौकर हैं जगत में, मान रहा है कौन।
सत्य नहीं स्वीकारना, इसीलिए तो मौन।।

चाकर बनने की रही, कितनों की अब चाह।
चाटुकारिता में करें, दीन-धर्म सब स्याह।।

किंकर बनिए गुरू का, दृष्टा बनकर आप।
कर्ता बन वो स्वयं ही, हर लेंगे संताप।।

राम कृपा जिस पर रही, दूत नाम हनुमान।
यश -वैभव उसका बढ़ा, मिला मान-सम्मान।।

ईश-कृपा यदि चाहिए, तो करिए विश्वास।
सुख-समृद्धि संग में, तब पूरी हर आस।।

वक्त साथ जो चल रहे, बुद्धिमान वे लोग।
किस्मत उनके साथ है, लोग कहें संयोग।।

वक्त सगा किसका हुआ, नाम बताओ आप।
चलता अपनी चाल है, क्या ये उसका पाप।।

अपनेपन के भाव का, होता जाता अंत।
यूँ तो सब ही बन रहे, सभी बड़े ही संत।।

आज किसी से व्यर्थ है, अपने पन की चाह।
सभी ढूँढते इन दिनों, केवल स्वारथ राह।।

अपने पन की चाह में, बोलें मीठे बोल।
वाणी में रस घोलकर , हृदय जहर अनमोल।।

शेर गाय थे सामने, क्यों होते हैरान।
दोनों की ये सौम्यता, देती हमको ज्ञान।।

दोनों ही निश्चिंत है, बिना किसी संदेह।
मुखमंडल को देखिए, जैसे लगें विदेह।।

बाबा मेरे देश में, भाँति-भाँति के लोग।
आप हमें समझा रहे, ये केवल संयोग।।

करें धर्म की आड़ में, उल्टे सीधे काम।
डर जिनको लगता नहीं, होने बदनाम।।

कोशिश कितनी हो चुकी, इन पर नहीं लगाम।
बदनामी जिनके लिए, जस सुखदा आयाम।।

आज चाहते हम सभी, गाड़ी बंगला कार।
नीति नियम सिद्धांत से, करें नहीं हम प्यार।।

बाबा बनकर देखिए, खुल जायेगा भाग्य।
हम भी आपके साथ में, ले लेंगे वैराग्य।।

होना सबसे चाहिए, समता का व्यवहार।
संविधान की आड़ में,मत करिए तकरार।।

समता के संदेश का, तभी सफल आयाम।
जब चाहेंगे हम सभी, करना ऐसा काम।।

धर्म जाति की ओट में, राजनीति का खेल।
सत्ता कुर्सी के लिए, फैल रहा विषबेल।।

समता के व्यवहार का, नित होता उपहास।
सिर्फ दिखावे के लिए, होते कुटिल प्रयास।।

पहले उसने प्यार से, लिया भरोसा जीत।
चतुराई से फिर ठगा, बनकर मेरा मीत।।

व्यर्थ आप लिखते रहे, सुंदर मोहक गीत।
उसने धोखा संग में, लिया भरोसा जीत।।

सब जानें हनुमान जी, महावीर बलवान।
राम भक्ति थी हृदय में, तनिक नहीं अभिमान।।

महावीर का एक था, पंचशील सिद्धांत।
पाप-पुण्य की सीख का, संदेशा वेदांत।।

रिश्ते भी अब रक्त के, देते गहरे घाव।
जैसे लहरों बीच में, घिर जाती है नाव।।

बूंद-बूंद के रक्त का, अमृत जैसा मोल।
पड़े जरुरत जब कभी, समझ रहे तब तोल।।

नहीं रक्त संबंध है, फिर भी होता प्यार।
कुछ रिश्ते संसार में, ईश्वर का उपहार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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