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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
(48k)

कुण्डलिनी छंद
*************
माया में हर जन फँसा, बना हुआ है हीन।
ठगनी उसको ठग रही, और संग में दीन।।
और संग में दीन, कौन लगता ठुकराया।
कहें मित्र यमराज, यही तो बंधन माया।।३१

लालच में इसके फँसे, हो पाते कब दूर।
ज्ञान, ध्यान, विज्ञान, सब होते मजबूर।।
सब होते मजबूर, द्वंद्व का भारी कच-कच।
माया के आधीन, स्वार्थ का होता लालच।।३२

जानें कब हम हो गये, माया के आधीन।
और आज अब हम सभी, बनकर घूमें दीन।।
बनकर घूमें दीन, आज हम खुद ही मानें।
आगे का अब हाल, हमारे ईश्वर जानें।।३३

मँहगाई की मार, रही रो जनता सारी।
सोच रही दिन रात, नई आई बीमारी।।
नई आई बीमारी, व्यर्थ कहना दुखदाई।
कहें मित्र यमराज, नया रिश्ता मँहगाई।।३४

मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज।
हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।।
बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई।
कहें मित्र यमराज, जान लेगी मँहगाई ।।३५

पावन गंगा नीर है, गाते हम गुणगान।
उससे ज्यादा है हमें, खुद पर अब अभिमान।।
खुद पर अब अभिमान, देखिए सब मनभावन।
कहें मित्र यमराज, मातु मम गंगा पावन।।३६


मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज।
हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।।
बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई।
कहें मित्र यमराज, जान लेगी मँहगाई ।।३७

अब तो जीवन से बड़ा, भारी हुआ दहेज।
हम सब अपनी बेटियाँ, पाते नहीं सहेज।।
कहें मित्र यमराज, ठाट से बैठो महतो।
लेना खूब दहेज, काम है केवल अब तो।।३८

पैसे का सब खेल है, लेना आप सहेज।
बड़े गर्व से कह रहा, मेरा नाम दहेज।।
मेरा नाम दहेज, दोष दूजे का कैसे।
हमको भी तो यार, सिर्फ दिखते हैं पैसे।।३९

अपने पर भी अब नहीं, रहा मुझे विश्वास।
केवल तुझसे है बची, मेरी अंतिम आस।।
कहें मित्र यमराज, देखते रहना सपने।
बड़े धैर्य के साथ, सोच कितने अब अपने।।४०

मानव जीवन कुछ नहीं, बस केवल अतिरेक।
पद पैसा पहचान का, करते सब अभिषेक।।
करते सब अभिषेक, काम इनका जस दानव।
कहें मित्र यमराज, आज ऐसा क्यों मानव।।४१

हमको इतना है पता, समय बड़ा बलवान।
पर कुंठित हम लोग हैं, पढ़ आये विज्ञान।।
पढ़ आये विज्ञान, आज बीमारी सबको।
इसका सफल इलाज, मित्र बतलाओ हमको।।४२

जमकर हिंसा कीजिए, छोड़ो व्यर्थ विचार।
यही आज का है बड़ा, मानो निज आधार।।
मानो निज आधार, छोड़ सब ये पहले कर।
नाचो-गाओ खूब, संग मस्ती कर जमकर।। ४३

सुधीर श्रीवास्तव

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मुक्तक
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दोहा मुक्तक
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जैसे जिसके कर्म हैं, वैसा ही परिणाम।
व्यर्थ आप हैरान हैं, नाम हुआ बदनाम।।
कहाँ किसी की बात का, देते आप महत्व-
फिर दुबले क्यों हो रहे, टकराओ नित जाम।।

मोह आप मत कीजिए, मानो मेरी बात।
बड़े कष्ट में आपकी, कट पायेगी रात।
कहें मित्र यमराज भी, कर लो सोच-विचार-
इस चक्कर में कल कहीं, मिले मुफ्त में लात।।

रिश्ता था कोई नहीं, फिर भी इतना मोह।
डर भी लगता था बहुत, पीड़ा बने विछोह।
मम प्रियवर यमराज भी, देते मुझको ज्ञान-
मर्यादित रहना सदा, तजकर ऊहा पोह।।

कुछ तिलचट्टे चाटते, घूम-घूमकर देश।
जाने कैसा है मिला, कुत्सित सा परिवेश।।
भाव नीच नित ये रखें, करते भ्रष्टाचार -
यहाँ-वहाँ यों नाचते, खोले डायन केश।।

तिलचट्टों के झुंड पर, व्यर्थ आपका वार।
कोशिश अपनी क्यों भला, हम करते बेकार।।
सृष्टि प्रलय भी मारकर, पाती नहीं सुकून-
सहनशक्ति इनकी सदा, होती बड़ी अपार।।

मानव जीवन है मिला, इसे दीजिए मान।
कुत्सित होती भावना, करो अभी बलिदान।।
आग वासना की जले, उसे रोक लो मित्र-
वरना जलेंगे आप भी, यही मुफ्त का ज्ञान।।
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रोला मुक्तक
*********
कितना भी मतभेद, नहीं कीजिए लड़ाई।
और आपके बीच, सदा हो व्यर्थ बड़ाई।।
कहें मित्र यमराज, होश में रहिए सारे-
सबके हित की बात, एकता केवल भाई।।
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चौपाई मुक्तक
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पहले जैसा प्यार नहीं है।
मान रहे तकरार सही है।
जाने खुद को समझ रहे क्या -
घर का खाता सही नहीं है।।

कल के जैसी बात नहीं है।
हमें किसी से प्यार नहीं है।
सभी स्वार्थ में इतना डूबे-
पहले जैसा प्यार नहीं है।।
********

बेटियाँ माता-पिता की जान होती हैं।
उनका मान सम्मान स्वाभिमान होती हैं।
जानें क्यों नहीं समझता है ये समाज-
इनको रुलाने से जान ही बेजान होती है।।

परंपरा की आड़ में हम परंपरा निभाते हैं।
नाहक बदनाम हैं कि हम परंपरा चलाते हैं।
कुछ भी कहते रहिए आप हमें चाहे जितना -
हम तो अब परंपरा खाते और खिलाते हैं।।

भूखे प्यासे को भोजन पानी दीजिए।
मज़ा नहीं आ रहा है तो कर्ज लीजिए।
कुछ नहीं रखा अब सूकून से जीनें में -
भेष बदलिए और कत्लेआम कीजिए।।

आँसू उसके पोंछकर क्या पा गए।
भूखे थे क्या पेट तेरे भर गए।
इसका पीछे राज क्या है, मित्रवर-
या तुम्हारे हम सभी दुश्मन हुए।।

सबसे प्यारा मित्र आज यमराज है।
दुनिया कहती यही कोढ़ में खाज है।
इसके पीछे राज भला तुम क्या जानो-
चमक रहा यमराज मित्र का ताज है।।

प्रेम सद्भावना हम पढ़ाते रहे।
गीत मीठे मधुर हम सुनाते रहे।
कर्म पथ पर अडिग मैं रहूँ उम्र भर-
कामना आप सब मुस्कराते रहें।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद
श्रम साधक का बहे पसीना

श्रम साधक का बहे पसीना।
चाहे सुख से वो भी जीना।।
करना चाहे सपने पूरे।
जो भी अब तक रहे अधूरे।।

श्रम साधक उन्नति पथ चलता।
निज परिजन का पालन करता।।
तभी राष्ट्र भी आगे बढ़ता।
नव विकास की गाथा लिखता।।

श्रम साधक का मोल समझना।
हेय दृष्टि मत आप देखना।।
श्रम साधक का मूल्य समझिए।
दे सम्मान निकट ही रखिए।।

मानो इनको आप धरोहर।
ये भी तो हैं आप सहोदर।।
बहा रहे दिन रात पसीना।
हँसी-खुशी चाहते जीना।।

ये कोई अपराध नहीं है।
हक इनका खैरात नहीं है।।
भीख नहीं ये माँग रहे हैं।
जाने कितने कष्ट सहे हैं।।

हम भी तो कर्तव्य निभाएँ।
श्रम साधक को गले लगाएँ।।
नित नूतन गाथा है लिखता।
श्रम से कभी न पीछे हटता।।

बस! ऐसा श्रम साधक होता।
बीज सदा खुशियों के बोता।।
करता निशदिन श्रम से सेवा।।
पर खा पाता कब वो मेवा।।

सुधीर श्रीवास्तव

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सरसी छंद गीत (१६, ११)
लोभ मोह में उलझा मानव

लोभ मोह में उलझा मानव, बनी हुई है पीर।
कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ बहाते नीर।।

इस दुनिया की गजब कहानी, सभी सुनाते रोज।
अपने निजी स्वार्थ की दुनिया, सभी रहे हैं खोज।।
राज कभी इसके पीछे का, बिल्कुल नहीं पनीर।।
राज छुपा इस रोग बीच में, दिखे न कोई चीर।।

बेशर्मी इन सबकी देखो, खड़े हुए सब मौन।
इन्हें देखकर कहना मुश्किल, आखिर ये सब कौन।।
पर इनके भीतर की मंशा, करती इन्हें अधीर।
कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ बहाते नीर।।

नहीं कदर वो करें किसी की, मन के कुत्सित भाव।
इसीलिए तो समझ न पाते, दूजी पीड़ा घाव।।
इनका नहीं दर्द से नाता, व्यर्थ हृदय की चीर।।
कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ बहाते नीर।।

पाप-कर्म जीवन का हिस्सा, धन-दौलत ईमान।
इसके आगे और नहीं कुछ, इनको होता ज्ञान।।
मान रहे ये फेल सभी हैं, जग के पीर फकीर।।
कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ बहाते नीर।।

मानव जीवन की कुर्बानी, भला करें क्यो याद।
यह तो इनको ऐसे लगता, करते हम फरियाद।।
घड़ियाली आँसू से इनके, बचकर रहो सुधीर।
कैसे कोई समझाए इनको, व्यर्थ बहाते नीर।।


सुधीर श्रीवास्तव

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व्यंग्य - गंगा दशहरा
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आप सभी को बधाइयाँ शुभकामनाएँ हैं
क्योंकि आज गंगा दशहरा है
इस दिवस की भी औपचारिकता निभाइए।
और कुछ तो आप कर नहीं सकते
माँ गंगा का अपमान कर उपहास ही कीजि
उनका आँचल मैला कीजिए।
उनकी लहरों के बीच नाव में बैठकर
मांस-मदिरा का आनंद लीजिए
और हड्डियाँ, जूठे पत्तल, गिलास
उनके आँचल में फेंक जाति-धर्म का नंगा नाच कीजिए।
वैसे भी माँ गंगा भला आपका क्या बिगाड़ लेंगी
वो माँ हैं, मजबूरी में ही सही,सब सह ही लेंगी।
जैसे गाय भी तो हमारी माता हैं
जिन्हें कुछ भी तो नहीं आता है।
आप बड़े बेवकूफ और हम समझदार हैं
क्या अब यह भी हम ही बताएँ?
कि इसमें आखिर किसका, कितना अपराध है,
हम जन्म देने वाली माँ को जब कुछ नहीं समझते हैं,
तब आप गंगा और गऊ माँ के नाम
नाहक भाषण देकर अपना समय बर्बाद करने का
भारी अपराध भला कैसे कर सकते हैं?
हम माँ गंगा के लाड़ले लाल हैं
गंगा दशहरा की औपचारिकता निभाकर
अपना अधिकतम कर्तव्य निभाते हैं,
आपकी तरह बेवजह समय नहीं बर्बाद करते हैं।
अब आपको नहीं समझ आता
तो भला हम क्या कर सकते हैं?
हम भी आपकी तरह बेवकूफ तो नहीं हो सकते हैं।
गंगा हमारी माँ है!
हम उसके साथ कुछ भी करने का
जन्म सिद्ध अधिकार रखते हैं,
बस! इसीलिए तो गंगा दशहरा मनाते हैं,
बड़ी मुश्किल से किसी तरह माँ गंगा पर
इतना बड़ा एहसान करने का समय निकाल पाते हैं,
उसको नमन वंदन कर याद करने का उपक्रम करते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - बिटिया

मातु-पिता की प्यारी बिटिया।
सुख की नींद सुलाती बिटिया।।
दो-दो घर महकाती बिटिया।
ममता पाठ पढ़ाती बिटिया।।

जीवन पथ पर जाना बिटिया।
कुल का मान बढ़ाना बिटिया।।
काम सभी उत्तम ही करना।
आगे बढ़ना कभी न डरना।।

मातृशक्ति तुम देवी रूपा।
पूजी जाती सकल अनूपा।।
बेटी पत्नी बहना माता।
घर परिवार की सुख प्रदाता।।

समय साथ तुम आगे बढ़ना।
हर मुश्किल से डटकर लड़ना।।
अपनीज्ञ ताकत जान गई हो।
सकल जगत पहचान नई हो।।

शीश कभी मत झुकने पाए।
राष्ट्र तुम्हारी गाथा गाए।।
जिम्मेदारी भारी बिटिया।
बदलेगी ये दुनिया बिटिया।।

बिटिया कहती सब-जन जागे।
फिर शासन सत्ता नहिं भागे।।
मेरा क्या है दोष बताओ।
दोष नहीं तो न्याय दिलाओ।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद (गीत) (१६,१६)
सीखो वृक्षों से अपनापन

सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।
मुस्काते सबके घर आँगन, लगते सबको बड़े सुहावन।।

तन मन में हैं स्फूर्ति जगाते। छाया देकर हमें लुभाते।। प्राण वायु दें वृक्ष हमारे, फल देकर सम्मोहित सारे।।
बिना स्वार्थ के जीवन जीते, पानी भी ये कम ही पीते।
मुस्कायें सबके घर-आंगन, करो न इनसे बेगानापन।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।१।।

ऑक्सीजन देते जीवन भर, फिर क्यों इनका करें निरादर।।
पूरे जीवन काम हैं आते, मरकर भी वे साथ निभाते।
जन्म संग रिश्ता है जोड़ें, वे श्मशान जल नाता छोड़ें।।
मुस्कायें सबके घर- आँगन, करे न इनसे कोई पलायन।।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।२।।

भले स्वार्थ में हम फँस जाते, पर ये कभी नहीं उलझाते।।
मौन साधना पथ पर चलते, अपने जीवन से हैं लड़ते ।।
जिसे समझना हम कब चाहें, लगें कंटीली इनकी बाँहें।।
मुस्कायें सबके घर-आँगन, महकायें मधुबन ये कानन ।।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।३।।

हम सब इनको समझ न पाते, असमय काल गाल पहुँचाते।
धरती की कटान ये रोकें, इनसे ही वारिश के झोंके।।
वातावरण संतुलित रखते, हर दुख सहकर भी हैं हँसते।।
मुस्कायें सबके घर-आंँगन, लाते ये ही हरियालापन।।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।४।।

वृक्षों का सब आदर करिए, श्रद्धा भाव हृदय में रखिए।
अच्छा है कुछ इनसे सीखो, नहीं कभी तुम प्यारे चीखो।।
करो सदा इनका गुण गायन, नहीं समझना इनको जायन।
मुस्काते सबके घर-आँगन, लगते सबको बड़े सुहावन ।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।५।‌।

वृक्षों का सब आदर करिए, श्रद्धा भाव हृदय में रखिए।
अच्छा है कुछ इनसे सीखो, ताकि तुम कल में न चीखो।।
करो सदा इनका गुण गायन, कभी न समझो इनको जायन।
मुस्काते सबके घर-आंगन, लगते सबको बड़े सुहावन ।
सीखो वृक्षों से अपनापन, जीवन मधुरिम हो मनभावन।।६।‌।

सुधीर श्रीवास्तव

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आइकू 
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आइए
चलें हम
मंजिल की ओर 
जिसका कुछ पता नहीं।१

गिरना
गिरकर उठना 
और फिर गिरना 
मगर हार मत मानना।२

भेंट 
चढ़ गई 
वो फिर आज
रसूख की बलिबेदी पर।३

सनातन 
संस्कृति परंपरा 
का संवाहक है 
समय बदल रहा है।४

छोड़िए 
इंतजार उसका
जिसे पता नहीं 
आप जिंदा भी हैं।५

कल
कितना हँसाया 
और आज देखो
सैलाबी समंदर में डुबोया।६

कविता 
लिखते सब
बिना सोचे समझे 
क्या, क्यों, कब-तक।७

इतना 
आसान नहीं 
यमराज को समझना 
और यार बना लेना।८

मिलिए 
एक बार 
फिर फैसला कीजिए 
आखिर करना क्या है।९

समझोगे 
निश्चित कल
जाने के बाद 
हमें खोने के साथ।१०

रखा
ही क्यों 
हटाना ही था 
जब तुम्हें अपना हाथ।११

सुधीर श्रीवास्तव

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मुक्तक
(दोहा/ रोला /चौपाई /सरसी/ मुक्त छंद)
********
रोला मुक्तक
*******
माना हम मजदूर, दोष इसमें क्या मेरा।
यह तो मेरा भाग्य, मिला दुर्भाग्य घनेरा।।
कहें मित्र यमराज, हुआ क्या जो मैं पापी-
हमने भी नौ माह, कोख माँ किया बसेरा।।

मजदूरों के नाम, खूब होता है खेला।
लगती ऐसी भीड़, दीखता जैसे मेला।
कहें मित्र यमराज, नहीं इनको अब छेड़ो-
वरना मुँह का स्वाद, लगे जस आप करेला।।

संगत करिये आप, नहीं हो जो दुखदाई।
और उसे भी आज, लगे ना तनिक पराई।
कहें मित्र यमराज, यार मुश्किल मत मानो-
हमें बताओ मित्र, ठीक है क्या अँगड़ाई।।

अपने मन की मैं व्यथा, नहीं कहूँगा यार।
व्यर्थ बताऊँ क्यों भला, ठना हृदय जो रार।।
कहते हैं यमराज जी, सब लो अच्छा मान-
कैसे कह दूँ आपको, हो मेरे सरकार।।

जीवन में अवरोध का, होता बड़ा प्रभाव।
इससे करना मत कभी, मित्रों आप दुराव।
प्रेम प्यार भी दीजिए, चाह रहा अवरोध -
अड़ जाता ये राह में, रखे दूर हर घाव।।

नहीं मानते बात, बड़े होते अब बच्चे।
कहाँ समझते राज, अभी हैं वो सब कच्चे।
कहें मित्र यमराज, घोर कलयुग है आया-
सारा व्यर्थ प्रयास, कहें क्यों बनना सच्चे।।

अपने अवगुण देख, सभी सचेत हो जाएँ।
तभी बनेगी बात, स्वयं को मत भरमाएँ।।
कहें मित्र यमराज, दंभ कल पड़े न भारी-
चिंता करिए आप, नहीं ठुकराए जाएँ।।

मेहनती मज़दूर, अथक परिश्रम करता।
उसका ही परिवार, भूख की आहें भरता।।
जीवन का अधिकार, चाह वो भी तो रखते-
कहें मित्र यमराज, मिलेगी कब तक समता।।
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दोहा मुक्तक
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जीवन में अवरोध का, होता बड़ा प्रभाव।
इससे करना मत कभी, मित्रों आप दुराव।
प्रेम प्यार भी दीजिए, चाह रहा अवरोध -
अड़ जाता ये राह में, रखे दूर हर घाव।।

अंधे की लाठी रहा, आज समझता भार।
धन दौलत लालच भरे, टपकाता बस लार।
कहें मित्र यमराज, दृश्य रहा दिख रोज-
अब बूढ़े माँ- बाप ने, समझा जीवन सार।।

करता कोई घात यदि, आप करो प्रतिघात।
मान लीजिए मित्रवर, तभी बनेगी बात।।
समय नहीं है आज का, बैठो रखकर हाथ-
आज दौर ऐसा हुआ, पहले मुक्का लात।।

पैरों में बिखरे पड़े, सपने जो थे यार।
खाते हम सब मार हैं, बनकर के लाचार।
समझ नहीं हम पा रहे, क्या ये है संयोग-
या किस्मत के संग में, ठनी हुई है रार।।

राष्ट्रगान होता जहांँ, छा जाते टैगोर।
इतने वर्षों बाद भी, बने हुए सिरमौर।
नाम रवींदर नाथ था, कहता है यह देश-
भारतवासी मानते, मिलता ऊर्जा सौर।।

सर्वोपरि है राष्ट्र हित, यह हम सबको ध्यान।
पर ऐसे कुछ लोग भी, बने हुए अज्ञान।।
होती है पीड़ा बड़ी, जब हो धर्म विवाद-
बड़ा देश से कब भला, होती निज पहचान।।

कविता तो सब लिख रहे, करते नहीं विचार।
कुछ भी लिखते नित्य हैं, बिना किसी आधार।।
बस घमंड में चूर हैं, बनकर घूमें श्रेष्ठ -
लोग खूब चर्चा करें, नहीं लेश संस्कार।।
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चौपाई मुक्तक
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इमली नमक मिर्च की चटनी।
बनती है जब करते घुटनी।
खाते जब चटकारे लेकर -
स्वाद हृदय को पटनी-पटनी।।

कभी किसी की बातें मानो।
अपने को भी थोड़ा जानो।
इतनी अक्ल नहीं क्यों आती-
घर बैठो अरु गोबर सानो।।

नहीं दिया जब हमने धोखा।
फिर क्यों खाना पड़ता चोखा।।
लगता अब कुछ करना होगा -
या फिर बनना होगा सोखा।।

धरा मात सम एक समाना।
इससे ही है देख जमाना।।
नहीं समझ जब हम हैं पाते-
हो जाते हैं तब बेगाना।।
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सरसी छंद मुक्तक
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कौन किसी का मीत यहाँ पर, सबको स्वारथ रोग।
इसीलिए तो करते हैं सब, नाहक दुख का भोग।
चलना होगा आप सँभल कर, कहते हैं यमराज-
सुख-दुख में सहभागी बनकर, रहिए सभी निरोग।।
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विविध मुक्तक
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कौन अपना है हमारा आज इस संसार में।
स्वार्थ में डूबे हुए सब व्यर्थ के अनुमान में।
जानते हैं हम सभी रोकर भला होगा नहीं-
आज जो समझा नहीं वह जाएगा कल काल में।।

आपने इतना रुलाया क्या मिला।
साथ ही ये भी बताओ क्या गिला।
हमने कब चाहा भला क्या आप से-
जो दिया है आपने ऐसा सिला।।

अपने अवगुण देखकर करिए आप सुधार।
यह तो ऐसा है नहीं फेंको आप उतार।
शुभचिंतक कोई नहीं बिसरायेगा रोज-
सबसे ज्यादा फिक्र तो करता बस परिवार।।

भौंकते कुत्ते बहुत हैं आजकल।
पर नहीं उनकी रही अब दाल गल।
खुद को न जाने समझ बैठे हैं क्या-
और गिरते जा रहे हैं मुंँह के बल।।

भक्ति भावना सफल वही है।
जिसमें नहिं कोई छल-बल है।।
ध्यान ईश का करते रहना -
यही बड़ा जीवन संबल है।।

मारिए पत्थर जमाना चाहता है।
आपको भी आजमाना चाहता है।
व्यर्थ की तकरार तो अब छोड़िए -
खून के आँसू रुलाना चाहता है।।

जो थे अपने सब पराए हो गए।
कह रहे हम आपके थे कब हुए।
सपनों से बाहर निकलना सीख लो-
मुफ्त में उपहार कब मिलते नए।

सुधीर श्रीवास्तव

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रोला छंद
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श्रम साधक मजदूर, रात दिन मेहनत करता।
कब कहता मजबूर, रोज रोटी को खटता।।
कहें मित्र यमराज, यही है इनका सावन।
नहीं मानते हार, भाव रखते मन पावन।।७३

कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें।
बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।।
कहें मित्र यमराज, नहीं अब और रुलाओ।
श्रम साधक मजदूर, मान-सम्मान बढ़ाओ।।७४

अपनों का अब प्यार, आज कोई ना चाहे।
बेईमानी की ओट, रोज ले बढ़ते राहें।।
कहें मित्र यमराज, गजब है लीला न्यारी।
अपने होते दूर, यही है माया भारी।।७५

सहता है आरोप, बड़ा जो बेटा घर का।
उसे नहीं है ज्ञान, भाग्य फल कैसा उसका।।
यह कैसा है दस्तूर, हमें भी आप बताओ।
क्या मेरा अपराध, बड़े होना समझाओ।।७६

करते रहें प्रयास, हार को पीछे छोड़ो।
पूरी होगी आस, जीत से रिश्ता जोड़ो।।
कहें मित्र यमराज, दूर होंगी बाधाएँ।
सदा जगाए ज्योति, आप रखना आशाएँ।।७७

हीन भावना छोड़,स्वाद गौरव का चखना।
सारे बंधन तोड़, जगाए आशा रखना।।
कहें मित्र यमराज, पूर्ण होगी सब आशा।
नहीं मानना हार, मिटेगी आप निराशा।।७८

होती है अनमोल, सभी के माँ की ममता।
जिसे रहे हम तोल, कहाँ है कोई समता।
कहें मित्र यमराज, मात सब है पर भारी।
बाँट रहे क्यों ज्ञान, धरा सम है महतारी।।७९

करते रहिए दान, बिना कुछ शोर मचाए।
दृष्टा रखिए भाव, ईश में भाव समाए।।
ईश्वर का आभार, मिला है अवसर मानो।
ये तो है सौभाग्य, लेख अपना पहचानो।।८०

दान धर्म का आप, व्यर्थ क्यों गाते गाना।
कम ज्यादा का गीत, कभी मत करो बखाना।।
कहें मित्र यमराज, बड़ी है इसकी महिमा।
करिए अपना काम, सदा रख दानी गरिमा।।८१

गुरुवर पर विश्वास, ज्ञान भी तब पाओगे।
वरना खाली हाथ, हमेशा रह जाओगे।
कहें मित्र यमराज, कौन कह सकता कमतर।
जिसके सिर पर हाथ, सदा रखते हों गुरुवर।।८२

वन उपवन बस नाम, आज है केवल बाकी।
सपने होते चूर, कहें अब नानी काकी।।
कहें मित्र यमराज, देख लो कलयुग माया।
है विकास की होड़, रोज ही सिमटे छाया।।८३

कर देंगे गुमराह, सदा बच के सब रहना।
कहें मित्र यमराज, मानिए मेरा कहना।।
सब कहते अभिशाप, आज की है लाचारी।
यह कैसा संताप, पड़े नित सब पर भारी।।८४

नेता जी का हाल, आज देखे सब जनता।
रोती माथा पीट, काम कोई ना बनता।
कहें मित्र यमराज, प्रभो कुछ तो अब कीजै।।
कैसा है यह राज, राह जनमानस दीजै।।८५

कब आओगे नाथ, आप हमको बतलाओ।
या फिर कर दो फोन, राग भैरवी सुनाओ।।
कहें मित्र यमराज, आप जो अच्छा लगता।
दिक्कत की जो बात, आपको इतना छजता।।८६

मौन और मुस्कान, भाव इनका है व्यापक।
समझ गये यदि आप, मिटे हर कोई चकचक।।
कहें मित्र यमराज, नहीं लगता है पैसा।
सुख देता है आप, भाव हो जिसका जैसा।।८७

अपने मन की मैं व्यथा, नहीं कहूँगा मित्र।
व्यर्थ खींचना क्यों भला, आप बताओ चित्र।।
कहें मित्र यमराज, रहो संभाले बोझा।
नहीं नचाना आप, मानकर बड़का ओझा।।८८

जिसका झुका न माथ, वही पड़ता कब भारी।
कलयुग का है दौर, बेवजह की बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, समय अब नहीं पुराना।
जिसे सुने हम आप, गया वो दूर जमाना।।८९

जन्म दिवस पर आज, हम सब का मन हर्षाया।
खुशियों की सौगात, संग में अपने लाया।।
कहें मित्र यमराज, सदा ही तू खुश रहना।
इतनी सी है चाह, रहो बन सुंदर गहना।।९०

जागी है उम्मीद, आज चहुँदिश जो दिखता।
बढ़ता जाता आज, सनातन धर्म जागता।।
कहें मित्र यमराज, नहीं पीछे अब जाना।
राष्ट्र-धर्म का नित्य, जागरण आप जगाना।।९१

आज हमें परमार्थ, व्यर्थ है केवल लगता।
लेकर इसकी आड़, हमें हर कोई ठगता।।
कहें मित्र यमराज, आज परमारथ भारी।
सच कहते हैं लोग, बनी अब ये बीमारी।।९२

यह कैसा संसार, जहाँ अब स्वारथ भारी।
रिश्ता नाता भूल, हुए सब मतलब धारी।।
कहें मित्र यमराज, यही कलयुग की माया।
किसे कहें हम आज, कौन है अपना भाया।।९३

बढ़ता जाता ताप, देखती दुनिया सारी।
दोषी भी हम आप, खूब करते तैयारी।।
बेतरतीब विकास, महज है इसका दोषी।
जिसका करते आज, सभी जन पाला-पोषी।।९४

बरस रही है आग, सभी सुरक्षित रहिए।
सोच समझकर आप, चलाएँ जीवन पहिए।।
कहें मित्र यमराज, काम की है मजबूरी।
बस इतना अनुरोध, रखो थोड़ी सी दूरी।।९५

चाहे बरसे आग, बेबसी भी तो भारी।
भूखा है परिवार, व्यर्थ आगे लाचारी।।
कहें मित्र यमराज, द्वंद हो चाहे जितना।
जो भी हैं मजबूर, भूख की चक्की पिसना।।९६

करो नहीं तकरार, भूख है सबसे आगे।
बरस रही है आग, कहाँ तक कोई भागे।।
कहें मित्र यमराज, दोष सब है मानव का।
लालच महज विकास, कहो मत इनका उनका।।९७

रखकर जो भी धैर्य, सदा ही आगे बढ़ते।
नहीं छोड़ते आस, हार से कभी न डरते।।
कहें मित्र यमराज, राह जो नहीं भटकते।
पाते वही मुकाम, जीत की जिद जो करते।।९८

संतों के सदज्ञान, सदा ही पावन होते।
भेदभाव से दूर, बीज सदगुण के बोते।।
कहें मित्र यमराज, सीख लो इतना प्यारे।
जन-मन का कल्याण, भाव हों सदा तुम्हारे।।९९

मानवता का पाठ, सीखिए संत जनों से।
देना आदर भाव, जान भी लेना इनसे।।
कहें मित्र यमराज, नहीं मन संत दुखाना।
रहो दंभ से दूर, पड़े क्यों कल पछताना।।१००


सुधीर श्रीवास्त

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