Quotes by महेश रौतेला in Bitesapp read free

महेश रौतेला

महेश रौतेला Matrubharti Verified

@maheshrautela
(675.3k)

पहाड़ कितना ऊँचा होता है
तब पता चला
जब उस पर चढ़ने लगा।
पहाड़ कितना ठंडा होता है
तब पता चला
जब वहाँ रहने लगा।
पहाड़ कितना पवित्र होता है
तब पता चला
जब वहाँ नदी को देखा।
पहाड़ कितना श्वेत होता है
तब पता चला
जब हिमालय को निहारा।
पहाड़ कितना सुहावना होता है
तब पता चला
जब वहाँ चिड़ियों की चहचहाहट सुना।


*** महेश रौतेला

Read More

संक्षिप्त हो जाऊँ
इतना भी नहीं
कि मौन लगूँ।
शान्ति बन जाऊँ
इतना भी नहीं
कि श्मशान हो जाऊँ।
सच बन जाऊँ
इतना भी नहीं
कि युधिष्ठिर बन जाऊँ।
कथा बन जाऊँ
ऐसी भी नहीं
कि कहा न जा सकूँ।
प्यार बन जाऊँ
इतना भी नहीं
कि वियोग लगने लगूँ।
धरती पर रहूँ
इतना भी नहीं
कि बोझ लगने लगूँ।
****

*** महेश रौतेला

Read More

एक दिन चल देना है
दिन हो या रात,
अपना आखेट होना है।
बहुत बड़ी हो चुकी दुनिया
जनसंख्या के महासागर में,
स्वयं को भूल आया।
गीत जो गुनगुनाया
अनन्त तक हो आया,
बहुत बड़ी हो चुकी दुनिया
स्वयं को भूल आया।


*** महेश रौतेला

Read More

रोटी कौन बनायेगा
रोटी कौन खिलायेगा,
दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं
रोटी कौन उड़ायेगा!
बीज कौन बोयेगा
बीज कौन उगायेगा,
दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं
फसल कौन काटेगा!
कदम कौन बढ़ायेगा
कदम कौन मिटायेगा,
दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं
सर्वस्व कौन लुटायेगा!
तीर्थ कौन बनायेगा
तीर्थ कौन जायेगा,
दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं
मानवता कौन सुझायेगा!

*** महेश रौतेला

Read More

धुली हुई प्रकृति का
धुला हुआ रूप है,
मनुष्य को ढूंढता
ये प्रकृति की कृति है।
आज जो मैं चला
कल कोई और है,
प्यार के हाथ में
उसी का आशीर्वाद है।
मौन ये टिका हुआ
आवाज सब धुली हुई,
धुली हुई प्रकृति का
संदेश तो साफ है।
जहाँ आज कदम हैं
कल राह धुली हुई,
धुली हुई प्रकृति की
मौन मन से बात हुई।


*** महेश रौतेला

Read More

उसने पूछा
क्या करते हो-
मैंने कहा बाग में
कोयल की कू - कू सुन लेता हूँ,
जंगल में
शेर की दहाड़ सुन लेता हूँ,
योग में
योगासन कर लेता हूँ,
खेत में
अन्न उगा लेता हूँ,
पहाड़ चढ़ लेता हूँ,
सुरीले संगीत में
खो जाता हूँ,
प्रकृति का सान्निध्य लेने
शहर से बाहर चला जाता है,
लम्बे-लम्बे खोखले भाषणों से
मुक्त हो जाता हूँ,
वृक्ष के फूल सा खिला
फल बनने की सोचता हूँ,
पूरब की आभा ले
पश्चिम से निकल जाता हूँ।

*** महेश रौतेला

Read More

हम अपने प्यार से
बातें करने लगे हैं,
खोये हुये शरीर का
चित्र बनाने लगे हैं।
तुम हमारे स्वभाव से
बिखरने लगे जब,
हम खुद को संभाल कर
गुनगुनाने लगे तब।
तुम पूजते रहे भगवान
मैं देखता गया भगवान,
हर बार हमारी बातों से
बिखरने लगा भगवान।

*** महेश रौतेला

Read More

समय खाली है
रिक्त है,योगी है,
धड़कनों का मेहमान है।

***महेश रौतेला

जिन्दगी कब तक ढोऊँ तुझे
कहाँ ले जाऊँ तुझे,
घुटने बदल दूँ
या लाठी ले लूँ,
या चलते-फिरते ही निकल लूँ।


*** महेश रौतेला

Read More

कल थी
आज नहीं हो,
आकाश है,धरती है
तुम मन में हो
पर इन में नहीं हो।
कल घर पर थी
आज नहीं हो,
रसोई से आने वाली सुगन्ध
घर में नहीं
मन में है।
काँटे इधर भी हैं
उधर भी हैं,
तुम फूल सी
मन में खिली हुयी हो।
साथ कल था
आज नहीं है,
तुम राह में नहीं
मन में हो।
कल मन्दिर में थी
आज नहीं हो,
ईश्वर के अन्दर
सन्नाटा है।
सूर्य को अर्घ्य देती
कल तुम थी
आज नहीं।
आज सूर्य बिना अर्घ्य के
उगा और डूब गया।


*** महेश रौतेला

Read More