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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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कुण्डलिया छंद
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कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें।
बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।।
नहीं सरकारें मानें, राम कहानी इनकी।
भरते सबका पेट, सोच उच्च है जिनकी।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कब तक ऐसा।
इनका भी परिवार, कटेगा जीवन कैसा।।२४

केवल सकता देख है, दिवास्वप्न वो रोज।
पर जीवन में सत्य की, करते रहना खोज।।
करते रहना खोज, यही मजदूर कहानी।
जिसे सुनाकर सो गए, पुराने पुरखे जानी।।
कहें मित्र यमराज, काम करना है भर बल।
बस इतना ही हाथ, सदा उसके है केवल।।२५

आँसू पीकर रह गया, था इतना मजबूर।
जितना लगता पास थे, समझ गया हूँ दूर।।
अब समझा हैं दूर, समय की है सब लीला।
चाहे जैसा रंग हो, हमें तो दिखता नीला।
कहें मित्र यमराज, दौर आया है बासू।
मूरख हो क्या आप, बहाते इतना आँसू।।२६

मुझको मूरख मानकर, रहिए आप प्रसन्न।
और निकट आ जाइए, संकट के आसन्न।।
संकट के आसन्न, आपका चिंतन भारी।
या फिर आया दौर, नयी आई बीमारी।
कहें मित्र यमराज, समझ इतनी है तुझको।
इसीलिए तो यार, समझता मूरख मुझको।।२७

मानव मन को खोखला, करता दीमक खूब।
तभी दीखता इन दिनों, कुंठा में सब डूब।।
कुंठा में सब डूब, बढ़ी है ये बीमारी।
इसीलिए तो बढ़ रही, आज भारी दुश्वारी।।
कहें मित्र यमराज, यार सब बचकर रहना।
वरना मानो आप, सभी को निश्चित ढहना।।२८

जिसकी जैसी सोच है, वैसा उसका काम।
होता भी तो नाम है, या फिर हो बदनाम।।
या फिर हो बदनाम, किसे अब होती चिंता।
मान रहे हैं लोग, व्यर्थ क्यों करना छिंता।।
कहें मित्र यमराज, फ़िक्र है किसको किसकी।
सभी सोचते आज, सोच होती जस जिसकी।।२९

अपने मन पर आपका, हो इतना अधिकार।
जो खुद को भी प्रेम से, हरदम हो स्वीकार।।
हरदम हो स्वीकार, यही हो कोशिश सबकी।
नहीं बीच की राह, खोजकर कहना तब की।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ ना जाएँ सपने।
नहीं दीजिए दोष, रखें मन काबू अपने।।३०

तिनका सा संसार है, भला समझता कौन।
फिर भी हर पल भौंकते, रह पाते कब मौन।।
रह पाते कब मौन, यही तो पीड़ा भारी।
फैली जस है आज, धरा कोरोना बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, बताओ दोष है किसका।
मातु सिया तो याद, हाथ जिनके था तिनका।।३१

फैला जो आतंक है, समझ न आये आज।
मगर सभी हमज्ञ जानते, इसके पीछे राज।।
इसके पीछे राज, भोगते हम सब सारे।
पर कुछ लोगों के आज, चमकते भाग्य सितारे।।
कहें मित्र यमराज, मिटेगा कब ये मैला।
चिंतित हैं सब लोग, गर्भ किस माँ के फैला।।३१

गाते हम आतंक का, नित्य बेसुरा राग। अच्छे से सब जानते, कैसे जन्मा नाग।। जन्मा है जो नाग, चलो हम इसको कुचलें। जाति-धर्म को भूल, राह हम मिलकर चल लें।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ की छोड़ो बातें।
कोई श्रेष्ठ उपाय, एक स्वर में हम गाते।।३२

नाहक ही सब चाहते, मिले मान सम्मान।
इसके पीछे मात्र है, छिपा हुआ अभिमान।।
छिपा हुआ अभिमान, पड़ेगा कल को भारी।
फल की चिंता छोड़, करो अपनी तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ है बनना ग्राहक।
करो नहीं तकरार, कर्म बिन सब है नाहक।।३३

आओ मिलकर हम करें, ऐसा आज उपाय।
जिससे हो आतंक का, बंद सदा अध्याय।।
बंद सदा अध्याय, बहुत अब खेल हो चुका।
कब तक इसके साथ, चलेगा ये छिपी-लुका।।
कहें मित्र यमराज, एकता भाव दिखाओ।
छोड़-छाड़ तकरार, संग सब आगे आओ।।३४

नेता जी फिर कह रहे, नहीं सहेंगे और।
अब बनने देंगें नहीं, आतंकी सिरमौर।।
आतंकी सिरमौर, राष्ट्र है सबसे पहले।
करें सभी मिल काम, चलेंगे नहले-दहले।।
कहें मित्र यमराज, चलो कोई तो चेता।
काश बात पर यार, टिका रह पाए नेता।।३५

सुधीर श्रीवास्त

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सफलता का मूक पथ

उजालों से मिलती है सीख
बोध कराता है विश्वास, संकल्प के साथ
सहनशीलता की खामोशी का,
जीवन यात्रा की अनवरत यात्रा के लिए
हमारी अपनी ताकत का,
लक्ष्य पाने की दिशा में मूक पथ बनकर।
जिसे समझना है हमें।
खामोशी से वैराग्य भाव से
संकल्प शक्ति को अहमियत देते हुए।
तभी सार्थक होगी पथ विचलन से दूरी
और सफल होगा हमारा जीवन
जो खुशियां हमें देगा
लेकिन प्रेरणा औरों की बनेगा,
और तब पूर्ण होगा हमारा जीवन
हमारे जीवन का उद्देश्य।

सुधीर श्रीवास्तव

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आधार बाला छंद :- 212-212-212-2
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धर्म का देख व्यापार ऐसा।
चाहते हैं सभी आज पैसा।।
खो रही है धरा भाव देखो,
आदमी हो गया आज कैसा।।

खोजते आज अपने पराए।
जो रहे खूब दूरी बनाए।।
ज़ख्म अपने भला क्यों कुरेदें,
क्या यही आज तक सीख पाए।।

मित्र यमराज घर आज आए।
देख हमको तनिक मुस्कराए।।
मौन से आज उनके डरा मैं,
प्रेम से चल दिए बिन बताए।।

मानते क्यों नहीं बात प्यारे।
सामने आ कहो तुम दुलारे।।
हम नहीं है किसी की दया से,
मान जाओ करो ना किनारे।।

यार हमको नहीं तुम सताओ।
नाज़ नखरे नहीं अब दिखाओ।।
लोग कहते नहीं ठीक आदत,
या चलो राज हमको बताओ।।

माँ नहीं तो भला कौन होगा।
मान लो ये धरा हो वियोगा।।
माँ कहे लाल मेरा निराला,
लाल मेरा बना है उजाला।।

सुधीर श्रीवास्तव

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ग़ज़ल 
           हमको ये मंज़ूर नहीं है
*बह्र: 22 22 22 22, क़ाफ़िया: 'ऊर', रदीफ़: नहीं है

हमको  ये  मंज़ूर  नहीं  है।
क्योंकि वो मजबूर नहीं है।

मत  गाओ  राग  अधूरा,
इसमें लय भरपूर नहीं है।

नफ़रत की दीवार उठाओ, 
ये  हमको  मंजूर  नहीं  है।

वो तो करता प्यार की बातें,
तुम जैसा  वो  क्रूर नहीं है।

गोटी कितनी भी तुम खेलों,
जीत हमसे अब दूर नहीं है।

चाहे जितना स्वांग रचाओं,
उसका कोई कसूर नहीं है।

कितना और बतायें तुमको, 
दोषी अब ये हुजूर नहीं है।

बिन पतवार चली कब नैया,
बात सही पर गुरूर नहीं है।

सुधीर श्रीवास्तव

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दीप्ति छंद
माँ की ममता
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माँ की ममता बड़ी अपार।
मान रहे हम सब आधार।।
कौन हुआ इससे उद्धार।
करते रहिए माँ से प्यार।।

प्राणी जीवन का ये सार।
इनसे मिलता प्यार दुलार।।
माँ का खोता है सम्मान।
लोग बने मूरख अंजान।।

माता झेल रही है दंश।
पीछे इसके अपना अंश।।
माँ को होता भीषण दर्द।
पता चले कब चुभती सर्द।।

माँ का ये कैसा दुर्भाग्य।
अपने करते उसका त्याग्य।।
ये कैसा हम करते पाप।
नाहक है सब पूजा जाप।।

अब अपने में करो सुधार।
वरना निश्चित है बँटाधार।।
माँ की ममता नहीं उधार।
करते रहिए माँ को प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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मुक्तक
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तीन लोक का स्वामी तुमको, कहती दुनिया सारी।
जीवन पथ की हर इक बाधा, करती डरती यारी।।
मन विश्वास हृदय में जिसके, छाई रहती मस्ती -
पापी सारे कष्ट भोगते, जिसके मन गद्दारी।।

नहीं रसायन से बच पाना, यही आज की पीर।
चाहे जो भी करना कर लो, और बहाओ नीर।
नये-नये रंग ढंग में अब तो, बनें रसायन रोज-
नाम प्रभो का जपते रहिए, रखकर मन में धीर।।

कुछ नहीं रखा है अब मिलने मिलाने में।
वक्त का तकाजा है सबको भगाने में।
दूर रहो तो बेहतर है इस जमाने में-
भलाई आज तो है बस बचने-बचाने में।

हर सितम सहकर भी मुस्कराते रहे।
उनके जुल्मो सितम हम भुलाते रहे।
जीत की कोशिशों में वो लगे थे मगर-
आइना मौन का हम दिखाते रहे।।

घर-घर की मुस्कान बेटियाँ।
आज रही बन शान बेटियाँ।
ऊँचा किया है नाम जग में-
बनती नव पहचान बेटियाँ।।

फैलाती हैं चमक बेटियाँ।
संबल बनती आज बेटियांँ।
नहिं बेटों से अब हैं पीछे -
घर-घर की मुस्कान बेटियाँ।।

आज किसी की बात न करिए।
कुछ भी कहने से अब डरिए।
समय के साथ चलना सीखिए-
कल की अपनी करनी भरिए।।

अश्रु लिए वो विदा हो गई।
मोहक सी मुस्कान दे गई।
जिसकी नहीं कल्पना की थी-
वो ऐसा उपहार बन गई।।

शासन सत्ता से खुदा न बनिए।
कल तुमको भी होना धनिए।
ज्ञान चक्षु अब तुम भी खोलो-
दंभ की उड़ान न भरिए।।

किसकी प्रतीक्षा में इतना अधीर हो।
लगता तो नहीं कि ये नाहक पीर हो।
सोचो समझो कि जायज है कितना -
अच्छा नहीं है कि आँखों में नीर हो।।

बताओ क्यों इतना मगन हो रहे हो।
जो खुद से ही नीचे गिरे जा रहे हो।
बताओ भला राज इसके क्या पीछे -
हवाओं के माफिक उड़े जा रहे हो।।

नाहक नहीं आप हमको सताओ।
शिकवा जो हमसे तो वो बताओ।
आखिर पता तो चले बात क्या है-
बहुत हूँ दुखी मैं नहीं अब रुलाओ।।

तीन लोक के तुम हो स्वामी।
जन-मन के हो प्रभु अनुगामी।
जिसने विश्वास किया तुम्हारा -
उसके मन का भाव नमामी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - परंपरा
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मर्यादा का पालन करिए।
परंपरा से जुड़कर रहिए।।
इतनी नहीं परंपरा भारी।
जिससे हो सकती न यारी।।

परंपरा भी पूँजी होती।
हँसी-खुशी नव पीढ़ी ढोती।।
पर कुछ को ये कब है भाती।
जैसे फटती उनकी छाती।।

परंपरा पुरखों ने डाली।
मान रहे क्यों आप बवाली।।
गहराई में यदि तुम जाओ।
सोच दूर तब उनकी पाओ।।

अनपढ़ उनको कभी न कहना।
परंपरा थी जिनका गहना।
यदि उनका उपहास करोगे।
निश्चित इसका दंड भरोगे।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपई / दीप्ति / जयकरी छंद
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आप लगाओ जमकर रंग।
मौका है तो कर लो तंग।।
मर्यादा भी हो मत भंग।
नहीं किसी से करना जंग।।

समझो आप महात्मा बुद्ध।
व्यर्थ ठान बैठे क्यों युद्ध।।
धारण उनका कर संदेश।
नाहक क्या है ये उपदेश।।

आया नहीं आपको ज्ञान।
कितना दिया बुद्ध को मान।।
इसका हम पर बढ़ता भार।
समझा कब जीवन संसार।।

मिला गया में उनको ज्ञान।
बनी अलग थी तब पहचान।।
दुनिया लेती बुद्धा का ज्ञान।
हम क्या हैं मूरख अज्ञान।।

दिवस मनाते सब मजदूर।
समझा नहीं नशे में चूर।।
उड़ा रहे इनका उपहास।।
या फिर होता है परिहास।।

करते सभी छंद जागरण।
कुछ लेते न इसका प्रण।।
जैसा जिसका है सिद्धांत।
ज्ञान मिलेगा श्रम उपरांत।।

गुस्से में आया यमराज।
कहा मुझे पहनाओ ताज।।
मैंने कहा और कुछ बोल।
या फिर बैठ बजाओ ढोल।।

अति देती है कष्ट अपार।
इतना तुम भी समझो यार।।
व्यर्थ नहीं करिए तकरार।
खाना है क्या तुमको मार।।

करते इतना अति विश्वास।
इसीलिए तो टूटे आस।।
अब तो कर लें सोच विचार।
या जाकर बैठो घर द्वार।।

उन लोगों का क्या है काम।
जिन्हें चाहिए केवल नाम।।
लगता उनसे ही संसार।
जिसके वो हैं लंबरदार।।

जिससे की थी ज्यादा आस।
उसने तोड़ा सब विश्वास।।
व्यर्थ गया जो किया करार।
हिस्से आई भारी हार।।

कैसा आया है परिणाम।
डूबगया ममता का नाम।।
नहीं रहा अब उनका राज।
दूजा सिर पर भगवा ताज।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - श्रमिक

श्रमिक धरा हम तुम है सारे।
कोई यहाँ विशेष न प्यारे।।
सबके काम अलग बस होते।
करने पड़ते हँसते रोते।।

इसका हल्का उसका भारी।
कुछ की बैठे जिम्मेदारी।।
कोई भाग-दौड़ है करता।
ठकोई बैठे बैठे खटता।।

श्रमिक भला श्रम से कब डरता।
किसका पेट बिना श्रम भरता।।
श्रमिक बने सब घूम रहे हैं।
सबके अपने भाग्य रचे हैं।।

करे जरूरत सबकी पूरी।
चाहे पास हो या फिर दूरी।।
रूप रंग का भेद न होता।
श्रम के बीज श्रमिक ही बोता।

श्रम सम्मान सभी को मिलता।
जन परिवार देश है खिलता।।
श्रमिक देश का मान बढ़ाते।
उन्नति के पथ पर ले जाते।।

बड़ी निराली इनकी लीला।
रुखा-सूखा, सुखद कंटीला।।
श्रमिक ही करते जग उद्धार।
इनको सभी दीजिए प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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विश्व हास्य दिवस (03 अप्रैल)
हँसना मना है
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आज हास्य दिवस है
इस पर किसका वश है।
कहते हैं यमराज मित्र हँसना मना है यही इस दिवस का सम्मान है।
मगर आप तो मानोगे नहीं, इसीलिए तो आप जैसे बेवकूफों का इतना नाम है।
हास्य की कसम आप सबको
स्वस्थ, प्रसन्न रहना है
तो हँसना एकदम गैर जरुरी है
मगर आप सब ये गलती है मत करना
क्योंकि हँसने के लिए हँसना मना है।
हम आप सबसे ज्यादा शरीफ हैं
यमराज के यार हैं, सबसे बड़का लंबरदार हैं।
आप समझ गए तो आपका कल्याण कर देंगे
यदि नहीं समझे, और मुझ हँस दिए तो
सबको काला पानी की सजा दे देंगे।
हँसने का शौक अगर इतना ही रहा
तो यमराज की कसम हँसी का नामोनिशान ही मिटा देंगे, हँसने और हास्य दिवस दोनों का अस्तित्व ही
खत्म कर हास्य दिवस को इतिहास बना देंगे।

सुधीर श्रीवास्तव

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