Impossible Ishq - Episode 4 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | नामुमकिन इश्क - एपिसोड 4

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 4


एपिसोड 4: एक अजीब-सी बेचैनी
कॉलेज की छुट्टी हुए लगभग एक घंटा बीत चुका था।
शाम की हल्की सुनहरी धूप पूरे लखनऊ शहर को अपनी नरम रोशनी से ढक रही थी। सड़कों पर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी थी। कहीं चाट की दुकानें सजी थीं, कहीं कुल्हड़ वाली चाय की महक हवा में घुल रही थी। बाज़ार अपनी पूरी रौनक पर था।
उधर आयत अपनी छोटी बहन हया का हाथ पकड़े अमीनाबाद बाज़ार की गलियों में धीरे-धीरे चल रही थी।
"आपा... जल्दी चलिए ना, मुझे नई चूड़ियाँ भी लेनी हैं और अम्मी ने कपड़ा भी मंगवाया है।" हया ने मासूमियत से कहा।
आयत मुस्कुराई।
"अच्छा बाबा... सब ले लेंगे। पहले आराम से चलते हैं।"
दोनों बहनें बाज़ार में घूमते हुए दुकानों को देख रही थीं।
तभी सामने सड़क पर अचानक हलचल मच गई।
कई दुकानदार अपनी-अपनी जगह से मुस्कुराते हुए किसी को आवाज़ देने लगे।
"राधे-राधे अर्जुन भैया!"
"राधे-राधे बेटा!"
"राधे-राधे अर्जुन बाबू!"
आयत ने अनायास ही उधर देखा।
सड़क के उस पार अर्जुन वशिष्ठ अपने दो दोस्तों के साथ चला आ रहा था।
गले में रुद्राक्ष की माला...
हल्की दाढ़ी...
काले रंग की जैकेट...
और चेहरे पर वही आत्मविश्वास।
लेकिन जो बात आयत को सबसे ज़्यादा अच्छी लगी, वह उसका व्यवहार था।
हर कोई उसे आवाज़ देता...
और अर्जुन हर बार मुस्कुराकर दोनों हाथ जोड़ देता।
"राधे-राधे काका।"
"राधे-राधे चाची।"
"राधे-राधे शर्मा अंकल।"
वह किसी से घमंड से बात नहीं कर रहा था।
हर छोटे-बड़े को पूरे सम्मान के साथ जवाब दे रहा था।
एक बूढ़ी अम्मा सड़क पार करने की कोशिश कर रही थीं।
अर्जुन तुरंत उनके पास पहुँचा।
"आइए अम्मा... धीरे-धीरे।"
उसने उनका हाथ पकड़कर आराम से सड़क पार करवाई।
अम्मा ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"भगवान हमेशा खुश रखे बेटा।"
अर्जुन मुस्कुराया।
"आपका आशीर्वाद बना रहे बस।"
यह सब देखकर आयत की आँखों में एक अलग-सी चमक आ गई।
उसने मन ही मन सोचा—
"यह वही लड़का है... जो कॉलेज में सबको इतना खतरनाक लगता है?"
"लेकिन यहाँ... हर कोई इसे इतना प्यार और सम्मान क्यों देता है?"
"शायद... यह बाहर से जितना सख़्त है, अंदर से उतना ही अच्छा इंसान भी है।"
आयत के चेहरे पर अनजाने में मुस्कान आ गई।
हया ने उसकी तरफ़ देखा।
"आपा... क्या हुआ?"
"कुछ नहीं..."
लेकिन सच तो यह था कि आयत पहली बार अर्जुन के बारे में सोच रही थी।
उसी समय अचानक पीछे से लड़कियों की खिलखिलाने की आवाज़ आई।
"अर्जुन... रुको ना!"
अर्जुन ने पलटकर देखा।
कॉलेज की पाँच-छह लड़कियाँ उसकी तरफ़ दौड़ती हुई आ रही थीं।
उनमें सबसे आगे थी—
सनाया।
स्टाइलिश कपड़े, चेहरे पर आत्मविश्वास और होंठों पर शरारती मुस्कान।
वह सीधे अर्जुन के सामने आकर खड़ी हो गई।
"इतनी जल्दी क्या है मिस्टर अर्जुन वशिष्ठ?"
अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"कोई काम था?"
"काम तो है..."
सनाया ने मुस्कुराते हुए कहा।
बाकी लड़कियाँ भी अर्जुन को चारों तरफ़ से घेरकर खड़ी हो गईं।
कोई उसकी जैकेट की तारीफ़ करने लगी।
कोई बोली—
"आज तो बहुत हैंडसम लग रहे हो।"
दूसरी बोली—
"एक कॉफी तो बनती है।"
अर्जुन हल्का-सा हँसा।
"रास्ता दीजिए... मुझे घर जाना है।"
"इतनी भी क्या जल्दी है?"
सनाया ने शरारत से कहा।
अर्जुन आगे बढ़ने लगा।
लेकिन तभी...
सनाया ने उसका कॉलर पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।
आसपास खड़े लोग हैरानी से यह सब देखने लगे।
आयत भी कुछ दूरी पर खड़ी सब देख रही थी।
उसका दिल न जाने क्यों तेज़ धड़कने लगा।
सनाया ने धीरे से अपना हाथ अर्जुन के गाल पर रखा।
मुस्कुराते हुए बोली—
"यू नो अर्जुन..."
"जिस दिन मैंने तुम्हें पहली बार कॉलेज में देखा था..."
"उसी दिन दिल हार बैठी थी।"
"आई लव यू..."
"मैं चाहती हूँ कि हम दोनों रिलेशनशिप में आ जाएँ।"
पूरा माहौल कुछ पल के लिए शांत हो गया।
सबकी नज़र अर्जुन पर थी।
आयत भी साँस रोके खड़ी थी।
अर्जुन ने बहुत शांति से सनाया का हाथ अपने गाल से हटाया।
फिर अपना कॉलर ठीक किया।
उसकी आवाज़ बिल्कुल शांत थी।
"सनाया..."
"सबसे पहले... किसी की इज़्ज़त करना सीखो।"
"और दूसरी बात..."
"अर्जुन वशिष्ठ किसी का टाइमपास नहीं है।"
सनाया मुस्कुराई।
"मतलब...?"
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"जिस दिन अर्जुन वशिष्ठ किसी से मोहब्बत करेगा..."
"पूरी शिद्दत से करेगा..."
"और उम्रभर उसी का साथ निभाएगा।"
"मुझे प्यार पर यक़ीन है..."
"लेकिन दिखावे वाले रिश्तों पर नहीं।"
"इसलिए... मुझे माफ़ कीजिए।"
इतना कहकर उसने हल्की मुस्कान दी और वहाँ से आगे बढ़ गया।
सनाया कुछ पल तक उसे जाते हुए देखती रही।
फिर अपने मन में बुदबुदाई—
"अर्जुन वशिष्ठ..."
"आज मना कर रहे हो..."
"लेकिन एक दिन तुम्हें मेरे पास आना ही पड़ेगा।"
उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई।
उधर...
आयत चुपचाप खड़ी थी।
उसने अर्जुन की पूरी बात सुनी थी।
उसे राहत महसूस हुई कि अर्जुन ने किसी लड़की का दिल नहीं दुखाया, लेकिन उसके साथ झूठा वादा भी नहीं किया।
फिर भी...
जब उसने सनाया को अर्जुन के इतने क़रीब देखा था...
उसके दिल में एक अजीब-सी कसक उठी थी।
वह खुद से सवाल करने लगी—
"मुझे इतना बुरा क्यों लगा?"
"आख़िर अर्जुन मेरी ज़िंदगी में है ही कौन?"
"फिर भी... दिल इतना बेचैन क्यों हो गया?"
उसी समय अर्जुन आगे बढ़ते-बढ़ते एक पल के लिए रुका।
उसकी नज़र दूर खड़ी आयत पर पड़ी।
दोनों की आँखें कुछ क्षणों के लिए मिलीं।
न कोई मुस्कान...
न कोई शब्द...
बस एक ख़ामोश नज़र...
और फिर अर्जुन अपने दोस्तों के साथ आगे बढ़ गया।
आयत देर तक उसे जाते हुए देखती रही।
उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था...
कि उसके दिल में जो पहली हल्की-सी बेचैनी आज पैदा हुई है...
वही एक दिन उसकी ज़िंदगी की सबसे गहरी मोहब्बत बनने वाली है।