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महेश रौतेला

महेश रौतेला Matrubharti Verified

@maheshrautela
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शब्दों तक पहुँचना भी
तपस्या है,
शब्दों को इकट्ठा करना और कठिन है
"उसने प्यार करता हूँ" कहने में
सालों लगा दिये।

** महेश रौतेला

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गणतंत्र :

हम गणतंत्र में घुलमिल जायें
गण का मन हो,गण की भाषा
गण का जीवन स्वस्थ सफल हो।
गण की गंगा, गण का गगन
धरा गण की पावन धारा,
सीमाओं में खुली पवन हो
घर-घर अपना स्वतंत्र साथ हो।
चलना सबका सहज सरल हो
गण के अन्दर सत्य सशक्त हो
गण का मन हो,गण की भाषा।
आदि शक्ति से जुड़ा हुआ हो
तन की आभा सर्वत्र विकीर्ण हो,
मन से विजयी, मन से व्यापक
कई सूर्य की चमक लिया हो।
जन का वलिदान
जन का अर्पण,
जन के नियम,जन का राष्ट्र
गणतंत्र हमारा जीवन हो।
****

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।

*** महेश रौतेला

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इस बसंत में जो फूल खिलेंगे
तुमको अर्पित कर दूँगा,
इस बसंत में जो उल्लास रहेगा
तुमको समर्पित कर दूँगा।

आना-जाना सत्य रहा है
ऋतु को ऋतु से मिलना है,
धरा खिलेगी, नैन मिलेंगे
यह वरदान तुम्हें देना है।
***

बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।

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एक विदा होता व्यक्ति
बहुत दिव्य बोलता है,
एक मरा हुआ व्यक्ति
अतुलनीय कथा कहता है।

*** महेश रौतेला

जिन्दगी इतनी ही नहीं
और अधिक थी,
प्यास इतनी ही नहीं
और अधिक थी।
आसमान इतना ही नहीं
और अधिक था,
दुख इतना ही नहीं
और बिखरा था,
सुख इतना ही नहीं
और जुड़ा था।
ममता इतनी ही नहीं
और फैली थी,
प्यार इतना ही नहीं
और बाकी था।
धरती इतनी ही नहीं
और जीवट थी,
जीवन इतना ही नहीं
और शेष था।
****

*** महेश रौतेला

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हर दिन यहाँ तीर्थ बना है
हर उजाला ज्योति बनी है,
हर पंछी उड़ान लिए है
हर नदी तीर्थ चली है।

हर पहाड़ पर ऊँचाई है
हर खेत में अन्न उगा है,
हर जंगल में हवा शुद्ध है
हर झरने पर दृश्य अलग है।

हर मानव में देव अनेक हैं
हर विद्यालय में ज्ञान विविध है,
हर पुष्प का सौन्दर्य निराला
हर आग का ताप अलग है।

हर त्योहार के संदर्भ पवित्र हैं
हर पग का नाप अलग है,
हर आन्दोलन की नींव नयी है
हर जीवन का लय गूढ़ है।


*** महेश रौतेला

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प्यार की बातों में अजब सी गुमसुदगी थी,
कहाँ-कहाँ ढूंढता, जिन्दगी एक पैमाना लिए खड़ी थी।

पत्र तुमने पढ़ा नहीं
लिखा था," गगन में असंख्य नक्षत्र हैं
असंख्य तारों में दूरी बड़ी है,
धरती पर गाँव बसे हैं
इधर-उधर शहर जुड़े हैं,
प्यार के लिए अथाह जगह है।
जंगल में डर छुपा है
नदी में भँवर विचित्र है,
घरों के नाम बड़े हैं
पर मनुष्य का आवास न्यून है।
रखने को प्यार बहुत था
ममता का उधार बड़ा था,
पत्र जो पढ़ा नहीं
एक शब्द उसमें अदृश्य,गहन था।
बातें अक्षुण्ण थीं
सारांश संक्षिप्त था,
लोक-परलोक का विवरण लिखा था
मन ने मन को पढ़ा जहाँ था।
कथा कहने का मन हुआ
तुमने जिसे अनसुना किया,
घर से निकलना कठिन था
राह का मिलना जटिल था।
जीजिविषा जागी हुई थी
समय में संघर्ष छुपा था,
पत्र जो मैंने लिखा था
प्यार में प्रकट हुआ था।
***

*** महेश रौतेला

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कहाँ विराम लगेगा
पता नहीं,
सत्तर, अस्सी,नब्बे
या उससे पहले।
कहाँ से बुलावा आयेगा
पता नहीं,
धरती पर छीना झपटी चलते- चलते
शान्ति पर विश्वास बढ़ेगा।
कहाँ शाम होगी
कौन छूटेगा,
किसकी विदाई में
आँखें नम हो जायेंगी,
वक्त बतायेगा।
****

*** महेश रौतेला

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हम इच्छाओं को ढूंढते रहते हैं
वसंत के खुलासे में,
गंगा के जल में
हिमालय के हर शिखर पर।
प्यार हमारे लिए जीवित होता
बहुत छोटी पगडण्डियों में,
घास के मैदानों में
घर के स्वभाव में।
इच्छाओं का हाथ
बहुत लम्बा होता है,
वसुंधरा से आगे
स्वर्ग तक फैला होता है।
इस साल से, उस साल में जाते
चीते का वेग पकड़े,
शिकार भी हैं, शिकारी भी हैं
शुभकामनाओं के आगार भी हैं।
*****

साल 2026 की शुभकामनाएं।

** महेश रौतेला

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