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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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नववर्ष का मौन संदेश
***************
लो जी! एक और वर्ष बीत गया
फिर एक नया वर्ष आ गया,
हम फिर पुराने वर्ष को लापरवाही से विदा कर
नये वर्ष का तरह- तरह से स्वागत करेंगे
एक दूसरे को बधाइयाँ शुभकामनाएं देंगे
और फिर अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ेंगे।
हालांकि इसमें कुछ नया तो है नहीं,
हम तो हर वर्ष ऐसा ही करते हैं
क्योंकि यही हमारी आदत है
जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं।
गतवर्षौं के आगमन के समय भी हम ऐसा ही कर चुके हैं
और आने वाले के साथ ही नहीं
आगे आने वाले और वर्षों के साथ भी हम ऐसा ही करेंगे।
पहले भी आने वाले वर्षों के स्वागत के साथ ही
हम सबने कुछ नूतन संकल्प किए थे,
कुछ खासम-खास योजनाएं बनाई थी,
पर हमने क्या खोया-क्या पाया?
कितना हँसे-कितना रोये, क्यों हँसे-क्यों रोये?
कितना ईमानदार-कितना बेईमान रहे?
कितना लूटे- कितना लुटाया?
क्या कितना गलत या सही किया?
जो हुआ वो क्यों और कैसे हुआ ?
हमारी भूमिका कितनी सार्थक - निरर्थक रही?
हम सच की राह पर चले या ग़लत राह पर दौड़ते रहे,
इस पर कभी हम चिंतन ही नहीं करते
बस! वही पुरानी लीक पर दौड़ते जा रहे हैं
जो पाना है, ढंग से पा नहीं रहे हैं
जो खोना है, उसे कसकर जकड़े हुए हैं
बस! नये वर्ष के आगमन पर बावले हुए जा रहे हैं।
आखिर क्या नया है नये वर्ष में, जो पुराने में नहीं था,
सिर्फ कैलेंडर और वर्ष की गिनती ही तो बदली है,
मौसम की चाल तो नहीं बदली
सूर्योदय और सूर्यास्त भी अपने ढर्रे नहीं छोड़ेंगे
दिन-रात भी पहले की तरह चौबीस घंटे के ही होंगे,
अँधेरे-उजाले का क्रम भी नहीं टूटने वाला।
वास्तव में नये वर्ष में बदलना तो हमें है
जिसके लिए हम तैयार नहीं हैं,
क्योंकि हम तो कैलेंडर सरीखे लटके हुए ही खुश हैं
जीवन का एक और वर्ष बीत गया
बस इतने भर से ही खुश होकर उछल कूद रहे हैं,
जैसे पानी में लाठी मार रहे हैं।
अच्छा है नये वर्ष का स्वागत, अभिनंदन कीजिए
पर अपने शेष जीवन के लिए भी
अपनी श्री कार्य योजना भी तो तैयार कीजिए
जो बीत गया अच्छा या बुरा
उसमें मत उलझिए और आगे बढ़िए।
नया वर्ष भी आने के साथ ही पुराना होने लगता है,
जैसे जीव जन्म के साथ मृत्यु की ओर बढ़ने लगता है,
न समय पीछे जाता है, न हमारी उम्र बढ़ती है
बस क्रमानुसार वर्ष की गिनती बढ़ती
और हमारे जीवन का समय घटता है।
जिसे हम-आप बदल भी नहीं सकते
ठीक वैसे ही नया वर्ष स्वागत की लालसा में नहीं
अपने नियत समय से ही आया है और जायेगा भी।
उसके मौन संदेश को समझिए
जीवन को सफलता की ओर ले चलिए,
इसके लिए जो भी चिंतन मनन, प्रयास करना है,
बाखुशी ईमानदारी से करिए,
नया वर्ष तब ही आपको मान-सम्मान देगा
जाता हुआ वर्ष आभार धन्यवाद करेगा,
नये वर्ष का स्वागत भी,
आपके किसी काम नहीं आयेगा
ठेंगा दिखाते हुए मुस्कराएगा,
आयेगा और फिर विदा हो जायेगा।

सुधीर श्रीवास्तव

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नववर्ष और यमराज की पीड़ा
********
आप सभी को मेरे मित्र यमराज की ओर से
नववर्ष की अनंत बधाइयाँ शुभकामनाएँ,
आप स्वस्थ मस्त व्यस्त जबर्दस्त रहें
या नये वर्ष में चूल्हे भाड़ में जाएँ।
आप शराफत से स्वीकार कर लें, तो अच्छा है,
नहीं स्वीकार करें, तो ये सबसे अच्छा है
पर आप सब मेरे अपने हैं, इसलिए बता रहा हूँ
कि आप सब बड़ी भूल कर रहे हैं,
यह मैं अपनी ओर से बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ
ब्लिक ऐसा हमारे मित्र यमराज जी कह रहे हैं,
लगता है कि आप सबसे नाराज चल रहे हैं
पर मुझे नहीं लगता, वे सचमुच नाराज हैं।
फिर क्यों आप सब इतना उतावले हो रहे हैं?
जो थोड़ा भी सब्र नहीं कर पा रहे हैं,
या खुद को सबसे बड़ा बुद्धिमान समझ रहे हैं।
चलिए! मैं मान लेता हूँ कि आप बड़े बुद्धिमान हैं
यदि ऐसा है तो मित्र यमराज के सवालों का जवाब दीजिए,
मैं समझता हूँ कि वो ग़लत भी तो नहीं कह रहा है
फिर आपको इतनी मिर्ची क्यों लग रहा है?
आखिर आंग्ल नववर्ष को आप सब
इतना मान सम्मान क्यों दे रहे है?
अंग्रेजियत के लबादे में लिपटे
इस नामुराद के स्वागत में बिछे क्यों जा रहे हैं?
नाच, गाकर उत्सव मना रहे हैं
सड़कों पर जमकर हुड़दंग कर रहे हैं,
सभ्यता, संस्कार, मर्यादा को ताक पर रख रहे हैं,
आधी रात से आंग्ल नववर्ष की बधाइयाँ, शुभकामनाएं
औपचारिकतावश इनको, उनको देने में लग जा रहे हैं।
मगर हमारे मित्र यमराज को भी बताइए
आखिर इसमें कौन-सा तीर मार रहे हैं?
अपनी भारतीय संस्कृति, सभ्यता, संस्कार को
अंग्रेजियत का लबादा ओढ़ अपमानित कर रहे हैं।
क्या सनातनी नववर्ष को भी इतना ही मान-सम्मान देते हैं ?
उसके आगमन की खुशी में भी इसी तरह कसीदे पढ़ते हैं?
इसी उल्लास से, नाच गाकर स्वागत अभिनंदन करते हैं,
और तो और कितनों को सनातनी नववर्ष की
बाखुशी बधाइयाँ, शुभकामना देते हैं?
सच तो यह जनाब आप सब भ्रम में जी रहे हैं,
अपने हाथों अपने अपमान संग
खुद को ही गुमराह कर रहे हैं,
थोक में दोषारोपण औरों पर कर रहे हैं।
अब मैंने तो अभी तक कुछ कहा ही नहीं,
सिर्फ मित्रता का धर्म निभाया,
नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ
मित्र यमराज की पीड़ा ही तो दोहराया,
अब यह आपकी समस्या है कि आपके भेजे में
मेरे मित्र की पीड़ा कितना गहरे तक उतर पाया,
या सिर्फ औपचारिकताओं की चाशनी में लिपट
सिर्फ नववर्ष की बधाइयाँ, शुभकामनाओं ने ही कब्जा जमाया,
और आपको मेरे मित्र यमराज की पीड़ा का
तनिक बोध तक नहीं हो पाया।
तब यमराज मित्र की बधाइयाँ, शुभकामनाओं का
सवाल ही भला कहाँ आया?
मतलब साफ़ है कि आप सबने
मेरे मित्र का सिर्फ दिल ही दुखाया,
उसकी आंग्ल नववर्ष की बधाइयाँ, शुभकामनाओं को
असंवेदनशील बन हवा में उड़ाया,
एक बार भी यमराज मित्र का ख्याल
आप शुभचिंतकों को नहीं आया,
तब यमराज मित्र के इतना कहने सुनने का
मतलब ही क्या रह गया भाया?
फिर भी मैंने नववर्ष के बेसुरे राग संग
बधाइयाँ, शुभकामनाओं और पीड़ा को
ससम्मान आप तक तो पहुँचाया।

सुधीर श्रीवास्तव

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नववर्ष की औपचारिक बधाइयाँ
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नववर्ष आ गया, तो इसमें नया क्या है?
आना जाना तो प्रकृति का नियम है,
जो आया है, उसका जाना भी निश्चित है
हम आप भी तो एक दिन आये थे
और एक दिन निश्चित ही चले जायेंगे।
मगर हम हों या आप बड़े अजीब हैं,
आंग्ल नववर्ष के स्वागत की तैयारियों में
हफ्तों पहले से लग जाते हैं,
जब तक एक जनवरी आता है
तब तक जाने कितनों को
अग्रिम बधाइयाँ, शुभकामनाओं की
खानापूर्ति कर हाथ झाड़ लेते हैं,
और फिर इकत्तीस दिसंबर की रात
तरह - तरह के चोंचले करते हैं,
झूमते-नाचते-गाते, हुड़दंग करते
और जाने क्या-क्या तमाशा करते हैं
अंग्रेजियत का लबादा ओढ़े बड़ा लम्बरदार बनते हैं
नववर्ष के सबसे बड़े खैरख्वाह हम आप बनते हैं
आधी रात से ही सोशल मीडिया पर
नववर्ष के ब्रांड एंबेसडर बनने की होड़ में लगे जाते हैं
बधाइयाँ शुभकामनाओं से लोगों की
नींद हराम करने में जुट जाते हैं।
कड़ुआ तो लगेगा, पर बहुत ग़लत करते हैं
क्योंकि हिंदी नववर्ष को इतना मान जो नहीं देते हैं,
सनातनी हिन्दू कहने में तो बड़ा गर्व करते हैं
लेकिन सनातनी नववर्ष को भाव तक नहीं देते हैं
वैसे देखा जाए तो यह अच्छा भी है
कि औपचारिकताओं का तमाशा तो नहीं करते हैं,
वैसे भी हम आप बधाइयाँ शुभकामनाएं
दिल से कब, कहाँ और कितना देते हैं?
औपचारिकता की चाशनी में
सिर्फ दिखावे की जलेबी बनाते हैं,
इसीलिए तो हम-आप आंग्ल नववर्ष पर
इतना तामझाम, अनावश्यक तमाशा करते हैं,
सनातनी नववर्ष की उपेक्षा करके भी
उसे अपमान से तो दूर रखते हैं,
यह क्या उस पर कम अहसान करते हैं?
आंग्ल नववर्ष का शानदार स्वागत करते हैं
बधाइयाँ शुभकामनाओं की ओट में
बद्दुआओं का पिटारा बाँटकर बड़ा खुश होते हैं,
आपको शिकवा शिकायत न रहे
इसलिए हम भी बहती गंगा में हाथ धो ले रहे हैं,
ईमानदारी से कहता हूँ
कुछ मन, बड़े बेमन से आप सबको
हम भी आंग्ल नववर्ष की बधाइयाँ शुभकामनाएं देते हैं,
बदले में आप सबकी बधाइयाँ शुभकामनाएं
मजबूरी में सही स्वीकार करते हैं,
इसके लिए आंग्ल नववर्ष का
बहुत -बहुत आभार, धन्यवाद कर रहे हैं,
आप सब के साथ आंग्ल नववर्ष के
स्वागत अभिनंदन की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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नववर्ष और यमराज की सीख
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अति उत्साह में दो दिन पूर्व ही
मैंने यमराज को फोन लगाया
और बड़े प्यार से नववर्ष की
अग्रिम बधाइयाँ शुभकामनाएं देकर दुलराया।
प्रत्युत्तर में उसने मौन साध लिया
मुझे लगा कि शायद नेटवर्क बाधा ने
मेरे संदेश को बीच में ही लपक लिया,
मैंने अपना संदेश दोहराया
सुनते ही बंदा हत्थे से उखड़ गया।
हमनें आपसे कब इस नामुराद नववर्ष की
बधाइयाँ शुभकामनाएं माँगी थी?
मैंने कहा - अरे यार!
बधाइयाँ शुभकामनाओं कोई माँगता है क्या?
यह तो महज एक औपचारिकता है,
जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ, प्रमुख पर्व
तीज-त्योहार, विशेष अवसर या सफलता की तरह
एक अवसर हमें आंग्ल नववर्ष भी तो देता है
हर कोई अपने और अपनों को
बधाइयाँ शुभकामनाएं देता है,
उनके और उनके परिवार के
सुख, समृद्धि की कामना करता है,
भले ही औपचारिकताओं की परंपरा निभाता है
तब तू ही बता कि तुझे बधाइयाँ शुभकामनाएं देना
भला अपराध की किस श्रेणी में आता है?
बदले में यमराज ने मुझे आइना दिखाया-
क्या सनातनी हिंदू नववर्ष पर मुझे
बधाइयाँ शुभकामनाएं देने का ख्याल भी
इसके पहले कभी आपको आया?
बस! इसीलिए मुझे गुस्सा आया।
बड़ा अफसोस होता है आप सबकी सोच पर
जो अपना है, उसे भाव नहीं देते
अपनी सभ्यता, संस्कृति, संस्कार का सम्मान नहीं करते
जो सदियों से चला आ रहा है
जिसकी प्रमाणिकता मान सम्मान, महत्व,
पौराणिक ग्रंथों वेद, पुराण, उपनिषदों में
आज तक मिलता आ रहा है,
आधुनिक विज्ञान भी जिसके आगे सिर झुकाता है।
मगर आपको यह सब कहाँ समझ आता है?
सिर्फ बकवास ही तो सुहाता है,
क्योंकि आपको तो आधुनिकता का रंग ही भाता है।
मगर सच कहूँ तो आपका यह पुनीत व्यवहार
जाने क्यूँ मुझे अंदर तक घायल कर जाता है,
आप मेरे मित्र हो, इसलिए आप पर गुस्सा भी आता है।
आप अंग्रेजी नववर्ष का स्वागत अभिनंदन कीजिए
जी भरकर बधाइयाँ, शुभकामनाएं दीजिए,
दारु, रम, व्हिस्की पीकर हुड़दंग कीजिए
यार दोस्तों संग पार्टी कीजिए,
वैसे भी मेरी बात आपको समझ नहीं आयेगी।
इसलिए जो भी करना हो खुलकर करिए
मगर मुझे इन सब चोंचलों से मुझे दूर ही रखिए
बधाइयाँ, शुभकामनाएं देने की उत्सुकता को
सनातनी नववर्ष, नव संवत्सर तक सहेजकर रखिए
और अभी के अभी बिना किसी तर्क वितर्क के
फिलहाल फोन को विश्राम दीजिए,
नव संवत्सर के शुभ-दिन का इंतजार कीजिए,
तब तक के लिए इन बधाइयाँ शुभकामनाओं को
अपने पास बहुत सहेजकर रखिए,
आंग्ल नववर्ष के आगमन पर मेरी और से
औपचारिक बधाइयाँ शुभकामनाएं
सहर्ष स्वीकार कर तनिक तो मुस्कराइए।

सुधीर श्रीवास्तव

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बेचारा यमराज
*********
आज दोपहर मित्र यमराज आये
पहले तो पेट की भूख मिटाए,
फिर अपनी पर उतर आये।
कहने लगे - प्र‌भु! मुझ पर ध्यान कब दोगे?
मेरे साथ आखिर कब चलोगे?
आपके बिना अब मेरा मन नहीं लगता है
जैसे कुछ खोया-खोया सा लगता है,
अब आप निर्णय लीजिए
और मेरे साथ चलने की सहमति दीजिए।
मैं मुस्कराया - तू बड़ा बेवकूफ है भाया
जब मैं तैयार था तो तू क्यों नहीं आया?
अब इसमें मेरा क्या दोष है?
यदि तुझे मेरा प्रस्ताव ही समझ में नहीं आया।
पर अब भी तुझे परेशान होने की जरूरत नहीं है,
प्रस्ताव की फाइल अभी तक खुली है,
बड़ा उत्सुक है, तो फाइल बंद कर दे
मुझे अपने साथ लेकर अभी चल दे
मैंने तुझे रोका ही कब है?
जो तेरे मन में इतनी होने लगी हलचल।
अब तनिक भी देर मत कर- मेरा बैग उठा
क्या पता कब तेरा मन बदल जाए?
और फिर कल को, तू मुझ पर ही थोक मेंआरोप लगाए,
या वापस जाकर यमलोक में आँसू बहाए।
तू अपना यार है,
क्या ये बात तुझे फिर से तुझे बताऊँ?
या ये बता तेरी खुशी के लिए
आखिर किस हद तक गुजर जाऊँ?
अब तू मुझे साथ लेकर चलेगा? या हम तुझे लेकर चलें,
तू जैसा चाहे, वैसा ही मैं करुँ।
तेरी खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ,
इतिहास तो क्या भूगोल भी बदल सकता हूँ,
अपने यार के लिए मैं अकेले ही
अभी के अभी सीधे यमलोक तक जा सकता हूँ।
यमराज को मौन देख मैंने उसे हिलाया
वो हड़बड़ाया, क्या प्रभु! आपने मुझे क्यों जगाया?
दो मिनट चैन से सोने भी नहीं दे सकते थे
जो कहना था थोड़ा ठहरकर नहीं कह सकते थे?
आखिर यार की अच्छी भली नींद से
ये दुश्मनी क्यों निभाया?
इतना सुन मुझे इतना गुस्सा आया
कि मैंने तत्काल अपना डंडा उठाया
बेचारा यमराज भागता हुआ दूर नजर आया,
फिर भी मुझे अपने प्यारे यार पर बड़ा तरस
और खुद पर गुस्सा भी आया,
कि मित्र को आखिर मैंने नींद से जगाकर
कौन सा भारत रत्न पाया?

सुधीर श्रीवास्तव

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सच ही लिखेंगे
*************
कुछ लिखने की सोच तो रहा हूँ
पर समझ नहीं आ रहा है कि लिखूँ क्या?
क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?
ज्यादा नहीं थोड़ा अहसान कर सकते हैं?
मगर आप तो करोगे नहीं?
क्योंकि आपके हाव-भाव यही तो कह रहे हैं।
पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा
आज नहीं तो कल जरूर लिखूँगा ।
मगर जब भी लिखूँगा, आपका पर्दाफाश ही करुँगा?
यह मत सोचिए कि मुझे कुछ पता नहीं है
सब कुछ जानता हूँ आपके बारे में
आपके नकली मुखौटे या चाल, चरित्र, चेहरे की
सब जानता हूँ, सारा कच्चा चिठ्ठा खोल कर रख दूँगा।
फिर भी थोड़ा इंतजार कर रहा हूँ
कि शायद अब भी आप सुधर जाएँ,
अपनी कमियों का अहसास कर सुधार में जुट जाएँ।
यदि आप ऐसा करेंगे भी
तो किसी पर अहसान बिल्कुल नहीं करेंगे,
बल्कि अपनी ही छवि में सुधार करेंगे।
हमारा क्या है? हम तो हैं ऐसे,
जैसा कि आप भी अच्छे से जानते हैं
आज लिखें या कल, पर सच ही लिखेंगे।
तब आप सबसे पहले दोष तो मुझे ही देंगे,
मगर मैं भी क्या करुँ, आदत से मजबूर हूँ,
आइने की धूल हटाकर सामने कर देंगे
और आपका इतिहास दुनिया को अच्छे से पढ़ा देंगे।
वैसे भी कौन सा आप मेरे बड़े खैरख्वाह हो
जो मेरा तंबू उखाड़ कर फेंक दोगे,
सच कहता सिर्फ खुद पर शर्मिन्दा होंगे
और मुझे जी भर कर गालियाँ देते हुए
मुंँह छिपाते इधर-उधर फिरोगे
क्योंकि आप चाहकर भी रोक नहीं पाओगे।

सुधीर श्रीवास्तव

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मायूसी
*********
मायूसी महज एक विचार, एक भाव है
हमारी नकारात्मकता और आत्मिक कमजोरी है,
खुद पर अविश्वास मिश्रित डर है।
मायूसी को हम-आप बढ़ावा देते हैं
उसे अपने सिर पर बिठाते हैं,
उसके स्वागत में पलक पाँवड़े बिछाए देते हैं
खुद पर हावी होने का अवसर देते हैं।
वरना मायूसी इतनी मजबूत नहीं है
जो हम पर भारी पड़ जाये,
और खूँटा गाड़ कर बैठ जाये।
यदि हम उसे अवसर ही न दें तो
मायूसी खुद मायूस होकर वापस लौट जाएगी।
अच्छा है मायूसी को भाव देना बंद कीजिए
अपने आप पर इतना तो विश्वास कीजिए,
मायूसी यदि हठधर्मी पर उतर आए
तो उससे दो दो हाथ करने का हौसला कीजिए।
मायूसी आपसे है, आप मायूसी से नहीं
यह भाव निज मन में जगाए रखें,
तब मायूसी खुद-बखुद मायूस हो जायेगी
जब उसकी दाल ही नहीं गल पायेगी,
तब वो हमारी आपकी बगलगीर बनने की
भला सोच ही कब पायेगी?
हमारे आपके पास कौन सा मुँह लेकर आयेगी,
मजबूरी में ही सही दूर ही रहेगी
और जैसे तैसे अपना मुँह ही तो छिपायेगी,
मगर आसपास नजर नहीं आयेगी।

सुधीर श्रीवास्तव

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शिखर पुरुष डा. राजेन्द्र प्रसाद जी
***********
तीन दिसंबर को अठारह सौ चौरासी को
जन्में थे बाबू राजेन्द्र प्रसाद,
जीरादेई गाँव, जिला सीवान, बिहार राज्य को
इसीलिए तो करते हैं हम सब याद।
कमलेश्वरी देवी माता उनकी,
पिता थे सहाय शंकरदयाल,
स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति यही बना था लाल।
एक महान वकील, शिक्षक और लेखक
जिसने अपना जीवन समर्पित कर दिया,
पूरी तरह देश सेवा के नाम ।
भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान देकर
किया था श्रेष्ठतम काम,
1962 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
भारत रत्न हुआ उनके नाम।
महान नेता, स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षा शास्त्री
सादगी, ईमानदारी और नेतृत्व क्षमता से
उन्हें मिला महान नेता का मान-सम्मान,
1950 से 1962 तक बारह वर्ष तक
राष्ट्रपति पद किया शोभायमान।
शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता को
बढ़ावा देने में बड़ा योगदान दिया,
संविधान सभा के अध्यक्ष बने
भारतीय संविधान के निर्माण में
महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया,
संविधान सभा बैठकों की अध्यक्षता
संविधान के मसौदे पर चर्चा-परिचर्चा में
अग्रणी रहकर सक्रियता से भाग लेकर
अपनी नेतृत्व क्षमता और समझ से
संविधान निर्माण में श्रेष्ठतर योगदान दिया,
अपनी पुस्तक "इंडिया डिवाइडेड" से भी
दुनिया में बड़ा नाम, सम्मान, पहचान प्राप्त किया
28 फरवरी 1963 को उनके देहावसान से
एक दैदीप्यमान दीपक बुझ गया।
उनकी सादगी, दूरदृष्टि, कर्मशीलता और नेतृत्व क्षमता
आज हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है,
उनके आदर्शों को आत्मसात करते हुए
देश सेवा में अपना योगदान ही हमारा उद्देश्य है।
ईश्वर हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें
हममें सादगी, ईमानदारी, देश सेवा का भाव भरें,
आज बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी की जयंती पर
हम सब उन्हें नमन वंदन करते हैं,
उनके व्यक्तित्व, कृतित्व को याद करते हैं
उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेते हैं
और अपने श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हैं,
बड़ी शिद्दत से हम सब भारतवासी
शिखर पुरुष बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी को याद करते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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किनारा
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किनारा करने की वजह का मूल्यांकन जरुरी है,
या किनारा करने की सिर्फ मजबूरी है,
जो भी है, आजकल रिश्तों में बढ़ रही दूरी है।
अपने अपनों से किनारा कर रहे हैं,
बेवजह के आरोप लगा खुद को सही बता रहे हैं,
पर कौन समझाए हमारी सोच को?
जो हम अपने माता-पिता से भी किनारा कर रहे हैं,
अपनों को ही अपना दुश्मन मान लें रहे हैं।
रिश्तों में औपचारिकताओं का बोलबाला बढ़ रहा है,
और तो और मानव मशीन बनता जा रहा है,
अपने और अपनों की बात तो छोड़िए
वो तो अपने आप से भी किनारा कर रहा है।
संवेदनाओं को ढकेल कर किनारे कर रहा है,
प्रतिस्पर्धा में अपने हित और भविष्य को भी
ताक पर रखने को आतुर हो रहा है,
आधुनिकता के इस दौर में मानव
तकनीक की मशीन बनने की ओर स्वयं ही बढ़ रहा है।
मानव ही मानव को दफन कर रहा है
परिवार समाज से किनारा कर रहा है,
इस चक्कर में उल्टे सीधे तर्क दे रहा है
अपने आपमें से ही उलझता जा रहा है,
ऐसा लगता है कि बुद्धि विवेक से हीन हो रहा है।

सुधीर श्रीवास्तव

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किनारा
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किनारा करने की वजह का मूल्यांकन जरुरी है,
या किनारा करने की सिर्फ मजबूरी है,
जो भी है, आजकल रिश्तों में बढ़ रही दूरी है।
अपने अपनों से किनारा कर रहे हैं,
बेवजह के आरोप लगा खुद को सही बता रहे हैं,
पर कौन समझाए हमारी सोच को?
जो हम अपने माता-पिता से भी किनारा कर रहे हैं,
अपनों को ही अपना दुश्मन मान लें रहे हैं।
रिश्तों में औपचारिकताओं का बोलबाला बढ़ रहा है,
और तो और मानव मशीन बनता जा रहा है,
अपने और अपनों की बात तो छोड़िए
वो तो अपने आप से भी किनारा कर रहा है।
संवेदनाओं को ढकेल कर किनारे कर रहा है,
प्रतिस्पर्धा में अपने हित और भविष्य को भी
ताक पर रखने को आतुर हो रहा है,
आधुनिकता के इस दौर में मानव
तकनीक की मशीन बनने की ओर स्वयं ही बढ़ रहा है।
मानव ही मानव को दफन कर रहा है
परिवार समाज से किनारा कर रहा है,
इस चक्कर में उल्टे सीधे तर्क दे रहा है
अपने आपमें से ही उलझता जा रहा है,
ऐसा लगता है कि बुद्धि विवेक से हीन हो रहा है।

सुधीर श्रीवास्तव

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