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जिन्दगी कब तक ढोऊँ तुझे कहाँ ले जाऊँ तुझे, घुटने बदल दूँ या लाठी ले लूँ, या चलते-फिरते ही निकल लूँ। *** महेश रौतेला
कल थी आज नहीं हो, आकाश है,धरती है तुम मन में हो पर इन में नहीं हो। कल घर पर थी आज नहीं हो, रसोई से आने वाली सुगन्ध घर में नहीं मन में है। काँटे इधर भी हैं उधर भी हैं, तुम फूल सी मन में खिली हुयी हो। साथ कल था आज नहीं है, तुम राह में नहीं मन में हो। कल मन्दिर में थी आज नहीं हो, ईश्वर के अन्दर सन्नाटा है। सूर्य को अर्घ्य देती कल तुम थी आज नहीं। आज सूर्य बिना अर्घ्य के उगा और डूब गया। *** महेश रौतेला
जब मैं खुश था वह नाराज थी, जब वह खुश थी मैं नाराज था। ऐसे ही जीवन चढ़ता रहा, मौसम का दिया चखता रहा। याद है टूटी हड्डी चलते हाथ, मथा हुआ दही उबलता हुआ दूध। हाथ से पथती रोटियां अन्न की खुशबू, चित्त में बैठा हुआ आने वाला अकेलापन। जीवन में हाहाकार तब भी था, अब भी है, नाराजगी तब भी थी अब भी है, इसी नाराजगी में नटखट खुशी जिन्दा है। *** महेश रौतेला
मन में अब सन्नाटा है पेड़ कट गये, फूल झड़ गये तेरी यादों के दीप जल गये। राह-राह टूट गयी नदी बहुत सिकुड़ गयी। धूप बेहद कड़क है मन में तू अकेली है। विदाई तेरी याद है अन्तिम बात विराट है, मनुष्य के पास आ मौत भी निराश है। *** महेश रौतेला
अब तो जाना होगा: वह शव बन गयी अब तो जाना होगा, वह जल चुकी अब तो जाना होगा। वह देह छोड़ चुकी अब तो जाना होगा, वह बोलना छोड़ चुकी अब तो जाना होगा। प्यार धुँआ हो गया अब तो जाना होगा, साथ बुझ गया अब तो जाना होगा। बाँह छूट गयी अब तो जाना होगा, कर्म रुक गये अब तो जाना होगा। *** महेश रौतेला
तुम इस देश को दलदल मत कर देना, इस सुनहरी काया को भद्दा मत कर देना। *** महेश रौतेला
वृक्षों से क्या कहूँ वे उगेंगे फूलेंगे, फलेंगे नियति सुदृढ़ हमारी बना हवा में हँसने लगेंगे। उनका शोक गीत सुन सकेंगे जब कटकर वे गिरेंगे। वृक्षों से क्या कहूँ वे आसमान को देख, ठंडी छाया दे हमें देख गुनगुनाने लगेंगे। *** महेश रौतेला
तुम्हारे जाने के बाद- सारी दुनिया बन्द हो गयी इतना प्यार कहाँ छुपा था! श्रवण में शब्द नहीं इतना अहसास कहाँ बन्द था! ** महेश रौतेला
हमारी बाँहें खुली रह गयीं तुम आये नहीं, ऐसे ही जिये और बीत गये, बाहें अब अनजान सी हो गयीं। *** महेश रौतेला
मैं छोटी सी कविता पलभर चली, क्षणभर खिली हर परिचय में मिली। सुगन्ध सी फैली धरा में मिली, टूटे सपनों की धात्री देशों में घुली मिली। चेहरा दैदीप्यमान साथी संग हँसी, छुआ जब मन को सिहर कर मुस्करायी। मैं छोटी सी कविता वसंत संग लौटी, गरज के बरसी क्षणभर में बिखर गयी। पता बताने लौटी खर-पतवार उखाड़, प्रिय संग बैठी नित नये रूप में खड़ी, छोटी सी कविता हूँ। *** ** महेश रौतेला
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