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महेश रौतेला

महेश रौतेला Matrubharti Verified

@maheshrautela
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एक विदा होता व्यक्ति
बहुत दिव्य बोलता है,
एक मरा हुआ व्यक्ति
अतुलनीय कथा कहता है।

*** महेश रौतेला

जिन्दगी इतनी ही नहीं
और अधिक थी,
प्यास इतनी ही नहीं
और अधिक थी।
आसमान इतना ही नहीं
और अधिक था,
दुख इतना ही नहीं
और बिखरा था,
सुख इतना ही नहीं
और जुड़ा था।
ममता इतनी ही नहीं
और फैली थी,
प्यार इतना ही नहीं
और बाकी था।
धरती इतनी ही नहीं
और जीवट थी,
जीवन इतना ही नहीं
और शेष था।
****

*** महेश रौतेला

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हर दिन यहाँ तीर्थ बना है
हर उजाला ज्योति बनी है,
हर पंछी उड़ान लिए है
हर नदी तीर्थ चली है।

हर पहाड़ पर ऊँचाई है
हर खेत में अन्न उगा है,
हर जंगल में हवा शुद्ध है
हर झरने पर दृश्य अलग है।

हर मानव में देव अनेक हैं
हर विद्यालय में ज्ञान विविध है,
हर पुष्प का सौन्दर्य निराला
हर आग का ताप अलग है।

हर त्योहार के संदर्भ पवित्र हैं
हर पग का नाप अलग है,
हर आन्दोलन की नींव नयी है
हर जीवन का लय गूढ़ है।


*** महेश रौतेला

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प्यार की बातों में अजब सी गुमसुदगी थी,
कहाँ-कहाँ ढूंढता, जिन्दगी एक पैमाना लिए खड़ी थी।

पत्र तुमने पढ़ा नहीं
लिखा था," गगन में असंख्य नक्षत्र हैं
असंख्य तारों में दूरी बड़ी है,
धरती पर गाँव बसे हैं
इधर-उधर शहर जुड़े हैं,
प्यार के लिए अथाह जगह है।
जंगल में डर छुपा है
नदी में भँवर विचित्र है,
घरों के नाम बड़े हैं
पर मनुष्य का आवास न्यून है।
रखने को प्यार बहुत था
ममता का उधार बड़ा था,
पत्र जो पढ़ा नहीं
एक शब्द उसमें अदृश्य,गहन था।
बातें अक्षुण्ण थीं
सारांश संक्षिप्त था,
लोक-परलोक का विवरण लिखा था
मन ने मन को पढ़ा जहाँ था।
कथा कहने का मन हुआ
तुमने जिसे अनसुना किया,
घर से निकलना कठिन था
राह का मिलना जटिल था।
जीजिविषा जागी हुई थी
समय में संघर्ष छुपा था,
पत्र जो मैंने लिखा था
प्यार में प्रकट हुआ था।
***

*** महेश रौतेला

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कहाँ विराम लगेगा
पता नहीं,
सत्तर, अस्सी,नब्बे
या उससे पहले।
कहाँ से बुलावा आयेगा
पता नहीं,
धरती पर छीना झपटी चलते- चलते
शान्ति पर विश्वास बढ़ेगा।
कहाँ शाम होगी
कौन छूटेगा,
किसकी विदाई में
आँखें नम हो जायेंगी,
वक्त बतायेगा।
****

*** महेश रौतेला

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हम इच्छाओं को ढूंढते रहते हैं
वसंत के खुलासे में,
गंगा के जल में
हिमालय के हर शिखर पर।
प्यार हमारे लिए जीवित होता
बहुत छोटी पगडण्डियों में,
घास के मैदानों में
घर के स्वभाव में।
इच्छाओं का हाथ
बहुत लम्बा होता है,
वसुंधरा से आगे
स्वर्ग तक फैला होता है।
इस साल से, उस साल में जाते
चीते का वेग पकड़े,
शिकार भी हैं, शिकारी भी हैं
शुभकामनाओं के आगार भी हैं।
*****

साल 2026 की शुभकामनाएं।

** महेश रौतेला

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मरना बुरी बात नहीं
शोक की बात है,
मनुष्य जो मर गया
उसमें भगवान था।
पेड़ जो सूख गया
उसमें कभी प्राण था,
संग-संग जिया गया
वह पावन परिवार था।
टूट के संग भी
निकट का जुड़ाव था,
रोग जो हुआ था
उसका भी निदान था।
अस्तव्यस्त राह में
मिलन सुकुमार था,
गीत के पास में
स्वरों का संसार था।
मरना एक विराम है
प्रकृति में अनिवार्य है,
जो सांस में आया-गया
उसके निकट भगवान है।
***

** महेश रौतेला

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अगाध ममता में
विराम लगना था
लग गया।
घूमती-फिरती ममता को
थमना था,
थम गयी।
स्नेह का विभाजन
होना था,
हो गया।
तुम नहीं हो
मैं हूँ,
रिक्तता को प्रकट होना था,हुयी।


*** महैश रौतेला

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पहले तुम मेरे पते पर रहते थे
अब नहीं हो,
लोग कहते हैं
अब भगवान के पते पर रहते हो,
और मैं तब से चुपचाप सोच रहा हूँ-
कि उनसे क्या पूछना!


*** महेश रौतेला

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