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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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निकृष्टता का विधवा विलाप 

जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन की आड़ में 
क्या कुछ नहीं हो रहा है,
सत्ता की राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं 
संवैधानिक पदों पर बैठे कुछ बेशर्म 
नीट परीक्षा की आड़ में लोकतंत्र का माखौल उड़ा रहे हैं,
देश में अस्थिरता फैलाने का कुचक्र रच रहे हैं 
प्रोटोकॉल का खुला उलंघन कर रहे हैं, 
सड़क छाप गुण्डों जैसा आचरण कर रहे हैं।
धरना प्रदर्शन में हिंसा, सुरक्षा बलों पर हमला 
देश विरोधी नारों, संसद उखाड़ फेंकने 
नेपाल, बांग्लादेश की तरह तख्तापलट करने को
खीस निपोरे मौन समर्थन दे रहे हैं।
अपराधी तत्वों को छात्र और बेकसूर बता रहे हैं,
संसद में चर्चा से दुम दबाकर भाग रहे हैं
सड़कों पर घूम-घूम कर सिर्फ विधवा विलाप कर रहे हैं,
दोहरा मापदंड अपनाने का नया इतिहास लिख रहे हैं।
देश की प्रगति से शरमा रहें,
सिर्फ कुर्सी के लिए मरे जा रहे हैं,
युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं 
बच्चों के हाथों से पत्थर, हथियार थमा कर उकसा रहे हैं,
आपराधिक कृत्यों करने की दिशा में ढकेल रहे हैं।
अपने पुरखों के नक्शे कदम पर चल रहे हैं 
झूठ पर झूठ बोलने का नया रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं,
समस्या सुलझाने में योगदान के बजाय 
आग में घी डालकर धधकाने सतत् प्रयास रहे हैं 
अपनी बेशर्मी, बेहयाई और कुचेष्टाओं को 
युवाओं के कंधों के सहारे खाद पानी देने की कोशिश 
हद से नीचे गिरकर कर रहे हैं,
अपनी सबसे निकृष्ट मानसिकता का
उदाहरण सगर्व पेश कर रहे हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा

धर्म-धुरंधर लोग कुछ, बाँट रहे ज्ञान।
आता-जाता कुछ नहीं, केवल चर्चा जान।।

अपने-अपने धर्म का, सभी करें सम्मान।
इससे आपस में बढ़े, भाईचारा ज्ञान।।

किसके मन में क्या छिपा, कौन रहा है जान।
सफल नहीं अब तक हुआ, मानव का विज्ञान।।

क्या मन में किसके छिपा, खोजें हम सब आज।
कोशिश में विज्ञान भी, कैसे पाए राज।।

किसके मन में क्या छिपा, प्रश्न बड़ा गंभीर।
इस रहस्य की खोज में, मानव बड़ा अधीर।।

ईश्वर भी बेचैन है, हुई कौन सी भूल।
किसके मन में क्या छिपा, चुभी हमें जो शूल।।

किसके मन में क्या छिपा, कैसे कह दें राम।
शरण बैठकर भक्त ने, किया नाम बदनाम।।

सड़कें बन नदियां सभी, बहे शहर में धार।
छतरी वाला तैरता, करे समय बेकार।।

बस पानी में है खड़ी, बाइक हुई अधीर।
डूबी दिखती कार है, जन-मानस में पीर।।`

नफ़रत के बाजार में, सभी उठाते मौज।
जैसे बोरिंग चल रही, नहा रहे हैं हौज।।

जितना चाहें दीजिए, चल जाएगा काम।
यदि इच्छा बिल्कुल नहीं, मत होना बदनाम।।

समझ नहीं क्यों आ रहा, उसके मन का भेद।
फिर भी हम जतला रहे, कान पकड़कर खेद।।

आज दिखावा खूब है, कटे नाक या कान।
चमचे शोर मचा रहे, बेचारा कुर्बान।।

मन दर्पण निर्मल रखो, करते रहना साफ।
ईश्वर भी तब आपकी, भूल करेगा माफ़।।

निर्मल नदिया सी बहे, रिश्तों की रस धार।
जहर दिखावे का भरा, बन जाता है भार।।

पालक भी कुछ हो रहे, आज बड़े हैवान।
पानी पीकर कोसते, कलयुग के शैतान।।

पालक भी तो बन रहे, तरह-तरह के लोग।
उनमें कुछ भगवान जस, कुछ देते बस रोग।।

मातु-पिता ईश्वर सदा, सच्चे पालक आप।
शुभचिंतक सबसे बड़े, ढाल शोक-संताप।।

मन थाली को देखकर, सुखदा भोजन सार।
दाल-रोटी चावल संग, भिंडी का त्योहार।।

खीरा अचार रायता, संग इमरती जान।
सादा भोजन ही सदा, तृप्ति सहज पहचान।।

जो हो भोजन सामने, सदा करो सम्मान।
मातु अन्नपूर्णा कृपा, सुंदर स्वस्थ सुजान।।

मंदिर मस्जिद चर्च में, भेष बदलकर लोग।
नेता केवल चाहते, वोट मिलन संयोग।।

मंदिर मस्जिद चर्च सब, हैं ईश्वर के धाम।
कुछ उन्मादी सोचते, दूजा हो बदनाम।।

मंदिर में हो आरती, चर्च प्रार्थना गान।
मस्जिद नित्य अजान हो, सूत्रधार इंसान।।

मंदिर में सुख- शाँति की, मस्जिद भी दे सीख।
करुणा बरसे चर्च में, क्यों हम चाहें भीख।।

झूठ और पाखंड का, फैल रहा जाल।
इसकी आड़ में हो रहा, जाता रचा बवाल।।

मोहन से कुछ सीखिए, प्रेम जगत आधार।
होना जीवन में अगर, भव बाधा से पार।।

बजती मोहन बाँसुरी, मीठी मधुरिम तान।
सम्मोहन में बँध सभी, भूल गए निज गान।।

तीखा खाना स्वास्थ्य को, पहुँचाता नुकसान।
सादा भोजन दे सदा, जीवन को मुस्कान।।

फीका तो अब हो गया, लोगों का व्यवहार।
जैसे अब संबंध भी, चलते जस व्यापार।।

बहुरंगी पकवान भी, देते नहीं सुकून।
लगता जैसे पढ़ रहे, खाने का मजमून।।

पकवानों में अब नहीं, पहले वाला स्वाद।
भोजन होता सामने, मैया आती याद।।

दान चढ़ावा का नया, आया कैसा दौर।।
चोरी का है राज क्या, सभी कीजिए गौर।।

ऐसा वैसा कुछ नहीं, रहो धीर गंभीर।
जब भी हो मुश्किल घड़ी, बनिए मित्र सुधीर।।

पूर्व कर्म का फल मिले, निश्चित है यह लेख।
भले नहीं हम पा रहे, लें पहले से देख।।

कुछ करने से पूर्व यदि, कर लें सोच विचार।
फिर क्यों नाहक कष्ट का, सहना होगा सार।।

नाहक कुछ बदनाम हैं, वाहन चालक आज।
क्या वे सब अंजान हैं, कैसा जीवन साज।।

चालक सबसे है बड़ा, एक मात्र भगवान।
चाहे जितना शीर्ष पर, पहुँचा हो विज्ञान।।

वाहन चालक कब चाहते, दुर्घटना का दोष।
फिर भी सहना पड़ रहा, जब-तब उनको रोष।।

मन क्यों आज उदास है, मित्र बताओ राज।
नहीं समझ में आ रहा, बिगड़ा है क्यों साज।।

महका सा ये मन लगे, पर है बहुत उदास।
तनिक नहीं भाता उसे, तनिक हास परिहास।।

बहका क्यों अब जा रहा, आज मनुजता भाव।
सहना भी है पड़ रहा, बिना जख्म का घाव।।

शब्द थके पर बोलना, यह कैसा है द्वंद्व।
इसके पीछे क्या भला, छिपा हुआ छलछंद।।

तुमको रहा न याद अब, दादी नानी गोद।
कलयुग का यह रंग है, चाहे जितना खोद।।

मात-पिता के कष्ट का, तुमको रहा न याद।
अपने हाथों स्वयं, अब भविष्य बर्बाद।।

मातु-पिता का अंश हो, रहा न तुमको याद।
फिर भी तुम हो चाहते, निज जीवन आबाद।।

रहा न तुमको याद अब, गाँव गली अरु खेत।
कहें मित्र यमराज जी, समय अभी है चेत।।

कहते हैं यमराज जी, रहा न तुमको याद।
पर आयेगा एक दिन, जब होंगे बर्बाद।।

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झूठ और पाखण्ड
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झूठ और पाखण्ड का, होता नित नव खेल।
पढ़ें लिखे भी बन रहे, इस माया की रेल।।

तिलक कलावा संग में, कंठी भी बदनाम।
झूठ और पाखंड का, ऐसा झाम तमाम।।

डरते बिल्कुल हैं नहीं, कलयुग के शैतान।
झूठ और पाखंड के, गाते अपने गान।।

झूठ और पाखण्ड से, कर बेटी गुमराह।।
भोले बन राक्षस जो, करते नित्य गुनाह।।

झूठ और पाखंड का, भारी पड़ता खेल।
नीति नियम सिद्धांत से, झूठा इसका मेल।।

धर्म आड़ में ये करें, भरे नीचता काम।
झूठ और पाखण्ड का, इनको मिलता दाम।।
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शहीद
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जो शहीद सैनिक हुए, रहें हमेशा याद।
श्रद्धा के दो पुष्प से, शौर्य की हम दें दाद।।

सैनिक हुए शहीद जो, रहे अमर अभिमान।
उनको है इस देश का, यही बड़ा अवदान।।

हंसते हंसते कर दिया, प्राणों का बलिदान।
धरती माँ की गोद में, सोये चादर तान।।

नाम शहीद के हो सदा, गाँव का जो स्कूल।
भूलेगा कोई नहीं, निज बगिया के फूल।।

हो शहीद के नाम पर, स्कूल औ अस्पताल।
मान सभी का बढ़ेगा, अमर रहेगा लाल।।
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गलत
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गलत सही जो गलत है, कैसे कह दें यार।
लाभ-हानि के बिना, करें नहीं क्षतकरार।।

गलत आज जो नित करें, वे देतेज्ञ उपदेश।
उनकी कुछ मजबूरियाँ, कुछ उनका परिवेश।।

हम डंके की चोट पर, करते सारे काम।
गलत-सही को छोड़कर, बस होतै बदनाम।।

चंदा चोरी थी गलत, कहते हैं हम लोग।
पर कब सोचा आपने, यह भी है इक रोग।।

जितना भी होता गलत, सबका एक ही सार।
केवल इतनी चाह है, हो अपना विस्तार।।

झूठा जो भी तथ्य हो, खंडन कर पुरजोर।
वरना मुश्किल आयेगी, दुनिया में तब शोर।।

महिमा -मंडन हो गया, जैसे अब उत्पाद।
अपने हित सब भेंट में, देते माला लाद।।

माँग रहे संसार से, तुम नाहक में भीख।
दाता केवल एक है, मानो मेरी सीख।।

वाणी से हैं उगलते, आज मनुज अंगार।
झुलसा जाता धरा का, मानवता का सार।।
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सबूत
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चोरी हमने है किया, दे दो एक सबूत।
नाहक ही तुम मत बनो, हरिश्चंद्र के पूत।।

चंदा चोरी के नये, मिलते रोज सबूत।
फिर भी कहते स्वयं को, बड़ा राम का दूत।।

चाह रहे यदि आप हो, हमसे एक सबूत।
तो फिर तुम जाकर मिलो, जो है मेरा भूत।।

जिंदा होने का भला, क्यों माँगते सबूत।
समझ रहे क्या तुम मुझे, हूँ कोई अवधूत।।

मम प्रिय वर यमराज से, मिलिए जाकर आप।
फिर सबूत को भूलकर, करना मेरा जाप।।
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विधि का अजब विधान
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समझ नहीं हम पा रहे, विधि का अजब विधान।
इसीलिए क्या मानते, है कोई भगवान।।

हिलता पत्ता एक भी, समझो ईश विधान।
मत कहना विज्ञान के, उन्नति का अवदान।।

विधि का अजब विधान है, मत ढ़ूंढ़ो तुम तोड़।
नहीं मिलेगा आपको, अपनी इच्छा मोड़।।

पल-पल जो है हो रहा, वारिश वर्षा धूप।
विधि का अजब विधान का, निश्चित है प्रारुप।।

मान रहे यमराज भी, विधि का अजब विधान।
इसीलिए वो बाँटते, नहीं व्यर्थ का ज्ञान।।

विधि के अजब विधान से, टकराना है व्यर्थ।
कोशिश जिसने भी किया, प्रतिफल मिला अनर्थ।।
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बालक
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बालक भी अब स्वयं को, कब माने नादान।
सेवा और सद्ज्ञान को, नहीं मानते ज्ञान।।

बालक भी देने लगे, मातु-पिता को ज्ञान।
हमें बोध होने लगा, कलयुग नया विधान।।

बालक बनकर जो रहे, देते बड़ों को मान।
ईश्वर की संग में कृपा, सबका उन पर ध्यान।।

बालक बन रहना मुझे, देता खुशी अपार।
छाया बड़ों की शीश पर, मम जीवन आधार।।

समय साथ होना बड़ा, ईश्वर का वरदान।
बालक का सौभाग्य है, क्यों करना अभिमान।।
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फिजूल
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खर्चा फिजूल का जो करे, संग खूब अभिमान।
आता ऐसा एक दिन, जब इसका संज्ञान।।

समय नहीं फिजूल का, आप करो बरबाद।
लौट नहीं आये कभी, व्यर्थ सभी फरियाद।।

अगर सरल फिजूल का, मुझसे मिलिए आप।
काम हमारा कीजिए, कर सुधीर का जाप।।

समझ रहे जीवन अगर, अपना आप फिजूल।
मिलो मित्र यमराज से, बाँट रहे वो फूल।।

आवेदन हैं माँगते, जितने धरा फिजूल।
मुफ्त मिलेगी नौकरी, फाँक सके जो धूल।।
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दिन दिन बढ़ता जा रहा
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दिन दिन बढ़ता जा रहा, अब ऐसा संबंध।
ऐसा लगता अब हमें, बस केवल अनुबंध।।

कब सोते कब जागते, भूले हम अनुराग।।
दिन-दिन बढ़ता जा रहा, सबका भागमभाग।

दिन-दिन बढ़ता जा रहा, आज धरा व्यभिचार।
कैसा होता जा रहा अपना यह संसार।।

दिन-दिन बढ़ता जा रहा, रोज-रोज नव रोग।
रहन-सहन है बिगड़ गया, निज करनी सब भोग।।

बढ़ता जाता है जहर, नहीं किसी की खैर।।
दिन-दिन बढ़ता जा रहा, आपस में ही बैर।।

दिन दिन बढ़ता जा रहा, धरा प्रदूषण भार।
क्या धरती पर शेष है, ये ही जीवन सार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा गीत - जन्म दिवस

जन्म दिवस है आपका, खुशियाँ लाया साथ।
यश वैभव नित-नित बढ़े, रहे सदा प्रभु हाथ।।

अरमानों के दीप से, बुझे न कोई आस।
जीवन पथ पर फूल हों, मिटे सभी वनवास।।
हर दिन -हर पल आपके, हो अपनों का साथ।
यश वैभव नित-नित बढ़े, रहे सदा प्रभु हाथ।।

हँसी-ख़ुशी परिवार में, बँटे प्रेम का दान।
स्वस्थ रहें शत वर्ष तक, बढ़े जगत में मान।।
कभी आपका ना झुके, नाहक में ही माथ।
यश वैभव नित-नित बढ़े, रहे सदा प्रभु हाथ।।

नित नूतन संकल्प हों, नई उमंगें रोज।
जन्म दिवस के पर्व पर, सफल रहे हर खोज।।
कदम-कदम बढ़ते रहें, सरल सहज हो पाथ।
यश वैभव नित-नित बढ़े, रहे शीश प्रभु हाथ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - मौन साध कर बैठे रहना

मौन साध कर बैठे रहना।
मान रहे क्या जीवन गहना।
अन्याय देख जो चुप रहते ।
समझो कितना कुछ वो सहते।।

कायरता की बातें करना।
बिन हिम्मत के केवल डरना।।
बोलें सच जब वक्त पुकारे।
वही मनुज कहलाएं प्यारे।।

नीर पेट का नहीं डुलाना।
आग लगे तब दीप बुझाना।।
जागो अरु आवाज उठाओ।
विजय पताका तुम लहराओ।।

धर्म सत्य की गाथा गाओ।
मौन छोड़ अब आगे आओ।।
जीवन में कुछ नाम कमाओ।
सतपथ पर नित चलते जाओ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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स्वार्थ का सिद्धांत
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स्वार्थ की भी अपनी दुनिया अपना सिद्धांत है
आज जिसके पास स्वार्थ का हथियार नहीं है
आज की दुनिया में वो बिल्कुल बेकार है।
मैं तो निरा नादान था
स्वार्थ का सुख भी नहीं जानता था ,
पर भला हो मित्र यमराज का
जिसने स्वार्थ का फलसफा समझाया
तब मेरे भूसा भरे दिमाग में कीड़ा कुलबुलाया,
मित्र का आभार जताया, जलपान कराया
स्वार्थ के नाम का एक दीप जलाया
पूजा-पाठ और स्वार्थ मंत्र का जाप किया।
पर यमराज को मुझ पर विश्वास ही न हुआ
और उसने मुझे स्वार्थ शपथ दिलाकर
अपनी शंका का समाधान किया
उसके बाद ही बंदा प्रस्थान किया।
ईमानदारी से कहूँ,
तो अब मुझे भी काफी अच्छा लग रहा है,
क्योंकि स्वार्थ का सिद्धांत अब
मुझे भी समझ में जो आ गया है।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - तरुण

तरुण अवस्था जीवन धारा।
नव उमंग से जगमग सारा।।
शक्ति अपार संग तरुणाई।
समय-समय पर ले अँगड़ाई।।

श्रद्धा भाव नमामि-नमामी।
तरुण हमारे नव अनुगामी।।
तरुणाई जब ले अँगड़ाई।
मान लीजिए आँधी आई।।

इसी समय पथ विचलन होता।
तरुण जोश में संयम खोता।।
इन पर देना ध्यान जरूरी।
आशाएं तब सबकी पूरी।।

निंदा से है कुंठा बढ़ती।
करना नहीं हमें ये गलती।
तरुण हमारे कल के नायक।
ये समाज के नव परिचायक।।

तरुण बनेंगे जब अनुरागी।
होंगे धन्य सभी बड़भागी।।
मान तरुण को भी है देना।
उनके पंखों को है सेना।।

शाँति भाव से इनकी बातें।
समझें सब जो भी जज़्बातें।।
आप भरोसा इनका करिए।
नहीं डराएँ, खुद मत डरिए।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई -झूम-झूम बरसो रे मेघा

झूम-झूम बरसो रे मेघा।
सावन ले आए मन रेघा।।
आकर धरती प्यास बुझाओ,
हरियाली संदेशा लाओ।।

पवन चले सब झूला झूले।
गीत मधुर सबके मन छू लें।
बूँद-बूँद में खुशियाँ बरसे।
प्रेम और करुणा रस सरसें।।

मेघ गरज मंगल धुन गाए,
जीवन में नव चेतन लाए।।
बागों में कोयलिया गाए।
दादुर केकी शोर मचाए।।

खेतों में हरियाली छाई।
कृषकों के मन खुशियाँ छाईं।।
नाले नदी लगें लहराने।
बच्चे कागज नाव चलाने।।

रिमझिम बूँदें छत पर बाजे,
चाय-पकौड़े सँग में साजे।
मन का कोना-कोना नाचे।
स्मृतियाँ मधुरिम सब साजे।।

सावन आए द्वार हमारे।
बरसे बदरा चारों द्वारे।।
झिमिर-झिमिरकर बरसे पानी।
मेघा करो नहीं मनमानी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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दोहा
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उत्सव
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उत्सव मेरे संग में, मना रहे यमराज।
भूले अति उत्साह में, आए थे जिस काज।।

बिटिया रानी के जन्म पर, उत्सव सा माहौल।
विदा हुई जब एक दिन, हृदय रहा है खौल।।

अब उत्सव में वो नहीं, पहले सा उल्लास।
ऐसा लगता आजकल, होता है परिहास।।

होते उत्सव आड़ में, सिर्फ दंभ के खेल।
आते जाते लोग में, नहीं प्रेम का मेल।।

उत्सव भी अब बन गए, महज एक व्यापार।
भीतर सब रीता पड़ा, द्वार सजा बाजार।।
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पीड़ा
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पीड़ा जन-मन की हरो, मेरे प्रभु जी राम।
वाणी अरु व्यवहार से, रचें नवल आयाम।।

मातु-पिता को आजकल, कौन दे रहा भाव।
पीड़ा की हम क्या कहें, नित्य कुरेदें घाव।।

बड़ी विकट पीड़ा उठी, चिंतित है यमराज।
हाथ जोड़ मुझसे कहे, आप सँभालो काज।।

मेरे पीड़ा की दवा, मम प्रियवर यमराज।
शुभ चिंतक सबसे बड़ा, बाकी व्यर्थ समाज।।

देख हमारी मित्रता, पीड़ित हैं कुछ लोग।
पूछ रहा यमराज भी, यह कैसा है रोग।।
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उतरन
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उतरन देकर लोग कुछ, जता रहे एहसान।
चर्चा- परिचर्चा करें, मान स्वयं भगवान।।

अगर किसी का हो भला, यदि उतरन से आप।
वरना रखो संभालकर, व्यर्थ नहीं कर जाप।।

उतरन को मिलता नहीं, सदा सभी से भाव।
केवल देते हैं वही, सहते हैं जो घाव।।

उतरन देती है कभी, कुछ लोगों को हर्ष।
वे करते नाहक नहीं, झूठ-मूठ संघर्ष।।

यह तन भी तो एक दिन, होगा उतरन रुप।
किसे पता है कौन कल, सुंदर बने विद्रुप।।
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शतरंज
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जीवन भी शतरंज सा, जैसा ही है खेल।
बुद्धिमान वो ही बड़ा, चलता करके मेल।।

हारी बाजी जीतना, है शतरंजी चाल।
जो कुंठित रहते सदा, करते बहुत सवाल।।

राजा-रानी गिर पड़े, प्यादा भी लाचार।
यह शतरंजी खेल है, जीत-हार का सार।।

ऊँचा चाहे जो बने, गिरना भी है जान।
नहीं बिसात घमंड की, यही गुरू का ज्ञान॥

सिर पर जो ये ताज है, कल चाटेगा धूल।
चाल समय की देखिए, मोहरे देंगे शूल॥
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करतूत
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अपनी ही करतूत को, नहीं जानता कौन।
फिर भी बेचारे बने, देखो बैठे मौन॥

करतूतों का एक दिन, मिलता है परिणाम।
आप बैर हो बेचते, दाम मिले क्यों आम॥

भले छिपाए घूमते, हम अपनी करतूत।
पर सब कुछ हैं देखते, ईश्वर के जो दूत॥

जैसा बोते बीज हो, पाते वैसा उत्पाद।
दिया खाद पानी नहीं, निश्चित सब बरबाद॥

हर पल अपनी करतूत का, रखता है जो ध्यान।
उसके जीवन का सदा, बिल्कुल अलग विधान॥
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बदले नहीं विचार
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दोष हमारा क्या भला, बदले नहीं विचार।
क्या ठेका मैंने लिया, सुधरे ये संसार।।

बदले नहीं विचार तो, चिंता की क्या बात।
बीतेगा ये समय भी, जैसे दिन औ रात।।

बदले नहीं विचार का, मत लो आप तनाव।
मुफ्त बाँटता फिर रहा, कब से नेक सुझाव।।

कोशिश तो ढेरों किया, बदले नहीं विचार।
क्या कोई है इस धरा, जो दे मुझे सुधार।।

बदले नहीं विचार का, प्रश्न बड़ा गंभीर।
पर कोई दिखता नहीं, हमको तनिक अधीर।।
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भोर ललित की लालिमा
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भोर ललित की लालिमा, बिखरें जन मन लाल।
जैसे चंदा की चुनर, धरती ओढ़े गाल॥

भोर ललित की लालिमा, जागे तरुवर डाल।
पंछी गावें रागिनी, सबके अपने ताल॥

भोर ललित की लालिमा, पुष्पित कमल उछाह।
बूंद-बूंद की ओस में, मोती सी उत्साह॥

भोर ललित की लालिमा, बजते घंटे शंख।।
होती दीपक आरती, उड़ते पक्षी पंख॥

भोर ललित की लालिमा, जीवन में नव आस।
अँधियारा हारा चला, उजियारे का वास॥

भोर ललित की लालिमा, देती नव उत्साह।
दिखे धरा पर नव खुशी, संग सुखदा प्रवाह।।
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दर्द झेलती बेटियाँ
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दर्द हमारी बेटियाँ, झेल रही हैं रोज।
मातु-पिता नित कर रहे, समाधान की खोज।।

जाने कैसा हो गया, अपना आज समाज
दर्द झेलती बेटियाँ, गिरती उन पर गाज।।

घर हो परिवार फिर, डर-डर जीते नित्य।
दर्द झेलती बेटियाँ, यह कैसा औचित्य।।

दर्द झेलती बेटियाँ, पूछें जीवन सार।
कृष्ण धरा पर आप लो, आज अभी अवतार।।

दर्द झेलती बेटियाँ, चिंतित हैं यमराज।
हाथ जोड़ हमसे कहे, घोल पिया क्या लाज।।

दर्द झेलती बेटियाँ, पूछ रही हैं आज।
जहर पिला कर मार दो, बच जाए मम लाज।।
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धमकी
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धमकी देकर क्या मिला, इस पर करो विचार।
वरना होगा एक दिन, तव जीवन बेकार।।

धमकी देकर पाक नित, बनता है बलवान।
सारी दुनिया जानती, इसका जो ईमान।।

नेता धमकी दे रहे, खाली जिनके हाथ।
किसी तरह से चाहते, सत्ता का हो साथ।।

खाली जिनके हाथ में, बस धमकी हथियार।
बेचारे मजबूर हैं, सुने नहीं सरकार।।

धमकी अब देने लगा, मम प्रियवर यमराज।
मेरे साथ चलना तुझे, फिर कैसा कल-आज।।
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चिंता चिता समान है
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चिंता चिता समान है, झूठी है ये बात।
किसकी कटती है भला, बिन चिंता के रात।।

चिंता चिता समान है, कैसे कहते आप।
मुर्दे तो बेखौफ हैं, करते कब संताप।।

चिंता चिता समान है, फिर लकड़ी बेकार।
सभी इसी से कीजिए, अब अंतिम संस्कार।।

कहा मित्र यमराज ने, प्रभु सब झूठा खेल।
चिंता चिता समान है, क्या है इसका मेल।।

चिंता चिता समान है, बड़ा गूढ़ है राज।
रहें नहीं इसके बिना, जैसे हो यह ताज।।
*********
बिना स्वार्थ होता, अब स्वागत सत्कार।
कलियुग माया देखिए, दें अपने दुत्कार।।

आज कौन करता भला, अब भूलें स्वीकार।
उसको तो आता मजा, बस करना तकरार।।

करते हम स्वीकार हैं, जो मेरा अपराध।
यही हमारी है सजा, ईश्वर ले अब साथ।।

आदत पाकिस्तान की, जस कुतिया की पूँछ।
छोड़ नहीं पाता कभी, भीख कटोरा छूँछ।।

अपनी आदत से नहीं, बनो आप मजबूर।
वरना होंगे मित्रवर, अपनों से भी दूर।।

पोषक तत्वों से युक्त हो, हर प्राणी आहार।
प्रभु जी धरा को दीजिए, आप उचित आधार।।

शोषक बनकर भी नहीं, मन को मिला सुकून।
अब भी जीवन का नहीं, समझ रहे मजमून।।

अहंकार तो काँच है, समझे सारे लोग।
यही बात तो साँच है, व्यर्थ पालते रोग।।

हृदय काँच सा टूटता, देता गहरा दर्द।
जोड़ बताता है सदा, क्या है इसका सर्द।।

नहीं भटकिए और अब, मन की ऑंखें खोल।
आखिर इतना आपके, चिंतन में क्यों झोल।।

मन की ऑंखें खोलना, बड़ी जरूरत आज।
भावावेशी मत बनो, समझो इसका राज।।

करते पूजा-पाठ जो, मान रहे अनमोल।
जो भी करना है करें, मन की ऑंखें खोल।।

मन की ऑंखें खोलकर, करो सत्य का बोध।
वरना जीवन में सदा, होगा नित अवरोध।।

लगा लिया है आपने, मोटा ताला एक।
मन की आँखे कैद में, यह कैसा अविवेक।।

आज भद्र इंसान को, पूछ रहा है कौन।
माफी के संग सिर्फ है, उसके हिस्से मौन।।

मन में देखो झाँक कर, देखो अपने पाप।
राम दान को लूटते, करके माला जाप।।

पाक-साफ कितना हुए, मन में देखो झाँक।
या फिर घर में बैठकर, पाप को अपने टाँक।।

मन में अपने झाँकना, जो करते स्वीकार।
यही बड़प्पन मनुज का, आज समय दरकार।।

मन में देखो झाँककर, और करो बदलाव।
कहें मित्र यमराज जी, केवल नेक सुझाव।।

करते रहिए कर्म शुभ, मन में रख विश्वास।
ईश्वर की होगी कृपा, नहीं छोड़िए आस।।

चंदा चोरी कर्म का, करते व्यर्थ बखान।
कलयुग महिमा का नहीं, आप दीजिए ज्ञान।।

कर्म का दीपक जो जले, बुझे न मन की आस।
ईश्वर देता साथ है, रखिए उस पर विश्वास।।

चंदा मांगें भाग्य का, जो बैठे कर आस।
कर्महीन की नाव का, डूबे बिन जल वास।।

कलयुग केवल नाम का, मनुज करे यदि काज।
नीति-धर्म संग कर्म से, बदले सारा साज।।

समय देखकर बोलिए, तोल-मोल कर बात।
मधुर वचन से जीतिए, वरना पड़ते। लात।।

कायर बनने से भला, बनता किसका काम।
अच्छा है घर बैठकर, आप लड़ाओ जाम।।

उलझाओ खुद को नहीं,चुनिए सहज विकल्प।
नहीं किसी को बोध हो, ज्ञानी हो तुम अल्प।।

देख विषमता रो रहे, निर्बल अरु असहाय।
बड़ी वेदना हृदय की, ईश्वर रहा रुलाय।।

असमय कभी न बोलिए, नहीं बघारो ज्ञान।
नाहक में कटुता बढ़े, अरु होगा अपमान।।

अब असत्य का जोर है, यही आज की नीति।
झूठ-मूठ दिखला रहे, लोग आपसे प्रीति।।

बेंचा खुद ईमान है, मुझे न कोई द्वंद्व।
फिर क्यों करते आप हैं, घर बैठे छलछंद।।

यमराज मित्र के दोहे

मेरे ही ईमान पर, प्रश्न उठाते आप।
नादानी में कर रहे, जानबूझकर पाप।।

ठेका मैंने ले लिया, बेंचों सब ईमान।
पाओगे मौका नहीं, मुफ्त धर्म का ज्ञान।।

क्या अचार है डालना, दीन धर्म ईमान।
बस थोड़ा सा आपको, रहे लोग सब जान।।

नादानी हमसे हुई, बेच दिया ईमान।
कल तक मैं कहता रहा, मुझे बहुत सद्ज्ञान।।

सदा खड़ा हो सामने, कर्मों का परिणाम।
समय साथ इसका बड़ा, दिखता है आयाम।।

कर्मों के परिणाम का, जिसने समझा सार।
ज्ञानी वो ही है बड़ा, नहीं समझता भार।।

मिले हमेशा आपको, जैसा है निज धर्म।
परिणामों से जानिए, अब-तक जैसा कर्म।।

आये दिन बरसात के, कृषकों में उत्साह।
बढ़ जायेगा शीघ्र ही, खेती कर्म प्रवाह।।

आये दिन बरसात के, गर्मी जाती दूर।
भीग रही जैसे धरा, वो होती मजबूर।।

जनमानस बेचैन है, मिल नहीं सुख-चैन।
आये दिन बरसात के, सुख के भीगे रैन।।

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश

अपनों को बिसरा रहे, आज जगत की रीत।
अपने-अपने स्वार्थ में, गाते झूठे गीत।।

प्रीत नहीं रखना कभी, जाने बिना चरित्र।
धोखा खाने से भला, रहो अकेले मित्र।।

सूत्र जीत का दे गए, प्रिए मित्र यमराज।
बिन बाधा के हो रहे, मेरे सारे काज।।

कौन आपका मीत है, नहीं आपको बोध।
स्वयं आप सबसे बड़े, जीवन में अवरोध।।

गाओ अपने गीत सब, बिना किसी सुर-ताल।
औरों का मत देखिए, झूठे सभी मलाल।।

खोटी किस्मत दीन की, इसमें किसका दोष।
व्यर्थ निकालें हम सभी, ईश्वर पर निज रोष।।

भले हमें है लग रहा, खोटी किस्मत दीन।
पर खुद वो माने नहीं, कभी स्वयं को हीन।।

खोटी किस्मत दीन की, इसमें भी उपदेश।
भला मानता वो कहाँ, जीवन कोई क्लेश।।

खोटी किस्मत आड़ में, नफरत का बाजार।
कितना देखा आपने, उसका जग संसार।।

खोटी किस्मत दीन की, क्यों करते उपहास।
मीठे बोलो शब्द दो, बिना किसी संत्रास।।

रोटी नहीं नसीब में, क़िस्मत से जो हीन।
करता है संघर्ष बहु, पर बेचारा दीन।।

श्यामा मेरी शान है, मातु भारती शान।
इससे ज्यादा कुछ नहीं, है मेरा अभिमान।।

नाम जपूँ श्यामा सदा, भारती है मम शान ।
बंसी बाजे कृष्ण जब, गूंजित आरति गान॥

श्यामा माटी को कहें, मातु भारती शान।
वीरों की कुर्बानियाँ, करती गौरव गान॥

सारी दुनिया देखती, बढ़े भारती शान।
श्याम चरण में शीश धर, करें आरती गान॥

सारी धरती गा रही, राधा-रानी नाम।
और तिरंगा देश का, नव भारत आयाम।।

पावस आई है धरा, हरियाली के साथ।
सूखे हृदय में जागी, आभा जग के माथ॥

मानव भी अब आजकल, उड़ते बने जहाज।
मान रहे वो गर्व से, उनका आया राज।।

चाह रहे यमराज भी, इतनी सुविधा आज।
पर उनको कोई नहीं, देता एक जहाज।।

उड़ने को यमलोक में, हुआ जहाज प्रबंध।
मोदी जी के साथ में, अभी-अभी अनुबंध।।

सुख-दुख को हम मानिए, मत कीजै मनुहार।
धर्म-कर्म करिए सदा, बाकी ईश्वर सार।।

जीवन में सुख -दुख सदा, होते बच्चे मीत।
सबसे ज्यादा दें हमें, अपनेपन की प्रीत।।

जीवन कागज नाव है, देगी जब तक साथ।
नहीं किसी को है पता, छोड़ जाय कब हाथ।।

पालक हैं ईश्वर-पिता, रखिए इतना ध्यान।
इनके आगे फेल है, दुनिया का विज्ञान।।

पालक संग पनीर में, नहीं रहा वो स्वाद।
जब से गायब हो रहा, पशुधन देशी खाद।।

मौन छोड़ अब कीजिए, कुछ तो आप विचार।
बस इतना अनुरोध है, सुनो मेरे करतार।।

सतगुरु ही करतार हैं, मम जीवन आधार।
उनकी पाकर मैं कृपा, समझा जा दातार।।

अब का मानव मानता, खुद को ही करतार।
वाणी और व्यवहार का, नहीं समझता सार।।

नीति नियम सिद्धांत का, भूले सभी विचार।
कुत्सित मन की भावना, निहित स्वार्थ आधार।।

धर्म -कर्म सब ताक पर, बस माया का शोर।
अंतरमन आवाज भी, हुई बहुत लतखोर।।

गुरु-कृपा से बुझ रहा, माया का अँधियार।
सत पथ दिखलाकर हमें, करते भव से पार।।

शीश झुका अरदास है, चरनन बारंबार।
कहें मित्र यमराज भी, लाज रखो सरकार।।

बिना समर्पण कुछ नहीं, सफल किसी का काज।
जितना मर्जी कीजिए, उतनी गिरती गाज।।

यदि मन की हो साधना, ईश्वर भी दे साथ।
सभी खुशी से चाहते, थामें तेरा हाथ।।

अब आस्था के साथ नित, होता है खिलवाड़।
नहीं पता कल को गिरे, कोई बड़ा पहाड़।।

अब मानव की भावना, रही जहर पी रोज।
कारण इसका है पता, व्यर्थ रहे सब खोज।।

नहीं जीत की राह भी, होती है आसान।
मिलती है केवल उसे, जो लेता है ठान।।

पक्ष-विपक्ष में है ठनी, आपस में ही रार।
दोनों में कोई नहीं, मान रहा है हार।।

सुख-दुख को हम मानिए, मत कीजै मनुहार।
धर्म-कर्म करिए सदा, बाकी ईश्वर सार।।

जीवन में सुख -दुख सदा, होते बच्चे मीत।
सबसे ज्यादा दें हमें, अपनेपन की प्रीत।।

जीवन कागज नाव है, देगी जब तक साथ।
नहीं किसी को है पता, छोड़ जाय कब हाथ।।

पहले हम अपना करें, मन के भाव पवित्र।
तब ही हम आगे बढ़ें, लेने दूजा चित्र।।

कहा मित्र यमराज ने, बनना तुझे पवित्र।
तब मैंने हँसकर कहा, मत कर बात विचित्र।।

जन्मभूमि श्री कृष्ण की, मथुरा जिसका नाम।
कुछ पापी मन चाहते, कैसे हो गुमनाम।।

कृष्ण वंश के लोग कुछ, करते हैं बदनाम।
इतने सत्ता लालची, भूले मथुरा धाम।।

मथुरा में यमराज से, हुई हमारी भेंट।
चक्कर में अपने फँसा, खाली कर दी टेट।।

सब झूठे आरोप भी, छीन रहे सुख चैन।
एक समय के बाद में, पथरा जाते नैन।।

चोरी के आरोप से, धूमिल धर्म समाज।
चरणों में प्रभु राम के, पाप कर्म का काज।।

आरोपों के बोझ से, झुकते कंधे रोज।
सच बोले तो जल उठे, झूठे करते मौज।।

न्यायालय में झूठ की, दिखती मोटी खाल।
सच कोने में हो खड़ा, खुद से करे सवाल।।

कहा मित्र यमराज ने, सब झूठे आरोप।
कोशिश करके देख लो, नहीं चलेगी तोप।।

यहाँ सभी मेहमान हैं, करें भला क्यों काम।
जैसा चाहें सब करें, बैठे हैं श्रीराम।।

चार दिनों का खेल है, रखिए इतना ध्यान।
नहीं भूलिएगा कभी, यहाँ सभी मेहमान।।

माया बंधन में फँसे, बने हुए अंजान।
कौन भला है मानता, सभी यहाँ मेहमान।।

माटी तन का दंभ है, बनते व्यर्थ महान।
तव झूठी पहचान है, यहाँ सभी मेहमान।।

मम प्रियवर यमराज से, करो-जान पहचान।
मत भूलो तुम भी यहाँ, सिर्फ एक मेहमान।।

रिश्ते ढोये जा रहे, जैसे हों सामान।
हम ऐसे क्यों हो गये, मुर्दों से लो ज्ञान।।

हमने इतना कर लिया, जोड़-गाँठ सामान।
लेकर कुछ जाना नहीं, भूला गुरु का ज्ञान।।

मुर्दा अरु सामान में, कितना सुंदर मेल।
दोनों ढोये जा रहे, देख जगत का खेल।।

जितना कम सामान के, सफर करें हम लोग।
कहें मित्र यमराज जी, बने सुखद संयोग।।

अपना सब सोचें भला, औरों का नुकसान।
यही आज के मनुज का, है उत्तम अवदान।।

हमको जो कहते बुरा, उन सबका आभार।
यही मित्र यमराज के, जीवन का है सार।।

करो बहाना तुम भले, पर भीतर लो देख।
मन के भीतर सत्य का, अक्षरशः अभिलेख।।

वादे पूरे जब नहीं, किसको इसका शोक।
इस पर होनी चाहिए, अब कानूनी टोक।।

भेष बदलकर भेड़िए, चाह रहे सम्मान।
प्रश्न बड़ा ये आज है, कैसे हो पहचान।।

चिंता इतनी है बड़ी, जिसका नहीं निदान।
लुटते अब भगवान भी, कौन करे पहचान।।

महल-अटारी से बड़े, नहीं रहे भगवान।
शरणागत पापी भरे, कैसे हो पहचान।।

कोशिश करके देख लो, व्यर्थ तुम्हारा ज्ञान।
बिना किसी गतिरोध के, कैसे हो पहचान।।


सुधीर श्रीवास्तव

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कहानी
सितारे छूना चाहूँ

पढ़ाई में होशियार नवोदित धाविका सीता के सपने बड़े थे, मगर परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। जूनियर वर्ग की प्रतियोगिताओं में उसके नाम की खूब चर्चा होती थी।
पिता उसकी उपलब्धियों से जहांँ खुश तो थे, मगर अपनी आर्थिक हालात को देखते हुए परेशान भी रहते थे कि वे बिटिया के सपनों को उड़ान दें पाने में अस्मर्थ महसूस कर रहे थे।
सीता उम्र में अभी छोटी ही थी, मगर माँ की मौत और हालातों ने उसे समझदार बना दिया। उसके पड़ोसी गाँव की एक लड़की चंदा उसकी पक्की सहेली थी।वह भी सीता की सुख-दुख में शामिल रहती थी।एक दिन उसने अपने पिता से सीता के बारे में बताया, तब काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने सीता और उसके पिता को अपने घर बुलाया और सीता को हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया।
सीता के पिता उनके कदमों में गिर पड़े, आपका यह अहसान कैसे चुका पाऊँगा।
चंदा के पिता ने उन्हें उठाया, ढाँढस बंधाया, चिंता मत कीजिए। चंदा की तरह सीता भी आज से मेरी भी बेटी है है, अब उसे दो पिताओं का संरक्षण मिलेगा। चंदा भी चाहती है कि सीता के लिए मैं कुछ करुँ।
उन्होंने सीता के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - तू बिल्कुल चिंता मत कर।तू अपने सितारे छू सके उसके लिए मैं कुछ भी करुँगा, बस तू सितारों के छूने के जिद यत छोड़ना।कल की चिंता छोड़कर मेहनत कर। हम हर हाल में हमेशा तेरे साथ खड़े रहेंगे। कोई जरूरत या परेशानी हो, तो मुझसे कहना बेटा। अब तू और चंदा दोनों मेरी बेटियाँ हों। तुम दोनों की खुशी में ही हमारी खुशी है।

अपने पापा की बात सुनकर चंदा चहककर सीता से लिपट गई।
सीता के पापा की आँखों में आँसू थे। हाथ जोड़कर उन्होंने ईश्वर का धन्यवाद किया।
चंदा के पापा ने उन्हें खींचकर कर गले लगाते हुए कहा - अब हम दोनों सीता बेटी के सितारे छूने के पलों का इंतजार करेंगे।
इतना सुनते ही सीता के पापा फफककर रो पड़े।

सुधीर श्रीवास्तव

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डिजिटल युग में पुस्तकों का भविष्य

कल रात जब यमराज मुझे शुभरात्रि कहने आया
तो मैंने डिजिटल युग में पुस्तकों के
भविष्य वाला सवाल उसके सामने उठाया,
बंदा खूँटा गाड़ कर बैठ गया
और मुझसे ही पूछने लगा - आपको क्या लगता है?
मैंने कहा - मुझे तो उज्ज्वल ही दिखता है।
इतना सुन वह भड़क गया - खाक उज्ज्वल है?
यह ठीक है कि डिजिटल युग ने आपको
अनगिनत सुख-सुविधाएं तो दे रहा है,
मगर उससे ज्यादा छीन भी तो रहा है।
आदमी के पास अपने और अपनों के लिए
समय बिल्कुल नहीं रह गया,
आत्मीय संबंध औपचारिकता के शिकार हो रहे हैं
संवेदनाएं बड़ी आसानी से मरती जा रही हैं,
ऐसे में पुस्तकों का भाव भी अब कम होता जा रहा है
पुस्तकों का चलन लगातार घटता जा रहा है
उपलब्धता-अनुपलब्धता, सुविधा-असुविधा का
तराजू मत उठाइएगा जनाब
वास्तविकता में झाँकिए, फिर ज्ञान बाँटिए।
आप हमारे मित्र हैं, बस इतना तक ही रहिए
मुझे गुमराह कर अपनी औकात मत दिखाइए
और मेरी बात ध्यान से सुनिए।
आपका ये डिजिटल युग वर्तमान हो सकता है
मगर भविष्य तो मुद्रित पुस्तकों का ही है,
ठीक वैसे ही जैसे आपके पुरातन पंथी, अनपढ़
या कम पढ़े लिखे पुरखे आज भी आपको याद आते हैं,
डिजिटल युग में पुराने रीति-रिवाज, परंपराएं
आप सब भला क्यों नहीं छोड़ पाते हैं?
बस! ऐसे ही आपके डिजिटल युगीन
और मुद्रित पुस्तकों का असली भविष्य है।
अच्छा है यमलोक में डिजिटल युग नहीं आया,
वरना मेरा तो धरती से नाता ही टूट जाता,
क्योंकि तब आत्माओं के आवागमन की सुविधा में
डिजिटल तकनीक का अनाधिकृत प्रवेश हो जाता,
और तब सबसे बड़ा दुर्भाग्य आपका होता,
क्योंकि हम दोनों के मिलन का सौभाग्य भी
सिर्फ आनलाइन ही हो पाता,
क्योंकि तब आपसे आकर मिलने के चक्कर में
मैं अपना समय ही क्यों बर्बाद करता।
बस! प्रभु अब सोचो-सम़झो और आराम करो
डिजिटल युग और उसके साथ अपना भविष्य देखो।
फिलहाल मैं शुभरात्रि बोलकर विदा लेता हूँ,
आपको आपकी डिजिटल दुनिया के
हाथों में सौंपकर अपने धाम लौटता हूँ
चिंता मत कीजिए, जल्दी ही फिर मिलता हूँ
तब आपके डिजिटल युग में पुस्तकों के भविष्य पर
लंबी बातचीत करता हूँ।

सुधीर श्रीवास्तव

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