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मैं छोटी सी कविता पलभर चली, क्षणभर खिली हर परिचय में मिली। सुगन्ध सी फैली धरा में मिली, टूटे सपनों की धात्री देशों में घुली मिली। चेहरा दैदीप्यमान साथी संग हँसी, छुआ जब मन को सिहर कर मुस्करायी। मैं छोटी सी कविता वसंत संग लौटी, गरज के बरसी क्षणभर में बिखर गयी। पता बताने लौटी खर-पतवार उखाड़, प्रिय संग बैठी नित नये रूप में खड़ी, छोटी सी कविता हूँ। *** ** महेश रौतेला
बहुत समय से मैं भगवान की तरफ हूँ, आँधी हो,तूफान हो युद्ध हो,महायुद्ध हो, अमीरी हो,गरीबी हो मैं भगवान की तरफ रहता हूँ। बाढ़ हो,सूखा होः गर्मी हो, ठंड हो या वसंत हो मेरी आशा-आकांक्षा उनमें रहती है। गीता पढ़ता हूँ लोक,परलोक की बातें समझ लेता हूँ, "जो पहले ही मारे जा चुके हैं उन्हें मारने का निमित्त मात्र बन भगवान की ओर रहता हूँ।" संशय से बाहर आने के लिए कर्म बन जाता हूँ, शायद भगवान ऐसा ही चाहते हैं। **** *** महेश रौतेला
इसी प्यार के कारण हम फिर-फिर मिलते हैं, इसी प्यार के कारण हम फिर-फिर लड़ते हैं। इसी प्यार के कारण आँसू नित बहते हैं, इसी प्यार के कारण सब राधे-राधे कहते हैं। इसी प्यार की अगुवाई में दुनिया नित चलती है, इसी प्यार की परछाई में राधा अब तक बैठी है। *** *** महेश रौतेला
मैंने चाहा तृणभर परिचय, इस धरा का,इस ब्रह्मांड का। सपना चाहा तृणभर सुन्दर इस देश का, इस मनुष्य का। प्यार चाहा अतिशय व्यापक इस लोक का, फिर परलोक का। *** महेश रौतेला
भीगे नयनों की बातें हैं जो दुनिया में रहती हैं, कुछ हाथ पकड़ कर आती हैं कुछ पैर छू कर जाती हैं। *** महेश रौतेला
थोड़ा ही चले थे साथ-साथ शेष प्यार में चले, थोड़ा ही रहे थे साथ-साथ शेष प्यार में रहे। थोड़ा मिले थे साथ-साथ शेष मीलों अकेले चले, थोड़ा गाये थे साथ-साथ शेष मन ही मन गुनगुनाये। थोड़ी हुई थी भेंट शेष अलग-अलग चले थे, थोड़ा बैठे थे साथ-साथ शेष दूर-दूर रहे थे। *** महेश रौतेला
ऐसा लय बाँधो राधे तुममें लय हो जाऊँ, भारत के कुरुक्षेत्र में महाभारत न दोहराऊं। लिखा रहे कर्म यहाँ पर हर पग पर साँस दिखे, मानव ही मानव में लय ऐसा उन्नत संसार दिखे। *** महेश रौतेला
बहुत समय से टिकी है पवन पृथ्वी पर, बहुत समय से टिके हैं वृक्ष पृथ्वी पर, बहुत समय से टिकी हैं नदियां पृथ्वी पर, बहुत समय से टिके हैं पहाड़ पृथ्वी पर, बहुत समय से टिका है समुद्र पृथ्वी पर, महाभारत से पहले और महाभारत के बाद बहुत समय से टिका है मनुष्य पृथ्वी पर। *** महेश रौतेला
दुख तो सब आ चुके हैं सुख की उम्मीद जगी हुई है, दुनिया अपनी जगह घूमती घाम की आदत बनी हुई है। प्यार से अच्छा क्या होगा प्यार से सच्चा क्या होगा! श्रीकृष्ण अच्छे हैं राधा भी अच्छी हैं। उनका सुख दुख समान करना मुझे नहीं आता है, जय-पराजय ,लाभ-हानि समान मानना कठिन कठोर है। दुख तो सब आ चुके हैं सुख की उम्मीद जगी हुई है। *** महैश रौतेला
तुम हमें प्यार का अंदाज दे दो या किसी तीर्थ का सहारा दे दो, या वृक्ष की पूर्ण छाया दे दो या पुष्प की जीवित महक दे दो। शून्य सा ये भरा आकाश दे दो एक मुस्कराती शीतल छवि दे दो, प्रीति के रूके स्रोत खोल दो समय का सशक्त आधार दे दो। नम आँखों का पूर्ण प्यार दे दो स्पर्श का नूतन आभास दे दो, जिन्दगी का मधुर संगीत दे दो तुम मुझे प्यार का हाथ दे दो। *** महेश रौतेला
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