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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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दोहा - कहें सुधीर कविराय ४५
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मातु शारदा
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मातु शारदे आपकी, मुझ पर कृपा अपार।
शीश झुका तव चरण में, देना मुझको तार।।

सत्य सनातन धर्म की, चहुँदिश जय-जयकार।
मातु शारदे शक्ति का, सबने देखा सार।।

एक बार फिर से शुरू, देखो पूजा पाठ।
कल तक था जो लग रहा, सबसे भारी काठ।।

मैया मेरी शारदे, करती कृपा अपार।
आया जो परिणाम है, एक मात्र आधार।।
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संकट मोचन दुख हरो....
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संकट मोचन दुख हरो, करते भक्त पुकार।
जन मन को सारे कष्ट से, आप करो उद्धार।।१

सेवक प्रभु श्री राम के, पवन पुत्र हनुमान।
संकट मोचन दुख हरो, और संग दो ज्ञान।।२

बजरंगी से है बड़ा, कौन राम का भक्त।।
संकट मोचन दुख हरो, जो जन तुममें आसक्त।।३

संकट मोचन दुख हरो, करके बड़ा प्रहार।
आतंकी जो धरा पर, अब करिए संहार।।४

चाह मित्र यमराज भी, प्रभु आप से आज।
संकट मोचन दुख हरो, बनें सभी के काज।।५
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विविध
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भला चाहता कौन है, अब अपनों का प्यार।
वो ही तो लगते हमें, धूर्त और मक्कार।।

बेटा जो घर का बड़ा, पाता कितना मान।
जिसका होता है उसे, बहुत देर में ज्ञान।।

यह कैसा दस्तूर है, कैसा इसका रंग।
मर्यादाएं हो रहीं, सरेआम ही भंग।।

सच का पथ ही श्रेष्ठ है, इसे बना लें राह।
मुश्किल होगी सैकड़ों, शुभता बने गवाह।।

सच का पथ ही श्रेष्ठ है, चित्त उतारो आप।
आते हैं अवरोध बहु, अंतिम सुखदा जाप।।

सच का पथ ही श्रेष्ठ है, मानो मेरी बात।
इसके आगे झूठ की, व्यर्थ सभी औकात।।

सच का पथ ही श्रेष्ठ है, देती खुशी अपार।
चलता इसकी राह जो, मान मिले संसार।।

समझौता कैसे करे, घर में है परिवार।
बिन मेहनत उसका भला, क्या जीवन संसार।।

श्रम में इतना लीन वो, और नहीं कुछ ध्यान।
केवल उसको है पता, भूख पेट का ज्ञान।।

मेरी इतनी बात यदि, रहा आपको याद।
बिना उचित संसर्ग के, नाहक है फरियाद।।

ज्ञान-दान का है बड़ा, ऊँचा उत्तम स्थान।
जो होते गुणवान हैं, बनते बड़े महान।।

नमन करूँ प्रभु राम को, जोड़े दोनों हाथ।
इतनी सी करिए कृपा, देते रहना साथ।।
सबको ही देते रहें, सदा उचित सम्मान।
इसके पीछे का बड़ा, सरल सहज विज्ञान।।

मम प्रिय वर यमराज जी, देते शिक्षा ज्ञान।
इसीलिए तो बढ़ रहा, अब मेरा भी मान।।

सीमा पर सैनिक खड़ा, लिए हथेली जान।
धरती माँ के लाल को, इसका है अभिमान।।

रेखाएं जो दिख रहीं, आप हथेली चार।
इसके आगे भी बहुत, आगे है संसार।।

कवि के मन की वेदना, भला समझता कौन।
शब्दों से है बोलता, वाणी से वो मौन।।

कवि के मन की वेदना, कहते कविता छंद।
मातु शारदे की कृपा, देती परमानंद।।

कहता आज समाज से, इतना बदले आप।
कवि के मन की वेदना, बढ़ता जाता पाप।।

राजनीति के क्षेत्र में, नैतिकता लाचार।
सबसे ज्यादा हो रहा, यहीं आपसी मार।।

सबसे ज्यादा इन दिनों, नैतिकता लाचार।
जितना लेते ओट हैं, उतना ही व्यभिचार।।

बेईमानों के सामने, नैतिकता लाचार।
बेचारी बेबस हुई, भूल रहे सब प्यार।।

देते हैं यमराज जी, शुभाशीष अरु प्यार।
जन्म दिवस पर दें दुआ, जीना वर्ष हजार।।

रोटी कपड़ा और घर, मानव का है पक्ष।
इधर उधर की छोड़िए, जन चाहे प्रत्यक्ष।।

समय-समय की बात है, जान रहे हम आप।
कोस-कोसकर वक्त को, करते व्यर्थ अलाप।।

फैला इतना धुंध है, चलें सुरक्षित आप।
यह जीवन जो आपका, बने नहीं अभिशाप।।

छँट जाएगा धुंध ये, मत हो आप अधीर।
औरों को भी देखिए, हँसकर सहते पीर।।

बीती ताहि बिसार कर, आगे बढ़िए आप।
कल में जो कुछ भी हुआ, मान उसे संताप।।

इतनी चिंता व्यर्थ है, कहते हैं यमराज।
कल किसने देखा यहाँ, सब कुछ तो है आज।।

अपना कोई है नहीं, यही आज का ज्ञान।
अपने केवल आप हैं, कहते मित्र सुजान।।

प्रकृति बदलती है नहीं, जान रहे हम लोग।
करते नित अवमानना, अरु कहते संयोग।।

दोहन होता प्रकृति का, चहुँदिश में हर ओर।
इसीलिए तो दिख रहा, कहर रोज घनघोर।।

मान चाहती है प्रकृति, नहीं हमारा ध्यान।
यह कैसी संवेदना, जिसका नहीं विधान।।

आज सभी जन चाहते, हो स्वागत सत्कार।
पर सोचें नहिं एक पल, क्या इसका आधार।।

प्रेम भाव से जब करें, हम स्वागत सत्कार।
तभी हृदय का भाव से, धन्यवाद आभार।।

आज महावर का नहीं, रहा पुराना भाव।
भागम-भाग में नारियाँ, इससे करें दुराव।।

अपवादों को छोड़कर, इसका रंग उदास।
पहल महावर की कहाँ, आज रही बिंदास।।

मात-पिता के चरण में , सारा सकल जहान।
उनकी छाया में हमें, सदा सुरक्षित भान।।

ईश्वर की होती कृपा, मात पिता जो साथ।
धन-दौलत से भी बड़ा, रहे शीश पर हाथ।।

व्यर्थ सभी हैं गा रहे, नाहक अपना राग।
अपने अपने दंभ में, रहते केवल भाग।।

होता नहीं विराग से, जीवन का उद्धार।
चलता निज कर्तव्य पथ, करिए ईश पुकार।।

चाय एक कप जो मिला, आया दिल को चैन।
उत्कंठा थी इस हृदय, भीगे उसके नैन।।

गर्मी से बेचैन थी, सोचा पी लूँ चाय।
माँ ने पकड़ाया मुझे, मंद-मंद मुस्काय।।

मानव के मन में छिपा, जितना ज्यादा पाप।
उतना ही वो कर रहा, कंठी माला जाप।।

मानव के मन में छिपा, अच्छा बुरा विचार।
उलझा रहता है सदा, बिना तर्क तकरार।।

चिंता है किस बात की, करिए प्रभु का ध्यान।
सब कुछ उनकी ही कृपा, रचते उचित विधान।।

खटका रहता है बना, मात-पिता को नित्य।
बाहर बिटिया जब रहे, समझे जग औचित्य॥

खतरा अपनों से बढ़ा, कैसे करें उपाय।
दुविधा में जन-मन फँसा, कोई नहीं सहाय॥

बादल अब संदेह के, कैसे होंगे दूर।
मानव अब रहता डरा, क्योंकि है मजबूर।।

दुविधा से बाहर निकल, मस्ती कर ले यार।
क्यों करता है आप ही, निज जीवन बेकार।।

कैंची जैसी चल रही, तेरी बहुत जुब़ान।
उस पर अब ताला लगा, यही आज का ज्ञान।।

ताला कैंची दे रहे, मिलकर ऐसी सीख।
अंकुश खुद पर राखिए, नहीं व्यर्थ में चीख।।

शस्त्र हाथ में है मगर, करिए नहीं प्रहार।
पता नहीं जो सामने, शत्रु मान मत मार।।

निकलो बाहर द्वंद्व से, खोजो कोई राह।
गीत ग़ज़ल कविता पढ़ो, मन रख उत्तम चाह।।

फँसा द्वंद्व में जो रहा, पाता कब आनंद।
मस्ती में आगे बढ़ो, व्यर्थ सभी छल-छंद।।

अब अतीत के दौर से, बाहर निकलो आप।
वर्तमान भी देखिए, करते जमकर पाप।।

समय चक्र के खेल का, होता किसको ज्ञान।
सरल नहीं है समझना, ईश्वर रचा विधान।।

जैसे-जैसे बढ़ रहा, गर्मी का आतंक।
अग्नि कांड भी होड़ में, जैसे बना कलंक।।

मानव मन में आजकल, जलती ईर्ष्या आग।
अपवादों को छोड़कर, भूल रहे सब त्याग।।

मुर्दे जिसमें जल रहे, वो भी तो इक आग।
जब तक हम श्मशान में, तब तक ही वैराग।।

दोष भला क्या आग का, करती अपना काम।
नादानी हम सब करें, और उसे बदनाम।।
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सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छन्द गीत
सुख-दुख तो हैं आते-जाते
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सुख-दुख तो हैं आते-जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।
समझ इसे हम सब कब पाते, बाद बहुत नाहक पछताते।।

इसका जीवन खेल निराला, लगा नहीं है कोई ताला।
करें नहीं जो गड़बड़ झाला, कब होता उसका मुँह काला।।
जो इससे यारी कर पाते, मधुरिम राग सदा ही गाते।
सुख-दुख तो है आते जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।।

जो भी इसको दोष न देता, ईश्वर नैया उसकी खेता।
सुख का जो है स्वागत करता, सदा नाम दुख के है डरता।।
ऐसे प्राणी हैं पछताते, जीवन का रस कभी न पाते।
सुख-दुख तो हैं आते जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।।

चाहे जितनी कथा सुनाएँ, या फिर सुख-दुख में भरमाएंँ।
या जीवन सुर-ताल बताएँ, आप व्यर्थ कहकर ठुकराएँ।।
कड़वी लगती इसके बातें, मापदंड हम कब सह पाते।
सुख-दुख तो हैं आते जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।

मानो दोनों आप सहोदर, मान दीजिए समता सादर।
नहीं आप बनिए अज्ञानी, जानो इसकी कथा पुरानी।।
भेदभाव की नाहक बातें, नहीं कटेंगी दिन या रातें।
सुख-दुख तो हैं आते जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।।

बस अपना किरदार निभाओ, ईश्वर इच्छा मान बढ़ाओ।
मिला आप जो भी अपनाओ, जीवन का आनंद उठाओ।।
सुख में इतना क्यों इतराते, तनिक दुखों में घबरा जाते।
सुख-दुख तो हैं आते जाते, जीवन पथ संगीत सुनाते।।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद ४
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ज्ञानी  मुझको  मानना,   कहाँ  बड़ा  अपराध।
सबको ये  अधिकार है, मन  चाहा ले  साध।।
मन चाहा  ले साध, फ़र्क कब मुझको पड़ता।            
कब  आकर के  द्वार,  आपके  हूँ मैं  लड़ता।।
कहें  मित्र  यमराज,  करो  जमकर  मनमानी।      
 धन्यवाद  आभार,       मानते  रहना  ज्ञानी।।३६          

मोहित मत हो जाइए, सुनकर सबके गीत।
नहीं भरोसा आजकल, कौन शत्रु या मीत।।
कौन शत्रु या मीत, समझना बहुत जरूरी।
भले  रहें  वो  दूर, आपकी  भी  मजबूरी।।
कहें मित्र यमराज, लगे कितना भी सोहित।
सोच समझकर यार, आपको होना मोहित।।३७

नारी का भी  आजकल, बदल  रहा है रंग।
जिसे देख वो आप ही, होती  रहती  दंग।।
होती  रहती  दंग,   जमाना  क्यों है  दोषी।
जब अपने ही हाथ, आप को पाली पोषी।।
कहें  मित्र  यमराज, पड़ेगा  इक दिन भारी।
गारी  भी अब  आज,  खूब  देती है  नारी।।३८

नारी  अब  कहती  नहीं, चुप थी  जो इक बार।
यही  आज के  सत्य का, बना  हुआ  आधार।।
बना  हुआ  आधार, दोष  क्यों दें  हम  उनको।
दोषी को सब जान, नहीं कुछ कहते जिनको।।
कहें  मित्र  यमराज,   समस्या   इतनी   सारी।
लेते   पल्ला   झाड़,   मानकर   दोषी   नारी।।३९

नारी निज अपमान से, होती विचलित नित्य। 
समझ नहीं आता उसे, इसका जो औचित्य।। 
इसका  जो  औचित्य, जमाना  बढ़ता  आगे। 
पर  नारी  सम्मान, नाम  आखिर  क्यों भागे। 
कहें  मित्र  यमराज,     बड़ी  भारी  लाचारी। 
इसीलिए  तो  आज,  नित्य  रोती  है  नारी।।४०

अंबर क्यों  सूना लगे, बड़ा प्रश्न  है आज। 
या फिर कोई खास है, इसके पीछे राज।। 
इसके  पीछे  राज,  हमें  कोई  समझाए। 
जिस कारण से आज, लगे जैसे मुरझाए। 
कहें मित्र यमराज, शांत भी दिखे समंदर। 
या देता  है  साथ, प्रेम  में  भीगा  अंबर।।४१

सोना  महँगा  हो  गया, जन  मानस  बेचैन।
मंहगाई  डायन  बनी,     भीगे  सबके  नैन।।
भीगे  सबके  नैन, चमक का  हर दिन मेला।
सबका  अपना  भाग्य, ईश भी खेले खेला।।
कहें  मित्र  यमराज,    नहीं  ये  जादू  टोना।
चच्चा ट्रंप  विलेन,    हुआ जो महँगा सोना।४२

जीवन जीने के लिए, करते रहिए काम।
तभी मिलेगा आपको, नूतनता आयाम।।
नूतनता आयाम, खुशी तब  होगी भारी।
चिंता होगी दूर, आपकी जब तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, लगे सुख का सब सीजन।
खुशियों की बरसात, महकता लागे जीवन।।४३

माना  सबका  एक सा, समय  नहीं दे  साथ।
दोषी किसको हम कहें, क्या है अपने हाथ।।
क्या है  अपने  हाथ, भूलकर  हमको बढ़ना।
समय मिला जो आज,  उसे है प्यारे गढ़ना।।
कहें  मित्र  यमराज,  यही  हम सबने  जाना।
दुनियाँ की हर बात,  धैर्य रखकर भी माना।।४४

जीवन   गुंजित   था   कभी,    सूने   पड़े   मुँडेर। 
पक्षी   अब   आते   नहीं,     भूले   अपनी   टेर।। 
भूले  अपनी  टेर,       गया  मिट  मीठा  कलरव।
कल तक था जो सत्य, आज अब लगे असंभव।।
कहें   मित्र   यमराज,  बचेगा  क्या अब  निम्मन।
कहाँ  सुनेंगे आज,  शोर  अब  मधुरिम  जीवन।।४५

आया  अब  ऐसा  समय,    भारत  दे  आदेश।
प्रेम प्यार  से सब  रहो, नाहक  करते क्लेश।।
नाहक करते क्लेश, समझ में क्यों नहिं आता।
अच्छा  नहीं  घमंड,   बने  हो  सबके   दाता।।          
कहें  मित्र  यमराज,  समझ  ले तू  भी  भाया।          
विश्व पटल  पर आज, देश भारत अब आया।।४६     
                                                           
भारत  दे  आदेश  अब,     सुनता  है  संसार।                
स्वाभिमान सबका रहे,  यही आज का सार।।     
यही आज का सार,    व्यर्थ आपस में लड़ना।        
होगा जो नुकसान, सभी को कल में  भरना।।     
कहें  मित्र  यमराज,   बने मत आप बुझारत।          
सीखो  आकर  आप, सिखाता  मेरा भारत।।४७

गायब  लोक  लिहाज  सब,   मर्यादा  बेशर्म।
कलयुग  के इस  दौर में, कैसा  मानव धर्म।।
कैसा  मानव  धर्म, ईश  ये   किसकी  माया।
या फिर  है संकेत,   अँधेरे  की अब  छाया।।
कहें मित्र यमराज, बनें हम सब क्यों साहब।
दीन धर्म  ईमान, सभी  कुछ  होता  गायब।।४८

होता जीवन  में कभी, नाहक मिले कलंक।
नहीं पता है  किसी को, कौन मार दे डंक।।
कौन मार  दे डंक, बड़ी  चिंता  तब   होगी।
बिना  किसी  इलाज,   मरे  बेचारा  रोगी।।
बिना किसी  अपराध, धर्म ईमान  है रोता।।
कहें मित्र यमराज, चाह से सब कब होता।।४९

चाहत हो जन-मन सभी, सबका हो कल्याण।
निंदा  नफ़रत  से  सदा, मुक्त  भावना  त्राण।।
मुक्त  भावना  त्राण,  जगत  खुशहाली  होगी।
दुनिया  में तब  आज, नहीं  कोई  मन  रोगी।।
कहें  मित्र  यमराज, कौन  तब  होगा  आहत।
यदि हो जाए उच्च, आज हर जन की चाहत।।५०

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिनी छंद १ 
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हर्षित मन मेरा सभी, करें  नमन  स्वीकार।
बस आशीषों के सिवा, और नहीं दरकार।।
और नहीं दरकार, मिले वो जिससे वंचित।
जीवन का बस सार,  रहे मन मेरा संचित।।१

ईश्वर ने  जीवन  दिया,    मानें  हम  आभार।
बनी रहे उनकी कृपा,  मधुरिम जीवन सार।।
मधुरिम जीवन सार, नजर रखता है हम पर।
वही चलाता एक है, ईश ही जगती का घर।।२

चारों  खाने  चित्त हैं, फिर  भी  इतना  दंभ।
संग पतन  का हो रहा, अभी आज आरंभ।।
अभी  आज  आरंभ,   भले  ना  मेरी  माने।
आयेगा  वो  दिवस,    गिरेंगे   चारों  खाने।।३

बाँटो  इतना  प्यार  तुम,       दुनिया  देखे  रंग।
बिना किसी भी स्वार्थ के, कर दो सबको दंग।।
कर  दो  सबको  दंग,  नहीं  किसी  को  छाँटो।
कभी  रुके  ना  हाथ, आप बस  इतना बाँटो।।४

अपने भी  करते नहीं, अपनों पर विश्वास।      
सबको लगता है यही, घातक होगी आस।।
घातक होगी आस, सोच  ये  कैसे  सपने।
जैसे हम सब लोग, हमें मिलते हैं अपने।।५

उसने हमको जो दिया, लेने  को  मजबूर।      
मुश्किल थी इतनी बड़ी, कैसे करता  दूर।।
कैसे   करता  दूर,  भार  जो सौंपा सबने।
वो  ही  जिम्मेदार, लिया जो खुद से उसने।।६

होता खुशियों का नहीं, कोई ओर या छोर।
कहें  मित्र  यमराज जी, थामे  रहना  डोर।।
थामे  रहना  डोर,  सुखद जीवन वो बोता।         
नहीं छोड़ना आप, बहुत  दुखदाई  होता।।७

ममता  की माँ  का  कभी, नहीं  लगाना  मोल।
वरना कहेंगे लोग सब, तुम हो क्या बकलोल।।
तुम हो क्या बकलोल, समझते क्या हो समता।

माँ   होती  अनमोल,  जगत  तारी है  ममता।।८

मुश्किल है यह बोलना,   किसकी होगी जीत।
पर निश्चित  ये मानिए,    विजयी  होगी  प्रीत।।
विजयी  होगी  प्रीत, थाम कर तुम बैठो  दिल।
आये  जो  परिणाम, नहीं अब कोई मुश्किल।।९

रखना दृष्टा भाव निज, अपने मन में आप।
ईश्वर की तब हो कृपा, कभी न होगा पाप।।
कभी न होगा पाप, भाव उत्तम ही चखना।
निंदा नफ़रत दूर, प्रेम से  सबको  रखना।।१०

हल्ला  व्यर्थ  मचा  रहे,        करते  रहिए  दान।
ईश  समायाक्ष हृदय  में,  दृष्टा का  निज  भान।।
दृष्टा  का  निज भान,   ईश  के  सब  हैं  लल्ला।
सबका निज सौभाग्य, करो मत नाहक हल्ला।।११

करते  रहिए  दान  सब,  बिना  मचाए  शोर।
ईश रखो निज हृदय में, नई सुबह का भोर।।
नई सुबह  की भोर, भाव सुखदा  मन भरते।
रखना सबसे प्रीति, काम सब  ईश्वर  करते।।१२

सत्ता के इस खेल का, अजब-गजब है रंग।
क्या कुछ अब है हो रहा,जनमानस भी दंग।।
जनमानस  भी  दंग,  चाहते  वो  भी  भत्ता।
कहें  मित्र  यमराज,  गर्त  में  जाती  सत्ता।।१३

करते गणपति वंदना,     भक्त जोड़कर हाथ।
रहिए प्रभु जी आप तो,    सदा  हमारे साथ।।
सदा  हमारे  साथ,     कष्ट  मम  रहना  हरते।
प्रथम पूज्य हो आप, काज पूरण सब करते।।१४

शाला आकर हम सभी,  सीख रहे हैं छंद।
गुरुजन  करते  दूर हैं,  मन के  सारे द्वंद्व।।
मन  के  सारे  द्वंद्व,      गूँथते  जैसे  माला।
मिलता नव आधार, छंद आभासी शाला।।१५

जिसका कोई है  नहीं, इस  जगती  में  तोल।
फिर खुजली क्यों हो रही, लगा रहे जो मोल।।
लगा  रहे  जो  मोल,   ज्ञान तू  पाया किसका।
इतना तुझे न  ज्ञान, धरा सम कद है जिसका।।१६

रखते  चाहत  ही  सदा,     रहे  प्रेम  व्यवहार।
नहीं किसी के आ बसे, कुत्सित भाव विचार।।
कुत्सित भाव विचार, स्वाद  मीठा  सब चखते।
मेल-जोल  हो संग, सभी इस  जीवन  रखते।।१७

सबकी  चाहत  ही  सदा,    रहे  प्रेम  व्यवहार।
नहीं किसी के मन बसे,   कुत्सित भाव विचार।
कुत्सित भाव विचार, नहीं हो जन के उर की।।
सुखी  रहे संसार, सोच  इस  जीवन  सबकी।।१८

बदल गया है अब बहुत, आज खेल का रंग।
प्रतिस्पर्धा  है खेल  में, मन  में  भारी  जंग।।
मन  में  भारी  जंग,  भावना  खेत  गया  है।
चाहो जो हो  खेल, दृश्य सब बदल गया है।।१९

चलते  रहना  है  हमें, बिना  किए  विश्राम।
तब ही तो मंजिल मिले, और संग आराम।।
और  संग  आराम, सोच  अच्छे ही फलते।
कहें मित्र यमराज, साथ सब रहते चलते।।२०

हारी  बाजी  जीतना,   यही  हमारी  सोच।
नहीं और कुछ मन भरा, या है कोई लोच।।
या है कोई लोच,   व्यर्थ मत बनिए काजी।
तब ही  होगी  हाथ,    हमारे  हारी  बाजी।।२१

कुंठा अपनी छोड़ कर, करो जीत की बात।
हार शब्द को भूल जा, बीत  गई  वो  रात।।
बीत  गई  वो  रात, छोड़ना  मन  की  मुंठा।
रखो जीत का लक्ष्य, भूलकर सारी कुंठा।।२२

समझ रहे हो क्यों भला, लगता इतना भार। 
या मन  में कुछ  और है, दूजा  कोई  सार।। 
दूजा  कोई  सार, आप  जो  छिपा  रहे  हो। 
कहें  मित्र  यमराज, बता जो समझ रहे हो।।२३

लादे इतना भार क्यों,      नाहक में तुम यार। 
या फिर बैठे  ठान कर,      मन में कोई रार।। 
मन  में  कोई  रार,      बोझ  या  भारी  वादे। 
बिना हिचक दो बोल , भार क्यों इतना लादे।।२४

जैसा चाहा लग गया, संकट का अनुमान।
अब तो होना चाहिए, इसका पूर्ण निदान।।
इसका पूर्ण निदान, चाहते  हैं  सब  वैसा।
अपराधों से मुक्त, शाँति की धारा  जैसा।।२५

आया  हिंसा  का  नया,  ये  है  कैसा  दौर। 
जैसे  गिरते  पेड़ से,  मरे  आम  के  बौर।।
मरे  आम  के  बौर,  कौन है इसको लाया।
ऐसी ना थी उम्मीद, उलटबासी  ले आया।।२६

शादी  भी  है  साधना,    नहीं  समझना  खेल।
नहीं समझ आया जिसे, उसका निकला तेल।।
उसका   निकला   तेल,   रही   होती   बर्बादी।
ये   तो   सृष्टि   सार,   जरूरी   होती   शादी।। २७                  
शादी  रिश्तों  के  लिए,   सर्वश्रेष्ठ  आधार।       
वरना  जायेगा  बिखर,  संबंधों  का  सार।।       
संबंधों  का सार, जिसके हम  सभी आदी।      
इसीलिए अनिवार्य, सृजन संतुलित शादी।।२८

रिश्ता है  अनिवार्यता,     शादी  का  संबंध।
बस  इतना  ही  चाहिए, आए  प्रेम  सुगंध।।
आए   प्रेम   सुगंध,   नहीं  होता  है  सस्ता।         
अंतर्मन  से देखिए, तभी समझोगे  रिश्ता।।२९       

करते  हैं जो  परवरिश, मिले न उनको मान।
हम सब शायद हो गए, आज बहुत नादान।।
आज बहुत नादान, यही सब हमको मिलते।
जैसा हम सब आज, दंभ में जमकर करते।।३०

सुधीर श्रीवास्तव

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वर्ण पिरामिड -
विश्व रेडक्रॉस दिवस
*********
ये
सिर्फ
निशान
लाल नहीं
रेड क्रॉस का
सेवा प्रतीक है।

हे
देश
भर के
नागरिकों
समझो तुम
नैतिकता सेवा
रेडक्रॉस संदेश।

लो
आगे
आकर
सेवाधर्म
का पाठ पढ़ो।
नित मुस्कान बाँटो।

ये
बस
भलाई
सेवाभाव
सिखाता हमें
रेडक्रॉस दिवस।

सुधीर श्रीवास्तव

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ग़ज़ल (बह्र:२२ २२ २२ २२)

माना जीवन बड़ा सरल है।
कुछ लोगों से बना गरल है।।

अपने तो सब बेगाने हैं,
इसका अब आज कहाँ हल है।

जिस पर आज करो भरोसा,
करता वही हमेशा छल है।

अपने लक्ष्य में जान लगाता,
होता आज वही सफल है।

चुनाव जीताने के लिए ही,
नेताओं के पास दल-बल है।

कितना पाप करो तुम सुधीर,
पवित्र होने को गंगाजल है।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया छंद
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कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें।
बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।।
नहीं सरकारें मानें, राम कहानी इनकी।
भरते सबका पेट, सोच उच्च है जिनकी।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कब तक ऐसा।
इनका भी परिवार, कटेगा जीवन कैसा।।२४

केवल सकता देख है, दिवास्वप्न वो रोज।
पर जीवन में सत्य की, करते रहना खोज।।
करते रहना खोज, यही मजदूर कहानी।
जिसे सुनाकर सो गए, पुराने पुरखे जानी।।
कहें मित्र यमराज, काम करना है भर बल।
बस इतना ही हाथ, सदा उसके है केवल।।२५

आँसू पीकर रह गया, था इतना मजबूर।
जितना लगता पास थे, समझ गया हूँ दूर।।
अब समझा हैं दूर, समय की है सब लीला।
चाहे जैसा रंग हो, हमें तो दिखता नीला।
कहें मित्र यमराज, दौर आया है बासू।
मूरख हो क्या आप, बहाते इतना आँसू।।२६

मुझको मूरख मानकर, रहिए आप प्रसन्न।
और निकट आ जाइए, संकट के आसन्न।।
संकट के आसन्न, आपका चिंतन भारी।
या फिर आया दौर, नयी आई बीमारी।
कहें मित्र यमराज, समझ इतनी है तुझको।
इसीलिए तो यार, समझता मूरख मुझको।।२७

मानव मन को खोखला, करता दीमक खूब।
तभी दीखता इन दिनों, कुंठा में सब डूब।।
कुंठा में सब डूब, बढ़ी है ये बीमारी।
इसीलिए तो बढ़ रही, आज भारी दुश्वारी।।
कहें मित्र यमराज, यार सब बचकर रहना।
वरना मानो आप, सभी को निश्चित ढहना।।२८

जिसकी जैसी सोच है, वैसा उसका काम।
होता भी तो नाम है, या फिर हो बदनाम।।
या फिर हो बदनाम, किसे अब होती चिंता।
मान रहे हैं लोग, व्यर्थ क्यों करना छिंता।।
कहें मित्र यमराज, फ़िक्र है किसको किसकी।
सभी सोचते आज, सोच होती जस जिसकी।।२९

अपने मन पर आपका, हो इतना अधिकार।
जो खुद को भी प्रेम से, हरदम हो स्वीकार।।
हरदम हो स्वीकार, यही हो कोशिश सबकी।
नहीं बीच की राह, खोजकर कहना तब की।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ ना जाएँ सपने।
नहीं दीजिए दोष, रखें मन काबू अपने।।३०

तिनका सा संसार है, भला समझता कौन।
फिर भी हर पल भौंकते, रह पाते कब मौन।।
रह पाते कब मौन, यही तो पीड़ा भारी।
फैली जस है आज, धरा कोरोना बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, बताओ दोष है किसका।
मातु सिया तो याद, हाथ जिनके था तिनका।।३१

फैला जो आतंक है, समझ न आये आज।
मगर सभी हमज्ञ जानते, इसके पीछे राज।।
इसके पीछे राज, भोगते हम सब सारे।
पर कुछ लोगों के आज, चमकते भाग्य सितारे।।
कहें मित्र यमराज, मिटेगा कब ये मैला।
चिंतित हैं सब लोग, गर्भ किस माँ के फैला।।३१

गाते हम आतंक का, नित्य बेसुरा राग। अच्छे से सब जानते, कैसे जन्मा नाग।। जन्मा है जो नाग, चलो हम इसको कुचलें। जाति-धर्म को भूल, राह हम मिलकर चल लें।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ की छोड़ो बातें।
कोई श्रेष्ठ उपाय, एक स्वर में हम गाते।।३२

नाहक ही सब चाहते, मिले मान सम्मान।
इसके पीछे मात्र है, छिपा हुआ अभिमान।।
छिपा हुआ अभिमान, पड़ेगा कल को भारी।
फल की चिंता छोड़, करो अपनी तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ है बनना ग्राहक।
करो नहीं तकरार, कर्म बिन सब है नाहक।।३३

आओ मिलकर हम करें, ऐसा आज उपाय।
जिससे हो आतंक का, बंद सदा अध्याय।।
बंद सदा अध्याय, बहुत अब खेल हो चुका।
कब तक इसके साथ, चलेगा ये छिपी-लुका।।
कहें मित्र यमराज, एकता भाव दिखाओ।
छोड़-छाड़ तकरार, संग सब आगे आओ।।३४

नेता जी फिर कह रहे, नहीं सहेंगे और।
अब बनने देंगें नहीं, आतंकी सिरमौर।।
आतंकी सिरमौर, राष्ट्र है सबसे पहले।
करें सभी मिल काम, चलेंगे नहले-दहले।।
कहें मित्र यमराज, चलो कोई तो चेता।
काश बात पर यार, टिका रह पाए नेता।।३५

सुधीर श्रीवास्त

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सफलता का मूक पथ

उजालों से मिलती है सीख
बोध कराता है विश्वास, संकल्प के साथ
सहनशीलता की खामोशी का,
जीवन यात्रा की अनवरत यात्रा के लिए
हमारी अपनी ताकत का,
लक्ष्य पाने की दिशा में मूक पथ बनकर।
जिसे समझना है हमें।
खामोशी से वैराग्य भाव से
संकल्प शक्ति को अहमियत देते हुए।
तभी सार्थक होगी पथ विचलन से दूरी
और सफल होगा हमारा जीवन
जो खुशियां हमें देगा
लेकिन प्रेरणा औरों की बनेगा,
और तब पूर्ण होगा हमारा जीवन
हमारे जीवन का उद्देश्य।

सुधीर श्रीवास्तव

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आधार बाला छंद :- 212-212-212-2
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धर्म का देख व्यापार ऐसा।
चाहते हैं सभी आज पैसा।।
खो रही है धरा भाव देखो,
आदमी हो गया आज कैसा।।

खोजते आज अपने पराए।
जो रहे खूब दूरी बनाए।।
ज़ख्म अपने भला क्यों कुरेदें,
क्या यही आज तक सीख पाए।।

मित्र यमराज घर आज आए।
देख हमको तनिक मुस्कराए।।
मौन से आज उनके डरा मैं,
प्रेम से चल दिए बिन बताए।।

मानते क्यों नहीं बात प्यारे।
सामने आ कहो तुम दुलारे।।
हम नहीं है किसी की दया से,
मान जाओ करो ना किनारे।।

यार हमको नहीं तुम सताओ।
नाज़ नखरे नहीं अब दिखाओ।।
लोग कहते नहीं ठीक आदत,
या चलो राज हमको बताओ।।

माँ नहीं तो भला कौन होगा।
मान लो ये धरा हो वियोगा।।
माँ कहे लाल मेरा निराला,
लाल मेरा बना है उजाला।।

सुधीर श्रीवास्तव

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ग़ज़ल 
           हमको ये मंज़ूर नहीं है
*बह्र: 22 22 22 22, क़ाफ़िया: 'ऊर', रदीफ़: नहीं है

हमको  ये  मंज़ूर  नहीं  है।
क्योंकि वो मजबूर नहीं है।

मत  गाओ  राग  अधूरा,
इसमें लय भरपूर नहीं है।

नफ़रत की दीवार उठाओ, 
ये  हमको  मंजूर  नहीं  है।

वो तो करता प्यार की बातें,
तुम जैसा  वो  क्रूर नहीं है।

गोटी कितनी भी तुम खेलों,
जीत हमसे अब दूर नहीं है।

चाहे जितना स्वांग रचाओं,
उसका कोई कसूर नहीं है।

कितना और बतायें तुमको, 
दोषी अब ये हुजूर नहीं है।

बिन पतवार चली कब नैया,
बात सही पर गुरूर नहीं है।

सुधीर श्रीवास्तव

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