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हमने शास्त्रीय ढंग से प्यार किया था, पतली पगडण्डी पर हम मिले थे, अकेले पेड़ के नीचे चुपचाप खड़े थे, या कभी-कभी हवा की तरह चले थे। *** महेश रौतेला
जिन्दगी तुझे कैसे नापूँ कोई हल जोतता, कोई हिमालय चढ़ता कोई खाना बनाता कोई आराम से बैठा रहता। कौन सा पैमाना लूँ कोई नाचता रहता, कोई गाता रहता कोई सोचता रहता। यह लिखना-पढ़ना यह खेलना-कूदना, कितना प्यार करूँ कि तू शेष रह जाय। *** महेश रौतेला
धूप खिलेगी: धूप खिलेगी, बिछेगी और समेट ली जायेगी, जीवन आयेगा, चलेगा और समेट लिया जायेगा। आन्दोलन बनेंगे, बिछेंगे और मुरझाने दिये जायेंगे, यदि सत्ता तक पहुँचे तो झगड़ने लगेंगे। हर नदी का स्रोत स्वच्छ होता है, फिर वह बहेगी,बिछुड़ेगी और समुद्र में डूब जायेगी। जीवन सत्य से उपजता झूठ में लिपटता है, मीलों चलकर सत्य में डूब जाता है। अभी-अभी जो सुबह थी वह शाम बन जायेगी, पृथ्वी मृत्यु के बाद हमें नहीं जगा पायेगी। ***** *** महेश रौतेला
तुझसे मैं एक बात कहूँ तुझको लम्बी रात कहूँ, जब जब मानव युग आये तुझसे अपना प्यार कहूँ। अमृत कहीं रखा होगा विष भी पहले पीना होगा, जीवन के इस मंथन में फूल हाथ में रखना होगा। लो बीत गयी क्षण की माया सन्नाटा उधर घिर आया, लोग अव्यवस्थित दौड़ रहे घर अपना भूल रहे। राहों का कोई अन्त नहीं आनन्द मेरा अनन्त नहीं, तुझसे मैं एक बात कहूँ मन में कोई दिगंत नहीं। *** *** महेश रौतेला
तुम तो मेरे प्यार की धुरी कृष्ण भाव तो मुझमें भी है, राधे-राधे कहता हूँ पूर्ण भाव तो मुझमें भी है। पग के आगे,पग के पीछे यह अनन्त तो सबका है, जीवन के चार धाम में स्वर-लय तो सबका है। *** महेश रौतेला
गंगा दशहरा:( गंगा जी जब स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी थी) मेरे मन से निकली गंगा कहाँ रुकी,कहाँ थमी, शिव जटा पर घूमी क्षणभर फिर इसी धरा पर अमर रमी। मन से मन तक बही नदी पुण्य भाव में रुकी नदी, ओ गंगा, तेरे निकट लोग "माँ" कहते- कहते देखे लोग। तू कल- कल, छल- छल करती आयी हिमगिरि का विरह साथ में लायी, पवित्रता में आगे-आगे जन-जीवन में बसती आयी। भाव अमर घुलते तुझमें तू समुद्र तक हो आयी, कहते स्वर्ग से आना तेरा जल को जीवन कहने आयी। "गंगे" तट-तट पर क्यों आते लोग जल की महिमा रखते लोग, पाप नाशिनी हो या न हो पुरखों का आशीष लेते लोग। **** *** महेश रौतेला
पहाड़ कितना ऊँचा होता है तब पता चला जब उस पर चढ़ने लगा। पहाड़ कितना ठंडा होता है तब पता चला जब वहाँ रहने लगा। पहाड़ कितना पवित्र होता है तब पता चला जब वहाँ नदी को देखा। पहाड़ कितना श्वेत होता है तब पता चला जब हिमालय को निहारा। पहाड़ कितना सुहावना होता है तब पता चला जब वहाँ चिड़ियों की चहचहाहट सुना। *** महेश रौतेला
संक्षिप्त हो जाऊँ इतना भी नहीं कि मौन लगूँ। शान्ति बन जाऊँ इतना भी नहीं कि श्मशान हो जाऊँ। सच बन जाऊँ इतना भी नहीं कि युधिष्ठिर बन जाऊँ। कथा बन जाऊँ ऐसी भी नहीं कि कहा न जा सकूँ। प्यार बन जाऊँ इतना भी नहीं कि वियोग लगने लगूँ। धरती पर रहूँ इतना भी नहीं कि बोझ लगने लगूँ। **** *** महेश रौतेला
एक दिन चल देना है दिन हो या रात, अपना आखेट होना है। बहुत बड़ी हो चुकी दुनिया जनसंख्या के महासागर में, स्वयं को भूल आया। गीत जो गुनगुनाया अनन्त तक हो आया, बहुत बड़ी हो चुकी दुनिया स्वयं को भूल आया। *** महेश रौतेला
रोटी कौन बनायेगा रोटी कौन खिलायेगा, दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं रोटी कौन उड़ायेगा! बीज कौन बोयेगा बीज कौन उगायेगा, दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं फसल कौन काटेगा! कदम कौन बढ़ायेगा कदम कौन मिटायेगा, दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं सर्वस्व कौन लुटायेगा! तीर्थ कौन बनायेगा तीर्थ कौन जायेगा, दाये- बाये प्रश्न बहुत हैं मानवता कौन सुझायेगा! *** महेश रौतेला
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