एपिसोड 39— आयत का छुपा हुआ फैसला
सुबह के करीब दस बज रहे थे।
सिटी हॉस्पिटल के कॉरिडोर में हमेशा की तरह मरीजों और स्टाफ की आवाजाही लगी हुई थी, लेकिन आयत के लिए उस वक्त जैसे पूरी दुनिया रुक गई थी।
उसके हाथ में अभी भी वही मैसेज था—
"अगर तुम अपनी माँ को जिंदा देखना चाहती हो, तो आज रात अकेले पुराने सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल आना। अर्जुन को मत बताना।"
आयत की उंगलियाँ काँप रही थीं।
उसने मैसेज को कई बार पढ़ा।
जिंदा...
इस एक शब्द ने उसके अंदर सालों से दबे हुए उस दर्द को जगा दिया था, जिसे उसने कभी किसी के सामने ठीक से बताया ही नहीं था।
उसे अपनी माँ का चेहरा ठीक से याद नहीं था।
बस कुछ धुंधली यादें थीं।
एक गर्म हथेली...
एक खुशबू...
गोद में सिर रखकर किसी का उसे प्यार से थपकना...
और फिर अचानक सब कुछ खत्म।
आयत ने खुद से धीरे से कहा,
"अगर ये झूठ हुआ तो?"
लेकिन अगले ही पल उसके दिल ने जवाब दिया—
"अगर सच हुआ तो?"
यही सवाल उसके लिए काफी था।
उसने फोन लॉक कर दिया।
उसी समय पीछे से आवाज आई—
"आयत!"
वह चौंककर पलटी।
अर्जुन सामने खड़ा था।
उसके चेहरे पर हल्की चिंता थी।
"तुम यहाँ अकेली क्या कर रही हो?"
आयत ने तुरंत फोन अपने पीछे कर लिया।
"कुछ नहीं... बस ऐसे ही।"
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।
"तुम ठीक हो?"
"हाँ।"
"पक्का?"
आयत ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"हाँ, बिल्कुल।"
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।
उसे साफ महसूस हो रहा था कि आयत उससे कुछ छिपा रही है।
लेकिन उसने उस वक्त ज्यादा सवाल नहीं किया।
"चलो, आज हमारी यूनिट में नए मरीज आने वाले हैं। डॉक्टर साहब ने सबको बुलाया है।"
आयत ने सिर हिलाया।
"जी।"
दोनों साथ चल पड़े।
लेकिन इस बार उनके बीच एक ऐसा राज़ था, जिसके बारे में सिर्फ आयत जानती थी।
एक ही यूनिट में अर्जुन और आयत
कुछ देर बाद दोनों अपनी यूनिट में पहुँचे।
सीनियर डॉक्टर मरीजों के बारे में समझा रहे थे।
"आज से आप लोग खुद मरीजों की बेसिक हिस्ट्री लेना शुरू करेंगे। कोई भी गलती हो तो तुरंत सीनियर से पूछिए।"
अर्जुन ध्यान से सब सुन रहा था।
आयत भी नोट्स बना रही थी।
डॉक्टर ने एक फाइल उठाई।
"अर्जुन, ये मरीज तुम्हारे अंडर रहेगा।"
"जी, सर।"
"और आयत, तुम अर्जुन के साथ रहोगी। दोनों मिलकर केस तैयार करना।"
आयत ने अनजाने में अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
"लगता है आज भी तुम्हें मेरे साथ ही काम करना पड़ेगा।"
आयत ने धीरे से कहा,
"शायद किस्मत चाहती है कि मैं आपसे पीछा न छुड़ा पाऊँ।"
अर्जुन हँस पड़ा।
"और मुझे लगता है कि तुम खुद पीछा छुड़ाना नहीं चाहती।"
आयत ने तुरंत नजरें झुका लीं।
"ऐसा कुछ नहीं है।"
"अच्छा?"
"जी।"
अर्जुन उसे देखते हुए मुस्कुराता रहा।
दोनों को पहली बार महसूस हुआ कि उनके बीच की दूरी अब पहले जैसी नहीं रही थी।
रोहन की नजर
दूसरी तरफ रोहन दूर से दोनों को देख रहा था।
उसके चेहरे पर नाराजगी साफ दिखाई दे रही थी।
समर उसके पास आया।
"क्या हुआ?"
रोहन ने कहा,
"कुछ नहीं।"
समर ने अर्जुन और आयत की तरफ देखा।
"तुझे अभी भी आयत पसंद है?"
रोहन ने ठंडी आवाज़ में कहा,
"पसंद नहीं..."
वह कुछ सेकंड रुका।
फिर बोला,
"अब बात उससे कहीं आगे निकल चुकी है।"
समर समझ नहीं पाया।
"मतलब?"
रोहन ने जेब से एक छोटी-सी फोटो निकाली।
"मुझे आयत के अतीत के बारे में कुछ पता चला है।"
समर ने फोटो देखने की कोशिश की।
रोहन ने तुरंत उसे वापस रख लिया।
"अभी नहीं।"
"तू मुझसे भी छिपा रहा है?"
"क्योंकि जितना मैं जानता हूँ, उतना तू जान जाएगा तो शायद डर जाएगा।"
समर हँस पड़ा।
"मैं डरने वालों में से नहीं हूँ।"
रोहन ने उसकी तरफ देखा।
"देखते हैं।"
आयत का फैसला
शाम होते-होते ट्रेनिंग खत्म हो गई।
आयत अपने कमरे में वापस आई।
उसने दरवाजा बंद किया।
घड़ी की तरफ देखा।
रात होने में अभी कुछ घंटे बाकी थे।
उसने अपना फोन निकाला।
अर्जुन का नाम स्क्रीन पर था।
उसकी उंगली कॉल बटन पर गई...
लेकिन रुक गई।
"अगर मैंने अर्जुन को बताया तो वो मुझे अकेले जाने नहीं देगा।"
उसने खुद से कहा।
फिर उसे अपनी माँ का ख्याल आया।
"अगर सच में माँ जिंदा हैं..."
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
"तो मैं उन्हें एक बार देखना चाहती हूँ।"
उसने अपना बैग उठाया।
और उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।
आयत घबरा गई।
"कौन?"
"मैं हूँ।"
रीवा की आवाज थी।
आयत ने जल्दी से अपना फोन बैग में रख दिया।
दरवाजा खोला।
रीवा सामने खड़ी थी।
"कहाँ जाने की तैयारी है?"
"कहीं नहीं।"
रीवा ने बैग देखा।
"तो फिर बैग लेकर कहाँ जा रही हो?"
आयत कुछ नहीं बोली।
रीवा ने उसकी आँखों में देखा।
"कुछ हुआ है?"
आयत ने धीरे से कहा,
"रीवा... अगर मैं तुमसे एक बात कहूँ, तो तुम किसी को बताओगी तो नहीं?"
"बिल्कुल नहीं।"
आयत ने कुछ पल सोचा।
लेकिन फिर भी वह पूरा सच नहीं बता पाई।
"मुझे आज रात एक जगह जाना है।"
"कहाँ?"
"मैं अभी नहीं बता सकती।"
रीवा परेशान हो गई।
"आयत, कोई खतरा तो नहीं?"
आयत ने हल्की मुस्कान दी।
"नहीं।"
लेकिन उसके मन में खुद उसे भरोसा नहीं था।
अर्जुन को शक
उधर अर्जुन हॉस्पिटल से निकलने वाला था।
गौरव उसके पास आया।
"अर्जुन, तू आज बहुत चुप है।"
"कुछ सोच रहा हूँ।"
"आयत के बारे में?"
अर्जुन ने उसे देखा।
"तुझे कैसे पता?"
गौरव मुस्कुराया।
"तेरे चेहरे पर लिखा है।"
अर्जुन ने धीमे से कहा,
"मुझे लगता है आयत मुझसे कुछ छिपा रही है।"
"क्या?"
"पता नहीं। लेकिन आज सुबह से उसका व्यवहार अलग है।"
गौरव ने कहा,
"तो पूछ ले।"
अर्जुन ने फोन निकाला।
उसने आयत को कॉल किया।
फोन बजता रहा।
कोई जवाब नहीं आया।
अर्जुन ने दोबारा कॉल किया।
इस बार फोन बंद था।
उसका चेहरा तुरंत गंभीर हो गया।
"उसका फोन बंद क्यों है?"
गौरव ने कहा,
"शायद बैटरी खत्म हो गई होगी।"
अर्जुन ने सिर हिलाया।
"नहीं। आयत फोन कभी बंद नहीं करती।"
उसे अचानक कुछ याद आया।
सुबह आयत का घबराया हुआ चेहरा...
उसका फोन छिपाना...
और उसका बार-बार कहीं जाने की तैयारी करना।
अर्जुन ने तुरंत अपनी बाइक की चाबी उठाई।
"मैं अभी आता हूँ।"
"कहाँ?"
"आयत को ढूँढने।"
पुराना सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल
रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे।
पुराना हॉस्पिटल अंधेरे में डूबा हुआ था।
आयत धीरे-धीरे अंदर दाखिल हुई।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
उसने फोन की फ्लैशलाइट ऑन की।
"कोई है?"
कोई जवाब नहीं आया।
तभी सामने से आवाज आई—
"आयत..."
वह तुरंत रुक गई।
उस आवाज़ में कुछ ऐसा था...
जो उसे अजीब तरह से जाना-पहचाना लगा।
"कौन है?"
अंधेरे से एक महिला धीरे-धीरे बाहर आई।
आयत की नजर उसके चेहरे पर पड़ी।
उसके हाथ से फोन लगभग गिर गया।
महिला की आँखों में आँसू थे।
वह कुछ कदम आगे आई।
फिर काँपती आवाज़ में बोली—
"आयत..."
आयत की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसके सामने खड़ी महिला ने दोनों हाथ आगे बढ़ाए।
"बेटा..."
आयत जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।
उसके दिमाग में बचपन की वही धुंधली याद चमक उठी—
एक माँ...
एक गोद...
वही आवाज़...
वही खुशबू...
आयत के होंठ काँपे।
"माँ...?"
महिला की आँखों से आँसू गिर पड़े।
"हाँ... मैं तुम्हारी माँ हूँ।"
आयत एक पल भी खुद को रोक नहीं पाई।
वह दौड़कर अपनी माँ से लिपट गई।
दोनों फूट-फूटकर रोने लगीं।
"आप मुझे छोड़कर क्यों चली गई थीं?"
नूरजहाँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था, बेटा..."
वह रोते हुए बोलीं,
"मुझे तुमसे दूर किया गया था।"
आयत ने उनकी तरफ देखा।
"किसने?"
नूरजहाँ की आँखों में डर उतर आया।
उन्होंने चारों तरफ देखा।
फिर धीमे से कहा—
"जिस इंसान से तुम्हारे दादा ने तुम्हें बचाया था... वही आज भी तुम्हें ढूँढ रहा है।"
आयत के चेहरे पर डर छा गया।
"कौन?"
नूरजहाँ ने जवाब देने के लिए होंठ खोले ही थे कि अचानक बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई।
दोनों चौंक गईं।
नूरजहाँ ने आयत का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
"क्यों?"
नूरजहाँ ने डरते हुए कहा—
"क्योंकि उसने तुम्हें ढूँढ लिया है।"
उसी वक्त हॉस्पिटल के बाहर अर्जुन की बाइक आकर रुकी।
अर्जुन तेजी से अंदर की तरफ बढ़ा।
लेकिन उसे नहीं पता था...
कि उसी पुराने हॉस्पिटल के अंधेरे गलियारे में कोई तीसरा व्यक्ति भी खड़ा था।
उसकी नजर आयत और नूरजहाँ पर थी।
उसने फोन निकालकर सिर्फ इतना कहा—
"आयत अपनी माँ तक पहुँच चुकी है। अब अगला कदम शुरू करो।"
और फोन के दूसरी तरफ से जवाब आया—
"अर्जुन को भी वहीं रहने दो। अब दोनों को एक साथ सच पता चलेगा।"
क्रमशः...