Impossible Ishq - Episode 5 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | नामुमकिन इश्क - एपिसोड 5

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 5

एपिसोड 5

नई सुबह... नई हलचल

अगली सुबह लखनऊ का आसमान हल्की सुनहरी धूप से जगमगा रहा था। शहर की सड़कों पर रोज़ की तरह चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। कुछ ही देर में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का विशाल कैंपस भी छात्रों की भीड़ से भर गया।

उसी समय कॉलेज के मुख्य गेट से अर्जुन वशिष्ठ अपने दो दोस्तों के साथ अंदर दाखिल हुआ। सफेद शर्ट के ऊपर काली जैकेट, गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में लाल कलेवा और चेहरे पर हमेशा की तरह बेफिक्र मुस्कान।

उसे देखते ही कई छात्रों ने आवाज़ लगाई—

"अर्जुन भाई... गुड मॉर्निंग!"

अर्जुन मुस्कुराया।

"गुड मॉर्निंग... पढ़ाई पर ध्यान देना।"

कॉरिडोर में खड़ी लड़कियों की निगाहें अनायास ही उसकी तरफ़ मुड़ गईं।

"यार... आज तो अर्जुन पहले से भी ज़्यादा हैंडसम लग रहा है।"

"काश... एक बार मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दे।"

"इतना एटीट्यूड भी अच्छा नहीं होता... लेकिन फिर भी दिल तो इसी पर आता है।"

सब हँसने लगीं।

एक लड़की ने हिम्मत करके कहा—

"हाय अर्जुन!"

अर्जुन ने बस हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया और बिना रुके आगे बढ़ गया।

यह सब दूर खड़ी आयत चुपचाप देख रही थी।

उसने मन ही मन सोचा—

"अजीब इंसान है... कोई भी लड़की आवाज़ दे, लेकिन यह किसी के पीछे नहीं भागता।"

दूसरी ओर कॉलेज की पार्किंग में खड़ा रोहन मेहरा यह सब देख रहा था। महँगी घड़ी, ब्रांडेड कपड़े और चेहरे पर घमंड साफ़ झलक रहा था।

उसने झुँझलाकर कहा,

"यार, अगर इस कॉलेज में अर्जुन वशिष्ठ नहीं होता, तो सारी लड़कियाँ मेरे पीछे घूमतीं। यहाँ तक कि मेरी गर्लफ्रेंड भी इसकी तारीफ़ करती रहती है।"

उसके साथ खड़े समर ने हँसते हुए कहा,

"भाई... अर्जुन की लोकप्रियता अलग ही लेवल पर है।"

रोहन की आँखों में जलन उतर आई।

"एक बार इसकी कोई कमज़ोरी मेरे हाथ लग जाए... फिर देखना, अर्जुन वशिष्ठ का घमंड कैसे टूटता है।"

उसी समय उसकी नज़र सामने खड़ी आयत पर पड़ी।

सादगी से पहना हुआ सूट, सिर पर दुपट्टा और चेहरे पर मासूमियत...

रोहन कुछ पल उसे देखता रह गया।

"ये लड़की कौन है?"

समर मुस्कुराया।

"नई एडमिशन है। नाम है आयत खान। मुंबई से आई है। खान साहब की बेटी है।"

"इतनी जल्दी पूरी जानकारी निकाल ली?"

समर हँस पड़ा।

"नई स्टूडेंट्स की खबर रखना मेरी पुरानी आदत है।"

तभी उनके साथ खड़ा करण गंभीर आवाज़ में बोला,

"दोनों अपनी आदतें संभालकर रखना। वह खान साहब की बेटी है। और सबसे ज़रूरी बात—वह इस कॉलेज में पढ़ने आई है, किसी की परेशानी बनने नहीं।"

रोहन ने व्यंग्य से कहा,

"तुम हर बात में ज्ञान देने लगते हो।"

करण ने शांत स्वर में जवाब दिया,

"ज्ञान नहीं... सही बात कह रहा हूँ। किसी लड़की का सम्मान करना सीखो।"

इतना कहकर वह वहाँ से चला गया।

समर हँस पड़ा।

"देखा... फिर शुरू हो गया महात्मा।"

रोहन भी हँस दिया, लेकिन उसकी नज़र अभी भी आयत की तरफ़ ही थी।

उधर करण तेज़ कदमों से कॉरिडोर की ओर बढ़ रहा था कि तभी सामने से आती एक लड़की से उसकी ज़ोरदार टक्कर हो गई।

दोनों की किताबें ज़मीन पर बिखर गईं।

लड़की गुस्से में बोली,

"मिस्टर! देखकर नहीं चल सकते क्या?"

करण ने सिर उठाकर देखा...

सामने खड़ी लड़की की तेज़ आँखें गुस्से से भरी थीं।

वह थी...

सनाया खन्ना।

कॉरिडोर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
करण और सनाया दोनों की किताबें ज़मीन पर बिखरी हुई थीं।
सनाया ने गुस्से से करण की तरफ़ देखा और बोली,
"मिस्टर! देखकर नहीं चल सकते थे क्या? आपकी वजह से मेरी सारी किताबें नीचे गिर गईं।"
करण भी झुककर अपनी किताबें उठाने लगा।
उसने शांत स्वर में कहा,
"माफ़ कीजिए... लेकिन मैं अकेला नहीं टकराया। आप भी तो सामने देखकर नहीं चल रही थीं।"
"वाह!"
सनाया ने ताली बजाते हुए कहा।
"गलती भी आपकी और जवाब भी आप ही दे रहे हैं?"
करण हल्का-सा मुस्कुराया।
"जवाब इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि गलती दोनों की थी।"
सनाया ने भौंहें चढ़ा लीं।
"आपको ज़रा भी शर्म नाम की चीज़ है या नहीं?"
करण ने किताबें उठाईं और मुस्कुराते हुए बोला,
"शर्म तो है... लेकिन लगता है आपके अंदर गुस्सा ज़रूरत से थोड़ा ज़्यादा है। कभी इस्तेमाल भी कर लिया कीजिए।"
इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।
सनाया कुछ पल उसे जाते हुए देखती रही।
फिर धीरे से बुदबुदाई,
"बहुत घमंडी लड़का है..."
"इसका घमंड तोड़कर ही रहूँगी।"
वह अपनी किताबें सँभालकर दूसरी तरफ़ चली गई।
उधर कॉलेज के गार्डन में...
आयत अकेली एक बेंच पर बैठी थी।
चारों तरफ़ छात्रों की भीड़ थी, लेकिन उसका अभी तक कोई दोस्त नहीं बना था।
उसने एक गहरी साँस ली।
"या अल्लाह... यहाँ सब एक-दूसरे को जानते हैं... बस मैं ही अकेली हूँ।"
तभी एक प्यारी-सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी।
"हेलो... मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?"
आयत ने सिर उठाकर देखा।
सामने एक मुस्कुराती हुई लड़की खड़ी थी।
"जी... क्यों नहीं।"
लड़की उसके पास बैठ गई।
"वैसे मेरा नाम सावी चौधरी है।"
"और तुम्हारा?"
आयत मुस्कुराई।
"मैं आयत खान।"
सावी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
"ओह... तो तुम वही नई स्टूडेंट हो?"
"हाँ... अभी कुछ दिन पहले ही एडमिशन लिया है।"
सावी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"तो फिर... आज से हम दोस्त?"
आयत भी मुस्कुराकर उसका हाथ थाम लिया।
"दोस्त।"
दोनों हँस पड़ीं।
सावी बोली,
"सच कहूँ तो मेरा भी कोई खास दोस्त नहीं है। अच्छा हुआ तुम मिल गई।"
आयत ने राहत की साँस ली।
"मैं भी अकेले-अकेले बोर हो गई थी।"
दोनों बातें करने लगीं।
उसी समय अर्जुन अपने दोस्तों के साथ वहाँ से गुज़रा।
उसकी नज़र अचानक सावी पर पड़ी।
वह मुस्कुरा दिया।
सावी ने भी उसे देखते ही ज़ोर से आवाज़ लगाई—
"अर्जुन भाई...!"
अर्जुन रुक गया।
"क्या हुआ, पगली?"
"बस... बाद में आपसे एक ज़रूरी बात करनी है।"
"ठीक है, क्लास के बाद मिलना।"
"ओके, अर्जुन भाई।"
यह सब देखकर आयत हैरान रह गई।
सावी वापस उसके पास आकर बैठ गई।
आयत से रहा नहीं गया।
उसने पूछा,
"एक बात पूछूँ?"
"हाँ... पूछो।"
"तुमने उन्हें 'अर्जुन भाई' कहा... क्या वो सच में तुम्हारे भाई हैं? लेकिन तुम्हारा सरनेम चौधरी है और उनका वशिष्ठ..."
सावी हँस पड़ी।
"अरे पगली... हर रिश्ता खून का नहीं होता।"
"हम दोनों बचपन से एक ही मोहल्ले में रहते हैं। हमारे घर पास-पास हैं। बचपन से ही मैं उन्हें अपना बड़ा भाई मानती हूँ और वो मुझे अपनी छोटी बहन। इसलिए मैं उन्हें अर्जुन भाई कहती हूँ।"
आयत ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अच्छा... इसलिए।"
सावी हँसते हुए बोली,
"और वैसे भी... इस कॉलेज में ऐसा कौन होगा जो अर्जुन वशिष्ठ को नहीं जानता?"
आयत ने धीरे से अर्जुन की तरफ़ देखा।
उसके चेहरे पर अनजानी-सी मुस्कान आ गई।
शायद...
वह भी अब अर्जुन को थोड़ा-थोड़ा जानने लगी थी।