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मन का माया-जाल कुछ समझता नहीं मन मेरा, बस उलझनों में खोया है। हर दिशा में माया का जाल, जाने किसने बोया है। जब भी एक कदम बढ़ाती हूँ, राह नई रुक जाती है। सपनों की उजली किरणें भी, बादल बन छिप जाती हैं। चारों ओर आकर्षण इतने, सत्य कहीं दिखता नहीं। मन अपने ही प्रश्नों में उलझा, उत्तर कोई मिलता नहीं। फिर भी आशा का दीप लिए, मैं आगे बढ़ती जाती हूँ। माया के इस घने वन में, सत्य की राह खोजती हूँ। एक दिन यह धुंध छंटेगी, मन निर्मल हो जाएगा। माया का सारा बंधन टूटे, अंतर प्रकाश
प्रेम, दोस्ती, दर्द और जीवन प्रेम है जैसे सुबह की पहली किरण, जो अँधेरों में भी जगा दे नया जीवन। दोस्ती है जैसे बरगद की ठंडी छाँव, थके हुए मन को दे अपना-सा गाँव। दर्द है जैसे बारिश की अनकही रात, जो सिखा जाती है ख़ामोशी की बात। जीवन है एक बहती हुई नदी, कभी खुशी, कभी ग़म, कभी नई सदी। प्रेम से दिल को धड़कन मिलती है, दोस्ती से राहों को मंज़िल मिलती है। दर्द हमें मज़बूत बनाता है, और जीवन हर दिन कुछ नया सिखाता है। इसलिए मुस्कुराकर सफ़र तय करो, हर पल को अपने दिल में भर लो। क्योंकि प्रेम, दोस्ती, दर्द और जीवन— इन्हीं से बनता है इंसान का सबसे सुंदर दर्पण। ✨🌹
स्त्री तेरी खोज क्या है, तू पता कर जरा, अपने भीतर छिपे उस असीम आकाश को छूकर जरा। तू केवल मर्यादा की लकीर नहीं, एक बहती जलधारा है, तू थकी हुई राहों का सुस्ताता हुआ एक किनारा है। बंधी है तू सदियों से जिन रस्मों और रिवाजों में, उन बेड़ियों को तोड़कर अपनी आवाज़ पहचान जरा। न तू अबला है, न तू बेचारी, तू खुद में एक शक्ति है, तेरी सहनशीलता कमजोरी नहीं, तेरी गहरी भक्ति है। दुनिया की नजरों से खुद को आंकना अब बंद कर, तू खुद अपनी पहचान की मुकम्मल किताब है जरा। उठ, कि तुझे अभी मील के पत्थर पार करने हैं, तुझे अपने सपनों के रंगों से नए संसार भरने हैं। तेरी खोज बाहर नहीं, तेरे अपने वजूद के भीतर है, स्त्री, तू खुद में ही एक पूरा ब्रह्मांड है जरा।
कुछ पल ठहर जाऊँ मैं, खुद से रूबरू होने के लिए, भागती इस दुनिया में, थोड़ा सुकून बोने के लिए। न मंज़िल की जल्दी हो, न रास्तों की फिकर, बस एक शांत कोना हो, और यादों का ज़िक्र। ठहर जाऊँ कि देख सकूँ, ढलते सूरज की लाली, महसूस करूँ उस हवा को, जो लगती है खाली-खाली। ज़िम्मेदारियों की धूप में, बहुत दूर तक आई हूँ, अब अपनी ही छाँव में, सुस्ताने की बारी है मेरी। कुछ पल ठहर जाऊँ मैं, फिर से मुस्कराने के लिए, कल की नई उड़ान को, पंख देने के बहाने के लिए।
बरगद के नीचे बड़े घर में हँसता परिवार, सपनों की नींव रखता संसार। थोड़ी दूर खड़ा बरगद पुराना, जैसे समय ने खुद को पहचाना। डाल पर चलती एक निडर सी काया, ना डगमगाई, ना घबराया साया। मैंने कहा माँ से, देखो ज़रा, कैसे चल रही है यह बिना डरा। लोग बोले, कुछ नहीं करती यह, डरने की इसमें बात ही क्या है। पर मैं जानती थी उसकी उड़ान, चुप्पी में छुपा है बड़ा आसमान। मैंने कुछ देना चाहा उसे, वो मुस्कुराई, बोली बस यूँ ही— “मेरे पास सब है, मुझे कुछ नहीं चाहिए।” फिर वह बड़ी हुई, समय की तरह, हरे रंग में ढली, शांति की लहर। पैठणी साड़ी, गरिमा अपार, जैसे आत्मा ने पहन लिया संस्कार। बरगद आज भी वहीं खड़ा है, पर अब मैं जानती हूँ— वो लड़की कोई और नहीं, वो मैं हूँ।
“डर के साथ उड़ान” मैं बचपन से उड़ती रही, आसमान मेरे लिए खेल का मैदान था, पर हर उड़ान में दिल के कोने में एक डर बैठा रहता था। ऊँचाई बुलाती थी, ज़मीन पकड़ कर खींचती थी, और मैं— दोनों के बीच खुद को पहचानती थी। लोग कहते रहे— “नीचे रहो, सुरक्षित रहो” पर मेरी आत्मा ने हमेशा कहा— “ऊपर जाओ, सच वहीं है।” डर ने मुझे रोका नहीं, उसने मुझे संभलना सिखाया। मैं गिरी नहीं, क्योंकि डर के साथ हौसला भी उड़ता था। आज भी उड़ती हूँ, फर्क बस इतना है— अब डर मेरा दुश्मन नहीं, मेरी चेतना है। मैं वही हूँ जो ऊँचाई से डरती भी है और फिर भी उड़ना नहीं छोड़ती।
कान्हपा की योगिनियाँ कान्हा बोला—योग न रूखा, न तन का केवल ताप। जहाँ प्रेम जगे और चेतन हँसे, वही साधना, वही जाप। उसके संग थीं योगिनियाँ, न दासी, न परछाईं। सहज हँसी, सहज मौन में, जागी अंतर की गहराई। काजल-सी आँखों में ज्ञान, पैरों में बंधन नहीं। घर, जंगल, बाजार सभी, उनके लिए साधन ही सही। वे बोलीं—देह भी दीप है, इसे मत कह माया भार। जिसमें श्वास जगे सजग होकर, वही ब्रह्म का द्वार। न व्रत कठिन, न रूढ़ि कठोर, न भय, न पाप का लेख। कान्हपा ने योग सिखाया— जीवन ही बन जाए सेख। योगिनियाँ हँसती रहीं, लोक ने जो भी कहा। प्रेम बना उनका योगपथ, सहज में मोक्ष मिला।
योगिनियाँ : नाथ परंपरा की नारी शक्ति कंदरा–कंदरा गूँज उठी, जब योगिनियों ने स्वर साधा। केवल गेरुआ नहीं था पथ, नारी ने भी योग को साधा। मैनावती ने त्याग चुना, बंधन टूटे, भय भी हारे। अंतर में जागी अग्नि ऐसी, जिससे अज्ञान तमस मारे। जालंधरी ने श्वास में बाँधा, कुंडलिनी का मौन प्रकाश। गुरु–वाणी हृदय में रखकर, चल दी वह निर्भय आकाश। चौरंगी की देह तपस्या, धैर्य बना उसका शृंगार। काँटों पर भी पुष्प खिले, जब जागा अंतर का संसार। लीलावती लोक में बोली, ज्ञान न रहा ग्रंथों का दास। नारी ने जब शब्द जगाए, जाग उठा हर सूना श्वास। माया कहकर जिसे टाला, वही बनी शक्ति का स्रोत। नाथ-पंथ में नारी बोली— “मैं भी हूँ योग की ज्योत।”
गोरख वाणी : नारी चेतना नारी न माया, न ही बंधन, यह गोरख की वाणी बोली। जिस देह में चेतन बसता है, वह कैसे हो सकती होली? योग न पूछे नर या नारी, आत्मा का होता है पंथ। जहाँ साधना जाग उठे मन में, वहीं टूटें सब मिथ्या ग्रंथ। जिसने जननी को हेय कहा, वह सत्य से अनजान रहा। गोरख बोले—जिस कोख से जन्मा, उसका अपमान अपमान रहा। योगिनियाँ भी चलीं पथ पर, हठ और धीरज साथ लिए। लोक-भाषा में ज्ञान दिया, ताकि नारी भी बात जिए। न चूड़ी रोकी, न घूँघट पूछा, न कर्मकांड की दीवार। गोरखनाथ ने खोल दिए, नारी के अंतर के द्वार।
“घर की देहलीज़” वह बाहर नहीं निकलती, पर भीतर बहुत कुछ चलता है। डर की परछाइयाँ, संस्कारों की जंजीरें, और सवाल — क्या मैं कर पाऊँगी? घर की दीवारें सिर्फ ईंटों की नहीं, कभी-कभी मन की सीमाएँ बन जाती हैं। उसने सीखा था— चुप रहना सुरक्षित है, कम चाहना समझदारी है, और खुद से पहले दुनिया की सोच ज़रूरी है। पर मनोविज्ञान कहता है— यह कमजोरी नहीं, यह सीखी हुई आदत है। जो बदली जा सकती है थोड़े साहस से, थोड़े आत्मविश्वास से। जब वह एक कदम बाहर रखती है, तो दुनिया नहीं बदलती— वह खुद बदलती है। और यही सबसे बड़ी आज़ादी है।
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