एपिसोड 3 नामुमकिन इश्क
अर्जुन अभी उस लड़की को बचाकर अपनी क्लास की ओर जा ही रहा था कि तभी कॉलेज के मुख्य गेट पर एक सफ़ेद कार आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
धीरे-धीरे एक लड़की कार से नीचे उतरी।
हल्के फ़िरोज़ी रंग का सूट, सिर पर सलीके से रखा सफ़ेद दुपट्टा, हाथों में कुछ किताबें और चेहरे पर ऐसी सादगी कि जो भी देखे, एक पल के लिए ठहर जाए।
उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों में हल्की-सी घबराहट थी। आखिर आज इस कॉलेज में उसका पहला दिन था।
वह इधर-उधर देखते हुए आगे बढ़ी, लेकिन उसे रास्तों का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।
उधर अर्जुन अपनी ही धुन में सामने से आ रहा था।
दोनों का ध्यान कहीं और था।
और अगले ही पल...
धड़ाम...
हल्की-सी टक्कर हुई।
लड़की के हाथों से किताबें नीचे फर्श पर बिखर गईं।
"आह...!"
वह घबरा गई।
अर्जुन भी एक कदम पीछे हटा।
"सॉरी..."
दोनों के मुँह से एक साथ यही शब्द निकला।
एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखकर हल्का-सा मुस्कुरा दिए।
अर्जुन बिना कुछ बोले झुक गया और नीचे गिरी किताबें उठाने लगा।
लड़की भी जल्दी से झुक गई।
एक ही किताब पर दोनों का हाथ एक साथ पड़ा।
जैसे ही उनकी उँगलियाँ एक-दूसरे से हल्के से टकराईं...
दोनों की नज़रें मिलीं।
अर्जुन कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया।
उसने पहली बार इतने क़रीब से उस लड़की को देखा।
बड़ी-बड़ी मासूम आँखें...
चेहरे पर सादगी...
और बात करने से पहले भी चेहरे पर झलकता हुआ अदब।
लड़की ने झट से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"माफ़ कीजिए... मेरी वजह से आपकी भी किताबें गिर गईं।"
उसकी आवाज़ में ऐसी नरमी थी कि अर्जुन कुछ पल तक बस उसे सुनता रह गया।
फिर उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"कोई बात नहीं... गलती मेरी भी थी।"
अर्जुन ने सारी किताबें उठाकर उसकी ओर बढ़ा दीं।
लड़की ने दोनों हाथों से किताबें लेते हुए कहा,
"बहुत-बहुत शुक्रिया... आपने मदद की।"
फिर हल्का-सा मुस्कुराकर बोली,
"वैसे... मेरा नाम आयत है। आज मेरा इस कॉलेज में पहला दिन है, इसलिए थोड़ी घबरा गई थी।"
अर्जुन पहली बार किसी लड़की की बातों को इतने ध्यान से सुन रहा था।
उसकी आवाज़ में कोई बनावट नहीं थी।
हर शब्द में तहज़ीब थी।
हर लफ़्ज़ ऐसा लगता था जैसे बहुत सोच-समझकर बोला गया हो।
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद आयत ने पूछा,
"आप... यहीं पढ़ते हैं?"
अर्जुन ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"अगर आपको तकलीफ़ न हो... क्या आप मुझे एडमिशन ऑफिस का रास्ता बता देंगे? मैं पहली बार आई हूँ, इसलिए कुछ समझ नहीं पा रही।"
अर्जुन कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।
फिर बोला,
"सीधे जाइए... सामने जो पहली बिल्डिंग दिख रही है, उसके दाहिनी तरफ़ एडमिशन ऑफिस है।"
आयत ने उसी दिशा में देखा और मुस्कुरा दी।
"बहुत शुक्रिया..."
फिर उसने पूरे अदब से कहा,
"अल्लाह आपको हमेशा सलामत रखे।"
इतना कहकर वह आगे बढ़ गई।
अर्जुन वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रह गया।
उसने कभी किसी लड़की की बातों पर ध्यान नहीं दिया था।
लेकिन आज...
उसकी आवाज़...
उसकी सादगी...
उसका अदब...
सब कुछ अर्जुन के दिल में कहीं उतर गया था।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि इंसान की ख़ूबसूरती सिर्फ़ चेहरे में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और बात करने के अंदाज़ में भी होती है।
उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...
कि यह छोटी-सी मुलाक़ात उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनने वाली है।
और दूसरी तरफ़...
आयत भी चलते-चलते एक बार पीछे मुड़ी।
अर्जुन अब भी वहीं खड़ा था।
दोनों की नज़रें एक बार फिर मिलीं...
और फिर दोनों अपनी-अपनी राह पर बढ़ गए।
उन्हें क्या पता था...
क़िस्मत ने उनकी पहली मुलाक़ात लिख दी थी।
अब आगे उनकी कहानी भी वही लिखने वाली थी।