Impossible Ishq - Episode 7 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | नामुमकिन इश्क - एपिसोड 7

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 7

एपिसोड 7

बेचैनी का नाम... शायद मोहब्बत

अर्जुन को कॉलेज से निलंबित हुए तीन दिन हो चुके थे।

इन तीन दिनों में उसने मेडिकल की किताबें तो कई बार खोलीं, लेकिन हर बार कुछ ही मिनटों में बंद कर देता।

वह खुद से ही परेशान था।

कमरे की बालकनी में खड़ा उसने गहरी साँस ली।

"ये मुझे हो क्या गया है...?"

उसके दिमाग में बार-बार एक ही चेहरा घूम रहा था...

आयत।

उसने खुद से कहा,

"मैं तो उसे ठीक से जानता भी नहीं... फिर भी बार-बार उसी का चेहरा क्यों याद आता है?"

"जब तक उसे देख नहीं लेता... मन बेचैन-सा रहता है।"

"ये आखिर कैसा एहसास है?"

उसे अपने ही सवालों का जवाब नहीं मिल रहा था।

उधर...

कॉलेज में आयत भी पहले जैसी नहीं रही थी।

सावी उसके पास बैठी कुछ बोल रही थी, लेकिन आयत का ध्यान कहीं और था।

"आयत..."

"आयत... सुन रही हो?"

आयत अचानक चौंकी।

"हाँ... क्या हुआ?"

सावी मुस्कुराई।

"कहाँ खोई रहती हो आजकल?"

आयत ने बात टाल दी।

"कहीं नहीं..."

लेकिन सच तो यह था कि पिछले तीन दिनों से उसका भी किसी चीज़ में मन नहीं लग रहा था।

क्लास चल रही होती...

उसकी नज़र अनजाने में कॉलेज के गेट की तरफ़ चली जाती।

कॉरिडोर में कोई बाइक की आवाज़ आती...

तो दिल एक पल के लिए तेज़ धड़कने लगता।

फिर जब पता चलता कि अर्जुन नहीं है...

तो न जाने क्यों मन उदास हो जाता।

आयत ने मन ही मन खुद को डाँटा।

"मुझे क्या हो गया है?"

"मैं क्यों हर वक्त उसी के बारे में सोच रही हूँ?"

"क्या सिर्फ इसलिए कि उसने मेरी मदद की थी?"

वह जितना खुद को समझाने की कोशिश करती...

उतना ही अर्जुन का ख़याल उसके दिल में गहराता जाता।

उधर अर्जुन ने आखिर फैसला कर लिया।

"कॉलेज के अंदर नहीं जा सकता..."

"लेकिन उसे एक बार देख तो सकता हूँ।"

उसने बाइक स्टार्ट की और कॉलेज पहुँच गया।

कॉलेज के मुख्य गेट से थोड़ी दूर उसने अपनी बाइक खड़ी कर दी।

वह हेलमेट उतारकर बाइक से टिक गया।

उसकी नज़र बार-बार कॉलेज के गेट पर जा रही थी।

"बस... छुट्टी हो जाए।"

"एक बार उसे देख लूँ... फिर चला जाऊँगा।"

समय जैसे रुक-सा गया था।

करीब आधे घंटे बाद कॉलेज की छुट्टी की घंटी बजी।

धीरे-धीरे छात्र बाहर निकलने लगे।

अर्जुन की नज़र भीड़ में किसी एक चेहरे को ढूँढ़ रही थी।

और फिर...

हल्के नीले रंग का सूट...

सिर पर दुपट्टा...

चेहरे पर वही सादगी...

आयत।

उसी पल आयत की नज़र भी गेट के बाहर खड़े अर्जुन पर पड़ी।

दोनों कुछ सेकंड तक बस एक-दूसरे को देखते रहे।

न कोई मुस्कान...

न कोई शब्द...

लेकिन उन कुछ पलों में जैसे दोनों के दिल को सुकून मिल गया।

अर्जुन के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

"चलो... आज देख लिया।"

उधर आयत के चेहरे पर भी अनजानी-सी राहत उतर आई।

"ये आए थे...!"

"सिर्फ... बाहर से?"

वह कुछ समझ नहीं पाई, लेकिन उसके चेहरे की उदासी पलभर में गायब हो गई।

दोनों ने बिना कुछ कहे एक-दूसरे को देखा...

और फिर अपनी-अपनी राह चल पड़े।

शायद...

दोनों के दिल अब एक-दूसरे की मौजूदगी के आदी होने लगे थे।

उसी समय कॉलेज के दूसरे कॉरिडोर में...

सनाया अपनी दो सहेलियों के साथ हँसते-बातें करते हुए जा रही थी।

बातों में ध्यान इतना था कि अचानक किसी से टकरा गई।

"ओह...!"

उसने झुंझलाकर सामने देखा।

और सामने वही लड़का खड़ा था...

करण।

करण भी उसे देखकर हल्का-सा मुस्कुराया।

सनाया ने भौंहें चढ़ा लीं।

"फिर तुम?"

"तुम्हें टकराने के लिए मैं ही मिलती हूँ क्या?"

करण ने हँसते हुए जवाब दिया,

"ये सवाल तो मैं भी पूछ सकता हूँ।"

"कॉलेज इतना बड़ा है... फिर भी हर बार तुम ही सामने आ जाती हो।"

सनाया ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा,

"ज़्यादा स्मार्ट बनने की कोशिश मत करो।"

करण ने मुस्कुराकर रास्ता छोड़ दिया।

"ठीक है मैडम... इस बार गलती किसी की भी रही हो, मैं ही 'सॉरी' बोल देता हूँ।"

सनाया ने कुछ नहीं कहा।

बस उसे एक नज़र देखा...

और अपनी सहेलियों के साथ आगे बढ़ गई।

करण भी हल्की मुस्कान के साथ दूसरी तरफ़ चला गया।

दोनों को शायद अभी अंदाज़ा भी नहीं था...

कि किस्मत बार-बार उनकी राहें यूँ ही टकराने वाली है।