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Sudhir Srivastava

Sudhir Srivastava

@sudhirsrivastava1309
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आधार बाला छंद :- 212-212-212-2
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धर्म का देख व्यापार ऐसा।
चाहते हैं सभी आज पैसा।।
खो रही है धरा भाव देखो,
आदमी हो गया आज कैसा।।

खोजते आज अपने पराए।
जो रहे खूब दूरी बनाए।।
ज़ख्म अपने भला क्यों कुरेदें,
क्या यही आज तक सीख पाए।।

मित्र यमराज घर आज आए।
देख हमको तनिक मुस्कराए।।
मौन से आज उनके डरा मैं,
प्रेम से चल दिए बिन बताए।।

मानते क्यों नहीं बात प्यारे।
सामने आ कहो तुम दुलारे।।
हम नहीं है किसी की दया से,
मान जाओ करो ना किनारे।।

यार हमको नहीं तुम सताओ।
नाज़ नखरे नहीं अब दिखाओ।।
लोग कहते नहीं ठीक आदत,
या चलो राज हमको बताओ।।

माँ नहीं तो भला कौन होगा।
मान लो ये धरा हो वियोगा।।
माँ कहे लाल मेरा निराला,
लाल मेरा बना है उजाला।।

सुधीर श्रीवास्तव

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ग़ज़ल 
           हमको ये मंज़ूर नहीं है
*बह्र: 22 22 22 22, क़ाफ़िया: 'ऊर', रदीफ़: नहीं है

हमको  ये  मंज़ूर  नहीं  है।
क्योंकि वो मजबूर नहीं है।

मत  गाओ  राग  अधूरा,
इसमें लय भरपूर नहीं है।

नफ़रत की दीवार उठाओ, 
ये  हमको  मंजूर  नहीं  है।

वो तो करता प्यार की बातें,
तुम जैसा  वो  क्रूर नहीं है।

गोटी कितनी भी तुम खेलों,
जीत हमसे अब दूर नहीं है।

चाहे जितना स्वांग रचाओं,
उसका कोई कसूर नहीं है।

कितना और बतायें तुमको, 
दोषी अब ये हुजूर नहीं है।

बिन पतवार चली कब नैया,
बात सही पर गुरूर नहीं है।

सुधीर श्रीवास्तव

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दीप्ति छंद
माँ की ममता
*********
माँ की ममता बड़ी अपार।
मान रहे हम सब आधार।।
कौन हुआ इससे उद्धार।
करते रहिए माँ से प्यार।।

प्राणी जीवन का ये सार।
इनसे मिलता प्यार दुलार।।
माँ का खोता है सम्मान।
लोग बने मूरख अंजान।।

माता झेल रही है दंश।
पीछे इसके अपना अंश।।
माँ को होता भीषण दर्द।
पता चले कब चुभती सर्द।।

माँ का ये कैसा दुर्भाग्य।
अपने करते उसका त्याग्य।।
ये कैसा हम करते पाप।
नाहक है सब पूजा जाप।।

अब अपने में करो सुधार।
वरना निश्चित है बँटाधार।।
माँ की ममता नहीं उधार।
करते रहिए माँ को प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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मुक्तक
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तीन लोक का स्वामी तुमको, कहती दुनिया सारी।
जीवन पथ की हर इक बाधा, करती डरती यारी।।
मन विश्वास हृदय में जिसके, छाई रहती मस्ती -
पापी सारे कष्ट भोगते, जिसके मन गद्दारी।।

नहीं रसायन से बच पाना, यही आज की पीर।
चाहे जो भी करना कर लो, और बहाओ नीर।
नये-नये रंग ढंग में अब तो, बनें रसायन रोज-
नाम प्रभो का जपते रहिए, रखकर मन में धीर।।

कुछ नहीं रखा है अब मिलने मिलाने में।
वक्त का तकाजा है सबको भगाने में।
दूर रहो तो बेहतर है इस जमाने में-
भलाई आज तो है बस बचने-बचाने में।

हर सितम सहकर भी मुस्कराते रहे।
उनके जुल्मो सितम हम भुलाते रहे।
जीत की कोशिशों में वो लगे थे मगर-
आइना मौन का हम दिखाते रहे।।

घर-घर की मुस्कान बेटियाँ।
आज रही बन शान बेटियाँ।
ऊँचा किया है नाम जग में-
बनती नव पहचान बेटियाँ।।

फैलाती हैं चमक बेटियाँ।
संबल बनती आज बेटियांँ।
नहिं बेटों से अब हैं पीछे -
घर-घर की मुस्कान बेटियाँ।।

आज किसी की बात न करिए।
कुछ भी कहने से अब डरिए।
समय के साथ चलना सीखिए-
कल की अपनी करनी भरिए।।

अश्रु लिए वो विदा हो गई।
मोहक सी मुस्कान दे गई।
जिसकी नहीं कल्पना की थी-
वो ऐसा उपहार बन गई।।

शासन सत्ता से खुदा न बनिए।
कल तुमको भी होना धनिए।
ज्ञान चक्षु अब तुम भी खोलो-
दंभ की उड़ान न भरिए।।

किसकी प्रतीक्षा में इतना अधीर हो।
लगता तो नहीं कि ये नाहक पीर हो।
सोचो समझो कि जायज है कितना -
अच्छा नहीं है कि आँखों में नीर हो।।

बताओ क्यों इतना मगन हो रहे हो।
जो खुद से ही नीचे गिरे जा रहे हो।
बताओ भला राज इसके क्या पीछे -
हवाओं के माफिक उड़े जा रहे हो।।

नाहक नहीं आप हमको सताओ।
शिकवा जो हमसे तो वो बताओ।
आखिर पता तो चले बात क्या है-
बहुत हूँ दुखी मैं नहीं अब रुलाओ।।

तीन लोक के तुम हो स्वामी।
जन-मन के हो प्रभु अनुगामी।
जिसने विश्वास किया तुम्हारा -
उसके मन का भाव नमामी।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई छंद - परंपरा
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मर्यादा का पालन करिए।
परंपरा से जुड़कर रहिए।।
इतनी नहीं परंपरा भारी।
जिससे हो सकती न यारी।।

परंपरा भी पूँजी होती।
हँसी-खुशी नव पीढ़ी ढोती।।
पर कुछ को ये कब है भाती।
जैसे फटती उनकी छाती।।

परंपरा पुरखों ने डाली।
मान रहे क्यों आप बवाली।।
गहराई में यदि तुम जाओ।
सोच दूर तब उनकी पाओ।।

अनपढ़ उनको कभी न कहना।
परंपरा थी जिनका गहना।
यदि उनका उपहास करोगे।
निश्चित इसका दंड भरोगे।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपई / दीप्ति / जयकरी छंद
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आप लगाओ जमकर रंग।
मौका है तो कर लो तंग।।
मर्यादा भी हो मत भंग।
नहीं किसी से करना जंग।।

समझो आप महात्मा बुद्ध।
व्यर्थ ठान बैठे क्यों युद्ध।।
धारण उनका कर संदेश।
नाहक क्या है ये उपदेश।।

आया नहीं आपको ज्ञान।
कितना दिया बुद्ध को मान।।
इसका हम पर बढ़ता भार।
समझा कब जीवन संसार।।

मिला गया में उनको ज्ञान।
बनी अलग थी तब पहचान।।
दुनिया लेती बुद्धा का ज्ञान।
हम क्या हैं मूरख अज्ञान।।

दिवस मनाते सब मजदूर।
समझा नहीं नशे में चूर।।
उड़ा रहे इनका उपहास।।
या फिर होता है परिहास।।

करते सभी छंद जागरण।
कुछ लेते न इसका प्रण।।
जैसा जिसका है सिद्धांत।
ज्ञान मिलेगा श्रम उपरांत।।

गुस्से में आया यमराज।
कहा मुझे पहनाओ ताज।।
मैंने कहा और कुछ बोल।
या फिर बैठ बजाओ ढोल।।

अति देती है कष्ट अपार।
इतना तुम भी समझो यार।।
व्यर्थ नहीं करिए तकरार।
खाना है क्या तुमको मार।।

करते इतना अति विश्वास।
इसीलिए तो टूटे आस।।
अब तो कर लें सोच विचार।
या जाकर बैठो घर द्वार।।

उन लोगों का क्या है काम।
जिन्हें चाहिए केवल नाम।।
लगता उनसे ही संसार।
जिसके वो हैं लंबरदार।।

जिससे की थी ज्यादा आस।
उसने तोड़ा सब विश्वास।।
व्यर्थ गया जो किया करार।
हिस्से आई भारी हार।।

कैसा आया है परिणाम।
डूबगया ममता का नाम।।
नहीं रहा अब उनका राज।
दूजा सिर पर भगवा ताज।।

सुधीर श्रीवास्तव

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चौपाई - श्रमिक

श्रमिक धरा हम तुम है सारे।
कोई यहाँ विशेष न प्यारे।।
सबके काम अलग बस होते।
करने पड़ते हँसते रोते।।

इसका हल्का उसका भारी।
कुछ की बैठे जिम्मेदारी।।
कोई भाग-दौड़ है करता।
ठकोई बैठे बैठे खटता।।

श्रमिक भला श्रम से कब डरता।
किसका पेट बिना श्रम भरता।।
श्रमिक बने सब घूम रहे हैं।
सबके अपने भाग्य रचे हैं।।

करे जरूरत सबकी पूरी।
चाहे पास हो या फिर दूरी।।
रूप रंग का भेद न होता।
श्रम के बीज श्रमिक ही बोता।

श्रम सम्मान सभी को मिलता।
जन परिवार देश है खिलता।।
श्रमिक देश का मान बढ़ाते।
उन्नति के पथ पर ले जाते।।

बड़ी निराली इनकी लीला।
रुखा-सूखा, सुखद कंटीला।।
श्रमिक ही करते जग उद्धार।
इनको सभी दीजिए प्यार।।

सुधीर श्रीवास्तव

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विश्व हास्य दिवस (03 अप्रैल)
हँसना मना है
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आज हास्य दिवस है
इस पर किसका वश है।
कहते हैं यमराज मित्र हँसना मना है यही इस दिवस का सम्मान है।
मगर आप तो मानोगे नहीं, इसीलिए तो आप जैसे बेवकूफों का इतना नाम है।
हास्य की कसम आप सबको
स्वस्थ, प्रसन्न रहना है
तो हँसना एकदम गैर जरुरी है
मगर आप सब ये गलती है मत करना
क्योंकि हँसने के लिए हँसना मना है।
हम आप सबसे ज्यादा शरीफ हैं
यमराज के यार हैं, सबसे बड़का लंबरदार हैं।
आप समझ गए तो आपका कल्याण कर देंगे
यदि नहीं समझे, और मुझ हँस दिए तो
सबको काला पानी की सजा दे देंगे।
हँसने का शौक अगर इतना ही रहा
तो यमराज की कसम हँसी का नामोनिशान ही मिटा देंगे, हँसने और हास्य दिवस दोनों का अस्तित्व ही
खत्म कर हास्य दिवस को इतिहास बना देंगे।

सुधीर श्रीवास्तव

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जीने के लिए
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उम्मीदों की राह का मिटता सन्नाटा
मुस्कान बिखेरती चाँदनी सपने दिखाती,
दिल की धड़कन बेकाबू सी हो जाती है।
तब मन में विश्वास जगाना पड़ता है
अपने आप से तर्क-वितर्क करना पड़ता है,
उम्मीदों को यथार्थ के धरातल पर
उतारने का प्रयत्न भी करना पड़ता है।
राह के काँटे खुद हटाता पड़ता है,
सन्नाटे को चीरना पड़ता है,
ऊहापोह से बचकर आगे बढ़ना पड़ता है
धड़कनों पर काबू रखना पड़ता है।
इन सबके लिए अपने आप से लड़ना पड़ता है।
जीवन में विडंबनाएं बहुत हैं,
यह बात अच्छे से समझना पड़ता है,
आँसुओं को ताकत बनाकर
हौसलों को पंख देना पड़ता है,
जीवन जीने के लिए
जाने क्या-क्या जतन करना पड़ता है
और अकेले ही जूझते हुए
आगे बढ़ना और जीतना पड़ता है।

सुधीर श्रीवास्तव

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कुण्डलिया
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ममता की वो खान है, मानें हम संताप।
अपने निज व्यवहार से, करते हम सब पाप।।
करते हम सब पाप, सभी हम जो हैं भरते।
उसकी पीड़ा आज, देख क्यों नहीं समझते।
कहें मित्र यमराज, समझिए इतनी समता।
प्यारे पढ़ लो आप, मित्र लाचारी ममता।।९

मानो ज्ञान भंडार का, निज जीवन आयाम।
अज्ञानी बन बैठना, बदनामी तव नाम।।
बदनामी तव नाम, भलाई आखिर किसमें।
करना वो ही काम, भाव सुखदा हो जिसमें।
आप बढ़ाओ कोष, मित्र अब इतना जानो।
बाकी सबकुछ आप, सोच समझकर मानो।।१०

जिनकी होती है नहीं, स्वाभिमान पहचान।
हम सब उनको जानते, इतना होता ज्ञान।।
इतना होता ज्ञान, व्यर्थ है चर्चा करना।
होशोहवास में आप, मित्र संभलकर रहना।
दूरी रखिए आप, कहानी जो है इनकी।
क्यों उनकी पहचान, शोर है चहुँदिश जिनकी।।११

सबके नहीं नसीब में, होता माँ का प्यार।
जो इससे वंचित रहे, वही समझता सार।।
वही समझता सार, दंश ये होता भारी।
पर बेचारा आप, कहे किससे लाचारी।
कहें मित्र यमराज, जगत में ऐसे तबके।
धक्के खाते नित्य, जहाँ में रहते सबके।।१२

बनिए नहीं बिचौलिया, मिलता केवल दोष।
सहना पड़ता व्यर्थ में, कल में ढेरों रोष।।
कल में ढेरों रोष, काम जब उसका निकले।
काम बिगड़ यदि जाय, फोड़ना चाहे टकले।
कहें मित्र यमराज, बात मेरी तो सुनिए।
अच्छा होगा आप, सामने मूरख बनिए।।१३

सबसे ज्यादा आजकल, अपने लगते भार।
कलयुग का यह सार है, लगभग हर परिवार।
लगभग हर परिवार, सुनें हम यही कहानी।
सभी सुनाते आज, कथाएं आप जुबानी।
कहें मित्र यमराज, शिकायत नहीं किसी से।
सभी दुखी हैं आज, मगर हम अच्छे सबसे।।१४


अंर्तमन की पीर का, होता गहरा घाव।
आज छोड़कर कल उसे, आप दीजिए भाव।
आप दीजिए भाव, रंग चेहरे मत लाना।
नाहक उसको आज, नहीं दो पानी दाना।
इसका रौरव छंद, तोड़ देता है हर तन।
कहें मित्र यमराज, गजब होता अंर्तमन।।१५

दिखता है दृश्यमान जो, करता सबको तंग।
जो हो रहा समाज में, आज बहुत बदरंग।।
आज बहुत बदरंग, जमाना कैसा आया।
कलयुग के दौर ने, जगत को है भरमाया।।
कहें मित्र यमराज, सत्य भी खूब है बिकता।
मान लीजिए आप, झूठ ही आगे दिखता।।१६

आया मुश्किल समय है, होते सब बेहाल।
सूर्यदेव इतने कुपित, तपन हुई विकराल।।
तपन हुई विकराल, हमें भी तो समझा दो।
या लाकर चुपचाप, एक बोतल पकड़ा दो।।१७
कहें मित्र यमराज, शर्म आती है भाया।
गर्मी का यह रूप, आप से मिलने आया।।

बनते न्यायाधीश जो, होते नहीं महान।
संविधानक्ष की पालना, रखें ईश का ध्यान।।
रखें ईश का ध्यान, न्याय के जो अनुरागी।
नीति नियम सिद्धांत, बने रहते बिरहागी।
कहें मित्र यमराज, धर्म का पोषण करते।
तब जाकर कुछ लोग, योग्य तब इसके बनते।।१८

तुमको जो अच्छा लगा, किया वही हर काम।
और मुफ्त में हो गए, घर बैठे बदनाम।।
घर बैठे बदनाम, पीटते अब क्यों माथा।
करते जिन पर नाज , आज कोई ना साथा।
कहें मित्र यमराज, बुलाओ इनको उनको।
हम भी देखें आज, यहाँ जो लाए तुमको।।१९

ऐसे भी कुछ लोग हैं, नहीं आस्था ज्ञान।
कुंठा में हैं जी रहे, बनते बड़े महान।।
बनते बड़े महान, बता कर वे खुश होते।
नहीं समझते आज, उड़ेंगे इक दिन तोते।
कहें मित्र यमराज, बनो मत इनके जैसे।
ये सब हैं बेशर्म, रहेंगे बिल्कुल ऐसे।।२०

आस्था के साथ अब क्यों, खेल रहे हैं लोग।
या फिर इन सबको मिला, जन्मजात ये रोग।।
जन्मजात ये रोग, दवा अब बहुत जरूरी।
मान लीजिए आप, भले ही हो मजबूरी।
कहें मित्र यमराज, बढ़ाओ सब मिल हाथा।
तभी बचेगी लाज, सत्य जब होगी आस्था।।२१

गाना गाते बेसुरा, या फिर कोई रोग।
दुश्मन से लगने लगे, अपने सारे लोग।।
अपने सारे लोग, दुश्मनी लगे निभाने।
बिना बात के आज, बेवजह देते ताने।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ इनको समझाना।
रहें दंभ में चूर, बेसुरा गाते गाना।।२२

नफरत ही नफरत भरी, मानव मन में आज।
क्या होता अब जा रहा, कैसा हुआ समाज।।
कैसा हुआ समाज, राम जाने क्या होगा।
भोग रहे सब आज, नहीं जो कल तक भोगा।।
कहें मित्र यमराज, दिखाओ यार शराफत।
करो सभी से प्रेम, नहीं आपस में नफरत।।२३


सुधीर श्रीवास्त

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