The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
आधा-चौथाई जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य, खिलता-मुरझाता जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य। चढ़ता-उतरता जितना हूँ हूँ तो मनुष्य, जाता-लौटता जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य, दौड़ता-हाँफता जितना हूँ हूँ तो मनुष्य, जीता-मरता जितना भी हूँ हूँ तो मनुष्य। *** महेश रौतेला
तन भी संगम मन भी संगम, जहाँ स्नान किया वह भी संगम। धरा पर जीवन संगम शिखरों पर उन्नत संगम, जल का बहता संगम आकाश में अद्भुत संगम। पग-पग पर पूजा का संगम स्वर-लय का समधुर संगम, जीवन-मृत्यु का अटूट संगम यहाँ मुस्कानों पर शाश्वत संगम। ** महेश रौतेला
ध्रुव ने तपस्या की और ध्रुव पद पाया, सिद्धार्थ ने तप किया ज्ञान पा मोक्ष पा लिया, हम आजीविका कमाते-कमाते तप गये, प्यार को पकड़ न सके समता पर झगड़ न सके, शुद्ध समयवादी होकर समय पर लटक लिये। *** महेश रौतेला
शब्दों तक पहुँचना भी तपस्या है, शब्दों को इकट्ठा करना और कठिन है "उसने प्यार करता हूँ" कहने में सालों लगा दिये। ** महेश रौतेला
गणतंत्र : हम गणतंत्र में घुलमिल जायें गण का मन हो,गण की भाषा गण का जीवन स्वस्थ सफल हो। गण की गंगा, गण का गगन धरा गण की पावन धारा, सीमाओं में खुली पवन हो घर-घर अपना स्वतंत्र साथ हो। चलना सबका सहज सरल हो गण के अन्दर सत्य सशक्त हो गण का मन हो,गण की भाषा। आदि शक्ति से जुड़ा हुआ हो तन की आभा सर्वत्र विकीर्ण हो, मन से विजयी, मन से व्यापक कई सूर्य की चमक लिया हो। जन का वलिदान जन का अर्पण, जन के नियम,जन का राष्ट्र गणतंत्र हमारा जीवन हो। **** गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं। *** महेश रौतेला
इस बसंत में जो फूल खिलेंगे तुमको अर्पित कर दूँगा, इस बसंत में जो उल्लास रहेगा तुमको समर्पित कर दूँगा। आना-जाना सत्य रहा है ऋतु को ऋतु से मिलना है, धरा खिलेगी, नैन मिलेंगे यह वरदान तुम्हें देना है। *** बसंत पंचमी की शुभकामनाएं।
एक विदा होता व्यक्ति बहुत दिव्य बोलता है, एक मरा हुआ व्यक्ति अतुलनीय कथा कहता है। *** महेश रौतेला
जिन्दगी इतनी ही नहीं और अधिक थी, प्यास इतनी ही नहीं और अधिक थी। आसमान इतना ही नहीं और अधिक था, दुख इतना ही नहीं और बिखरा था, सुख इतना ही नहीं और जुड़ा था। ममता इतनी ही नहीं और फैली थी, प्यार इतना ही नहीं और बाकी था। धरती इतनी ही नहीं और जीवट थी, जीवन इतना ही नहीं और शेष था। **** *** महेश रौतेला
हर दिन यहाँ तीर्थ बना है हर उजाला ज्योति बनी है, हर पंछी उड़ान लिए है हर नदी तीर्थ चली है। हर पहाड़ पर ऊँचाई है हर खेत में अन्न उगा है, हर जंगल में हवा शुद्ध है हर झरने पर दृश्य अलग है। हर मानव में देव अनेक हैं हर विद्यालय में ज्ञान विविध है, हर पुष्प का सौन्दर्य निराला हर आग का ताप अलग है। हर त्योहार के संदर्भ पवित्र हैं हर पग का नाप अलग है, हर आन्दोलन की नींव नयी है हर जीवन का लय गूढ़ है। *** महेश रौतेला
प्यार की बातों में अजब सी गुमसुदगी थी, कहाँ-कहाँ ढूंढता, जिन्दगी एक पैमाना लिए खड़ी थी।
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser