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मैंने चाहा तृणभर परिचय, इस धरा का,इस ब्रह्मांड का। सपना चाहा तृणभर सुन्दर इस देश का, इस मनुष्य का। प्यार चाहा अतिशय व्यापक इस लोक का, फिर परलोक का। *** महेश रौतेला
भीगे नयनों की बातें हैं जो दुनिया में रहती हैं, कुछ हाथ पकड़ कर आती हैं कुछ पैर छू कर जाती हैं। *** महेश रौतेला
थोड़ा ही चले थे साथ-साथ शेष प्यार में चले, थोड़ा ही रहे थे साथ-साथ शेष प्यार में रहे। थोड़ा मिले थे साथ-साथ शेष मीलों अकेले चले, थोड़ा गाये थे साथ-साथ शेष मन ही मन गुनगुनाये। थोड़ी हुई थी भेंट शेष अलग-अलग चले थे, थोड़ा बैठे थे साथ-साथ शेष दूर-दूर रहे थे। *** महेश रौतेला
ऐसा लय बाँधो राधे तुममें लय हो जाऊँ, भारत के कुरुक्षेत्र में महाभारत न दोहराऊं। लिखा रहे कर्म यहाँ पर हर पग पर साँस दिखे, मानव ही मानव में लय ऐसा उन्नत संसार दिखे। *** महेश रौतेला
बहुत समय से टिकी है पवन पृथ्वी पर, बहुत समय से टिके हैं वृक्ष पृथ्वी पर, बहुत समय से टिकी हैं नदियां पृथ्वी पर, बहुत समय से टिके हैं पहाड़ पृथ्वी पर, बहुत समय से टिका है समुद्र पृथ्वी पर, महाभारत से पहले और महाभारत के बाद बहुत समय से टिका है मनुष्य पृथ्वी पर। *** महेश रौतेला
दुख तो सब आ चुके हैं सुख की उम्मीद जगी हुई है, दुनिया अपनी जगह घूमती घाम की आदत बनी हुई है। प्यार से अच्छा क्या होगा प्यार से सच्चा क्या होगा! श्रीकृष्ण अच्छे हैं राधा भी अच्छी हैं। उनका सुख दुख समान करना मुझे नहीं आता है, जय-पराजय ,लाभ-हानि समान मानना कठिन कठोर है। दुख तो सब आ चुके हैं सुख की उम्मीद जगी हुई है। *** महैश रौतेला
तुम हमें प्यार का अंदाज दे दो या किसी तीर्थ का सहारा दे दो, या वृक्ष की पूर्ण छाया दे दो या पुष्प की जीवित महक दे दो। शून्य सा ये भरा आकाश दे दो एक मुस्कराती शीतल छवि दे दो, प्रीति के रूके स्रोत खोल दो समय का सशक्त आधार दे दो। नम आँखों का पूर्ण प्यार दे दो स्पर्श का नूतन आभास दे दो, जिन्दगी का मधुर संगीत दे दो तुम मुझे प्यार का हाथ दे दो। *** महेश रौतेला
मरने के बाद तीता(कड़ुआ) भी मीठा लगने लगता है, चुप्पी में प्यार आने लगता है मन मुटाव हँसाने लगता है, अधैर्य, धैर्य बन जाता है। मरने के बाद तीर्थ एकान्त लगता है काँटे फूल से दिखते हैं, अँधेरे में दिखने लगता है सूनापन आजाद हो जाता है। *** महेश रौतेला
बन्द करो ये चलना-फिरना बन्द करो ये जय-जयकार, दीर्घ शान्ति को आ जाने दो बन्द करो ये भाषणवाद। आ जाने दो हवा शान्ति की रह जाने दो अरण्य देवतुल्य, बन्द करो ये ठगना-ठगाना बन्द करो ये शैक्षिक व्यापार। पूर्ण करो पूजा मन की बन्द करो लय के व्यवधान, आ जाने दो स्नेह की धारा बन्द करो झूठे वादे सादे। रोको सारे रण के रथ बन्द करो ये जय-जयकार, सुख-दुख रख प्राणों के अन्दर ले आओ सब फूल भरे रथ। **** महेश रौतेला
उसने एक फूल चुना और मेरे भाग्य पर चढ़ा दिया, उसने एक पत्थर उठाया और मेरे भाग्य पर दे मारा, फिर उसने एक फूल चुना और अन्तिम संस्कार पर चढ़ा दिया। *** महेश रौतेला
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